Saturday, 10 September 2011

ग़ाँव को बचाइए !!! वरना सब मारे जाएँगे!!!

मेरी गली 

हमारे गाँव प्रकृति की अनमोल देन हैं. हवा, पानी, मिट्टी, पहाड और पेड-पौधे क्या कुछ नही दिया है प्रकृति ने. मगर बदले मे प्रकृति को हमने क्या दिया? कथित विकास के नाम पर हमने हवा मे चिमनियो का धुआँ भर दिया. पानी मे तरह-तरह की गँदगियाँ घोल दी. मिट्टी मे खाद नाम का ज़हर मिला दिया. पेड-पौधो और पहाडो को नष्ट कर बडी-बडी इमारते और कल-कारखाने बना दिए.
हमारे गाँव आज़ादी के भारत की तस्वीर बदल सकते थे. लेकिन हमारी सरकारो ने गाँव को सदा हाशिए पर रखा. हमे पढाया तो जाता रहा कि भारत गाँवो का देश है,लेकिन देश के विकास की राह शहरो से निकाली गई.नए-नए शहर बसाए गए.शहरो को सँवारने मे तन, मन और देश का अपार धन लगाया गया.मगर गाँव को सँवारना तो दूर बचाने का भी प्रयास नहीं किया गया.आज़ादी के 64 साल बाद भी केन्द्र अथवा किसी राज्य सरकार के पास ग़ाँव को बचाने की कोई नीति या योजना नहीं है.ग्रामीण विकास के नाम पर गाँवो को विकास की अँधी दौड मे जबरन धकेला जा रहा है.गाँवो को सडको से जोडा जा रहा है और सडको  के रास्ते शहर जबरन गाँव मे घुसे आ रहे हैं.और इसका सबसे पहला शिकार हो रहे हैं हमारे उपजाउ खेत.किसानो के खेत एक तरफ विकास के नाम पर सरकार छीन रही है, दूसरी तरफ उँची कीमत का लालच दे बिल्डर और इंवेस्टर.किसान मजबूर हैं.खेती के लिए ज़रूरी इंफ्रास्ट्रक्चर का घोर अभाव है.बिजली नहीं है,किसान मॉनसून के भरोसे हैं. नतीजा खेती चौपट है. कभी बाढ मे फसले डूब जाती हैं तो कभी पानी के अभाव मे फसले सूख जाती हैं. किसान इन विपदाओ से फसलो को उबारकर अच्छी पैदावार कर भी लेते हैं तो उचित बाज़ार मूल्य नहीं मिलता और किसानो को फिर निराशा और कुंठा के गर्त मे डूबना पडता है.इस देश मे बडे व्यापारी से लेकर सडक किनारे बैठा मामूली मोची भी अपनी मेहनत और उत्पाद की कीमत खुद तय करता है, लेकिन किसान अपने अनाज,फूल या फल की कीमत तय नही करता.उसकी कीमत बाज़ार या सरकार तय करती है.खेती करना किसान के लिए घाटे का काम बन गया है. लिहाजा, किसानो का खेती से मोह्भँग होता जा रहा है. किसान अपने बाल-बच्चो को पढा लिखा कर नौकरी के लिए शहर भेजना चाहते हैं,इसके लिए खेत बेचने से भी नहीं झिझकते.और उनके खेत खरीद रहे हैं वे व्यापारी, जिनको पता है, यह ग़ाँव भी कल शहर बन जाएगा और उन्हे अच्छी कमाई होगी. दोस्तो, इस तरह से लगातार हमारे गाँव खत्म हो रहे हैं.हमारे गाँव बचाए जाने चाहिए,क्योंकि गाँव मे ही प्रकृति बसती है.अगर प्रकृति नष्ट हो गई, तो हम भी नही बचेंगे.खेत नही बचेंगे तो चावल, गेहूँ, सब्ज़ी, फल आदि कहाँ से आएँगे? क्या हम कार,कम्प्यूटर खाकर ज़िन्दा रह सकेंगे???

धनंजय कुमार  

Friday, 9 September 2011

आँगन ग्राम गीत



2003 मे मुंबई मे आँगन सोसियो कल्चरल ऑर्गेनाइजेशन द्वारा आयोजित "बिहार गौरव दिवस" पर संबोधित करते संस्था के संस्थापक-अध्यक्ष श्री धनंजय कुमार   

श्रोतागण  

2003 मे मुंबई मे आँगन सोसियो कल्चरल ऑर्गेनाइजेशन द्वारा आयोजित "बिहार गौरव दिवस" पर  उपस्थित विशिष्ट अतिथि  (बाएँ से- श्री विवेक अबरोल,सांसद श्री संजय निरुपम और त्रिपुरा के पूर्व राज्यपाल व प्रख्यात राजनेता-विद्वान लेखक प्रो.सिद्धेश्वर प्रसाद .

2003 मे मुंबई मे आँगन सोसियो कल्चरल ऑर्गेनाइजेशन द्वारा आयोजित "बिहार गौरव दिवस" पर संबोधित करते संस्था के संस्थापक-अध्यक्ष श्री धनंजय कुमार   
हम धार बनें, आधार बनें,हम सृष्टि का श्रृंगार बनें.
हम आस बनें,विश्वास बनें,हर मौसम में मधुमास बनें.

