Tuesday, 25 December 2012

फूलों की खेती की शुरुआत कर लिखी जा रही बदलाव की नई इबारत

फोटो- मनोज कुमार 

बिहार के नालंदा ज़िले के बिन्द गाँव में पहली बार पारम्परिक खेती से अलग हटकर नगदी फसल के तौर पर फूल की खेती शुरू की गई है. परिवर्तन की यह पहल हमारे गाँव के सर्जक व प्रयोगकर्त्ता धनंजय कुमार ने की है.धनंजय कुमार ने यह परिवर्तनकारी शुरुआत अपने ही खेत से की है. अभी उन्होने एक बीघा खेत में गेंदे की विकसित किस्म पूसा नारंगी और पूसा वासंती लगाई है. फूल नवंबर महीने से ही खिलने शुरू हो गए हैं. सरमेरा-बिहटा फोरलेन इस खेत से सटकर गुजर रही है, इसलिए वहाँ से गुजरने वाले अनगिनत ग्रामीणों को आकर्षित कर रहे हैं. बिन्द सहित पास-पड़ोस के अनेक गाँवों के किसान फूल की इस खेती को लेकर उत्सुक और जिज्ञासु हैं. लगभग रोज़ ही कोई न कोई किसान धनंजय कुमार से मिलकर फूल की खेती के बारे में पूछताछ करते हैं. धनंजय कुमार उसके उत्पादन से लेकर मार्केटिंग तक से उन किसानों को अवगत कराते हैं. अबतक मिलने वाले अधिकांश किसानों ने लाभ को देखते हुए फूल की खेती करने का मन बनाया है. धनंजय कुमार मिलनेवाले किसानों को न सिर्फ फूलों की खेती को लेकर जागरूक और प्रोत्साहित कर रहे हैं, बल्कि वह पपीता, केला और मेंथा की खेती के लिए भी तैयार कर रहे हैं. धनंजय कुमार कहते हैं कि नालन्दा ज़िले की मिट्टी खेती के लिए बहुत ही उपयुक्त है. उर्वरा शक्ति से भरपूर यह मिट्टी इन नगदी फसलों के लिए भी मुफीद है. मगर जानकारी के अभाव में यहाँ के किसान अभी भी पारम्परिक खेती ही कर रहे हैं. पूर्वजों के समय से धान-गेहूँ यहाँ के किसानों की मूल फसल है. धान-गेहूँ में लाभ का मार्जिन बेहद कम है. अच्छी उपज होने पर भी चार से पाँच हज़ार रुपए से अधिक का लाभ नहीं होता. इस वजह से यहाँ के किसान लगातार खेती का कार्य छोड़ शहर की ओर नौकरी या किसी अन्य रोज़गार की तलाश में शहर भाग रहे हैं. धनंजय कुमार पिछले एक साल से इन किसानों के बीच काम कर रहे हैं. वह बताते हैं कि किसान खेती को लेकर बेहद निराश और उदासीन हैं. ज्यादातर किसान स्वयं खेती नहीं कर रहे हैं, बल्कि वह बटाईदारों या पट्टा पर खेत लेनेवाले ईंट भट्ठा मालिकों को अपने खेत दे देते हैं. बटाईदार छोटे किसान या मज़दूर हैं. विडम्बना यह है कि वे लोग भी खेती से बेजार हो चुके हैं. पारम्परिक खेती में मेहनत की तुलना में कम लाभ और मजदूरों के अभाव के चलते दिन ब दिन महँगी होती खेती की वजह से किसानों के खेती से दूर होते जाने की मुख्य वजह है. लेकिन धनंजय कुमार का मुम्बई से आकर खेती के लिए काम करना उन किसानों के लिए संजीवनी का काम किया है. धनंजय पिछले दो दशक से मुम्बई में पहले पत्रकारिता फिर टेलीविजन और सिनेमा से जुड़े रहे हैं. पत्रकारिता के क्षेत्र में जहाँ वह जनसत्ता और दोपहर का सामना से जुड़े रहे, वहीं टेलीविजन और सिनेमा में भी वह पहले डेली सोप शांति से लेकर शगुन और एक टुकड़ा चाँद का जैसे दसियों सीरियल लिख तथा हमार घरवाली जैसी सुपरहिट फिल्म निर्देशित कर लेखक व निर्देशक के तौर पर सफल पारी खेल चुके हैं. इसके अलावा वह थिएटर ऑफ रेलेवेंसके सर्जक व प्रयोगकर्त्ता मंजुल भारद्वाज के साथ वह सालों से थिएटर के माध्यम से बदलाव में अपनी महत्वपूर्ण भागदारी देते रहे हैं. इसके बाद 2011 में धनंजय कुमार ने हमारे गाँवका कॉंसेप्ट गढ़ा, जिसके तहत वह गाँव को मजबूत और आत्मनिर्भर बनाने की लक्ष्य-साधना में जुटे हैं. धनंजय कुमार इस बात से बेहद चिंतित है कि विकास की अंधी दौड़ में हमारे गाँव बदरूप शहर में परिवर्तित होते जा रहे हैं. वह कहते हैं, हमारे गाँव नष्ट होते जा रहे हैं. और हमारे गावों के नष्ट होने का मतलब है, हम भारतीयों की पहचान का नष्ट होना. हमें अपनी पहचान को बचाना है तो हमारे गाँव को बचाना होगा.
धनंजय कुमार इसी लक्ष्य को लेकर अपने खेतों में उतरे हैं. अपने गाँव बिन्द को उन्होंने प्रयोगभूमि के तौर पर चुना है, जहाँ वह खेती के साथ-साथ शिक्षा, सामाजिक-राजनीतिक सुधार और सांस्कृतिक चेतना पर भी काम कर रहे हैं. बिन्द में अभी वह डेमोंस्ट्रेशन सेंटर तैयार कर रहे हैं, जो आनेवाले वर्षों में देश में अनुभवपरक सार्थक बदलाव का केंद्र बनेगा. 

Sunday, 23 December 2012

Dreams are blooming...in village Bind.


Horticulture- to empower the farmers By Dhananjay Kumar.


photo by Manoj Kumar


photo by Manoj Kumar



Photo-Dhananjay Kumar 



Friday, 14 December 2012

VIJAYASH ka DHOOM DHADAKA !

