Saturday, 16 August 2014

प्रधानमंत्री गाँवों को कैसे बनाएँगे स्वावलंबी ?

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस पर दिए अपने पहले भाषण में गाँवों को लेकर जो दृष्टिकोण प्रकट किया है, वह गाँववासियों के लिए आह्लादकारी तो है ही, शहरों में रह रहे शहरियों के लिए भी सुखदायक है. क्योंकि अगर गाँव की दशा और दिशा बदलेगी, तो गाँवों से भारी संख्या में हो रहा पलायन काफी हद तक थमेगा. शहरों में भीड़ घटेगी और बढ़ती आबादी की वजह से चरमराती शहरी व्यवस्था कुछ बेहतर होगी.
भारत गाँवों का देश है, हमारी संस्कृति गाँवों से ही उपजी है और हमारे विचारों का मूल आधार भी गाँव है. हमारे राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने इसे भली भाँति जानते थे, इसीलिए उन्होंने भारत की तरक्की का रास्ता भी गाँवों से निकलते हुए रास्तों में देखा था. मगर स्वतंत्रता के बाद हमारे देश के गाँधीवादी नेता उस राह पर चल न सके. देश की तरक्की का रास्ता उन्हें भारतीय गाँवों के बजाय यूरोपीय रास्तों पर चलने में दिखा. देश में शहरीकरण और औद्योगिकीकरण को बढ़ावा दिया गया और विकास की दौड़ में गाँवों की भूमिका को गौण कर दिया गया.
खुशी है कि 67 साल बाद किसी प्रधानमंत्री ने हमारे गाँव की शक्ति को पहचाना. जिस तरह से महात्मा गाँधी पहचानते थे. हालाँकि हमारे नए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी उस सांगठनिक पृष्ठभूमि से आएँ हैं, जिस पर महात्मा गाँधी की हत्या में शामिल रहने का आरोप है. खैर वो इतिहास और आरोप-प्रत्यारोप की राजनीतिक बातें हैं, आज की सच्चाई यह है कि नरेन्द्र मोदी महात्मा गाँधी के सपनों को अपना सपना मानकर उसे पूरा करने का संकल्प करते दिख रहे हैं. उन्होंने अपने भाषण में महात्मा गाँधी की दृष्टि का विशेष तौर पर जिक्र किया है. यह सुखद है.
नरेन्द्र मोदी ने अपने सांसदों का आह्वान किया है कि सभी सांसद अपने-अपने क्षेत्र में आदर्श गाँव के निर्माण में जुट जाएँ. शहरी क्षेत्र के सांसदों से भी गाँव चुनने की अपील की है. ऎसी ही अपील मोहन दास करमचन्द गाँधी यानी हमारे महात्मा गाँधी ने आजादी की लड़ाई लड़ते वक्त काँग्रेसी कार्यकर्त्ताओं से की थी कि वे गाँवों से जुड़ें और उनकी बेहतरी के लिए काम करें. साफ –सफाई से लेकर किसानी और ग्रामीण व्यवस्था तक के सभी कामों से काँग्रेसी कार्यकर्त्ताओं से अपील की थी. लेकिन जब नेताओं ने ही गाँधी की अपील को नजरअंदाज कर दिया तब कार्यकर्ताओं से कौन पूछे.
आजादी के बाद नेताओं और मंत्रियों के फॉर्महाउस नुमा बड़े-बड़े बंगले इसलिए बनबाए गए थे कि सांसद-विधायक और मंत्री अपने रिहाइशी परिसर में खेती का कार्य भी करेंगे और किसानों की समस्या को नजदीक से समझेंगे. ज़रूरत भर अनाज उगा लेंगे यह उसका निहित ल्क्ष्य था.
मगर हुआ क्या? राष्ट्रपिता के विचारों की अवहेलना और देश के संसाधनों का फिजूल इस्तेमाल.
नरेन्द्र मोदी अगर अपने सांसदों को आदर्श गाँव बनाने के लिए मोटिवेट करने में कामयाब हो जाते हैं तो निश्चित तौर पर बड़ी उपलब्धि होगी और देश को नई दिशा मिलेगी. देश उस रास्ते पर चल पड़ेगा जो उसका स्वाभाविक रास्ता है. यूरोपियन रास्ते पर चलकर हमने तरक्की तो की है, मगर अपनी जमीन, अपनी संस्कृति और अपनी पहचान की अवहेलना कर, उसे जबरन त्याग कर. नरेन्द्र मोदी अगर हमारी राष्ट्रीय पहचान और शक्ति को सचमुच देश के विकास की मुख्यधारा बनाना चाहते हैं, तो यह गाँधी के सपनों का भारत बनाने की दिशा में ठोस कदम होगा.
लेकिन पिछले 67 सालों में देश ने अपनी व्यवस्थाएँ जिस तरह की बनाई हैं और अपने जनमानस को जिस तरह की मानसिकता दी है, उसे विपरीत दिशा में बदल पाना आसान नहीं है. भारत गाँवों का देश है. अभी भी 7 लाख से अधिक गाँव हैं जिसमें 70 प्रतिशत से अधिक आबादी रहती है. मगर पिछले 67 सालों में देश की अर्थ व्यवस्था पूरी तरह शहरोन्मुखी रही. इन सालों में गाँव न सिर्फ आर्थिक स्तर पर बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक स्तर पर भी बर्बाद हुए. आज गाँवों में न रोजगार है, न समाज और न ही चेतना. हर स्तर पर गाँव शहरों की नकल बन गए हैं.
इन सालों में गाँवों की मदद के नाम पर भारत व राज्य सरकारें हर साल बेशक लाखों, करोड़ों और अरबों रुपए खर्च करती रही, मगर गाँवों में न तो शिक्षा का स्तर सुधरा न जीवन स्तर. गाँवों का मुख्य रोजगार कृषि इन सालों में बुरी तरह चौपट हुआ, क्योंकि कृषि उत्पादनों को न्यायसंगत मुनाफा आधारित बाजार देने की दिशा में कोई सार्थक पहल नहीं हुई. कृषि लगातार घाटे का रोजगार बनी रही. कृषि के जरूरी संसाधनों खाद, बीज, कृषि यंत्र की कीमतों और मजदूरी में निरंतर वृद्धि की वजह से किसानों का घाटा लगातार बढ़ता गया. ऊपर से मॉनसुन के भरोसे खेती. कभी बाढ़ तो कभी सूखे से सामना. किसानों को घोर निराशा में धकेल दिया. आज किसान खेती छोड़कर शहर की तरफ भाग रहे हैं. बच्चों को खेती से दूर रखने की हर संभव जुगत कर रहे हैं.

ऎसे में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की चुनौती है कृषि को लाभोन्मुखी बनाना. यह बेहद कठिन काम है, क्योंकि कृषि उत्पादित वस्तुओं के न्यायसंगत मूल्य निर्धारण से खाद्य वस्तुओं की कीमते बढ़ेंगी और महँगाई दमघोंटू स्तर पर पहुँच जाएगी. देखना है कि नरेन्द्र मोदी स्वतंत्रता के बाद शहरजीवी बन गए गाँवों को कैसे स्वावलंबी बनाते हैं ?
धनंजय कुमार 

Sunday, 29 June 2014

गाँव को बचाना है तो भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन करना होगा

