यह बड़ी खुशी की बात है कि भारत के नए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी हमारे गाँव को स्वावलंबी बनाना चाहते हैं. गाँव की आत्मा को बचाए रखकर गाँव को शहर जैसी सुविधाओं से लैश करने का इरादा उन्होंने संसद में दिए अपने पहले भाषण में ही प्रकट कर दिया है. उन्होंने महात्मा गाँधी के सपनों को भी उद्धृत किया और कहा कि गाँव के विकास से ही देश का विकास होगा. मगर कैसे ? इसका खाका अपने भाषण में उन्होंने प्रकट नहीं किया.
कहने को तो यह देश किसानों का है, मगर वास्तविकता यह है कि देश का सबसे शोषित, पीड़ित, प्रताड़ित, वंचित और पिछड़ा किसान ही है. देश की सत्तर प्रतिशत आबादी आज भी गाँवों में रहती है. कभी गाँव की पूरी सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था कृषि आधारित हुआ करती थी, किंतु आज गाँव की सामाजिक आर्थिक व्यवस्था में कृषि का दखल हाशिए पर चला गया है. किसान सहित सारे ग्रामीण सरकारी नौकरियों, छोटे-मोटे रोजगार-धंधों और शहरों के भरोसे जी रहे हैं. खेती बस मजबूरी में की जा रही है. ग्राम जीवन पर अंग्रेजी शासनकाल के दौरान लगा ग्रहण अभी तक छँटा नहीं है. देश की आजादी के साथ किसानों के शोषक जमींदार ज़रूर खत्म हो गए, मगर किसानों का शोषण रुका नहीं. पहले ज़मींदार किसानों की मेहनत-पसीने की कमाई को गड़प कर जाते थे, आजादी के बाद सरकार की व्यवस्था.
कोई भी व्यवसाय-कार्य और उसमे लगे लोग तभी सरवाइव कर सकते हैं, जब उस कार्य-व्यवसाय से उन्हें मुनाफा हो. किसानों के साथ ऎसी स्थिति कभी नहीं बनी. अंग्रेजी काल से आजतक उनके द्वारा उत्पादित अनाज, सब्जियाँ, फल और दूध आदि बगैर मुनाफा जोड़े बाजार तक पहुँचती है. कितनी हैरत की बात है कि बाज़ार में बैठे व्यापारी और बिचौलिए किसानों द्वार उत्पादित वस्तुओं को बेचकर गाढ़ी कमाई कर रहे हैं और किसान अपनी परवरिश भर लाभ भी प्राप्त नहीं कर पाता है. यहाँ यह बताते हुए चलना आवश्यक है कि एक एकड़ में गेहूँ की खेती करने से किसान को लागत के अलावा 2500 रुपए की बचत हो पाती है, जबकि उतनी ही ज़मीन पर धान की खेती से 3500 रुपए की बचत हो पाती है. यानी 5 एकड़ खेत जोतनेवाला किसान एक साल में 30 हज़ार रुपए कमा पाता है. वह भी तब जब पूरे खेत उसके हों और फसल भी अच्छी हुई हो. अब अंदाजा लगा लीजिए 5 एकड़ में खेती करनेवाला सालाना 30 हज़ार रुपए कमाकर अपने परिवार का भरण-पोषण कैसे कर सकता है? और यह हालत तब है, जब केन्द्र व राज्य सरकारें बीज से लेकर खाद, पानी, बिजली, डीजल और ट्रैक्टर आदि के नाम पर भारी सब्सिडी किसानों को देने का दावा करती हैं. जबकि सरकारी नौकरी करनेवाला चपरासी भी कम से कम 15 हज़ार रुपए महीना वेतन पाता है. इस सन्दर्भ में दूसरी वास्तविकता यह भी है कि देश के अधिकांश किसानों के पास बमुश्किल 2 एकड़ ज़मीन है. लिहाजा, आज़ादी के 67 साल बाद भी किसान इस देश का सबसे शोषित, पीड़ित, प्रताड़ित, वंचित और पिछड़ा तबका है तो क्यों? इस सवाल का जवाब आजतक या तो सरकारें ढूँढ नहीं पाईं या फिर इस सवाल को जानबूझकर नजरअंदाज़ किया.
अब सवाल उठता है कि क्या प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी वाकई गाँव को सँवारने को लेकर गंभीर है ? क्या वह गाँव में रहनेवाले लोगों की सामाजिक-आर्थिक हैसियत को लेकर सचमुच चिंतित है? क्या वह गाँव और ग्रामीणों की दशा सुधारने को लेकर वाकई प्रतिबद्ध हैं?