VIJAYASH ka DHOOM DHADAKA
video by ms Rupam Kumari
uploaded by Lalan Kumar Kanj

Tuesday, 11 December 2012

मनरेगा और एफडीआई किसानों के लिए ताबूत में आखिरी कील हैं

फोटो - मनोज कुमार

 धनंजय कुमार
किसानों की स्थिति लगातार बदतर होती जा रही है. केन्द्र व राज्य सरकारें भले ही किसानों की बेहतर स्थिति के लिए अरबों-खरबों रुपयों की सब्सिडी बाँटने और किसानों के हित के लिए सतत कल्याणकारी नीतियाँ बनाने के दावे कर रही हो, मगर सच्चाई बिल्कुल उलट है. अरबों-खरबों की सब्सिडी किसानों के नाम पर बँदरबाँट की भेंट चढ़ रही है और रोज़ किसान अपने खेत छोड़कर भाग रहे हैं या इंडस्ट्री के नाम पर सरकारों व एस्टेट एजेंटों द्वारा जबरन ख्देड़े जा रहे हैं. मैं स्वयं किसान परिवार से हूँ. मेरा लालन-पालन, शिक्षा-दीक्षा सब कृषि की वजह से ही हुआ, मगर आज से 40 साल पहले ही मेरे पिता ने स्वप्न देख लिया था या कहिए कसम ले ली थी कि बेटा किसान नहीं बनेगा. इसी तरह मेरे पिताजी के अन्य मित्रों के बेटे भी अपने पिताओं की चाहत (मजबूरी कहना उपयुक्त होगा) के चलते आज कलेक्टर से लेकर क्लर्क तक बन भारत अथवा किसी राज्य सरकार की चाकरी कर रहे हैं, मगर कोई किसान नहीं बना. सरकार के वैज्ञानिकों के शोध व रिकॉर्ड्स आज भी बताते हैं कि बिहार के नालंदा ज़िले के खेतों की मिट्टी कृषि कार्य के लिए सर्वोत्तम है, बावजूद इसके नालंदा के लगभग युवा खेती छोड़ कोई छोटी-मोटी नौकरी भी करने को लालायित हैं. हाँ सरकारें अपने कृषि विभाग के आँकड़ों के आधार पर ज़रूर दावे कर खुश हो रही है कि कृषि के क्षेत्र में प्रदेश व देश लगातार तरक्की कर रहा है. यही रटंत आँकड़ा नालंदा ज़िले के ही बिन्द प्रखण्ड के दफ्तर में एक दिन चर्चा के केन्द्र में उछला. कृषि विभाग के एक छोटे से कर्मचारी ने गर्व से आँकड़ा प्रकट किया कि हमने कितने हेक्टेयर खेतों में फलाँ-फलाँ फसलें लगवाईं. हमारे ज़िला नालंदा ने आलू से लेकर धान उत्पादन में विश्व रिकॉर्ड बनाए. यह सब सरकार की किसान समर्थक नीतियों और हमारे बेहतर क्रियान्वयन का नतीजा है. इस पर मैंने पूछा कि अगर कृषि के क्षेत्र में इतना उत्साहजनक विकास हुआ है तो यह बताइए कि क्या आपके विभाग के छोटे कर्मचारी से लेकर किसी बड़े अफसर ने इस्तीफा देकर खेती से जुड़ने का एक उदाहरण भी प्रस्तुत किया है? इसपर इस कर्मचारी को बचाव में कोई जवाब नहीं सूझा, वह अ...ब... करने लगा, जबकि बाकी श्रोता हँस पड़े. तो यह है कृषि और किसानों की वस्तुस्थिति, वह भी उस प्रदेश में, जिस प्रदेश के मुख्यमंत्री सालों से देश की हर थाली में अपने प्रदेश के खेतों में उपजे अन्न, फल अथवा सब्ज़ियों से बना एक व्यंजन परोसना चाहते हैं. बहरहाल यह कहने में कोई हिचक नहीं है कि किसानों के नाम पर हर सरकारी नीति और योजना सिर्फ लूट है, और लूट के सिवा कुछ नहीं है. सच यह है कि किसानों की दशा लगातार बिगड़ रही है.
क्यों बिगड़ रहे हैं हालात
गाँधी जी ने आज़ादी का वास्तविक सुख देश के किसानों के घरों में देखना चाहा था, इसीलिए भारत में अंग्रेजों के खिलाफ अपनी लड़ाई उन्होंने चम्पारण के नील की खेती करनेवाले किसानों के साथ शुरू की थी, मगर कालांतर में किसान लगातार हाशिए पर धकेले जाते चले गए. हरित क्रांति को भले ही किसानों की भलाई के लिए प्रचारित किया गया, मगर वह भी देश को भुखमरी से बचाने के क्रम में उठाया गया किसान विरोधी कदम था. इसका नतीजा आज पंजाब के किसान और खेत भुगत रहे हैं. किसान कैसर और कर्ज से ग्रस्त हैं तो खेत लगातार घटते वाटर लेबल और उर्वरा क्षमता से बांझपन के कगार पर हैं.
किसानों की बदहाल हालत के लिए मुख्य रूप से ज़िम्मेदार फैक्टर है सरकारों द्वारा किसानों और उनके खेतों को कम करके आँका जाना. आज़ादी से पहले जिन खेतों पर देश की नब्बे प्रतिशत से अधिक आबादी आश्रित थी, उसको देश की आर्थिक व्यवस्था का आधार मानने के बजाय देश के कर्णधार नेताओं और नौकरशाहों ने इंडस्ट्रीयलायजेशन को मूल आधार बनाया. नतीजा रहा बाज़ार पर किसानों का प्रभुत्व होने के बजाय उद्योगपतियों और व्यापारियों का दबदबा बना. और बनता गया. किसान बाज़ार से दूर मिट्टी तक सीमित कर दिए गए और अंततः मिट्टी में ही मिल गए.
मनरेगा और एफडीआई ताबूत में आखिरी कील हैं
मनरेगा को देश के महान आधुनिक अर्थशास्त्री और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि मानते हुए गर्व से फूले नहीं समा रहे हैं, मगर दरहकीकत यह है कि बाज़ार की मार से अधमरे किसानों के लिए यह ज़हर का काम कर रहा है. मनरेगा के पीछे श्रीमान सिंह और उनके वृदों का सुमधुर गीत यह है कि मनरेगा गाँव से मजदूरों के पलायन को रोकने में कारगर होगा, जबकि सच्चाई यह प्रकट हो रही है मनरेगा के तहत साल के सौ दिन प्रतिदिन लगभग डेढ़ सौ रुपए पानेवाले मजदूर किसानों की पहुँच से बाहर हो गए हैं. पलायन की वजह से मजदूरों की
कमी झेल रहे किसानों पर मजदूरों का महँगा हो जाना सर मुड़ाते ओले पड़ने जैसा है. इसी तरह मनरेगा के बाद एफडीआई किसानों पर और भी भारी पड़ने वाली है. श्रीमान सिंह का तर्क है कि इससे बिचौलियों का सफाया हो जाएगा और किसान को अपनी उपज का अधिकतम मूल्य मिलेगा. बेचारे किसान जो छोटे व्यापारियों से पार नहीं पा रहे थे अब वॉल-मार्ट जैसी मल्टीनेशनल कम्पनी से स्वतः निबट लेंगे, यह हास्यास्पद और मूर्खतापूर्ण सोच नहीं तो और क्या है! अगर यह मूर्खतापूर्ण नहीं है तो फिर देश को पुनः गुलामी की ओर धकेलने का अद्भुत प्रयास ज़रूर है. हे गाँधी!        