हमारे गाँव और भूमि अधिग्रहण कानून
भूमि अधिग्रहण कानून आरंभ से ही हमारे गाँव के लिए अभिशाप की तरह रहा. देश में पहली बार भूमि अधिग्रहण कानून 1894 में बना. अंग्रेजी सरकार ने सार्वजनिक तरक्की के उद्देश्य की पूर्त्ति के लिए यह कानून बनाया था. हालाँकि कोई भी कानून न्याय को आधार बनाकर ही बनाया जाता है, मगर अंग्रेजों द्वारा बनाया गया यह भूमि अधिग्रहण कानून सीधे तौर पर न्याय को अँगूठा दिखानेवाला था. यह कानून सरकार को भूमि अधिग्रहण का अधिकार तो देता था, मगर जिसकी जमीन का अधिग्रहण किया जाता था, उसकी न तो मर्जी की परवाह थी, न उसके नुकसान और भविष्य की. कोई भी सरकार शासन के एवज में सुरक्षा के जो अधिकार देने को बाध्य होती है, इस कानून के तहत उस सुरक्षा के अधिकार की भी धज्जियाँ उड़ाई जाती रहीं. आश्चर्यजनक और विडंबनापूर्ण तो यह है कि आजादी के बाद भी यह कानून दशकों हमारे किसानों का गला घोंटता रहा. आजाद हिन्दुस्तान में भी किसी ने किसानों के साथ होनेवाले इस अन्याय की तरफ ध्यान नहीं दिया.
अंग्रेजों द्वारा बनाये गये इस भूमि अधिग्रहण कानून को न्यायपरक बनाने का प्रयास पहली बार आजादी के 37 सालों बाद 1984 में किया गया. इस बदलाव में किसानों को उचित मुआवजा देने का प्रावधान किया गया. मगर अंग्रेजों का बनाया यह कानून वैसे ही अलोकतांत्रिक बना रहा, यानी सरकार सार्वजनिक हित के उद्देश्य से किसानों की मर्जी के बगैर भी भूमि अधिग्रहण कर सकती थी. वैश्वीकरण और आर्थिक उदारीकरण के बाद इस कानून का और भी बेजा इस्तेमाल हुआ. नेताओं, नौकरशाहों और पूँजीपतियों के सिंडिकेट ने इस कानून की आड़ में खूब पैसे बनाये. उद्योग लगाने और घर मुहैया कराने के नाम पर उद्योगपतियों और बिल्डरों को सस्ती कीमतों पर जितनी चाहिए, उतनी जमीनें दी गईं, जिसे बाद में उनलोगों ने ऊँची कीमतों पर बेचा और करोड़ों-अरबों कमाए. और वे किसान, जिनकी जमीनें अधिग्रहण कानून के तहत ली गईं, ठगे गए. किसानों को जब इस बात का अहसास हुआ, तब आन्दोलन हुए और मामला कोर्ट तक पहुँचा. कोर्ट ने किसानों का पक्ष सुनने के बाद कई अधिग्रहणों को अवैधानिक बताते हुए खारिज कर दिया. सुप्रीम कोर्ट ने तो इस कानून को सरासर धोखा बता इसे खत्म कर दिये जाने तक की बात कह डाली. तब जाकर देश के नीति-नियंताओं की चेतना और गैरत जागी और नया भूमि अधिग्रहण कानून बनाने की कवायद शुरू हुई. और 29 अगस्त 2013 को भूमि अधिग्रहण कानून उचित मुआवजा और पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन में पारदर्शिता का अधिकार विधेयक 2012” नाम से पास किया गया.
देश में तेजी से बढ़ते औद्योगिकीकरण और शहरीकरण की खातिर भूमि अधिग्रहण आवश्यक तो है, मगर जिस अदूरदर्शी तरीके से भूमि का अधिग्रहण किया जा रहा है, वह भारतवर्ष के भविष्य के लिए न सिर्फ खतरनाक है, बल्कि भारत की पहचान को लेकर भी गंभीर चिंता प्रकट करता है. भूमि अधिग्रहण करते वक्त भारत के नीति नियंताओं को यह सतत याद रखने की ज़रूरत है कि भारत की पहचान आरंभकाल से कृषि प्रधान और गाँवों के देश के रूप में रहा है. इसके रहन-सहन, खान-पान, पारिवारिक-सामाजिक रीति-रिवाजों और उत्सवों-त्योहारों में भी ग्रामीण जीवन की गहरी छाप है. इसीलिए हमारे देश के मनीषियों-चिंतकों ने बार-बार यह माना और दोहराया है कि भारत की आत्मा गाँवों में बसती है. नये उद्योग-धंधे लगाने और नये शहर बसाने के जुनून में आवश्यक भूमि का अधिग्रहण करते वक्त यह ध्यान रखना होगा कि ज़रूरी विकास तो हो, मगर हमारी प्राचीन पहचान और संस्कृतियों को भी नुकसान न पहुँचे. 29 अगस्त 2013 को पास हुआ नया भूमि अधिग्रहण कानून पुराने भूमि अधिग्रहण कानून के अन्यायपूर्ण प्रावधानों को खत्म कर प्रभावितों के अधिकारों को अधिक से अधिक सुरक्षा प्रदान तो करता है, किंतु ‘हमारे गाँव’ और ‘खेती’ के अस्तित्व पर मंडराते संकट को यह तनिक भी कम नहीं करता है.
खेती ही हमारे भोजन का आधार हैं, ऎसे में यह बेहद आवश्यक है कि खेती योग्य जमीनों की हर हाल में रक्षा की जाय, मगर दुर्भाग्य यह है लगातार बढ़ते शहरीकरण की वजह से खेती योग्य जमीनें लगातार विकास की भेंट चढ़ती जा रही हैं, जबकि देश-दुनिया की आबादी लगातार बढ़ती जा रही है. हरित क्रांति ने बेशक खाद्य पदार्थों के उत्पादन में बढ़ोतरी की है, मगर अन्न, सब्जी, फल और दूध आदि पौष्टिक खाद्य ज़रूरतें अब भी आधुनिक समाज के समाज के सामने मुँह फैलाए खड़ी है. विज्ञान के दम पर पेट भरने भर अनाज उपजाने में हम कामयाब ज़रूर रहे हैं, मगर हर नागरिक को पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराने में हम अब भी नाकामयाब रहे हैं. चिंताजनक बात यह है कि 2013 में बना भूमि अधिग्रहण कानून भी भविष्य में और गहराते भोजन के इस देशव्यापी संकट को पहचानने में नाकामयाब रहा है.
आरंभिक काल से लेकर अंग्रेजों के शासन के पूर्व तक भूमि को सम्पत्ति के तौर पर नहीं, जीवन जीने के आधार के तौर देखा-समझा जाता था, मगर अंग्रेजों ने प्रॉपर्टी के तौर पर देखने की हमें दृष्टि दे दी. आजादी के बाद प्रबुद्ध भारतवासियों को इस दृष्टि में तरक्की की अपार संभावनाएँ दिखी, लिहाजा न तो ज़रूरी भूमि सुधार ही लागू हो पाये और न ही भूमिका वास्तविक मोल ही समझा गया. भूमि का असली मूल्य है उसकी उर्वरा में, अन्न, सब्जियां, फल आदि के ज़रूरी खाद्य पदार्थों के उत्पादन में, मगर आधुनिक भारत ने इसकी उर्वरा के बजाय इसके बांझपन को ज्यादा कीमती माना. फसलों से लहलहाते खेतों से ज्यादा कीमती कंक्रीट के जंगल हो गये.
नया भूमि अधिग्रहण कानून खेती की जमीन को कंक्रीट के जंगल में तब्दील करने के लिए पुरजोर तरीके से उत्साहित करता है. सरकारें जिस भी क्षेत्र की जमीनों का सरकारी या निजी उपक्रमों के लिए भूमि का अधिग्रहण करती हैं, वहाँ की जमीनों के भाव आसमान छूने लगते हैं. भूमि अधिग्रहण कानून में सरकार ने यह व्यवस्था दी है अधिग्रहण असिंचित, बंजर और खेती के लिए अयोग्य भूमि का ही अधिग्रहण किया जाएगा, और अगर इस तरह की भूमि उपलब्ध न हो, तो खेती योग्य भूमि का भी अधिग्रहण किया जा सकता है. इसमें पहली बात तो यह है कि कोई भूभाग अगर आजादी के इतने साल बाद भी, असिंचित है और उसकी वजह से बंजर और अनुपजाऊ है तो इसकी वजह भूमि नहीं हमारी सरकारों का नकारापन है कि हमारी सरकारें उचित जलप्रबंधन करने में अबतक असफल रही है. दूसरी बात यह कि बंजर होने की वजह से जो भूमि बेकार पड़ी थी, जिसकी कोई उल्लेखनीय कीमत नहीं थी, वह जमीन खेतीयोग्य जमीनों से भी ज्यादा कीमती हो गई. बंजर जमीनों के मालिक अमीर हो गये और कृषियोग्य जमीनों वाले किसान गरीबी की वजह से आत्महत्या करने को अभिशप्त.
भूमि अधिग्रहण कानून की दूसरी बड़ी विडम्बना या खामी कहें वह यह है कि कृषि भूमि का अधिग्रहण कर उद्योगों के साथ-साथ रियल-एस्टेट को भी पूरे जोर-शोर से बढ़ावा दिया जा रहा है। रियल एस्टेट आज भारतवर्ष का सबसे कमाऊ क्षेत्र है. कमाई कितनी है इसका अन्दाजा इसी से लगा लीजिए कि जमीनों की दलाली करनेवाले लोग भी लाखों-करोड़ों कमा रहे हैं. देश के काले धन का बहुत बड़ा हिस्सा रियल एस्टेट में लगा है. भूमि मालिकों के पुनर्वास को लेकर सरकार नगद मुआवजा देकर उन्हें चुप तो करा देती है, मगर इस बिजनेस के खेल में कृषिभूमि और किसान उजड़ रहे हैं. इसकी चिंता भूमि अधिग्रहण कानून में दिखाई नहीं पड़ती.
आखिर आदर्श भूमि अधिग्रहण कानून का आधार क्या होइस कानून में ऐसी कौन-कौन सी शर्तें जोड़ी जाय कि किसानों के हितों को भी चोट  पहुंचे और सार्वजनिक विकास में भी बाधा  आए?
इसके लिए ज़रूरी है कि अधिग्रहण कानून में गाँव और खेत को बचाए रखने की शर्त्त अनिवार्य की जाय. इस संबंध में कोई निश्चित नियम न होने की वजह से तेजी से शहरीकरण होते इस दौर में नई इंडस्ट्री के लगते ही नई रिहाइशी कॉलोनियाँ बननी शुरू हो जाती है, और खेती योग्य पूरी की पूरी ज़मीन भी ऊँची कीमतों पर बिल्डरों द्वारा खरीद ली जाती है. इससे खेती की ज़मीन तो खत्म होती ही है, गाँव का अस्तित्व भी सदा के लिए नष्ट हो जाता है. इसके लिए आवश्यक है कि अधिग्रहण कानून में कुछ ज़रूरी बातें शामिल कर ली जायं.
पहली शर्त्त, तो यह हो कि एक खास प्रतिशत से अधिक ज़मीन एक साथ अधिग्रहित नहीं की जाय, दूसरी शर्त्त, यह जोड़ी जाय कि किसानों को खेती की जमीन के एवज में नगद मुआवजा देने के बजाय वहीं आसपास खेती योग्य ज़मीन ही दी जाएगी, ताकि खेत और किसान दोनों बचे रहे, तीसरी शर्त्त यह हो कि खेती योग्य ज़मीन का वह खास प्रतिशत जो खेती के लिए संरक्षित है, उसका इस्तेमाल सिर्फ खेती के लिए हो. और चौथी शर्त्त यह हो कि नई कॉलोनियाँ बसाने हेतु ज़मीन अधिग्रहण के साथ यह निश्चित किया जाय कि इतने फ्लैट्स के बाद इतनी खेती योग्य ज़मीन होना अनिवार्य है. इससे दो तरह के लाभ होंगे, एक तो, खेत, किसान और गाँव का अस्तित्व बचा रहेगा, दूसरे, कॉलोनियों में बसे गैर कृषक आबादी को ज़रूरी खाद्यान्न पास के किसानों से उपलब्ध हो जाया करेगा. इससे किसानों को पास में ही बाज़ार मिल जाएगा और शहरी आबादी को अपेक्षाकृत सस्ते और बढ़िया खाद्यान्न मिल जाया करेंगे.
बहरहाल, यदि भारत वर्ष की वास्तविक पहचान को बचाए रखना है तो भूमि अधिग्रहण कानून में गाँव और किसान के अस्तित्व को बचाने हेतु संशोधन ज़रूरी है. 

