धनंजय कुमार
हम सब 65 वाँ गणतंत्र दिवस मना रहे हैं. हालाँकि हमारे देश में गणतंत्र की परम्परा
बहुत पुरानी है. हमारा लिच्छवि (वैशाली) गणराज्य दुनिया का पहला गणतंत्र था, इसे तो सब जानते ही हैं. इतिहासकार बताते हैं
कि उससे भी पहले से, वैदिक काल से ही हम जनतंत्रवादी रहे हैं. जनता द्वारा सरकार भले नहीं चुनी
जाती थी, शासन की बागडोर राजा के हाथ में होती थी, तब भी ग्रामसभाओं का वजूद था और ग्रामसभा अपने गाँव-समाज की
समस्याओं पर फैसले लिया करती थी. उनके निर्णयों को राजा भी भरपूर सम्मान देते थे.
गणतंत्र की यह परम्परा हमारे देश में अंग्रजों के आने से पहले तक निर्बाध चल रही
थी, हालाँकि अग्रेंजो से पहले भी दुनिया के तमाम आक्रमणकारी देशों और उनके राजाओं
ने भारतवर्ष पर शासन किया,
मगर गाँव की जनतांत्रिक प्रक्रिया पर किसी ने अपना तंत्र नहीं थोपा.
हमारे इस
ग्रामीण जनतांत्रिक व्यवस्था को मिटाने का काम किया अंग्रेजों ने. उसने जमींदारी
प्रथा शुरू की और ग्रामसभाओं का महत्व खत्म कर दिया. ज़मीन्दार को गाँव का
सर्वेसर्वा बना दिया गया और जमींदारों पर नियंत्रण रखने के लिए अंग्रेजों ने अपने
अधिकारी बहाल कर दिए. जो ग्रामसभाएँ पहले अपनी आंतरिक समस्याएँ खुद निबटा लिया
करती थीं, उसके लिए अब उन्हें शासन के अनुसार चलने को मजबूर होना पड़ा. शासन का ध्यान
उनकी समस्याओं के निबटारे के बजाय राजस्व उगाही में ज्यादा था, लिहाजा, ज़मीन्दार और अंग्रेज सरकार के अधिकारी, दोनों का सिंडिकेट ग्रामीणों के शोषण
में जुट गया.
और यहीं से
शुरू हुई हमारे गाँव की तबाही. अंग्रेजों की राजस्व उगाही नीति ने हमारे गाँवों के
राजनीतिक-सामाजिक ढाँचे को तो छिन्न-भिन्न किया ही, आर्थिक ढाँचे को भी
तहस-नहस कर दिया. हमारे गाँव, जो कलतक, अपनी ज़रूरतें पूरी कर
चुकने के बाद राज्य के कोषागार में भी अपना अमूल्य योगदान कर दिया करते थे, अब अपनी ज़रूरत पूरी करने में भी अक्षम होने लगे.
हमारे गाँव की
अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार थी कृषि, जो ज़मीन्दारी प्रथा की वजह से चौपट
हो गई. कृषि से किसानों-मज़दूरों का पेट भरना भी मुश्किल होने लगा. और यहीं से
भारतीय ग्रामीण सरकारी नौकरियों की तरफ उन्मुख होने लगे.
अंग्रेजों की
दरअसल यह सोची समझी चाल थी,
इस तरह से वह गाँव की आत्मनिर्भरता को समाप्त करने में
कामयाब हुए. साथ ही गाँववासियों को रोटी-रोजगार के लिए नौकरी की तरफ आकर्षित कर
अंग्रेजों ने हमारे पारिवारिक-सामाजिक ढाँचे को भी अभूतपूर्व क्षति पहुँचाई.
संयुक्त परिवार हमारे गाँव-समाज की हमारी विलक्षण विशेषता थी. बड़ी से बड़ी आपदा भी
हम जिसके बल पर झेल जाया करते थे, वह ध्वस्त होने लगी. ग्रामसभाओं के बहाने
सामाजिक स्तर पर गाँववासियों का जो आपस में संवाद था, वह समाप्त हो गया. भाषा के
स्तर पर भी अंग्रेजों ने हमें अलग-थलग करने की कामयाब चाल चली, कि हमारी अपनी भाषा
हेय और उनकी भाषा इंग्लिश महान लगने लगी. इस तरह धीरे-धीरे बड़े ही सुनियोजित तरीके
से अंग्रेज हमें गुलाम बनाने में पूरी तरह कामयाब हो गए.