गाँव को मजबूत और स्वावलंबी बनाने के लिए सबसे पहले कृषि और किसान को ताकतवर बनाना होगा. आधुनिक तकनीकों और तरीकों से खेती करने की वजह से कृषि उत्पादनों में वृद्धि तो हुई है, मगर बाज़ार में किसान की हैसियत अभी तक बन नहीं पाई है. फुटपाथ पर बैठा मोची और हॉकर भी अपनी मेहनत की कीमत खुद तय करता है, मगर बड़ा से बड़ा किसान भी अपने उत्पादन की कीमत तय नहीं कर पाता. उसे बाज़ार के रहमोकरम पर ही जीना पड़ता है. कहने को तो सरकार कृषि उत्पादनों का न्यूनतम समर्थन तय करती है, मगर वह बेहद कम, दोषपूर्ण और अन्यायी है. बाज़ार में किसी भी वस्तु की कीमत उस वस्तु की लागत में मुनाफा जोड़कर तय की जाती है, मगर किसानों द्वारा उत्पादित वस्तुओं के साथ ऎसी बात नहीं है. किसानों को मुनाफा तो दूर, मेहनत की मजूरी तक नहीं मिल पाती. क्या प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी किसानों को मुनाफा सहित मूल्य दिलाने का संकल्प रखते हैं? यदि हाँ, तो किसानों को बाज़ार से अपनी मेहनत का सही मूल्य मिले, इसकी उपयुक्त व्यवस्था करनी होगी.
पब्लिक डिस्ट्रिब्यूशन सिस्टम यानी सस्ते गल्ले की सरकारी दुकान पूरी तरह से किसान विरोधी है. यह नेताओं का वोट बैंक तो बढ़ाती है, मगर ग्रामीण अर्थव्यस्था को पूरी तरह ध्वस्त कर देती है. अभी सरकार ग्रामीण क्षेत्रों की 75% आबादी और शहरी क्षेत्र की 50% आबादी को सस्ता गल्ला बाँट रही है, क्या ऎसी ही कीमतों पर घर, टीवी-फ्रिज और मोटरगाड़ियाँ बाँट सकती? क्योंकि आज ये चीज़ें भी लक्जरी नहीं ज़रूरी हो गई हैं. मेरा दावा है एक साल के लिए भी सरकार ऎसा कर दे तो बड़े-बड़े उद्योगपतियों का बेड़ा गर्क हो जाएगा. किसानों ने फायदे को कभी अपना मकसद नहीं बनाया, यह इस देश पर किसानों का अहसान है. वरना गेहूँ 400 रुपए किलो और चावल 500 रुपए खरीदते, तब इस देश के शहरी अमीरों को समझ में आता कि उनकी कितनी हैसियत है. हमारे गाँव में एक कहावत है ‘ कमाए लँगोटी, खाय धोती’ इस देश की व्यवस्था इस कहावत को पूरी तरह चरितार्थ कर रही है.
आधुनिक जीवन व्यवस्था में बिजली की बड़ी अहम भूमिका है, मगर देश में बिजली की स्थिति बेहद दयनीय है. लाखों गाँवों ने आजादी के 67 साल बाद भी बिजली का मुँह नहीं देखा है. बिजली के अभाव में कम्प्यूटर जैसे ज़रूरी साधन का इस्तेमाल युवा और किसान नहीं कर सकते. जबकि आज की दुनिया में प्रगति का सहचर बनने के लिए कम्प्यूटर का साथ अनिवार्य है. क्या उत्साही प्रधानमंत्री देश के गाँवों तक बिजली पहुँचा पाने की स्थिति में होंगे?
ज्यादातर गाँवों में सभ्य समाज के जीवन की मूलभूत सुविधाएँ- अच्छे स्कूल और अस्पताल तक नदारद हैं. मुझे लगता है, गाँव को सड़कों से जोड़ने से ज्यादा ज़रूरी स्कूलों और अस्पतालों से लैश करना है. क्या संसद को मंदिर मानकर उसके प्रवेश द्वार पर श्रद्धा से शीश नवाने वाले प्रधानमंत्री मोदी हमारे गाँव में स्कूल और अस्पताल का जाल बिछा पाएँगे?
फूड प्रोसेसिंग में बड़ी-बड़ी कंपनियाँ धंधा कर रही हैं, मगर खेती करने के काम में ऎसी एक भी कंपनी क्यों नहीं उतर पाई है? इससे भी यह आसानी से समझा जा सकता है कि मौजूदा व्यवस्था में खेती में फायदा नहीं है. मोदी जी अगर सचमुच गाँव और किसान को मजबूत और स्वावलंबी बनाना चाहते हैं, तो फूड प्रोसेसिंग के व्यवसाय में उद्योगपतियों के एकाधिकार को खत्म करना होगा. बेहतर हो कि फूड प्रोसेसिंग इंडस्ट्री में किसानों की सीधी भागेदारी अनिवार्य की जाय और उन्हें इस इंडस्ट्री का मेन स्टेक होल्डर बनाया जाय. क्या सबका विकास चाहनेवाले प्रधानमंत्री मोदी देशी-विदेशी उद्योगपतियों को नाराज़ कर किसानों को उसका वाजिब हक दिला पाने का संकल्प रखते हैं? यदि हाँ, तभी गाँव का विकास संभव है, वरना 67 सालों से गाँव और किसान के विकास को लेकर चल रही सरकारी कवायद जिस तरह से अबतक रस्मी रही है, आगे भी रस्मी ही बनी रहेगी? भाषण देकर समर्थकों और मातहतों से तालियाँ जितनी भी पिटवा लें, हमारे गाँव की स्थिति सुधरने वाली नहीं.
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