Friday, 27 June 2014

हमारे गाँव और भूमि सुधार- 2

भूमि सुधार की आधी-अधूरी कवायद 
जमींदारी प्रथा के अंत से कागजी तौर पर किसानों को भूमि पर अधिकार तो मिल गए, लेकिन जमींदारी प्रथा के उन्मूलन का जो मूल उद्देश्य था, भूमि पर किसानों का हक स्थापित करना, यानी भूमि उसकी जो उस पर खेती करे, अपनी आजीविका चलाये, उसपर आश्रित हो, वह वास्तविकता से कोसों दूर था. अंग्रेजी राज में किसानों से छीनकर जो जमीनें अंग्रेजी सरकार ने जमींदारों के नाम कर दी थीं, उसे वापस किसानों को लौटाया जाना अभी बाकी था.
किसान आन्दोलन के प्रमुख नेता स्वामी सहजानन्द सरस्वती जमींदारों से लड़कर किसान को उसकी जमीन वापस दिलाने के पक्षधर थे, जबकि महात्मा गाँधी जमींदारों से बलपूर्वक जमीन छीनने के खिलाफ थे. जमींदारी उन्मूलन और भूमि सुधार का कानून बनाते समय सरकार ने महात्मा गाँधी के विचार का ही अनुशरण किया. सरकार ने इसके लिए सीलिंग एक्ट बनाया,जिसमें बंजर क्षेत्र में सीमा 30 एकड तय की गई, जबकि सिंचित क्षेत्र में 15 और असिंचित में 20 एकड़ तय की गई थी.  मगर जमींदार सरकार से चालाक निकले. सीलिंग एक्ट लागू किए जाने के बाद जमींदारों ने चालाकी से जमीन को अपने परिवारों के सदस्यों आदि के नाम स्थानांतरित कर सरकार की नजर से बचा लिया. बड़े-बूढ़े बताते हैं, सीलिंग लगने के बाद जमींदारों ने अपने जानवरों तक के नाम पर भूमि ट्रांसफर करवा लिए और भूमि पर अपना कब्जा बरकरार रखा. कई जमींदारों ने औने-पौने दामों में जमीनें बेचकर पैसा बनाया. हालाँकि यह भी हकीकत है कि बहुत सारे जमींदारों ने ईमानदारी से भूमि पर से अपना कब्जा छोड़ा और अपनी जमींदारी की भूमि को किसानों के नाम कर दिए. बिनोबा भावे द्वारा चलाए जा रहे भूदान आन्दोलन में भी बहुत सारे जमींदारों ने अपने कब्जे की भूमि दान में दी.
लेकिन कुछ सुधारवादियों का मानना है कि देश में भूमि सुधार के कार्यक्रम सही तरह से नहीं चलाये गए और जमींदारों को चालाकी कर भूमि पर अपना कब्जा बनाये रखने का मौका दिया गया , जिसकी वजह से ज्यादातर वास्तविक किसान जमींदारी के समय की तरह ही भूमिहीन रह गये. आजादी और जमींदारी के खात्मे के बाद भी उनके साथ न्याय न हो सका.
बात सच भी है. जमींदारी प्रथा का उन्मूलन तो किया गया मगर वास्तविक किसानों को वापस अपनी भूमि मिल जाय इस दिशा में ईमानदारीपूर्वक बहुत ठोस काम नहीं हुए. अगर ऎसी नीति बनती कि हर किसान को ज़रूरत भर खेतीयोग्य भूमि मिल जाय, तो किसान खुशहाल होते, गाँव में गरीबी कम होती और गाँव की स्थिति इतनी खराब नहीं होती.  इस तरह भूमि पर किसानों को अधिकार दिलाने और भूमि सुधार नीति को लागू कर किसानों को भूमि देने की कवायद अधूरी रह गई.
महात्मा गाँधी की अहिंसा की नीति इसके पीछे एक बड़ी वजह तो रही ही. महात्मा गाँधी यह मानते तो थे कि जिन किसानों के परिश्रम से पृथ्वी फलप्रसु और समृद्ध हुई है, जमीन उनकी ही है या होनी चाहिए, जमीन से दूर रहनेवाले जमींदारों की नहीं, लेकिन जमींदारों से बलपूर्वक जमीन छीनने के वह खिलाफ थे. दूसरी महत्वपूर्ण वजह यह थी कि ज्यादातर जमींदार काँग्रेसी नेता का चोला पहन चुके थे. ऎसे में सरकार ने गरीब-शोषित किसानों के लिए जमींदारों के हित को छेड़ना स्वहित में ठीक नहीं समझा. इसलिए सरकार का सीलिंग एक्ट किसानों के लिए छलावा बनकर रह गया. महात्मा गाँधी के अनन्य शिष्य विनोबा भावे का भूदान आंदोलन भी किसानों को उनका न्यायपूर्ण हक नहीं दिला सका, बिना लाग-लपेट के कहें तो भूदान आंदोलन किसानों को भरमाये रखने का करतब मात्र था, ताकि किसान असंतुष्ट और नाराज होकर आजाद भारत की सरकार के खिलाफ आंदोलन न कर दे. लेकिन वस्तुतः भूमि सुधार नीति देश में कितने न्यायपूर्ण तरीके से लागू हुई, इसका भेद खोलती है ये सर्वे रिपोर्ट. 2006 में की गई एक सर्वे रिपोर्ट के अनुसार 95.65 प्रतिशत किसान, जो कि छोटे और सीमान्त श्रेणी के हैं, वे 62 प्रतिशत खेती योग्य भूमि के मालिक हैं, जबकि 3.5 प्रतिशत किसान, जो कि मध्यम बड़ी श्रेणी के हैं, 37.72 प्रतिशत भूमि के मालिक हैं.
सरकार की नीयत पर इसलिए भी संदेह करने का कारण बनता है कि सरकार यदि वाकई भूमि सुधार नीति को मूर्त रूप देना चाहती, तो पहले पूरे देश की भूमि का सर्वेक्षण करवाती, अंग्रेजी सरकार ने 1905-06 में जमीन का सर्वेक्षण कराया था. उसके बाद सौ से अधिक साल गुजर गए, मगर हमारी सरकार ने भूमि का सही सही रिकॉर्ड रखने के लिए कोई पहल नहीं की है. नतीजा है भूमि के स्वामित्व को लेकर स्थिति अभी तक बेहद उलझी हुई है. रजिस्ट्री दस्तावेज के माध्यम से जमीनों की खरीद-बिक्री हो तो रही है और स्वामित्व अधिकार बदल रहे हैं, मगर किस भूमि का मालिक कौन है, अगर सरकारी दस्तावेज गृह से कोई पता करना चाहे, तो काफी मशक्कत करनी पड़ेगी.
गैर मजरुआ आम और गैर मजरुआ मालिक जमीनों को लेकर तो स्थिति और भी बुरी है. 1905-06 के सर्वे के अनुसार जमीन तीन भागों में विभक्त की गई थी, रैयत जमीन, गैर मजरुआ आम और गैर मजरुआ मालिक. रैयत जमीन तो किसानों के नाम हो गई, मगर गैर मजरुआ मालिक जमीन पर जमींदारों का कब्जा बना रहा, जबकि रास्ते, पोखरे, खत्ते, नदी, तालाब, नहर, पाइन, तटबंध आदि जमीनें, जिनका सार्वजनिक इस्तेमाल होता था, वे जमीनें गैर मजरुआ आम थीं. आजादी के बाद इन जमीनों का सबसे बुरा हाल हुआ. सरकार की अस्पष्ट नीति और गाँव की तरफ सरकार की लापरवाही भरे दृष्टिकोण की वजह से गैरमजरुआ आम जमीनों पर जिसको जहाँ मौका मिला, आम ओ खास सबने कब्जा कर लिया. इन जमीनों को लेकर चूँकि मालिकाना हक स्पष्ट नहीं है, इसलिए अक्सर गाँव के लोग जमीनों की खरीद-बिक्री करते समय ठगे जाते हैं और झगड़े होते हैं.
नदी, तालाब, पोखरा, नहर, पाइन आदि जो पानी के श्रोत थे, ज्यादातर उन्हीं जमीनों पर अराजक कब्जा हुआ है, इसलिए गाँवों में पानी की समस्या बढ़ी है. बरसात में बाढ़ की स्थिति रहती है और बरसात समाप्त होते ही, सूखे की स्थिति बन जाती है. बरसात का पानी बेकार बह जाता है. जलाशयों के समाप्त हो जाने की वजह से पशुओं को पीने का पानी मिलना, खेतों के लिए पटवन का काम आदि के लिए जमीन के नीचे के जल पर निर्भर रहना एकमात्र विकल्प रह गया है. नतीजा है जलस्तर लगातार नीचे गिरता जा रहा है.                  
खेती योग्य भूमि क्षेत्रों में भूमि सुधार की सरकारी प्रक्रिया अब भी जारी है, मगर पिछले एक दशक में भूमि की कीमतों में जिस तरह अभूतपूर्व वृद्धि हुई है, भूमिपतियों से भूमि लेना आसान नहीं रह गया है और यह अब न्यायसंगत भी नहीं है. शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों की भूमि की कीमतों में जिस तरह का आसमान-जमीन का अंतर है, उसमें शहरों के झोपड़ों में रहनेवाले लोगों झोपड़े की कीमत से भी कम है, उनके सारे खेतों का मूल्य. फिर जिन-जिन गाँवों में या उसके आसपास सरकार के विकास के कदम पड़ते हैं, जमीन की कीमत अनाप-शनाप बढ़ने लगती है. ऎसे में भूमि सुधार के नाम पर भूमिपतियों से जमीन वापस लेना सही नहीं होगा. फिर पिछले कुछ दशकों में नौकरी करनेवालों ने जिस तरह से अफरात कमाई कर शहरों में अथाह सम्पत्ति बनाई है, उसका क्या. टाटा-बिरला-अम्बानी जैसे पूँजीपतियों का क्या. भूमि आज सिर्फ आजीविका का साधन नहीं रह गया है, बल्कि भूमि की खरीद-बिक्री करोड़ों में होने लगी है, मामूली किसान भी नित नए बढ़ते शहरों के पास की जमीन बेचकर करोड़ों पति बन रहे हैं.     
दूसरी तरफ गाँवों में आज भी भूमिहीन परिवारों का एक बड़ा वर्ग ऐसा भी है, जिनके पास घर के लिए भी ज़मीन नहीं है. हालाँकि हमारी इक्कीसवीं सदी की सरकार ने इंदिरा आवास योजना और राजीव आवास योजना शुरू कर घरविहीनों को घर देने का काम शुरू किया है. मगर सरकार यह घर उन्हें उनके अधिकार के तौर पर नहीं, बल्कि भीख के तौर पर दे रही है, या कहें कृपा कर रही है. सरकार का कर्तव्य है कि उसके हर नागरिक को सम्मान पूर्वक जीने का हक मिले, मगर नागरिक दया के पात्र के तौर पर जीवन जीने के लिए न्यूनतम सुविधाएँ ही प्राप्त कर पाते हैं. इन योजनाओं में भी भ्रष्टाचार और बेईमानी का दीमक वैसे ही लगा है, जैसे सरकार की बाकी योजनाओं में.

आदिवासियों के मामले में यह स्थिति और भी शर्मनाक और अन्यायपूर्ण है. किसानों को भूमि के कुछ न कुछ अधिकार तो मिले, मगर उन आदिवासियों को, जिनका जीवन जंगलों पर निर्भर था, जिनकी आजीविका जंगलों से प्राप्त लकड़ी, पत्ते, फूल-फल और पशु-पक्षी पर आश्रित थी, उन्हें भूमि के अधिकार से सरकार ने लगभग पूरी तरह वंचित कर दिया. शहर आधारित मानसिकता के अंग्रेजों ने सम्पन्न गाँवों को तो अपने शोषण का केन्द्र बनाया, मगर अलाभकर जंगलों और आदिवासियों को इससे मुक्त रखा. वहाँ अंग्रेजी हुकूमत ने खेतीयोग्य जमीनवाले इलाकों की तरह जमींदारी प्रथा लागू नहीं की, और सुदूर जंगलों में आदिवासी अपना जीवन पूर्ववत जीते रहे. जब भारत आजाद हुआ, सरकार ने अंग्रेजों की तरह खेतों पर अपना स्वामित्व नहीं माना, और जमींदारों से खेत किसानों को मिले इसके लिए नियम–कानून तो बनाये, मगर जंगलों पर चूँकि जमींदारों का कब्जा नहीं था, इसलिए पूरे जंगल पर सरकार ने अपना कब्जा जमा लिया. आदिवासियों को जंगल की जमीन पर कोई अधिकार नहीं मिला. आज उसी अन्याय की वजह से देश के जंगली इलाकों में आग लगी है. आदिवासियों को उनका हक दिलाने के नाम पर एक तरफ नक्सली बंदूकें ताने खड़े हैं तो दूसरी तरफ कानून-व्यवस्था के नाम पर सरकारी सिपाही बंदूकें लिए आदिवासी इलाकों में घूम रहे हैं. और कुल मिलाकर स्थिति यह है कि पूरा जंगल जंगली जानवरों के आतंक से भी ज्यादा खतरनाक आतंक के साये में जी रहा है. सरकार जंगल पर अपना अधिकार मानती है, जबकि नक्सली जंगल पर आदिवासियों का हक बता, सरकार से जंग ठाने हैं. आदिवासियों को उसका हक दिलाने के नाम पर जबसे नक्सली आंदोलन शुरू हुआ है, लाखों लोग मारे जा चुके हैं, इनमें बहुत बड़ी संख्या निर्दोष आदिवासियों की भी है, मगर आदिवासियों का हक अब भी हवा में है. वास्तविक स्थिति यह है कि आदिवासी जंगल की तरफ सरकारी विकास के बढ़ते कदम की वजह से अपने घर से भी विस्थापित होने को मजबूर हैं. 