Sunday, 16 September 2012

स्लम बनते गाँव



विकास और प्रगति के नाम पर गाँव को शहरीकरण की अंधी दौड़ में शामिल करा दिया गया है और गाँव शहरों के चमकते स्वरूप पर नासूर की तरह पसरे स्लम का रूप लेते जा रहे हैं. तंग गलियाँ, छोटे-छोटे बंद कमरों वाले घर, खुली ज़गहों पर लगातार अतिक्रमण, अपने परिवार तक केन्द्रित सोच, अधिक से अधिक पैसे कमाने की भाग-दौड़, रोटी-रोजगार के भविष्य की चिंता आदि शहरी विसंगतियाँ अब गाँव के चरित्र में भी घुल गई हैं. लेकिन जिस तरह से हमारे नगरों-महानगरों की मानवीय-सामाजिक व्यवस्था चरमरा रही है. दम तोड़ रही है, उसे देखते हुए हमें फिर से गाँव की सुध लेने की ज़रूरत है. हम सभी भारतवासियों को पलभर रुककर सोचने की ज़रूरत है कि गाँवों को निरंतर नजर अंदाज करना हमारे देश के लिए कितना घातक रहा. आज जब भारत सरकार खाद्य सुरक्षा बिल लाकर हर भारतीय को पेटभर भोजन देने का सुखद सपना साकार करना चाहती है, ऎसे में यह और ज़रूरी हो गया है कि हम हमारे गाँव के बारे में नए सिरे से गंभीरता से सोचें.
देश की बदलती अर्थव्यवस्था ने गाँवों की बजाय शहरों के निर्माण को ज्यादा तवज्जो दिया. कृषि से ध्यान हटा औद्योगिकीकरण को विकास की धुरी बनाया गया. सरकारी नौकरियाँ करनेवाले लोगों को, वेतन के रूप में मिलनेवाली नियमित राशि और हर प्रकार की सरकारी मानवीय सहायता और सुरक्षा ने नौकरी के प्रति ग्रामीणों का ध्यान खींचा. क्योंकि कृषि कार्य जहाँ पूरी तरह भगवान भरोसे (मॉनसून आधारित) थे, वहीं सरकारी नौकरियों में हर तरह की सुरक्षा थी. फिर नौकरी करने वालों को हर महीने वेतन के रूप मिलने वाली निश्चित व नियमित रकम ने भी लोगों को खेती और गाँव से दूर होने को बाध्य किया. परिणाम यह हुआ कि शहरों के प्रति लोगों का आकर्षण लगातार बढ़ता गया और गाँवों के प्रति उसी अनुपात में घटता गया. शहर और नौकरी करनेवाले लोग प्रगति का, जबकि गाँव और किसान पिछड़ेपन का पर्याय बन गए. और अंतत: यही भारत की विशेषताओं में से एक संयुक्त परिवार की टूट का कारण बना तथा हमारा समाज चौतरफा पतन की ओर चल पड़ा . 
गाँव तेजी से अपना सौंदर्य खोता जा रहा है. जो गाँव कभी बैलों के गले में बँधी घंटियों, तरह-तरह के पंछियों के कलरव और ग्रामीणों के गीतों से गुंजायमान रहते थे, आज वहाँ मोटरगाड़ियों की आवाज़ और लाउडस्पीकर पर बजते फिल्मी गीतों का शोर है. जो ग्रामीण कभी किसी के भी दुख-दर्द को बाँटना अपना धर्म और वास्तविक कर्म समझते थे, अब ज्यादा अमीर बनने की लालसा में अपने भाई की हत्या कर देने से भी परहेज नहीं करते हैं. जिन गाँवों में पहले एकता थी, बंधुत्व था, सुन्दर प्राकृतिक तथा सामाजिक वातावरण था, वहाँ आज पॉलीथिन में भरी गंदगियाँ, टूटन, ईर्ष्या और व्यक्तिवादी विसंगतियाँ पसरी हैं.
महात्मा गाँधी ने कहा था कि ग्रामोद्योग का नाश हो गया तो भारत के गाँवों का सर्वनाश ही समझिए. उनका यह अंदेशा आज की कड़वी सच्चाई है. जो गाँव कभी सह-अस्तित्व पर आधारित अपने कुटीर और घरेलू काम-धंधों की वजह से आत्मनिर्भर हुआ करते थे, आज हर बात के लिए तेजी से पराश्रित होते जा रहे हैं. बढ़ई, चर्मकार, कुम्हार, लोहार, नाई, धोबी, जुलाहा आदि जाति के लोग अपनी मेहनत और हुनर से ग्रामीणों की ज़रूरत का सामान बनाते थे. ग्रामीणों को कभी भी शहरों या विदेशों का मुँह ताकना नहीं पड़ता था. लेकिन आज यह सारा कुछ ध्वस्त हो चुका है. साग-सब्ज़ी तक के लिए शहरों की तरफ भागना पड़ता है. हुनरमंद पारम्परिक जातियों की जगह अब व्यापारियों ने ले ली है. जो काम पहले घर-आँगन या घर के बाहर चौक-चौराहों पर बिना कोई खर्च हो जाया करते थे, उसके लिए अब बाज़ार में अच्छा-खासा किराया आदि चुकाना पड़ता है. पहले जो खेती और माल ढुलाई का काम बैलों से किया जाता है, उसकी जगह ट्रक्टरों ने ली है. गोबर और घूरे की खाद की जगह रासायनिक खादों का प्रयोग होने लगा. ऎसे में जाहिर है कि लागत मूल्य बढ़ेगा. फिर हमारी विपणन व्यवस्था में भी परजीवियों का खर्चीला प्रवेश हुआ है. पहले हाट-बाज़ार में किसान-उपभोक्ता सीधे मिलते थे. लेकिन बदली हुई व्यवस्था में किसान-उपभोक्ता का मिलना ही समाप्त हो गया. बिचौलियों की एक-दो नहीं अनगिनत कड़ियाँ खेत से बाज़ार के बीच घुस आई हैं. नतीजा है कि जीवन जीने के लिए बेहद अवश्यक वस्तुओं की कीमत भी तेज गति से बढ़ती जा रही है. पिछले दिनों औद्योगिक एजेंसी एसोचैम ने खाद्य पदार्थों की कीमतों में वृद्धि से मध्य वर्ग का जीना हुआ मुहाल के संदर्भ में जो सर्वे आधारित रिपोर्ट प्रकाशित की थी, उससे जाहिर होता है कि किसान खूब मुनाफा कमा रहे हैं, जबकि हकीकत यह है कि ट्रैक्टर और खाद आदि बनाने वाली कंपनियाँ और बिचौलिए मलाई मार रहे हैं. बेचारे किसानों के हाथ तो खुरचन ही आ रही है. 


