Wednesday, 21 May 2014

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और हमारे गाँव

नरेन्द्र मोदी से नई और ऊँची अपेक्षाएँ सिर्फ इसलिए नहीं है कि वह भारत के नए प्रधानमंत्री हैं, बल्कि उनसे आम भारतवासियों की अपेक्षाएँ इसलिए भी अधिकतम है कि उन्होंने बतौर मुख्यमंत्री गुजरात का विकास कर दिखाया है और अपने चुनावी भाषणों के दौरान पूरे देश को यह भरोसा दिलाया है कि गुड गवर्नेंस कर जिस तरह गुजरात में उल्लेखनीय विकास किया है, वैसी ही विकास गंगा वह पूरे भारत में बहाएँगे.
हमारे गाँव को नरेन्द्र मोदी से बड़ी अपेक्षाएँ है. गाँव हमारे देश भारतवर्ष की पहचान हैं. हमारी संस्कृति, हमारी दृष्टि, हमारा विवेक, हमारी आकांक्षाएँ और वसुधैव कुटुम्बकम् का हमारा अद्भुत मानवीय विचार हमारे गाँव से ही अनुप्राणित हैं. हमारे पर्व-त्योहारों, शादी-ब्याहअन्य रीति रिवाजों और उत्सवों की आधार भूमि हमारे गाँव ही हैं. कहते हैं कि अगर किसी को खत्म करना है तो उसकी संस्कृति को खत्म कर दो, बिना किसी युद्द के वह स्वतः खत्म हो जाएगा. सदियों की गुलामी की वजह से हमारी संस्कृति पर लगातार विदेशी हमले होते रहे. फिर भी हमारी संस्कृति बची रही, तो इसलिए कि हमारी जड़ें गहरे तौर पर हमारे गाँव की मिट्टी में जमी हैं. मगर दुखद यह रहा कि आजादी के बाद भी भारतीय संस्कृति के गढ़ गाँव को मजबूत करने का काम नहीं हुआ. वैश्वीकरण और आर्थिक उदारीकरण के बाद गाँव की स्थिति और भी दयनीय हुई है. गाँव से प्रतिभा और युवा शक्ति दोनों का भारी पलायन हुआ. आज स्थिति यह है कि हर पढ़ा-लिखा छात्र और अनपढ़ मजदूर अपने सुनहरे भविष्य और रोटी-रोजगार के लिए गाँव छोड़ कर जा रहा है. हमारी सरकारें गाँव के विकास के नाम पर लंबे-चौड़े दावे करती हैं, मगर हकीकत बिल्कुल उलट है. गाँव में समस्याओं का जाल लगा है. सभ्य समाज की मूलभूत ज़रूरतों -शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार का घोर अभाव है. गाँव तक विकास पहुँचाने के नाम पर हर गाँव को सड़कों से जोड़ा तो जा रहा है, मगर उन सड़कों के रास्ते विकास आने के बजाय, शहरी अपसंस्कृति आ रही है. शहरों की झोपड़पट्टी संस्कृति गाँव में भी बस्ती की शक्ल में  अनगढ़ और बेतरतीव बढ़ती जा रही है. ग्राम पंचायतों को जो पैसे विकास के नाम पर भेजे जा रहे हैं, गाँव के बदमाश किस्म के लोगों और ब्लॉक के अधिकारियों-कर्मचारियों का सिंडिकेट जोंक की तरह उसे पीता जा रहा है.
तमाम सरकारी सहायता के बावजूद गाँव के लोग खेती से लगातार दूर होते जा रहे हैं. सभ्य समाज की मूलभूत सुविधाओं की कमी और खेती के घाटे का सौदा साबित हो चुकने के बाद गाँव पूरी तरह कंगाली की हालत में है. गाँव का पूरा सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक ताना-बाना लगभग पूरी तरह टूट चुका है. हमारा संयुक्त परिवार, हमारा सामाजिक कार्य-व्यवहार, हमारी पंचायती न्याय व्यवस्था, हमारी पारंपरिक खेती, पशु-पक्षियों के साथ हमारा सह अस्तित्व सब नष्ट होने के कगार पर हैं. क्या इनके बिना हम हजारों साल पुरानी अपनी भारतीय संस्कृति, जिस पर हर भारतीय को गर्व है, उसकी कल्पना हम कर सकते हैं ?