हमारे गाँव और भूमि सुधार-1

प्राचीन काल में वायु, जल और प्रकाश की तरह भूमि भी प्रकृति प्रदत्त उपहार मानी जाती थी, इसलिए भूमि किसी व्यक्ति की निजी सम्पत्ति नहीं होती थी. हमारे ऋषियों के अनुसार भूमि पर पहला अधिकार उसका था, जिसने जंगल काटकर उसे साफ किया, जोता और खेती की. तब यह अधिकार संपत्ति के तौर पर बेचा-खरीदा नहीं जाता था. शायद इसलिए कि उस समय आबादी कम थी और भूमि बहुत ज्यादा. जिसे भी खेती के लिए भूमि चाहिए होती होगी, वह जंगल साफ कर उपयोग भर भूमि प्राप्त कर लेता होगा. यानी भूमि पर पहला अधिकार मेहनतकश किसानों का रहा. फिर समय के विकास के साथ सरदार, मुखिया और राजा अस्तित्व में आये. किसान अपनी सुरक्षा के एवज में कुछ अनाज आदि देने लगे होंगे, जो बाद में ‘कर’ के तौर पर नियमित किसानों से लिया जाने लगा होगा. इतिहासकार बताते हैं अंग्रेजों के भारत आने से पहले किसान और राजा के बीच कोई बिचौलिया नहीं हुआ करता था, बल्कि कर वसूलने का कार्य राजा द्वारा नियुक्त कर्मचारी किया करते थे. और वह ‘कर’ राजा द्वारा किसानों की सहमति से तय किया जाता था.
मुस्लिम शासकाल में भी भूमि पर किसानों का हक पूर्ववत बना रहा. इतिहासकार बताते हैं कि मुगल शासनकाल में किसानों को काफी इज्जत प्राप्त थी. प्राचीनकाल से चली आ रही कृषि व्यवस्था में किसी बादशाह ने हस्तक्षेप नहीं किया और कृषक उसी तरह कर गाँव के मुखिया अथवा राजा को कर देते रहे, जैसे पूर्व में दिया करते थे. और मुखिया अथवा राजा को शासन द्वारा वैसे ही कर वसूलने के एवज में पारिश्रमिक मिला करता था, जैसे पहले मिला करता था.
मगर औरंगजेब की मृत्यु के बाद जैसे-जैसे मुगल बादशाहों की शक्ति क्षीण पड़ने लगी, भूमि पर किसानों के अधिकार का भी क्षय होने लगा. शासन प्रजा के जानमाल की रक्षा करने में असमर्थ होने लगा और देश में अराजकता फैलने लगी. और कर वसूलनेवाले मुखिया अथवा राजा मनमानी करने लगे और मनमाफिक कर नहीं देनेवाले को भूमि से बेदखल कर देने लगे. ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपने लाभ के लिए ऎसे लोगों को और शह दिया. और बाद में अंग्रेजी सरकार ने जब शासन की बागडोर अपने हाथ में ले ली, तब उसने और आगे बढ़कर खुद को भूमि का मालिक ही घोषित कर दिया. किसान भूमि पर अपने अधिकार से बेदखल कर दिए गए और अंग्रेजी शासन ने किसानों के खेत कर वसूलने वाले ग्राम प्रधानों और सामंतों-राजाओं को पट्टे पर देना शुरू कर दिया. इस तरह भारत में जमींदारी प्रथा शुरू हो गई.      
इतिहासकार बताते हैं कि हालाँकि शुरुआत में अंग्रेजी शासन का विचार भूमि पर उनके अधिकार से किसानों को वंचित करने का नहीं था, मगर 1786 0 में जब लार्ड कार्न वालिस भारत का गर्वनर जनरल बना, तो उसने जमींदारी प्रथा को शासन की मान्यता दे दी. और 1791 में पहली बार बंगाल प्रांत में दस वर्षीय पट्टे को स्वीकृति दी गई. दो साल के बाद बोर्ड आफ डाइरेक्टर्स ने इस दस वर्षीय पट्टे को स्थायी बंदोबस्त में बदल देने की अनुमति दे दी. जबकि मद्रास प्रांत में जमींदारी प्रथा की शुरुआत अंग्रेजी शासन की नीलामी नीति से हुई. अंग्रेज अधिकारी जमीन की बोली लगवाते थे, और जो सबसे ऊँची बोली लगाता था, जमीन का मालिकाना हक उसे दे दिया जाता था.
इस प्रकार भारतवर्ष के इतिहास में शासन और किसानों के बीच जमींदारों का उदय हुआ. और किसानों का भूमि पर जो अधिकार अनादि काल से चला आ रहा था, छिन गया. हालाँकि उन जमीनों पर कृषि कार्य अब भी किसान ही करते थे, मगर उत्पादन पर पहला अधिकार भूमि मालिकों यानी जमींदारों का ही होता था. इस तरह किसानों का भयंकर शोषण होने लगा. कई बार तो ज़मींदारों का शोषण बेहद अमानवीय भी हो जाता था, मगर अंग्रेजी सरकार ने किसानों की दुर्दशा से खुद को दूर ही रखा, उसे तो बस जमींदारों से अधिकतम कर लेने से मतलब रहता था.   
अंग्रेज शासकों का विचार था कि शक्तिशाली और धनी वर्ग यानी जमींदार शासन से जितना अधिक खुश रहेंगे, उन्हें भारत पर शासन करने में उतनी ही सहूलियत मिलेगी, मगर यही सोच उनके पतन का कारण बन गया. जमींदारों ने किसानों को इतना सताया कि किसान खेती का कार्य छोड़कर भागने पर मजबूर हो गए. किसानों में अंग्रेजी शासन के प्रति जबरदस्त आक्रोश पनपने लगा. अंग्रेज शासक को भी अपनी भूल का अहसास हुआ और किसानों का असंतोष विद्रोह का रूप न ले ले, इसके लिए अंग्रेजी शासन ने पहली बार किसानों की दशा सुधारने के लिए 1859 में भूमि संबंधी अधिनियम पास किया. मगर जमींदारी व्यवस्था पूर्ववत बनी रही. किसानों पर जुर्म होते रहे. और किसानों का असंतोष आन्दोलन का रूप लेने लग गया.
किसान आन्दोलन का पहला बीज किसान सभा द्वारा बोया गया 11 फरवरी, 1918 को हुई अखिल भारतीय कांग्रेस की इलाहाबाद बैठक में. कांग्रेस के नेताओं ने किसानों के हितों को जोर-शोर से उभारा, जिसका ग्रामीण जनता पर बड़ा भारी असर हुआ. क्योंकि अधिकांश ग्रामीण जनता या तो किसान थी या किसानों पर आश्रित काम करिन्दे.
किसान आन्दोलन के असर को देखते हुए भारत की स्वतंत्रता के लिए लड़ रहे काँग्रेसी नेताओं ने 27 अक्टूबर, 1928 को यूपी काँग्रेस कमिटी की सभा में यह घोषणा की कि भारत की राजनीतिक स्वतंत्रता तबतक बेमानी है जब तक किसानों को शोषण से मुक्ति न दिला दी जाय. किसान अब और अधिक मुखर हो गए. लगान कम करने और उसे न्यायसंगत बनाने की माँग मुख्य रूप से उठने लगी. अंग्रेजी सरकार ने भूमि सुधार अधिनियम में सुधार करके जमींदारों के हक को और कम करके किसानों को राहत देने की कोशिश भी की, मगर 27-28 अप्रैल 1935 को इलाहाबाद में सरदार पटेल के सभापतित्व में काँग्रेसी नेताओं ने जमींदारों के हक को कम करने के सरकारी अधिनियम को किसानों के हित के लिए नाकाफी बताते हुए जमींदारी उन्मूलन का प्रस्ताव पास कर दिया. इस प्रस्ताव में यह घोषणा की गई कि वर्तमान जमींदारी प्रथा ग्रामकल्याण के बिल्कुल विपरीत है. यह प्रथा ब्रिटिश शासन के  दौरान लाई गई और इससे ग्रामीण जीवन पूरी तरह तहस नहस हो गया है. इसलिए हर हाल में जमींदारी प्रथा को समाप्त किया जाय.

कुछ साल बाद 1940 में बंगाल लैंड कमीशन भी इस नतीजे पर पहुँचा कि जमींदारी प्रथा  में बहुत सारी बुराइयाँ आ चुकी हैं और वर्तमान परिस्थिति में देश हित में यह बेहद अनुपयुक्त है. दूसरे विश्वयुद्ध और भीषण अकाल का सामना कर रही अंग्रेजी सरकार को भारतीय और ब्रिटिश अर्थशास्त्रियों ने भी अधिक कृषि उत्पादन के लिए जमींदारी प्रथा के उन्मूलन को आवश्यक बतलाया. लिहाजा 1946 में चुनाव में जीत के बाद जब हर प्रांत में कांग्रेस की सरकार बनी, तो चुनावी घोषणा पत्र के अनुसार जमींदारी प्रथा को समाप्त करने के लिये विधेयक प्रस्तुत किया गया. और यही विधेयक अधिनियम बनकर जमींदारी प्रथा के उन्मूलन का सूत्रधार बना. किसानों और राज्य के बीच फिर से सीधा संबंध स्थापित हो गया और भूमि का अधिकार वापस किसानों को मिल गया .