लंबे संघर्ष के
बाद 15 अगस्त 1947 को हमारा देश भारतवर्ष अंग्रेजी शासन से मुक्त हुआ. हमारे
नेताओं ने अपनी सरकार बनाई, और 26 जनवरी 1950 को भारत का अपना संविधान देश की जनता
को समर्पित किया गया. हम भारतवासियों को, नागरिक के मौलिक अधिकारों के साथ-साथ को सरकार
चुनने का अधिकार भी दिया गया. और भारतवर्ष जनता का, जनता के लिए और जनता के द्वारा
शासित गणतांत्रिक देश बन गया.
देश की जनता के
लिए यह बड़ा ही खुशी का दिन था कि वह अब किसी का गुलाम नहीं था. उसपर अब कोई
जबरदस्ती, उनकी मर्जी के विपरीत, अपना हित साधने के लिए नियम-कानून और व्यवस्था
नहीं थोप सकता था, क्योंकि अब सरकार चुनने का अधिकार जनता को मिल चुका था. पिछले 64 सालों से हम, इसी खुशी में आज के दिन
को गणतंत्र दिवस के तौर पर सेलीव्रेट कर रहे हैं. आज हम 65वाँ गणतंत्र दिवस मना रहे हैं. मगर
क्या यह वास्तव में वह गणतंत्र है, जो अंग्रेजों से पहले हमें प्राप्त था ?
गाँव को अधिकार
देने के उद्देश्य से हमारी सरकार ने पंचायती राज व्यवस्था फिर से कायम तो की, मगर ग्रामसभाओं
को अपने गाँव के सन्दर्भ में स्वतंत्र निर्णय लेने का अधिकार नहीं दिया. हालाँकि
पिछले कुछ सालों में भारत सरकार ने ग्रामसभाओं को अपने विकास से सम्बन्धित कुछ
निर्णय लेने और योजना बनाने का अधिकार तो दिया है, मगर सरकार ने अपना दखल वैसे ही
बनाए रखा है, जैसे अंग्रेजी शासन में था. ज्यादातर योजनाएँ अभी भी दिल्ली से बनकर
गाँव तक पहुँच रही हैं.
दूसरी
महत्वपूर्ण बात है कि गाँव की आत्मनिर्भरता. गाँव जबतक आत्मनिर्भर नहीं होते, तबतक
हमारा गणतंत्र अधूरा है. हमारे गाँव कृषि आधरित थे, जिसे अंग्रेजों ने चौपट कर
दिया, हमारी सरकार हरित क्रांति के बावजूद उस कृषि आधार को अबतक पुनर्जीवित नहीं
कर पाई है. क्योंकि हमारी सरकार ने भी अंग्रेजी सरकार की तरह ही गाँव और कृषि के
बजाय शहरीकरण और औद्योगिकीकरण को विकास का माध्यम माना. और कृषि को बढ़ावा देने के
बजाय उसे गर्त में जाने दिया.
सरकार यदि कृषि
को बढ़ावा देने की नीयत रखती तो किसान को बाज़ार से उसकी उपज का मुनाफा सहित मूल्य दिलाती,
मगर सरकार ने किसानों के साथ छल किया और उसे सब्सिडी का झुनझुना पकड़ा दिया. नतीजा
हुआ किसान तरक्की करने के बजाय लगातार पिछड़ता चला गया, और उसकी अगली पीढ़ी के सामने
गाँव से पलायन के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा.
आज गाँव की
स्थिति यह है कि पढ़े-लिखे लोग हों या अनपढ़ मजदूर, कोई गाँव में रहना नहीं चाहता.
विडम्बना यह है कि सरकार अभी भी नहीं जागी है. गाँव का विकास करने के उद्देश्य से
सरकार गाँव को स्कूलों, अस्पतालों और सड़कों से जोड़ तो रही है, मगर गाँव की स्थिति इससे
सुधर नहीं रही है. गाँव से लोगों का पलायन बदस्तूर जारी है. और यह स्थिति तबतक
यथावत रहेगी जबतक गाँव को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में सरकार कारगर कदम नहीं
उठाती. और वह कारगर कदम कृषि को लाभ का व्यवसाय बनाने अलावा कुछ भी नहीं हो सकता.
अब देखना है
हमारी सरकार हमारे गाँव का कब वास्तविक महत्व समझती है. और वास्तविक गणतंत्र इस
देश में उसी दिन आएगा, जब गाँव को महत्व दिया जाएगा. गाँव आत्मनिर्भर होगा और गाँव
में रहना सम्मान का विषय होगा.