Saturday, 15 September 2012

ग्रामीण विकास की झूठी कथा सुना रहे हैं आँकड़े



आँकड़ेबाज़ी में गाँव का ज़रूर विकास हो रहा है, लेकिन वस्तुस्थिति यह है कि गाँव तेजी से नष्ट हो रहे हैं. गाँव के मूल सौन्दर्य को कैसे बचाया जाय, इस संदर्भ में कोई ठोस ग्रामीण विकास नीति नहीं होने की वजह से गाँव स्लम में तब्दील होते जा रहे हैं. लोग गाँव के पाइन-पोखर-खत्ता से लेकर नदी तक हर गैरमजरुआ (सरकारी कह सकते हैं) ज़मीन पर बेरोकटोक कब्ज़ा कर रहे हैं. वह दिन दूर नहीं जब गाँव में खुली ज़गह का टोंटा हो जाएगा. जब भी कोई ग्रामीण घर बनाता है गली की फीट-दो फीट ज़मीन दबा लेता है. इस वजह से गलियाँ लगातार संकरी हो रही हैं.
इसी तरह आर्थिक खुशहाली का आँकड़ा भी कि ‘ग्रामीण भारतीयों ने शहरी भारतीयों से ज्यादा पैसे खर्च किए’ का विश्लेषण कर गाँव के विकास की जो मोहक कथा सुना रहा है, वह गाँव की आत्मनिर्भरता से जुड़ा होने के बजाय शहरों और सरकार से विभिन्न योजनाओं के तहत भेजे गए पैसों पर आधारित है. इस उत्साहवर्द्धक आँकड़ों की हकीकत इसी बात से जाहिर हो जाती है कि आम ग्रामीण युवा विकास के इतने उत्साहवर्द्धक आँकड़ों के बावजूद शहरों और सरकारी व प्राइवेट नौकरियों के मोह से लिपटा है. वह हर साँस इसी जुगत में भिड़ा है कि कब और कैसे शहरों से उसे बुलावा आए और शहरों में तरक्की की अथाह संभावनाओं से वह अपने लिए अंकवार भर खुशी हथिया ले. ग्रामीण विकास के आँकड़े इकट्ठा करने में जुटे सरकारी व गैरसरकारी चिंतको को इस पहलू पर गंभीरतापूर्ण विचार करने की ज़रूरत है.
अगर सरकार की मंशा सचमुच गाँव में विकास की गंगा बहाना है तो ग्रामीण विकास की नीति विदेशों से आयात करने की बजाय भारतीय दृष्टि से एक मुकम्मल और ठोस नीति बनानी होगी. साथ ही, उसे नियमपूर्वक गाँवों में लागू भी करना होगा.
गाँव की पहले अपनी आर्थिक व्यवस्था हुआ करती थी. एक आत्मनिर्भर व्यवस्था. जहाँ खाने-पीने का सामान उपजाने वाले किसान से लेकर तमाम ज़रूरत के सामान बनाने वाली हुनरमंद जातियाँ हुआ करती थीं. बढ़ई, चर्मकार, सुनार, लोहार अपने पारम्परिक हुनर से ज़रूरत के सामान बनाते थे, तो नाई, धोबी और कहार आदि जातियाँ सेवा के कार्य करती थीं. सबका जीवन सह-अस्तित्व पर आधारित था, लेकिन पहले ब्राह्मणवाद ने और बाद में अंग्रेजों ने हमारी सह-अस्तित्ववादी जातिगत व्यवस्था में इस क़दर नफरत और शोषण का ज़हर भरा कि हमारे खुशहाल गाँव घूरे का ढेर बन गए. लिओनेल कार्टिस नामक अंग्रेज लेखक ने हमारे गाँवों का वर्णन करते हुए उसे ‘घूरे का ढेर’ कहा था. लेकिन महात्मा गाँधी ‘घूरे के ढेर’ में दबे हमारे गाँवों की शक्ति को पहचानते थे, इसीलिए उन्होंने कहा कि भारतवर्ष की आत्मा गाँवों में बसती है. ‘मेरे सपनों का भारत में’ गाँव की महत्ता बताते हुए उन्होंने लिखा है, हमें गाँवोंवाला भारत और शहरोंवाला भारत, इन दोनों में से एक को चुन लेना है. गाँव उतने ही पुराने हैं, जितना कि यह भारत पुराना है. शहरों को विदेशी आधिपत्य ने बनाया है. जब यह आधिपत्य मिट जाएगा, तब शहरों को गाँवों के मातहत होकर रहना पड़ेगा. आज तो शहरों का बोलवाला है, और वे गाँवों की सारी दौलत खींच लेते हैं. इससे गाँवों का ह्रास और नाश हो रहा है. आज़ादी के इतने सालों बाद भी गाँव का ह्रास और नाश जारी है, हमारे नीति-नियंताओं के लिए यह गहरी चिंता का विषय होना चहिए था, लेकिन वह गाँव पर सरकारी धन की बरसात कर अपने कर्तव्य से उऋण होते जा रहे हैं.   
ग्रामीण विकास योजनाओं के नाम पर सरकारी धन की बरसात की वजह से बेशक सड़क-स्कूल और अस्पताल बने हैं. जगह-जगह हैंडपाइप गाड़े जाने से पीने का साफ पानी भी उपलब्ध हुआ है. गराबी उन्मूलन के तहत शुरू की गई मनरेगा, पीडीएस सिस्टम के तहत कम कीमत पर अनाज, इंदिरा आवास योजना, बच्चों की मुफ्त शिक्षा, हेल्थ कार्ड आदि सरकारी योजनाओं की वजह से गरीबों की दशा भी सुधरी है. पढ़ाई में पिछड़कर शहर न जा सके युवा सरकारी योजनाओं के ठेकों से अपनी आर्थिक स्थिति सुधार रहे हैं. मगर गाँव की दशा और दिशा दोनों बिग़ड़ गई है. गाँव में शराब पीने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है. सुख-दुख में एक-दूसरे की मदद के लिए उठ खड़े होने वाले ग्रामीणों के पास अब दूसरों के लिए फुर्सत नहीं है. सह-अस्तित्व की भारतीय संस्कृति नष्ट होती जा रही है. गाँव शहर की काली कॉपी बनते जा रहे हैं.   
गाँव का वास्तविक विकास तब होगा जब उसकी अपनी अर्थव्यवस्था खड़ी होगी. पारम्परिक खेती के साथ-साथ व्यावसायिक फसलों की खेती, फूड प्रोसेसिंग इंडस्ट्री, डेयरी इंडस्ट्री और मछली पालन आदि उद्योग के तौर पर गाँव में अपनाएँ जाएंगे. घर बनाने को लेकर एक मानक तय करना होगा कि अपने घर की चारों तरफ गलियों को कबजाने की बजाय इतनी ज़गह छोड़नी होगी कि स्वयं के साथ-साथ किसी और के घर की हवा और धूप भी न रुके. साफ-सफाई के लिए सामूहिक व्यवस्था हो और खत्ता,पाइन,पोखर,अलंग और नदी आदि पर किसी तरह का  अतिक्रमण न होने पाए. इन सारी विसंगतियों से निबटने के लिए एक कारगर व्यवस्था बनाकर अमल के लिए ग्राम-पंचायत के सौंपा जाना चाहिए. अन्यथा सरकार की सारी कवायद और गाँवों को आज़ादी के बाद भी 50 से अधिक सालों तक उपेक्षित करने के अपराधबोध से बचने के लिए ज़रूरी-गैरज़रूरी योजनाएँ बना पैसों की बरसात गाँव में विकास की जगह ठीक वैसे ही बर्बादी लाएगी, जैसे अतिवृष्टि विनाशकारी बाढ़ लाती है.