Sunday, 15 June 2014

प्रधानमंत्री मोदी कैसे बदलेंगे गाँव की तस्वीर

यह बड़ी खुशी की बात है कि भारत के नए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी हमारे गाँव को स्वावलंबी बनाना चाहते हैं. गाँव की आत्मा को बचाए रखकर गाँव को शहर जैसी सुविधाओं से लैश करने का इरादा उन्होंने संसद में दिए अपने पहले भाषण में ही प्रकट कर दिया है. उन्होंने महात्मा गाँधी के सपनों को भी उद्धृत किया और कहा कि गाँव के विकास से ही देश का विकास होगा. मगर कैसे ? इसका खाका अपने भाषण में उन्होंने प्रकट नहीं किया.
कहने को तो यह देश किसानों का है, मगर वास्तविकता यह है कि देश का सबसे शोषित, पीड़ित, प्रताड़ित, वंचित और पिछड़ा किसान ही है. देश की सत्तर प्रतिशत आबादी आज भी गाँवों में रहती है. कभी गाँव की पूरी सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था कृषि आधारित हुआ करती थी, किंतु आज गाँव की सामाजिक आर्थिक व्यवस्था में कृषि का दखल हाशिए पर चला गया है. किसान सहित सारे ग्रामीण सरकारी नौकरियों, छोटे-मोटे रोजगार-धंधों और शहरों के भरोसे जी रहे हैं. खेती बस मजबूरी में की जा रही है. ग्राम जीवन पर अंग्रेजी शासनकाल के दौरान लगा ग्रहण अभी तक छँटा नहीं है. देश की आजादी के साथ किसानों के शोषक जमींदार ज़रूर खत्म हो गए, मगर किसानों का शोषण रुका नहीं. पहले ज़मींदार किसानों की मेहनत-पसीने की कमाई को गड़प कर जाते थे, आजादी के बाद सरकार की व्यवस्था.
कोई भी व्यवसाय-कार्य और उसमे लगे लोग तभी सरवाइव कर सकते हैं, जब उस कार्य-व्यवसाय से उन्हें मुनाफा हो. किसानों के साथ ऎसी स्थिति कभी नहीं बनी. अंग्रेजी काल से आजतक उनके द्वारा उत्पादित अनाज, सब्जियाँ, फल और दूध आदि बगैर मुनाफा जोड़े बाजार तक पहुँचती है. कितनी हैरत की बात है कि बाज़ार में बैठे व्यापारी और बिचौलिए किसानों द्वार उत्पादित वस्तुओं को बेचकर गाढ़ी कमाई कर रहे हैं और किसान अपनी परवरिश भर लाभ भी प्राप्त नहीं कर पाता है. यहाँ यह बताते हुए चलना आवश्यक है कि एक एकड़ में गेहूँ की खेती करने से किसान को लागत के अलावा 2500 रुपए की बचत हो पाती है, जबकि उतनी ही ज़मीन पर धान की खेती से 3500 रुपए की बचत हो पाती है. यानी 5 एकड़ खेत जोतनेवाला किसान एक साल में 30 हज़ार रुपए कमा पाता है. वह भी तब जब पूरे खेत उसके हों और फसल भी अच्छी हुई हो. अब अंदाजा लगा लीजिए 5 एकड़ में खेती करनेवाला सालाना 30 हज़ार रुपए कमाकर अपने परिवार का भरण-पोषण कैसे कर सकता है? और यह हालत तब है, जब केन्द्र व राज्य सरकारें बीज से लेकर खाद, पानी, बिजली, डीजल और ट्रैक्टर आदि के नाम पर भारी सब्सिडी किसानों को देने का दावा करती हैं. जबकि सरकारी नौकरी करनेवाला चपरासी भी कम से कम 15 हज़ार रुपए महीना वेतन पाता है. इस सन्दर्भ में दूसरी वास्तविकता यह भी है कि देश के अधिकांश किसानों के पास बमुश्किल 2 एकड़ ज़मीन है. लिहाजा, आज़ादी के 67 साल बाद भी किसान इस देश का सबसे शोषित, पीड़ित, प्रताड़ित, वंचित और पिछड़ा तबका है तो क्यों? इस सवाल का जवाब आजतक या तो सरकारें ढूँढ नहीं पाईं या फिर इस सवाल को जानबूझकर नजरअंदाज़ किया.
अब सवाल उठता है कि क्या प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी वाकई गाँव को सँवारने को लेकर गंभीर है ? क्या वह गाँव में रहनेवाले लोगों की सामाजिक-आर्थिक हैसियत को लेकर सचमुच चिंतित है? क्या वह गाँव और ग्रामीणों की दशा सुधारने को लेकर वाकई प्रतिबद्ध हैं?
गाँव को मजबूत और स्वावलंबी बनाने के लिए सबसे पहले कृषि और किसान को ताकतवर बनाना होगा. आधुनिक तकनीकों और तरीकों से खेती करने की वजह से कृषि उत्पादनों में वृद्धि तो हुई है, मगर बाज़ार में किसान की हैसियत अभी तक बन नहीं पाई है. फुटपाथ पर बैठा मोची और हॉकर भी अपनी मेहनत की कीमत खुद तय करता है, मगर बड़ा से बड़ा किसान भी अपने उत्पादन की कीमत तय नहीं कर पाता. उसे बाज़ार के रहमोकरम पर ही जीना पड़ता है. कहने को तो सरकार कृषि उत्पादनों का न्यूनतम समर्थन तय करती है, मगर वह बेहद कम, दोषपूर्ण और अन्यायी है. बाज़ार में किसी भी वस्तु की कीमत उस वस्तु की लागत में मुनाफा जोड़कर तय की जाती है, मगर किसानों द्वारा उत्पादित वस्तुओं के साथ ऎसी बात नहीं है. किसानों को मुनाफा तो दूर, मेहनत की मजूरी तक नहीं मिल पाती. क्या प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी किसानों को मुनाफा सहित मूल्य दिलाने का संकल्प रखते हैं? यदि हाँ, तो किसानों को बाज़ार से अपनी मेहनत का सही मूल्य मिले, इसकी उपयुक्त व्यवस्था करनी होगी.
पब्लिक डिस्ट्रिब्यूशन सिस्टम यानी सस्ते गल्ले की सरकारी दुकान पूरी तरह से किसान विरोधी है. यह नेताओं का वोट बैंक तो बढ़ाती है, मगर ग्रामीण अर्थव्यस्था को पूरी तरह ध्वस्त कर देती है. अभी सरकार ग्रामीण क्षेत्रों की 75% आबादी और शहरी क्षेत्र की 50% आबादी को सस्ता गल्ला बाँट रही है, क्या ऎसी ही कीमतों पर घर, टीवी-फ्रिज और मोटरगाड़ियाँ बाँट सकती? क्योंकि आज ये चीज़ें भी लक्जरी नहीं ज़रूरी हो गई हैं. मेरा दावा है एक साल के लिए भी सरकार ऎसा कर दे तो बड़े-बड़े उद्योगपतियों का बेड़ा गर्क हो जाएगा. किसानों ने फायदे को कभी अपना मकसद नहीं बनाया, यह इस देश पर किसानों का अहसान है. वरना गेहूँ 400 रुपए किलो और चावल 500 रुपए खरीदते, तब इस देश के शहरी अमीरों को समझ में आता कि उनकी कितनी हैसियत है. हमारे गाँव में एक कहावत है ‘ कमाए लँगोटी, खाय धोती’ इस देश की व्यवस्था इस कहावत को पूरी तरह चरितार्थ कर रही है.
आधुनिक जीवन व्यवस्था में बिजली की बड़ी अहम भूमिका है, मगर देश में बिजली की स्थिति बेहद दयनीय है. लाखों गाँवों ने आजादी के 67 साल बाद भी बिजली का मुँह नहीं देखा है. बिजली के अभाव में कम्प्यूटर जैसे ज़रूरी साधन का इस्तेमाल युवा और किसान नहीं कर सकते. जबकि आज की दुनिया में प्रगति का सहचर बनने के लिए कम्प्यूटर का साथ अनिवार्य है. क्या उत्साही प्रधानमंत्री देश के गाँवों तक बिजली पहुँचा पाने की स्थिति में होंगे?
ज्यादातर गाँवों में सभ्य समाज के जीवन की मूलभूत सुविधाएँ- अच्छे स्कूल और अस्पताल तक नदारद हैं. मुझे लगता है, गाँव को सड़कों से जोड़ने से ज्यादा ज़रूरी स्कूलों और अस्पतालों से लैश करना है. क्या संसद को मंदिर मानकर उसके प्रवेश द्वार पर श्रद्धा से शीश नवाने वाले प्रधानमंत्री मोदी हमारे गाँव में स्कूल और अस्पताल का जाल बिछा पाएँगे?
फूड प्रोसेसिंग में बड़ी-बड़ी कंपनियाँ धंधा कर रही हैं, मगर खेती करने के काम में ऎसी एक भी कंपनी क्यों नहीं उतर पाई है? इससे भी यह आसानी से समझा जा सकता है कि मौजूदा व्यवस्था में खेती में फायदा नहीं है. मोदी जी अगर सचमुच गाँव और किसान को मजबूत और स्वावलंबी बनाना चाहते हैं, तो फूड प्रोसेसिंग के व्यवसाय में उद्योगपतियों के एकाधिकार को खत्म करना होगा. बेहतर हो कि फूड प्रोसेसिंग इंडस्ट्री में किसानों की सीधी भागेदारी अनिवार्य की जाय और उन्हें इस इंडस्ट्री का मेन स्टेक होल्डर बनाया जाय. क्या सबका विकास चाहनेवाले प्रधानमंत्री मोदी देशी-विदेशी उद्योगपतियों को नाराज़ कर किसानों को उसका वाजिब हक दिला पाने का संकल्प रखते हैं? यदि हाँ, तभी गाँव का विकास संभव है, वरना 67 सालों से गाँव और किसान के विकास को लेकर चल रही सरकारी कवायद जिस तरह से अबतक रस्मी रही है, आगे भी रस्मी ही बनी रहेगी? भाषण देकर समर्थकों और मातहतों से तालियाँ जितनी भी पिटवा लें, हमारे गाँव की स्थिति सुधरने वाली नहीं.

Wednesday, 21 May 2014

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और हमारे गाँव

नरेन्द्र मोदी से नई और ऊँची अपेक्षाएँ सिर्फ इसलिए नहीं है कि वह भारत के नए प्रधानमंत्री हैं, बल्कि उनसे आम भारतवासियों की अपेक्षाएँ इसलिए भी अधिकतम है कि उन्होंने बतौर मुख्यमंत्री गुजरात का विकास कर दिखाया है और अपने चुनावी भाषणों के दौरान पूरे देश को यह भरोसा दिलाया है कि गुड गवर्नेंस कर जिस तरह गुजरात में उल्लेखनीय विकास किया है, वैसी ही विकास गंगा वह पूरे भारत में बहाएँगे.
हमारे गाँव को नरेन्द्र मोदी से बड़ी अपेक्षाएँ है. गाँव हमारे देश भारतवर्ष की पहचान हैं. हमारी संस्कृति, हमारी दृष्टि, हमारा विवेक, हमारी आकांक्षाएँ और वसुधैव कुटुम्बकम् का हमारा अद्भुत मानवीय विचार हमारे गाँव से ही अनुप्राणित हैं. हमारे पर्व-त्योहारों, शादी-ब्याहअन्य रीति रिवाजों और उत्सवों की आधार भूमि हमारे गाँव ही हैं. कहते हैं कि अगर किसी को खत्म करना है तो उसकी संस्कृति को खत्म कर दो, बिना किसी युद्द के वह स्वतः खत्म हो जाएगा. सदियों की गुलामी की वजह से हमारी संस्कृति पर लगातार विदेशी हमले होते रहे. फिर भी हमारी संस्कृति बची रही, तो इसलिए कि हमारी जड़ें गहरे तौर पर हमारे गाँव की मिट्टी में जमी हैं. मगर दुखद यह रहा कि आजादी के बाद भी भारतीय संस्कृति के गढ़ गाँव को मजबूत करने का काम नहीं हुआ. वैश्वीकरण और आर्थिक उदारीकरण के बाद गाँव की स्थिति और भी दयनीय हुई है. गाँव से प्रतिभा और युवा शक्ति दोनों का भारी पलायन हुआ. आज स्थिति यह है कि हर पढ़ा-लिखा छात्र और अनपढ़ मजदूर अपने सुनहरे भविष्य और रोटी-रोजगार के लिए गाँव छोड़ कर जा रहा है. हमारी सरकारें गाँव के विकास के नाम पर लंबे-चौड़े दावे करती हैं, मगर हकीकत बिल्कुल उलट है. गाँव में समस्याओं का जाल लगा है. सभ्य समाज की मूलभूत ज़रूरतों -शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार का घोर अभाव है. गाँव तक विकास पहुँचाने के नाम पर हर गाँव को सड़कों से जोड़ा तो जा रहा है, मगर उन सड़कों के रास्ते विकास आने के बजाय, शहरी अपसंस्कृति आ रही है. शहरों की झोपड़पट्टी संस्कृति गाँव में भी बस्ती की शक्ल में  अनगढ़ और बेतरतीव बढ़ती जा रही है. ग्राम पंचायतों को जो पैसे विकास के नाम पर भेजे जा रहे हैं, गाँव के बदमाश किस्म के लोगों और ब्लॉक के अधिकारियों-कर्मचारियों का सिंडिकेट जोंक की तरह उसे पीता जा रहा है.
तमाम सरकारी सहायता के बावजूद गाँव के लोग खेती से लगातार दूर होते जा रहे हैं. सभ्य समाज की मूलभूत सुविधाओं की कमी और खेती के घाटे का सौदा साबित हो चुकने के बाद गाँव पूरी तरह कंगाली की हालत में है. गाँव का पूरा सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक ताना-बाना लगभग पूरी तरह टूट चुका है. हमारा संयुक्त परिवार, हमारा सामाजिक कार्य-व्यवहार, हमारी पंचायती न्याय व्यवस्था, हमारी पारंपरिक खेती, पशु-पक्षियों के साथ हमारा सह अस्तित्व सब नष्ट होने के कगार पर हैं. क्या इनके बिना हम हजारों साल पुरानी अपनी भारतीय संस्कृति, जिस पर हर भारतीय को गर्व है, उसकी कल्पना हम कर सकते हैं ?
मोदी जी से हमारे गाँव को इसलिए भी अधिक अपेक्षा है कि मोदी उस पार्टी और विचार की पृष्ठभूमि से आए हैं, राष्ट्रवाद और भारतीय संस्कृति को प्रतिष्ठित करना जिसका मूल ध्येय है.        
गाँव को पुनर्स्थापित और पुनर्प्रतिष्ठित करने के लिए सरकार को सबसे पहले ढाँचागत स्तर पर काम करने की ज़रूरत है. गाँव में शिक्षा व्यवस्था बिल्कुल ही चौपट है. ज्यादातर गाँवों में प्राइमरी स्कूल भी नहीं है. हाइस्कूल की पढ़ाई के लिए बच्चों को पाँच से दस किलोमीटर की रोजाना यात्रा करनी पड़ती है, जाड़ा, गर्मी और बरसात तीनों मौसमों में छात्र-छात्राओं को हर साल जानलेवा मुसीबतों का सामना करना पड़ता है. कॉलेज की पढ़ाई के लिए प्रायः गाँव के विद्यार्थियों को अपने गाँव से 25 से 30 किलोमीटर (कहीं-कहीं तो इससे भी अधिक) अपने जिला मुख्यालयों तक आना पड़ता है. शहरों में किराए का कमरा लेकर रहना ज्यादातर विद्यार्थियों के माता-पिता की आर्थिक स्थिति इजाजत नहीं देती, ऎसे में प्रायः लड़कियों को आगे की पढ़ाई छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ता है.
स्वास्थ्य के क्षेत्र में तो स्थिति और भी बुरी है. पिछले कुछ सालों में प्राइमरी हेल्थ सेंटर की सुविधा पंचायत स्तर पर ज़रूर की गई है, मगर ज़रूरत के हिसाब से बेहद नाकाफी है. कह सकते हैं ऊँट के मुँह में जीरा. छोटे-मोटे ऑपरेशन के लिए भी ग्रामवासियों को सरकारी सुविधा के लिए राजधानी आना पड़ता है या अपने पास के शहरों के प्राइवेट अस्पताओं का आसरा लेना पड़ता है. जहाँ मरीजों के अटेंडेंट्स को नारकीय स्थिति भोगनी पड़ती है.
साफ-सफाई के मामले में भी हमारे गाँव की स्थिति बेहद बुरी है, ज्यादातर घरों में शौचालय नहीं है, और लोग सड़कों-अलंगों पर खुले में शौच करते हैं. नतीजा है हरी-भरी फसलों से भरे खेत तो सुन्दर दिखते हैं, मगर गाँव में प्रवेश के रास्ते से ही गंदगी का साम्राज्य शुरू हो जाता है. नालियों और गलियों की साफ-सफाई की कोई आधिकारिक व्यवस्था नहीं होने की वजह से घर का कूड़ा-कचरा और गंदा पानी रास्तों पर बिखरा रहता है.