एक है सूरज, चाँद एक है, धरती और आकाश एक है.
एक ग्राम के हम हैं वासी,एक लक्ष्य के हम अभिलाषी.
सुखी रहें हम फूलें फलें,आगे बढ़ें और बढतें रहें.
हम आस बनें,विश्वास बनें,हर मौसम में मधुमास बनें.

कितना सुन्दर गाँव हमारा, प्यारा-प्यारा नदी किनारा.
चहुँ ओर हरियाली डोले हवा में पंछी मिश्री घोले.
कहीं दीप जले, कहीं रंग उड़े,कहीं दादा-पोता संग चले.
हम आस बनें,विश्वास बनें,हर मौसम में मधुमास बनें.

अपने गाँव का पानी-मिट्टी,प्रेमसिक्त जैसे कोई चिट्ठी.
दिन लिखता है शौर्यगीत,जहाँ गाती रात कोई लोरी.
बरगद-पीपल एसी अपने,बिन खाट ही आयें मधुर सपनें.
हम आस बनें,विश्वास बनें,हर मौसम में मधुमास बनें.


अपना गाँव भी है फरटाइल,गली-गली अब है मोबाइल,
शहरका मुँह फिर क्योंकर देखें,अपनी किस्मत खुद ही लिखें.
भीड़ नहीं हम चेहरा बने,हर सक्सेस का सेहरा बनें. 
 हम आस बनें,विश्वास बनें,हर मौसम में मधुमास बनें.

बेटा - बेटी फर्क कहाँ अब,ऊँच जाति का दर्प कहाँ अब,
 हलवाहा कि हलवाला,मिट्टी ने फर्क मिटा डाला .
जब हवा चले,फसलें झूमें,धरती का भाल गगन चूमे.
हम आस बनें,विश्वास बनें,हर मौसम में मधुमास बनें.

                                                         धनंजय  कुमार 

हमारे गाँव



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गाँव !
प्रकृति और मनुष्य की संगमस्थली!
जी हाँ,जिस जगह पर प्रकृति मनुष्य को सीने से लगाती है,वही गाँव है. इसीलिए गाँव जीवनदायिनी है. भोजन के लिए अनाज से लेकर फूल,फल और औषधि के लिए जड़ी-बूटियाँ भी गाँव से ही हमें प्राप्त होते हैं. गाँव किसी भी देश के विकास में अपना बहुमूल्य योगदान करते हैं.
भारत गाँवों का देश है,मगर संभ्रांत वर्ग की दृष्टि में हमारे गाँव देश के लिए बोझ बने हैं. वहां रहने वाले लोग income tax नहीं भरते,मगर vote के चक्कर में सरकार income tax भरने वालों का पैसा शहरों में लगाने के बजाय गाँवों पर खर्च कर रही है.और गाँव के लोग हैं कि मामूली रोज़ी-रोज़गार के लिए भी शहर भागे आ रहे हैं.शहरों में भीड़ बढती जा रही है.
गाँव के लोग भी गावों में नहीं रहना चाहते.वह खेती नहीं करना चाहते,क्योंकि उनके लिए खेती साल दर साल घाटे का कारोबार बनती जा रही है.वह खेत बेचकर भी अपने बाल-बच्चों को ऊँची शिक्षा दिलाना चाहते हैं,ताकि बच्चे अच्छी नौकरी पा सकें और गाँव से पाला छूटे.स्वाभाविक सा प्रश्न है,ऐसा क्यों?
तो उत्तर भी उतना ही सहज है कि गाँव को हमने लगातार कम करके आँका. विकास की धुरी हमने शहर को बनाया और गाँव की लगातार हम उपेक्षा करते रहे.हमारी किताबों में हमें पढाया जाता तो रहा कि भारत गाँवों का देश है,मगर आज़ादी के बाद भी हमारे गाँव विकास की धुरी नहीं बन सके. मुझे यह कहने में कोई झिझक नहीं कि भारत को भले ही 1947 में आज़ादी मिल गयी, लेकिन हमारे गाँव आज भी गुलाम हैं.स्वतंत्रता से पहले अंग्रेज भारतवर्ष से सस्ती कीमत पर कच्चा माल बाहर ले जाते थे और फिर उससे ही सामान बनाकर महँगी कीमत पर भारतवासियों को बेचते थे.वही स्थिति आज गाँवों की है; व्यापारी आलू से लेकर लीची तक गाँव से औने पौने दाम में ले जाते हैं और फिर चिप्स,शराब,जूस आदि के रूप में मंहगी कीमत पर हमें बेचते हैं.यह हमारे आर्थिक नीति निर्माताओं के लिए दशकों पहले सोचने का विषय यह होना चाहिए था कि हमारे किसान,जो देश को खिला-पिला कर तंदुरुस्त रखते हैं, वो अपने खेतों में हल नहीं चला पा रहे हैं और शराब जैसी अज़रुरी चीज़ बनाने वाले लोग हवाई जहाज चला रहे हैं.
सुन रहे हैं लोग...  
धनंजय कुमार