हमारे गाँव के सर्जक और पहलकर्ता धनंजय कुमार

Tuesday, 11 September 2012

" हमारे गाँव"के मार्केटिंग इंचार्ज संजय कुमार (बायें)
A Scene of Village. Photo- Manoj Kumar

हमारे गाँव क्यों बदले...?


हमारे गाँव सदियों हमारी पहचान रहे. गाँव हमारी ताकत थे. देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ थे. हमारी सभ्यता-संस्कृति, विचार और सृजन का केंद्र थे. लेकिन जैसे-जैसे आधुनिकता ने अपने पैर पसारे, आधुनिकता की दौड़ में हमारे गाँव पिछड़ते चले गए. अर्थवाद ने हमारे गाँवों से उसकी शक्ति छीन ली. देश की बदलती अर्थव्यवस्था ने कृषि से ध्यान हटा औद्योगिकीकरण को विकास की धुरी बनाया. विकास के घूमते पहिए ने बेशक हमारे गाँवों को सड़कों और शहरों से जोड़ा, लेकिन बदले में गाँवों से बहुत बड़ी कीमत वसूली. गाँवों से उसके किसान-मजदूर और हल-बैल छीन लिए. खेत-खलिहान उजड़ गए. गाँव का सौन्दर्य बिगड़ गया.
देश की बदलती अर्थव्यवस्था ने गाँवों की बजाय शहरों के निर्माण को ज्यादा तवज्जो दिया. कृषि से ध्यान हटा औद्योगिकीकरण को विकास की धुरी बनाया गया. सरकारी नौकरियाँ करनेवाले लोगों को, वेतन के रूप में मिलनेवाली नियमित राशि और हर प्रकार की सरकारी मानवीय सहायता और सुरक्षा ने नौकरी के प्रति ग्रामीणों का ध्यान खींचा. क्योंकि कृषि कार्य जहाँ पूरी तरह भगवान भरोसे (मॉनसून आधारित) थे, वहीं सरकारी नौकरियों में हर तरह की सुरक्षा थी. फिर नौकरी करने वालों को हर महीने वेतन के रूप मिलने वाली निश्चित व एकमुश्त नियमित रकम ने भी लोगों को खेती और गाँव से दूर होने को बाध्य किया. परिणाम यह हुआ कि शहरों के प्रति लोगों का आकर्षण लगातार बढ़ता गया और गाँवों के प्रति उसी अनुपात में घटता गया.
शहर और नौकरी करनेवाले लोग प्रगति, जबकि गाँव और किसान पिछड़ेपन का पर्याय बन गए. और अंतत: यही भारत की विशेषताओं में से एक संयुक्त परिवार की टूट का कारण बना. सबसे दुखद यह है कि हमारे गाँव विकास और प्रगति के नाम शहरीकरण की अंधी दौड़ में शामिल हो गए हैं. गाँव का अपना सौंदर्य तेजी से विलुप्त हो रहा है.जो गाँव कभी बैलों के गले में बँधी घंटियों,तरह-तरह के पंछियों के कलरव और ग्रामीणों के गीतों से गुंजायमान रहते थे, आज वहाँ मोटरगाड़ियों की आवाज़ और लाउडस्पीकर पर बजते फिल्मी गीतों का शोर है. जो ग्रामीण कभी किसी के भी दुख-दर्द को बाँटना अपना धर्म और वास्तविक कर्म समझते थे अब ज्यादा अमीर बनने की लालसा में अपने भाई की हत्या कर देने से भी परहेज नहीं करते हैं. जिन गाँवों में पहले एकता थी, बंधुत्व था, सुन्दर प्राकृतिक तथा सामाजिक वातावरण था, वहाँ आज पॉलीथिन में भरी गंदगियाँ, टूटन, ईर्ष्या और व्यक्तिवादी विसंगतियाँ पसरी हैं.
जिस तरह से हमारे महानगरों की मानवीय-सामाजिक व्यवस्था चरमरा रही है. दम तोड़ रही है, उसे देखते हुए हमें फिर से गाँव की सुध लेने की ज़रूरत है. गाँव में बसे भारत में ही इण्डिया की प्रोग्रेस की तमाम संभावनाएँ छिपी हैं. हम सभी भारतवासियों को पलभर रुककर सोचने की ज़रूरत है कि गाँवों को निरंतर नजर अंदाज करना हमारे देश के लिए कितना घातक रहा. आज जब भारत सरकार खाद्य सुरक्षा बिल लाकर हर भारतीय को पेटभर भोजन देने का सुखद सपना साकार करना चाहती है, ऎसे में और ज़रूरी हो गया है कि हम हमारे गाँव के बारे में नए सिरे से गंभीरता से सोचें.