लगातार बढ़ते शहरीकरण की वजह से भी गाँव की अस्मिता लगातार खतरे में है. इसके लिए भूमि अधिग्रहण कानून में यह सुधार की ज़रूरत है कि अधिग्रहण की स्थिति में किसानों को नगदी मुआवजा देने के बजाय खेत के बदले खेत का नियम बने. साथ ही यह आवश्यक किया जाय कि खेती की जमीन का एक निश्चित प्रतिशत ही विकास के लिए इस्तेमाल हो, बाकी पर खेती ही की जाय. ताकि उद्योगपति और व्यापारी के साथ-साथ किसान भी जिन्दा रहें और विकास में भागीदार बन सकें. 
धनंजय कुमार          

Monday, 14 April 2014

क्यों गाँवों की दुश्मन बनी हैं हमारी सरकारें


धनंजय कुमार  
इस बार के चुनावी घोषणापत्र में परंपरावादी राजनीतिक दल भारतीय जनता पार्टी ने भी सत्ता में आने पर देश में सौ नए शहर बसाने का वचन दिया है. यानी अब विशुद्ध भारतीय राजनीतिक सोच और दृष्टि रखनेवाले दल बीजेपी ने भी शहरों को ही भारत के विकास का मानक मान लिया है. शहरों को विकास की धुरी माननेवालों को बीजेपी का यह वचन विकासवादी और देश के विकास को नया आयाम देनेवाला लग सकता है, मगर क्या वाकई यह भारत को मजबूती देनेवाला है. ऎसे में यह प्रश्न लाजिमी है कि क्या गाँव की अवधारणा अब विकास विरोधी और अप्रासंगिक हो गई है? क्या हमारी अपनी सरकारें भी अब भारत की पहचान हमारे गाँव को खत्म करने की दिशा में योजनाएँ बनाएँगी?
भारत आदिकाल से कृषिप्रधान देश रहा, इसलिए भारत में गाँवों का महत्व ज्यादा रहा. इसी कारण देश के चिंतकों ने कहा कि भारत की आत्मा गाँव में बसती है. भारतीय आरंभ से गाँववादी सोच के रहे और उसी सोच के साथ विकास किया, भारत सोने की चिड़िया कहलाया.   शहरवादी सोच मूलत: यूरोपीय सोच है, जहाँ भूमि की कमी थी, और व्यापार और औद्योगिक क्रांति के दम पर ही तरक्की संभव हुई. जबकि भारत के संदर्भ में हमेशा यह उलट रही, यहाँ भूमि की कभी कमी नहीं रही. गाँव विकास की धुरी रहे. खुशहाल ज़िन्दगी गाँवों में और गाँवों के आसपास ही आबाद रही, इसलिए भारत में अंग्रेजों के आने से पहले तक भारत के गाँव लगातार फूलते-फलते और बढ़ते रहे. देश पर अंग्रेजों से पहले भी विदेशियों के आक्रमण होते रहे, इसकी मूल वजह भारत की संपन्नता थी, और यह संपन्नता गाँवों के दम पर बनी थी. विदेशी पहले लुटेरे के तौर पर भारत आते रहे, फिर स्थायी शासन की लालसा ने उन्हें यहीं बसने के लिए आकर्षित किया. चूँकि भारत की संपन्नता गाँवों की वजह से थी, इसलिए किसी भी विदेशी ने भारत के गाँव को नुकसान पहुँचाने की नहीं सोची. गाँवों को नष्ट करने की सबसे साजिश रची अंग्रेजों ने, क्योंकि अंग्रेज शहरी मानसिकता के लोग थे. इसलिए शुरुआत में तो उन्होंने गाँवों पर ध्यान नहीं दिया, लेकिन जब लगा कि गाँव ही इस देश की ताकत हैं, तो देश को गुलाम बनाने के लिए हमारे गाँवों को नष्ट करना अनिवार्य समझा और भूमि पर युगों-युगों से चले आ रहे किसानों के स्वामित्व को छीनकर देश में जमींदारी प्रथा लागू की. भारत में अंग्रेजों ने अपनी ज़रूरत के मुताबिक जो कुछ थोड़ा-बहुत विकास कार्य किया, वो शहरों में किया, जबकि हमारे गाँव का पूरी तरह दोहन और शोषण किया. जमींदारों के हाथों किसानों-मेहनतकशों को प्रताड़ित कराया, उनके स्वाभिमान को कुचलवाया, उनसे अपनी ज़रूरत के अनुसार खेती करवाया और अपनी इंडस्ट्री के लिए कच्चा माल हासिल किया, ताकि इग्लैंड की इंडस्ट्री में तैयार माल का लागत मूल्य न्यूनतम हो, दुनिया के बाज़ार में उसे अधिकतम मुनाफे पर बेचा सके और ब्रितानी उद्योगपतियों को तरक्की करने का भरपूर अवसर मिल सके.   
स्वतंत्र और मजबूत भारत के स्वप्नद्रष्टा महात्मा गाँधी इस बात को भली-भाँति समझते थे. इसलिए वह जानते थे कि गाँव की तरक्की के रास्ते ही भारत को तरक्की के शिखर पर पहुँचाया जा सकता है. इसलिए गाँव को लेकर उनमें बड़ी ही भावनात्मक और रचनात्मक दृष्टि थी. हमेशा उन्होंने गाँवों को उनके वास्तविक स्वरूप में देखा, इसलिए पंचायती राज की उन्होंने सदा हिमायत की. ग्राम पंचायतों को अधिकार संपन्न बनाने की हमेशा वकालत की. यह अलग बात रही कि महात्मा गाँधी को अपना आदर्श मानने वाले नेताओं ने गाँवों को गाँधी के स्वप्न का गाँव बनाने में कोई ठोस दिलचस्पी नहीं दिखाई. रस्मी दिलचस्पी के तौर पर गाँव और गाँव के लोगों को बेचारा समझ मदद करने का नियम ज़रूर बनाते रहे, मगर गाँव अंग्रेजों की गुलामी से पूर्व जिस तरह आत्मनिर्भर और खुशहाल थे, भारत के गाँव आत्मनिर्भरता और खुशहाली पुनः उसी तरह बहाल हो, ऎसी कोशिश किसी ने नहीं की.
आज देश को स्वतंत्र हुए 67 साल हो गए, मगर गाँवों की हालत लगातार खराब होती जा रही है. आधुनिक विकास के इस दौर में गाँव लगातार सिमटते या नष्ट होते जा रहे हैं. विकास के नाम पर गाँव को बिजली, सड़क, स्कूल जैसी सुविधाओं से लैस तो किया जा रहा है, मगर खेती और खेतों को नष्ट किया जा रहा है. किसानों से खेत छीनकर उन्हें भूमिहीन बनाया जा रहा है. मुआवजा के नाम पर सरकार किसानों को अपेक्षाकृत ऊँची कीमत तो देती है, मगर इसकी ओट में वह उनका पुश्तैनी रोजगार छीन ले रही है, उन्हें विस्थापन के लिए मजबूर कर दे रही है. इस तरह गाँव को सुविधासंपन्न करने के नाम पर गाँव की सामाजिक और आर्थिक संरचना के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है. बिना किसी समुचित विकास योजना और दृष्टि के गाँव को ऎसे शहर के रूप में बढ़ने दिया जा रहा है, जहाँ ग्रामीण विशेषताओं को तो पिछड़ापन समझ दुत्कारकर नष्ट किया जा रहा है, जबकि शहरी विसंगतियों को शहरीकरण के नाम पर आदरपूर्वक अपनाया जा रहा है. अब सवाल उभरता है क्या ऎसा कर हमारी सरकारें भारत को मजबूत कर रही हैं या उसे सामाजिक, आर्थिक और नैतिक पतन की ओर धकेल रही है?
अंग्रेजों की 200 साल की गुलामी ने भारत को सामाजिक, सांस्कृतिक, नैतिक, आर्थिक, वैचारिक हर दृष्टिकोण से जर्जर बनाया. किसी भी देश की तरक्की उसकी अपनी भौगोलिक, प्राकृतिक,  सामाजिक, सांस्कृतिक और वैचारिक स्थिति पर अबलंबित होती है. अमेरिका को चीन की तरह नहीं विकास के रास्ते दौड़ाया नहीं जा सकता, तो चीन को अमेरिका की तरह नहीं हाँका जा सकता है. आज दोनों देश तरक्की के शिखर पर हैं तो अपनी-अपनी विशेषताओं की वजह से न कि किसी और का विकास मॉडल नकलकर आगे बढ़ रहे हैं. भारत के सन्दर्भ में ऎसा नहीं हुआ. हमारे नेताओं-नौकरशाहों ने अपनी विशेषताओं को पहचानने में हर स्तर पर भूल की. हमारे नेताओं-नौकरशाहों ने भारत की विशेषताओं को जड़ता और पिछड़ापन माना, जबकि अंग्रेजी सभ्यता-संस्कृति को रोल मॉडल. नतीजा हुआ, आदिकाल से भारत की शक्ति के केंद्र रहे गाँव को संभावना विहीन और हेय भाव से देखा गया और गाँव पिछड़ापन और जड़ता के पर्याय बना दिए गए. गाँव हाशिए पर धकेल दिए गए.             
भारत के सन्दर्भ में गाँव की प्रासंगिकता को खत्म करना भारी भूल होगी. भारत विशाल देश है, मगर संसाधनों की तुलना में देश की जनसंख्या ज्यादा बड़ी है. यही कारण है कि हमारे मनीषियों-चिंतकों और पूर्वजों ने सादा जीवन उच्च विचार का हमें मंत्र दिया. धरती के संसाधनों को अधिक से अधिक भोगने के बजाय शांति और भाईचारे से जीवन निर्वाह की प्रेरणा दी. दूसरों पर शासन करने के बजाय स्वशासन की दृष्टि दी. सामाजिक जीवन सुखमय बीत सके, इसके लिए सह-अस्तित्व से अनुप्राणित ग्राम पंचायती व्यवस्था दी. शत्रुओं से बचने के लिए राजाओं का पोषण किया. भोजन से परे अपनी ज़रूरत की चीजों के लिए अपने ही बीच हुनरमंदों को अनुकूल वातावरण दिया. और भारत बिना किसी अन्य देश पर कब्जा किए, बिना किसी और की सम्पत्ति को लूटे सिर्फ अपनी मेहनत और अपनी जीवन दृष्टि के बल पर युगों-युगों तक संपन्न और आत्मनिर्भर रहा. विश्वगुरु और सोने की चिड़िया कहलाया. जब इतना सुन्दर विरासत हमारे पास है, फिर दुनिया की नकल करने की हमें क्या ज़रूरत है ?!
आज गरीब भारत के सन्दर्भ में भी गाँव हमारे लिए शहरों की तुलना में ज्यादा मुनासिब हैं. जीवन जीने के लिए ज़रूरी वस्तुएँ प्राकृतिक संसाधनों की सहज उपलब्धता की वजह से गाँव में आज भी न्यूनतम मूल्य पर उपलब्ध हो जाती हैं. जबकि शहरों में ज़रूरत के अनुसार साधन और सुविधाएँ कृत्रिम तरीके से बढ़ाई गईं. इस कारण शहर गाँव की तुलना में ज्यादा खर्चीले होते हैं. गाँव में प्रकृति के अनुसार जीवन चलता है, जबकि शहरों में प्रकृति के विपरीत चलने की जिद चलती है, और विसंगति के तौर पर पनपते हैं, अजनबीपन, आगे बढ़ने की अमानवीय होड़ और एकाकीपन.
भारतीय सभ्यता के विकास में शहरों का भी स्थान रहा, मगर मुख्य गाँव ही रहे. शहर शासन और व्यापार का केंद्र रहे, जबकि गाँव उत्पादन का. उत्पादन में निश्चित तौर पर ज्यादा लोगों की ज़रूरत पड़ती है, जबकि बाज़ार में कम लोगों की. यानी गाँव की समृद्धता पर शहर की चमक संभव है. भारत आरंभ से ही एक विशाल देश रहा. विशाल देश होने की वजह से इसकी आबादी भी सदा विशाल रही और मूलभूत ज़रूरतें भी. और यह ज़रूरतें बिना गाँव के कतई संभव नहीं थी. आरंभ से ही भोजन मनुष्य की पहली और सबसे महत्वपूर्ण ज़रूरत रही. नित आधुनिकता और तरक्की के नए आयाम गढ़ते, सोपान चढ़ते विश्व में भी भूख दुनिया की सबसे बड़ी समस्या है. करोड़ों लोग भुखमरी के शिकार हैं. हम आरंभ से ही दुनिया के सबसे बड़े कृषि प्रधान देश रहे, मगर भुखमरी आज भी भारत की प्रमुख समस्या में से एक है, और नागरिकों को दो वक़्त का पेट भरने भर सामान्य भोजन देने के लिए भी कानून बनाना पड़ता है. और करोड़ों करोड़ लोग कुपोषण के शिकार हैं. मतलब उन्हें स्वस्थ शरीर की ज़रूरत भर भी भोजन नहीं मिल पाता. यह स्थिति तब है, जब देश की आधी से अधिक आबादी गाँवों में रहती है और कृषि पर आश्रित है. यानी सभी नागरिकों को पौष्टिक आहार देने के लिए और अधिक मात्रा में खाद्य पदार्थ के उत्पादन की आवश्यकता है. जबकि लगातार दुर्बल होती किसानों की स्थिति किसानों और उनके परिवारों को खेती से दूर करने को बाध्य करती जा रही है. खेती पर किसानों की निर्भरता लगातार कष्दप्रद और कम होती जा रही है. किसान के बेटे किसानी छोड़ चाकरी करने और छोटे-मोटे रोजगार करने को मजबूर हैं. वह गाँव और खेत छोड़कर लगातार पलायन कर रहे हैं. इस वजह भारत की कुल आय में कृषि का आनुपातिक योगदान कम हुआ है और आगे भी लगातार कम होता जा रहा है. सरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक कृषि का उत्पादन कई वजहों से ज़रूर बढ़ा है, मगर आर्थिक और सामाजिक दृष्टिकोण से न तो यह पर्याप्त है और न ही मुँह ढँककर सोने लायक है. ऎसे में गाँवों का महत्व और बढ़ जाता है. विकास की अंधी दौड़ में दौड़ने के बजाय हमें ठहर कर सोचने की ज़रूरत है कि हम गलत क्या गलत कर रहे हैं और क्या सही? गाँवों को शहरों में तब्दील करना भारत के हित में कतई नहीं है.       