मोदी जी से हमारे गाँव को इसलिए भी अधिक अपेक्षा है कि मोदी उस पार्टी और विचार की पृष्ठभूमि से आए हैं, राष्ट्रवाद और भारतीय संस्कृति को प्रतिष्ठित करना जिसका मूल ध्येय है.        
गाँव को पुनर्स्थापित और पुनर्प्रतिष्ठित करने के लिए सरकार को सबसे पहले ढाँचागत स्तर पर काम करने की ज़रूरत है. गाँव में शिक्षा व्यवस्था बिल्कुल ही चौपट है. ज्यादातर गाँवों में प्राइमरी स्कूल भी नहीं है. हाइस्कूल की पढ़ाई के लिए बच्चों को पाँच से दस किलोमीटर की रोजाना यात्रा करनी पड़ती है, जाड़ा, गर्मी और बरसात तीनों मौसमों में छात्र-छात्राओं को हर साल जानलेवा मुसीबतों का सामना करना पड़ता है. कॉलेज की पढ़ाई के लिए प्रायः गाँव के विद्यार्थियों को अपने गाँव से 25 से 30 किलोमीटर (कहीं-कहीं तो इससे भी अधिक) अपने जिला मुख्यालयों तक आना पड़ता है. शहरों में किराए का कमरा लेकर रहना ज्यादातर विद्यार्थियों के माता-पिता की आर्थिक स्थिति इजाजत नहीं देती, ऎसे में प्रायः लड़कियों को आगे की पढ़ाई छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ता है.
स्वास्थ्य के क्षेत्र में तो स्थिति और भी बुरी है. पिछले कुछ सालों में प्राइमरी हेल्थ सेंटर की सुविधा पंचायत स्तर पर ज़रूर की गई है, मगर ज़रूरत के हिसाब से बेहद नाकाफी है. कह सकते हैं ऊँट के मुँह में जीरा. छोटे-मोटे ऑपरेशन के लिए भी ग्रामवासियों को सरकारी सुविधा के लिए राजधानी आना पड़ता है या अपने पास के शहरों के प्राइवेट अस्पताओं का आसरा लेना पड़ता है. जहाँ मरीजों के अटेंडेंट्स को नारकीय स्थिति भोगनी पड़ती है.
साफ-सफाई के मामले में भी हमारे गाँव की स्थिति बेहद बुरी है, ज्यादातर घरों में शौचालय नहीं है, और लोग सड़कों-अलंगों पर खुले में शौच करते हैं. नतीजा है हरी-भरी फसलों से भरे खेत तो सुन्दर दिखते हैं, मगर गाँव में प्रवेश के रास्ते से ही गंदगी का साम्राज्य शुरू हो जाता है. नालियों और गलियों की साफ-सफाई की कोई आधिकारिक व्यवस्था नहीं होने की वजह से घर का कूड़ा-कचरा और गंदा पानी रास्तों पर बिखरा रहता है.

लगातार बढ़ते शहरीकरण की वजह से भी गाँव की अस्मिता लगातार खतरे में है. इसके लिए भूमि अधिग्रहण कानून में यह सुधार की ज़रूरत है कि अधिग्रहण की स्थिति में किसानों को नगदी मुआवजा देने के बजाय खेत के बदले खेत का नियम बने. साथ ही यह आवश्यक किया जाय कि खेती की जमीन का एक निश्चित प्रतिशत ही विकास के लिए इस्तेमाल हो, बाकी पर खेती ही की जाय. ताकि उद्योगपति और व्यापारी के साथ-साथ किसान भी जिन्दा रहें और विकास में भागीदार बन सकें. 
धनंजय कुमार