आँगन सोसियो-कल्चरल ऑर्गेनाइजेशन का गठन भविष्य की इन्हीं चिंताओं के चिंतन के बाद हुआ है. और लेखक-पत्रकार, समाज विश्लेषक व चिंतक धनंजय कुमार ने हमारे गाँवनामक विचार का सृजन किया, आँगन सोसियो-कल्चरल ऑर्गेनाइजेशन जिसे पिछले साल के नवंबर महीने से ज़मीन पर उतारना शुरू कर दिया है. हमारे गाँव का पायलेट प्रोजेक्ट बिहार प्रदेश के नालंदा ज़िला के बिन्द गाँव में शुरू हो चुका है.
आँगन सोसियो-कल्चरल ऑर्गेनाइजेशन ने हमारे गाँवकी वास्तविक पहचान को वापस दिलाने के संकल्प के साथ हमारे गाँवनाम से एक अभियान शुरू किया है. इस अभियान के तहत आँगन सोशियो-कल्चरल ऑर्गेनाइजेशन ने गाँव को आत्मनिर्भर बनाने का लक्ष्य निर्धारित किया है ताकि दुनिया से भुखमरी समाप्त हो.

धनंजय कुमार





Thursday, 6 September 2012

save the village


महात्मा गाँधी ने कहा था, भारतवर्ष की आत्मा इसके गाँवों में निवास करती है... अगर गाँवों का नाश होता है तो भारत का भी नाश हो जाएगा. उस हालत में भारत भारत नहीं रहेगा. दुनिया को उसे जो संदेश देना है, वह संदेश खो देगा. 
गुलाम भारत में महात्मा गाँधी की उपरोक्त चिंता आज़ाद भारत में और गहराती जा रही है. गाँवों का अस्तित्व अब सचमुच खतरे में है. विकास के बहाने रोज़ गाँव मिटते जा रहे हैं.
इसमें कोई दो राय नहीं कि राज्य व केंद्र सरकारों के विभिन्न विकास कार्यक्रमों की वजह से गाँव का विकास हुआ है. गाँव सड़को से जोड़े गए हैं. आवागमन सुलभ हुआ है. स्कूल और अस्पताल खुले है. शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार आया है. पीने का पानी सुलभ हुआ है. मनरेगा से मजदूरों की दशा सुधरी है. मगर यह विकास गाँव के सौन्दर्य, संस्कार-संस्कृति, पारिवारिक-सामाजिक संरचना, लोकाचार-रीति-रिवाज, खान-पान, पहनावा, लोकगीत-संगीत आदि को संवार नहीं पा रहा है. जैसे-जैसे विकास का आधुनिक मॉडल हमारे गाँव में अपने पाँव पसार रहा है, वैसे-वैसे गाँव की विशेषता रहे–संयुक्त परिवार, आँगन, दालान, चौपाल, बाग-बागीचे, खेत-खलिहान, हल-बैल, कुआँ-पनघट, गोधूलि बेला में धूल उड़ाती गायें, मंदिरों से आते प्रात:-संध्या की आरती के स्वर, लोकसंगीत-गीत से सराबोर शामें, गाँव का गँवईपन, मिट्टी का सोंधापन, अपनों की मिठास सब लुप्त होती जा रही हैं. सब पर शहरी मजबूरियों और विकृतियों की काली छाया पड़ रही है. गाँव शहर का विकृत रूप लेता जा रहा है.
हमें ‘हमारे गाँव’ को बचाना है, तभी बचेंगें हम और हमारा प्यारा देश भारत.