    

Saturday, 12 April 2014

Devnandan Public School : कामयाब रहे हम

बिहार के नालन्दा जिला स्थित बिन्द गाँव में “हमारे गाँव” कॉंसेप्ट के तहत एजुकेशनल अवेयरनेस के लिए शुरू किए गए देवनन्दन पब्लिक स्कूल का पहला शैक्षणिक सत्र (2013-14) पूरा हुआ. यह स्कूल का पहला वर्ष था. पहले वर्ष कुल 36 बच्चों ने नामांकन कराया था. ज्यादातर बच्चे बड़ी उम्र के थे, अपनी क्लास से बड़े. जैसे नर्सरी के बच्चे की उम्र 3 साल के आसपास होनी चाहिए, मगर पाँच साल तक के बच्चे को भी नर्सरी में ही रखना पड़ा, क्योंकि उन्हें इंग्लिश का बिल्कुल ही ज्ञान नहीं था. हालाँकि वे बच्चे पास-पड़ोस के गाँव के ही किसी न किसी स्कूल में पढ़ने जाते थे. इसी वजह से हमने पहले वर्ष नर्सरी से स्टैंडर्ड वन तक की पढ़ाई शुरू की थी. क्लास से बड़ी उम्र के बच्चे को जूनियर से लेकर स्टैंडर्ड वन में जाँच परखकर रखा गया, और कोशिश की गई कि सभी बच्चे उम्र के अनुसार क्लास में आ जाएँ. सुखद यह रहा कि मेरे, टीचर्स और बच्चे के कलेक्टिव प्रयास से हमने तय लक्ष्य हासिल करने में हम कामयाब रहे. और हम गर्व से कह सकते हैं कि बच्चे क्लास के अनुसार लिखना-पढ़ना सीख गए हैं.
स्कूल के गाँव में होने की वजह से शुरूआती स्तर पर टीचर्स ढूँढने से लेकर गाड़ी की व्यवस्था करने तक में काफी मशक्कत करनी पड़ी. नौकरी की तलाश के लिए पढ़े-लिखे लोगों के शहर पलायन कर जाने की वजह स्थानीय इलाकों में अच्छा टीचर ढूँढना मुश्किल हुआ. शहर से टीचर लाना चाहा, तो टीचर गाँव की वजह से आने को तैयार नहीं हुए. फिर मैंने स्थानीय लड़कियाँ, जो गाँव में ही रहकर कॉलेज की पढ़ाई कर रही थीं, उनपर ध्यान फोकस किया. दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि बीए में पढ़ रही लड़कियों को भी इंग्लिश का सामान्य ज्ञान तक नहीं था. अल्फावेट से लेकर स्टोरी तक उन्हें पढ़ाना पड़ा. सुखद यह रहा कि उन लड़कियों ने मेहनत कर बहुत कम समय में बच्चों को पढ़ाने भर सीख लिया. ग्रामीण इलाका होने की वजह से लगभग पेरेंट्स अनपढ़ या कम पढ़े-लिखे हैं, इसलिए टीचर्स को ज्यादा स्ट्रेन लेना पड़ा. मगर बच्चों की प्रोग्रेस को देखकर पेरेंट्स खुश हैं. वे खुश हैं कि उनके बच्चे गाँव में रहकर शहरों जैसी पढ़ाई इंग्लिश मीडियम से कर रहे हैं.

दूसरे साल में प्रवेश के साथ ‘स्टैंडर्ड टू’ तक क्लास बढ़ा दी गई है. नए एडमिशंस हो रहे हैं. हालाँकि कई बच्चे स्कूल छोड़कर अपनी अलग-अलग वजहों से गये भी हैं, मगर नए बच्चों का आना जारी है. इस साल स्कूल ने अपनी गाड़ी लेने का विचार किया है, जो कि बहुत जल्द आ जाएगी.       

Thursday, 20 February 2014

हमारे गाँव और ग्राम पंचायतें-3

ग्राम पंचायतें और न्याय व्यवस्था
ग्राम पंचायतें सबको न्याय और समय पर न्याय देने-दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं. मगर अफसोस की बात यह है कि ग्रामपंचायतें इस पहलू पर भी बेहद कमजोर हैं, खाना-पूर्त्ति भर रह गई हैं. रोजगार और बेहतर जीवन की तलाश में पढ़े-लिखे ग्रामीणों के  शहर पलायन कर जाने की वजह से गाँव में न्याय और कानून को बेहतर तरीके से समझ पा सकनेवाले लोगों की बेशक कमी हो गई है, मगर गाँव के छोटे-मोटे झगड़ों और विवादों को सही पंचों के चयन से निबटाना बहुत मुश्किल नहीं है. लेकिन सरकार इस दिशा में भी उदासीन है. ग्रामीण मामलों में न्याय के लिए आरंभिक तौर पर ग्राम पंचायतों के पास जाना अनिवार्य होना चाहिए था, जबकि यह वैकल्पिक है. पुलिस और राजस्व कर्मचारियों को ग्राम पंचायतों के सहयोगी के तौर पर काम करना चाहिए था, मगर ऎसा नहीं है, वे न्याय के अलग और ज्यादा ऑथेंटिक संस्था के तौर पर गाँव में दखल रखते हैं. इस वजह से ग्राम पंचायतों में जाने की बजाय सीधा सरकारी अधिकारियों के पास चले जाते हैं. और ज्यादातर मामले वहीं के वहीं सुलझने के बजाय उलझकर न्यायालय तक पहुँच जाते हैं, जहाँ व्यवस्थागत संसाधनों और न्यायधीशों की कमी की वजह से और हज़ारों-लाखों केस सालों से लम्बित हैं. न्याय व्यवस्था के साथ-साथ आम आदमी का भी समय और धन व्यर्थ बर्बाद होता है.        
खाप पंचायत
ग्राम पंचायती व्यवस्था के बीच हमारे देश के कुछ हिस्सों में एक और तरह की पंचायत सदियों से अस्तित्व में हैं, जो खाप पंचायत के तौर पर जानी जाती है. इसका वजूद पश्चिमी उत्तरप्रदेश और हरियाणा के गाँवों में देखने को मिलता है. इस पंचायत का गठन पूर्वजों ने मूलतः गाँव की पारिवारिक-सामाजिक समस्याएँ सुलझाने के लिए किया था.
‘खाप’ दो शब्दों से मिलकर बना है- और आप‘. ख का अर्थ है आकाश और आप का अर्थ है जल, अर्थात ऐसा संगठन जो आकाश की तरह सर्वोपरि हो और पानी की तरह निर्मल और सब के लिए सुलभ एवं न्यायकारी हो.

