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| मेरी गली |
हमारे गाँव प्रकृति की अनमोल देन हैं. हवा, पानी, मिट्टी, पहाड और पेड-पौधे क्या कुछ नही दिया है प्रकृति ने. मगर बदले मे प्रकृति को हमने क्या दिया? कथित विकास के नाम पर हमने हवा मे चिमनियो का धुआँ भर दिया. पानी मे तरह-तरह की गँदगियाँ घोल दी. मिट्टी मे खाद नाम का ज़हर मिला दिया. पेड-पौधो और पहाडो को नष्ट कर बडी-बडी इमारते और कल-कारखाने बना दिए.
हमारे गाँव आज़ादी के भारत की तस्वीर बदल सकते थे. लेकिन हमारी सरकारो ने गाँव को सदा हाशिए पर रखा. हमे पढाया तो जाता रहा कि भारत गाँवो का देश है,लेकिन देश के विकास की राह शहरो से निकाली गई.नए-नए शहर बसाए गए.शहरो को सँवारने मे तन, मन और देश का अपार धन लगाया गया.मगर गाँव को सँवारना तो दूर बचाने का भी प्रयास नहीं किया गया.आज़ादी के 64 साल बाद भी केन्द्र अथवा किसी राज्य सरकार के पास ग़ाँव को बचाने की कोई नीति या योजना नहीं है.ग्रामीण विकास के नाम पर गाँवो को विकास की अँधी दौड मे जबरन धकेला जा रहा है.गाँवो को सडको से जोडा जा रहा है और सडको के रास्ते शहर जबरन गाँव मे घुसे आ रहे हैं.और इसका सबसे पहला शिकार हो रहे हैं हमारे उपजाउ खेत.किसानो के खेत एक तरफ विकास के नाम पर सरकार छीन रही है, दूसरी तरफ उँची कीमत का लालच दे बिल्डर और इंवेस्टर.किसान मजबूर हैं.खेती के लिए ज़रूरी इंफ्रास्ट्रक्चर का घोर अभाव है.बिजली नहीं है,किसान मॉनसून के भरोसे हैं. नतीजा खेती चौपट है. कभी बाढ मे फसले डूब जाती हैं तो कभी पानी के अभाव मे फसले सूख जाती हैं. किसान इन विपदाओ से फसलो को उबारकर अच्छी पैदावार कर भी लेते हैं तो उचित बाज़ार मूल्य नहीं मिलता और किसानो को फिर निराशा और कुंठा के गर्त मे डूबना पडता है.इस देश मे बडे व्यापारी से लेकर सडक किनारे बैठा मामूली मोची भी अपनी मेहनत और उत्पाद की कीमत खुद तय करता है, लेकिन किसान अपने अनाज,फूल या फल की कीमत तय नही करता.उसकी कीमत बाज़ार या सरकार तय करती है.खेती करना किसान के लिए घाटे का काम बन गया है. लिहाजा, किसानो का खेती से मोह्भँग होता जा रहा है. किसान अपने बाल-बच्चो को पढा लिखा कर नौकरी के लिए शहर भेजना चाहते हैं,इसके लिए खेत बेचने से भी नहीं झिझकते.और उनके खेत खरीद रहे हैं वे व्यापारी, जिनको पता है, यह ग़ाँव भी कल शहर बन जाएगा और उन्हे अच्छी कमाई होगी. दोस्तो, इस तरह से लगातार हमारे गाँव खत्म हो रहे हैं.हमारे गाँव बचाए जाने चाहिए,क्योंकि गाँव मे ही प्रकृति बसती है.अगर प्रकृति नष्ट हो गई, तो हम भी नही बचेंगे.खेत नही बचेंगे तो चावल, गेहूँ, सब्ज़ी, फल आदि कहाँ से आएँगे? क्या हम कार,कम्प्यूटर खाकर ज़िन्दा रह सकेंगे???
धनंजय कुमार