गाँव को बचाने और उसे आत्मनिर्भर बनाने के संकल्प के साथ पत्रकार-लेखक-फिल्मकार,समाज विश्लेषक व चिंतक धनंजय कुमार पिछले वर्ष से ही बिहार के नालंदा ज़िला के बिन्द गाँव में हमारे गाँवनामक विचार को मूर्त रूप देने में जुटे हैं.हमारे गाँव धनंजय कुमार द्वारा सृजित, विस्तारित और क्रियान्वित विचार है। इस महत्वपूर्ण कार्य में धनंजय कुमार का कदम दर कदम साथ दे रहे हैं आँगन सोशियो कल्चरल ऑर्गेनाइजेशन नामक संगठन और उसके कार्यकर्ता.
आँगन सोशियो-कल्चरल ऑर्गेनाइजेशन भारतीय सोसायटीज एक्ट एवं ट्रस्ट के तहत पंजीकृत (पंजीकरण सं-336/2003,मुम्बई) पूर्णतया स्वदेशी, प्रकृतिपरक और व्यावसायिक दृष्टिकोण से सम्पन्न एक आंदोलनात्मक सृष्टिसेवी संगठन है, जिसका लक्ष्य है भारतवर्ष के शैक्षणिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक, आर्थिक, प्राकृतिक और वैचारिक धरातल पर भारतीय विचार और दृष्टिकोण (वसुधैव कुटुम्बकम्) को रुपायित करना. संगठन का सूत्र वाक्य है- ‘साहित्य-संगीत-कला विहीन: साक्षात् पशुपुच्छ विषाणहीन:’. साहित्य, संगीत और कला संगठन के लिए आँख, कान, और नाक की तरह हैं.
हमारे गाँव के तहत शिक्षा, कृषि, थिएटर और मार्केटिंग पर एक साथ काम किया जा रहा है. ताकि कृषि और गाँव को लेकर लोगों में जागरूकता आए, कृषि फिर से लाभ का कारोबार बने, गाँव में रोजगार का सृजन हो और महज रोजी-रोटी के लिए परदेस गए सपूत अपने गाँव लौटें...और आँगन, दालान, खेत-खलिहान, बाग-बागीचे, चौपाल सब के सब फिर से गोधूलि बेला में धूल उड़ाती गायों, मंदिरों से आते प्रात:-संध्या की आरती के स्वरों तथा लोकसंगीत-गीत से सराबोर हो उठे.
Photo- Dhananjay Kumar
गाँव के विद्यार्थी शहर के विद्यार्थियों से कॉम्प्लेक्स्ड फील न करें, इसके लिए ‘हमारे गाँव’ की कोशिश है कि अंग्रेजी मीडियम के स्कूल गाँवों में भी खुले. जहाँ विद्यार्थियों को सिर्फ परीक्षा पास करने के गुर सिखाने के बजाय शिक्षा को लेकर यह जागृति फैलाई जाती है कि ‘शिक्षा क्यों और कैसे ?’ शिक्षकों और अभिभावकों में भी शिक्षा को लेकर सही और व्यावहारिक दृष्टि विकसित की जा रही है. बिन्द के देवनंदन पब्लिक स्कूल में यह प्रयोग शुरू किया जा चुका है.
कृषि के क्षेत्र में किसानों को पारम्परिक खेती के बजाय बुद्धिमतापूर्ण तरीके से नगदी खेती करने के लिए प्रेरित,उत्साहित और प्रशिक्षित किया जा रहा है. ताकि किसानों को मेहनत का उचित मूल्य मिल सके. इसके लिए सब्ज़ी, फूल, बासमती चावल, पपीता और केले की खेती पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है. किसान श्री व बिन्द आत्मा अध्यक्ष संजीव कुमार के अलावा कृषि वैज्ञानिक पुरुषोत्तम कुमार और अनुज कुमार भी अपना अमूल्य समय और सलाह उपलब्ध करा रहे हैं.
गौपालन को मुख्यत: दूध के व्यवसाय के तौर पर देखा जा रहा है, इसलिए डेयरी फॉर्मों में देशी गायों की ज़गह विदेशी नस्ल की जर्सी, फ्रिजियन आदि गायों को तरजीह दिया जाता है. जबकि हमारे गाँवमें गौपालन से दूध के साथ-साथ गोबर और गौमूत्र से प्राप्त होनेवाले लाभ को भी व्यवसाय का आधार बनाया गया है. गोबर से बनी गोबर-खाद और गौमूत्र से बना कीटनाशक किसानों के रासायनिक खाद व पेस्टिसाइड पर होनेवाले भारी खर्च से तो बचाता ही है, अनाजों,फलों और सब्जियों पर केमिकल्स और पेस्टिसाइड के बुरे प्रभाव को भी समाप्त करता है.
किसानों को समूह-गौपालन के लिए प्रेरित किया जा रहा है, ताकि गौओं की सही देखभाल भी हो सके और किसानों के समय की भी बचत हो. इसमें विशेषकर किसानों की पत्नियों को जोड़ा जा रहा है. दूध से प्राप्त आय किसानों की अतिरिक्त आय होती है. इस अभियान में महत्वपूर्ण साथ है नाबार्ड के पूर्व महाप्रबंधक डॉ.मोहन प्रसाद का.
किसानों को अपने माल की स्वयं मार्केटिग करने के गुर भी सिखाए जा रहे हैं, ताकि उन्हें अपनी मेहनत और पूँजी का पूरा-पूरा लाभ मिले. साथ ही, इसमें उपभोक्ताओं तक बेहतर और अपेक्षाकृत सस्ता सामान पहुँचाने का सेवाभाव भी निहित है. इसके लिए आँगन सोशियो कल्चरल ऑर्गेनाइजेशन किसानों को सामूहिक मार्केंटिंग स्टॉल के लिए भी समझाया जा रहा है. इससे गाँव के युवाओं को रोजगार भी मिलता है. बाज़ार विशेषज्ञ संजय कुमार इसमें अपना अमूल्य योगदान दे रहे हैं.
किसानों को खेतों तक सीमित रहने के बजाय शहर-देश-दुनिया में हो रहे परिवर्तनों और उठ रही ज़रूरतों के प्रति भी जागरूक रहने के लिए प्रेरित-उत्साहित किया जा रहा है. ताकि किसान अपनी चिंताओं से उबरकर देश-दुनिया के चिंतन से भी जुड़ सकें. इसके लिए चौपाल को पुनर्जीवित किया जा रहा है, जहाँ ‘चाय, चर्चा और चेंज’ के तहत किसानों, महिलाओं, युवाओं, विद्यार्थियों  व शिक्षकों और विशेषज्ञों के बीच संवाद होता है.
हमारे गाँवगाँवों में सांस्कृतिक धरोहरों को बचाने और थिएटर के माध्यम से ग्रामीण जीवन में कलात्मक-व्यावहारिक बदलाव लाने की दिशा में भी अग्रसर है. इस अभियान में साथ हैं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चित ‘थिएटर ऑफ रेलेवेंस’  के सर्जक और प्रयोगकर्त्ता रंगकर्मी मंजुल भारद्वाज.
इस तरह हमारे गाँव का अंतिम लक्ष्य है पूरे विश्व से भुखमरी का नामोनिशान मिटाना और पूरी सृष्टि को खुशहाल बनाना। सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया,सर्वे भद्राणि पश्यन्तु माँ कश्चिद् दुःख भाग भवेत्।के सदविचार को साकार करना।
इस पवित्र मुहिम में उन सारे महानुभावों से साथ की अपेक्षा है, जो स्वाभिमान और सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ जीवन जीना चाहते हैं.
आप हमें संपर्क कर सकते हैं