पहले खाप पंचायतें सामाजिक समस्याओं एवं कुरीतियों के खिलाफ ऐतिहासिक निर्णय लेने बैठती थीं और अपने स्तर पर ही हर विवाद का निष्पक्ष एवं सर्वमान्य हल करके कानून की मदद किया करती थीं. हाल के वर्षों में भी इन पंचायतों ने दहेज लेने और देने वालों को बिरादरी से बाहर करने और छोटी बारात लाने जैसे फरमान जारी कर कई कुप्रथाओं को खत्म करने में भी रचनात्मक भूमिका निभाई है. मगर आजकल ये सब खाप पंचायतें एक गोत्र के लड़के-लड़की के प्रेम और विवाह के खिलाफ मौत तक का फरमान सुनाने को लेकर चर्चा में ज्यादा है. समय के अनुसार खाप पंचायतें बदल नहीं पाईं और आधुनिक समाज तथा उसकी  बदलती हुई विचारधाराओं के साथ सहज सामंजस्य बिठा नहीं पा रही है. संस्कृति के नाम पर वह पुरानी मान्याताओं को कट्टरता से नई पीढ़ी से मनवाने पर अड़ी है और इस क्रम में वह उन मूल्यों को भी ध्वस्त करने में भी नहीं हिचक रही, जो मूल्य भारतीय धर्म और संस्कृति के प्राण हैं. भारतीय धर्म और संस्कृति मूलतः बेहद उदार है, जो अपने अलावा अन्य विचारों और रीति रिवाजों को समाप्त कर देने के बजाय उन्हें भी सहर्ष साथ चलने देता है. यही वजह है कि एक ही हिन्दू संस्कृति के होने के बावजूद अलग-अलग समुदाय अलग-अलग रीति-रिवाजों को मानते हैं. कहीं एक गोत्र में भी विवाह गलत है, तो कहीं अपने निकट रिश्तेदारों में विवाह भी सहजता और खुशीपूर्वक होता है. और हमारा संविधान भी हमारी उसी संस्कृति को लेकर चल रहा है. हमारा संविधान देश के हर नागरिक को स्वतंत्र रूप से जीवन जीने का अधिकार देता है. खाप पंचायतों को संस्कृति का अन्धानुकरण करने की बजाय समय के अनुसार स्वयं में बदलाव लाकर समाज की उन्नति के लिए काम करना चाहिए. 

Wednesday, 19 February 2014

हमारे गाँव और ग्राम पंचायतें-2

स्वतंत्रता के बाद भी ग्राम पंचायतों को नहीं मिली स्वायत्तता

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद नवनिर्मित भारतीय सरकार ने ग्राम पंचायतों की प्राचीन परम्परा के महत्व को समझते हुए ग्राम पंचायतों को स्थानीय ग्रामीणों द्वारा मतों के आधार पर पंचों का चुनाव करने का अधिकार तो दिया, मगर कामकाज में सरकारी हस्तक्षेप बनाए रखा. लिहाजा पंचायतें अधिकार और संसाधनों के अभाव में प्राचीन प्रतिष्ठा हासिल नहीं कर सकीं और निष्प्रभावी ही बनी रहीं. ग्राम विकास के लिए बनी सारी कमिटियों ने सरकार को कमोवेश यही रिपोर्ट दी कि समुचित अधिकार और संसाधन नहीं होने की वजह से ग्राम पंचायतें अनुकूल लक्ष्य हासिल करने में अक्षम हैं. योजना आयोग द्वारा ग्रामीण क्षेत्र में विकास व गरीबी उन्मूलन से संबंधित प्रशासनिक व्यवस्था की समीक्षा के लिए 1985 में गठित जी. के. वी. राव समिति ने भी अपनी रिपोर्ट में कहा कि लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण की प्रक्रिया के प्रति सरकारों की उदासीनता की वजह से अधिकांश राज्यों में पंचायतें शक्ति, अधिकार और संसाधनों के अभाव में निष्प्रभावी होती जा रही हैं. मगर तमाम सिफारिशों के बावजूद सरकारें पंचायतों को अधिकार व संसाधन संपन्न बनाने के प्रति लापरवाह बनी रहीं. परिणामस्वरूप स्थानीय ग्रामीणों द्वारा ग्राम पंचायतों के प्रतिनिधियों के चुने जाने के बाद भी ग्राम सुधार और विकास में ग्राम पंचायतें कोई उल्लेखनीय परिवर्त्तन लाने में सफल नहीं हो सकीं.

90 के दशक में मिली ग्राम पंचायतों को आंशिक स्वायत्तता      
एल. एम. सिंघवी के नेतृत्व में गठित समिति की रिपोर्ट के आधार पर संसद ने 1992 में 73वें संविधान संशोधन विधेयक पास कर पंचायतों को संविधान की नौवीं सूची में शामिल किया। इसके तहत गाँववासियों के आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय के लिए पंचायतों को योजना बनाने और उसके निष्पादन के अधिकार दिए गए. अतिरिक्त व्यवस्था और उसके निर्बाध संचालन के लिए कर व अन्य शुल्क लगाने और वसूलने का अधिकार भी दिया गया. मगर ग्राम पंचायतों को पूरी स्वायत्तता नहीं दी गई. ग्राम पंचायतें ग्रामसभा की मदद से स्थानीय ज़रूरत के अनुसार योजना बनाने या उसकी प्राथमिकता तय करने को स्वतंत्र नहीं है. गाँव में लागू होने वाले कार्यक्रमों की रूपरेखा राजधानियों के वाताकुलित कमरे से बनकर आती है, जबकि उसे ग्रामसभा में तय किए जाने की ज़रूरत है. इससे शासन में ग्रामीणों की भागीदारी बढ़ेगी और लोकतंत्र मजबूत होगा. कार्यक्रमों के निष्पादन में सरकारी हस्तक्षेप को कम करके उसे पर्यवेक्षक के तौर पर सीमित करने की ज़रूरत है.
             
ग्रामपंचायत, सरकारी कार्यक्रम और भ्रष्टाचार
बावजूद इसके सरकार ने गाँवों के सुधार और विकास के लिए जितने सारे कार्यक्रम चला रखे हैं अगर सही तरह से क्रियान्वित हो जाएँ तो सचमुच गाँव की कायापलट हो सकती है, मगर ग्राम पंचायतों के प्रतिनिधि और सरकारी अधिकारी सुधार और विकास के सरकारी कार्यक्रमों में जोंक की तरह चिपक गए हैं. ग्राम पंचायतें भी उसी तरह भ्रष्ट हो गई हैं, जैसे बाकी सारी सरकारी व्यवस्थाएँ. ग्राम पंचायतों के प्रतिनिधि सरकार के सुधार और विकास के कार्यक्रमों के लिए भेजी गई धनराशि के एक बड़े हिस्से की बँदरबाँट कर लेते हैं. इसमें सरकारी अधिकारियों का शेयर भी तय रहता है और गाँव के सुधार और विकास के कार्यक्रम आधे-अधूरे और अनुपयोगी रह जाते हैं. भवन, गली, पुलिया, नाली, चापाकल आदि सभी की गुणवत्ता निम्नतर स्तर की होती है, जो कुछ दिनों-महीनों बाद खराब होने लगते हैं.
ग्रामीण सब जानते-देखते हुए भी चुप रह जाते हैं, क्योंकि विभिन्न सरकारी योजनाओं में हर ग्रामीण किसी न किसी तरह जायज या नाजायज लाभांवित हो रहा है. राशन दुकानों में मिलने वाले किरासन तेल से लेकर अनाज तक तो वृद्धा पेंशन से लेकर इन्दिरा आवास    और पोशाक-साइकिल लेने से लेकर छात्रवृति पाने के लिए बनाये जाने वाले आय प्रमाण तक, लगभग हर ग्रामीण भ्रष्ट रास्तों पर चलकर लाभ हथियाने में जुटा है. ऎसे में भ्रष्टाचार पर शिकायत करने का नैतिक साहस कोई कहाँ से लाए? जो लोग जायज तौर पर सरकारी योजनाओं के लाभ का हकदार होने के बाद भी सरकारी योजनाओं का लाभ उठा पाने से वंचित हैं, वे बेचारे निहायत ही कमजोर हैं. वह अपना जायज हिस्सा पाने के लिए आवाज उठाना तो चाहते हैं, मगर कहाँ और कैसे, नहीं मालूम. और क्या सरकारी धन की लूट के उत्सव की गूँज में कोई उनकी आवाज सुन भी पाएगा.
फिर ज्यादातर जनप्रतिनिधि बाहुबली और आपराधिक पृष्ठभूमि के होते हैं, इसलिए कोई इन भ्रष्ट प्रतिनिधियों से दुश्मनी नहीं लेना चाहता. और कोई दुश्मनी ले भी तो क्यों? खर्च हो रहा पैसा उनका अपना नहीं, सरकारी है, और न ही जो कुछ बन रहा है, उसका इस्तेमाल सिर्फ वही करनेवाले हैं, फिर जब कोई और किए जा रहे भ्रष्टाचार के खिलाफ बोलने को तैयार नहीं है, तो वह अकेला क्यों बोले? फिर कोई जोखिम लेकर शिकायत करता भी है तो जाँच अधिकारी ले-देकर मामले को रफा-दफा कर देते हैं.          
ग्राम पंचायतों के जनप्रतिनिधियों को भी भ्रष्ट बनाने में देश की दोषपूर्ण चुनावी व्यवस्था बड़ी भूमिका निभा रही है. चुनाव लड़ने और जीतने के खर्चे ग्रामपंचायतों के चुनाव में भी बढ़ते जा रहे हैं. विधायक और सांसद की तरह मुखिया, सरपंच और पंच के चुनाव में भी चुनाव प्रचार के नाम पर हजारों-लाखों रुपए खर्च करने के साथ- साथ वो तमाम हथकंडे अपनाए जाने लगे हैं, जो चुनाव जीतने के लिए आवश्यक हैं. चुनाव से एक या दो दिन पहले वोटरों को दारू पिलाने से लेकर नकदी रुपए तक बाँटे जाते हैं. ग्रामपंचायतों के कमजोर होने की एक और बड़ी वजह जातिवाद भी है, जिसकी वजह से मतदान के समय योग्य उम्मीदवार को चुनने की बजाय लोग अपनी जाति के बदमाश और भ्रष्ट उम्मीदवार को चुनना पसंद करते हैं. अब गलत तरीके से चुने गए प्रतिनिधि अच्छा और ईमानदार काम करेंगे, इसकी कल्पना ही बेकार है.
        
कमजोर ग्रामसभा
भ्रष्टाचार नियंत्रण में ग्रामसभा बेहद प्रभावी हो सकती थी, मगर, आजादी के बाद भी गाँव में कृषि, रोजगार और अन्य नागरिक सुविधाओं की स्थिति में यथोचित सुधार नहीं हो पाने की वजह से गाँव के किसानों के बेटे-बेटियों का पढ़-लिखकर भी गाँव नहीं लौट पाना और युवा मजदूरों का रोजगार के लिए शहर की ओर पलायन की वजह से गाँव में जागरूक और समझदार लोगों की कमी हो गई है. गाँव की आबादी में अब गरीबों और मजदूरों का ही बाहुल्य है. जो न तो पढ़े-लिखे हैं और न ही बाहुबल में उतने मजबूत कि गाँवों में सक्रिय बदमाशों और धूर्त्तों का मुकाबला कर सकें. ऎसे में बदमाश और धूर्त्त किस्म के लोगों की चाँदी हो गई है.

दुखद यह है कि सरकारी मशीनरी भी इस दिशा में पूरी तरह उदासीन है. शिकायत की जाँच कर दोषियों पर कार्रवाई का पारम्परिक तरीका लगभग फेल हो चुका है. यह महज खानापूर्त्ति भर बनकर रह गया है. इसलिए भ्रष्टाचार को रोकने और भ्रष्टाचारियों को पकड़ने का कोई नया और प्रभावी तंत्र ढूँढना होगा. ग्राम पंचायतों में सही प्रतिनिधियों की भागीदारी और पंचायतों का ठीक तरह से संचालन सरकारी ग्राम सुधार व विकास कार्यक्रमों के माध्यम से गाँवों की दशा को बहुत हद तक सुधार सकता है. ग्रामीणों को सरकारी कार्यक्रमों के प्रति जागरूक बनाकर ग्रामसभा को मजबूत कर भ्रष्ट और धूर्त्त जनप्रतिनिधियों तथा सरकारी कर्मचारियों-अधिकारियों पर नकेल कसी जा सकती है.

शेष आगे....