Thursday, 30 August 2012

ऎसे मिलता है कृषि ऋण


इंडिया टुडे के नए अंक में पृष्ठ 40-41 पर "बैंक लोन मंजूर करो या मरो" शीर्षक से एक रिपोर्ट छापी गई है , जिसके रिपोर्ट-लेखक ने बयान किया है कि किस तरह बदमाशों के भय से दहशत में है बैकों के प्रबंधक. प्रभावशाली बिचौलिए लोन पास करने के लिए किस तरह धमकाते हैं और नकली दस्तावेजों के आधार पर लोन ज़बरन पास करवा लेते हैं. दूसरी तरफ उपमुख्यमंत्री सुशीलकुमार मोदी, जो कि प्रदेश के वित्त मंत्री भी हैं, का कथन है 'सरकारी दफ्तर के मुक़ाबले बैंकों में ज्यादा भ्रष्टाचार है.'
आम तौर पर नेताओं को गलतबयानी करनेवाला माना जाता है,लेकिन मेरा स्वयं का अनुभव भी मोदी जी के बयान से मिलता है. मैंने भी सोचा था किसान क्रेडिट कार्ड बनवा लिया जाय, ताकि कभी-कभार की पैसों की आवश्यक ज़रूरत को पूरा करने में मदद मिले, हालाँकि मेरे पिताजी खिलाफ थे. उनका कहना था कि कृषि कार्य अनिश्चितताओं से भरा है, लोन तो चुकाना ही होगा, फसल हो अथवा न हो, फिर मेरी इच्छा थी कि सुविधा का लाभ लेने में बुराई नहीं है. मगर मुझे फॉर्म भरते ही ज़रूरी जानकारी प्राप्त हो गई कि के सी सी बनवाने के लिए 3 से 4 हज़ार रुपए खर्च करने होंगे. मैंने कहा, मैं बैक द्वारा माँगे जानेवाले सारे दस्तावेज दूँगा, तब जवाब मिला कि लोन ब्रांच मैनेजर पास करेगा, बैंक नहीं, इसलिए रिश्वत के बिना काम मुश्किल है.यह अद्भुत जानकारी मुझे ब्लॉक में ही मुझे मिल गई थी, जब आवेदन वहाँ जमा करने गया. कृषि ऋण के लिए ब्लॉक से ही कागजात बैंक को फॉरवर्ड किए जाते हैं. मेरे पास यकीन करने  के अलावा कोई चारा नहीं था,क्योंकि गाँववालों से मुझको पहले ही मुझे यह अनुभव मिल चुका था कि बैक में सेविंग अकाउंट खोलने के लिए भी रिश्वत ली जाती है. चाहता तो मैं अधिकारी से भिड़ सकता था, लेकिन उचित नहीं समझा. एक तो  समयाभाव, दूसरे कम से कम उलझने की मेरी नीति.
इसी रिपोर्ट में बैंक के एक अधिकारी और पंजाब नेशनल बैंक ऑफिसर्स एसोसिएशन के महासचिव कुमार अरविंद का भी बयान है कि सर्कल अधिकारी किसान के एफिडेविट के आधार पर कब्ज़े का प्रमाणपत्र जारी कर देते हैं. फिर बैंक बिना सत्यापित एफिडेविट पर लोन जारी करने को मजबूर है. जबकि  हकीकत यह है कि एल पी सी यानी लैंड पजेशन सर्टिफिकेट सिर्फ किसान के एफिडेविट के आधार पर नहीं बनता. किसान द्वारा लिखे गए खेत के प्लॉट नं. को पहले कर्मचारी अपने रजिस्टर से मिलाता है, 'सही है' की टिप्पणी लिखता है, उसके बाद सी आई यानी सर्कल इंस्पेक्टर उसपर दस्तखत करता है, उसके बाद सी ओ साहब दस्तखत करते हैं और एलपीसी किसान तक पहुँचता है.
यह तो नियम की बात हुई, लेकिन वास्तव में किसान को हर ज़गह चढ़ावा चढ़ाना पड़ता है. एफिडेविट तो किसान को अतिरिक्त दंड है, इसे प्रदेश राजस्व विभाग और वकील का हिस्सा मानिए.
बहरहाल यह है कृषि ऋण की वस्तुस्थिति. अब इतने झंझट वाले काम में कोई मेरे जैसा ईमानदार किसान अपनी ऊर्जा लगाएगा यह तो सोचना भी बेमानी है. ऎसे में जो ऋण पास कराएगा उसकी मंशा कितनी सही होगी, समझा जा सकता है. इसमें सरकार की नीतियाँ भी ज़िम्मेदार है. सरकार को यह अच्छी तरह पता है कि आज ज्यादातर वैसे लोग किसानी का कार्य कर रहे हैं, जो पट्टे पर खेत लेकर खेती करते हैं, फिर वह एलपीसी कैसे बनवाएँगे..?
ऎसे में ज़रूरत है सही नीति और उसके सही-सही क्रियान्वयन की, ताकि किसानों को भी लाभ मिले, बैंकों को भी और सरकार को भी.

Photo-Manoj Kumar
धनंजय कुमार  

Wednesday, 22 August 2012

भारतीय किसानों के खिलाफ साज़िशों का दौर जारी है...


भारतीय किसानों के खिलाफ साज़िशों का दौर जारी है.
मुम्बई के नवभारत टाईम्स में आज फिर एक रिपोर्ट छापी गई है कि किस तरह खाद्य-सामग्रियों की कीमतों के बढ़ने से मध्य वर्ग के लिए घर चलाना मुश्किल हो गया है. रिपोर्ट औद्योगिक चैम्बर एसोचैम के सर्वे को आधार बनाकर लिखी गई है. सर्वे में इस शहरी मध्य वर्ग के दुख का कुछ इस तरह खुलासा किया गया है कि किसान विलेन के तौर पर उभरकर सामने आते हैं.
एसोचैम ने यह सर्वे जून-जुलाई महीने में देश के विभिन्न शहरों चेन्नै, अहमदाबाद, हैदराबाद, पुणे, चंडीगढ़, देहरादून, बेंगलुरू और दिल्ली एनसीआर के उन रहिवासियों से बातचीत करके तैयार किया है, जिनकी सेलेरी 35 से 50 हज़ार रुपए के बीच है. सर्वे में 88 प्रतिशत मिडिल क्लास परिवारों का कहना है कि खाद्य सामग्रियों की कीमतों में वृद्धि होने से उनका परिवार चलाना मुश्किल हो गया है. इसी सर्वे में यह भी ज़िक्र है कि लोन या मेडिकल किश्त और इंकमटैक्स देने के बाद उनके पास 40 हज़ार की सेलेरी में से बमुश्किल 20 हज़ार रुपए हाथ में आते हैं. इसमें बिजली का बिल, रसोई गैस का भुगतान करने के बाद बाकी पैसों से परिवार का गुजारा अब बहुत मुश्किल हो गया है.और इसका अहम कारण है खाने-पीने की चीज़ों में 100 से 300 प्रतिशत की वृद्धि हुई है.
इस मध्यवर्ग के परिवारों का घर, गाड़ी और बच्चों की पढ़ाई पर कितना खर्च होता है, सर्वे में इस बात का कहीं विश्लेषण नहीं है. खाद्य पदार्थों की कीमतें मध्यवर्ग को मुश्किल में डालने तक बढ़ गई हैं,तो इसमें इन बढ़ी कीमतों के लिए कौन ज़िम्मेदार है और बढ़ी कीमतों से कौन अपना घर भर रहा है, इस बात का भी कोई विश्लेषण नहीं है.
photo by  Sanjeev Kumar 
इस तरह के सर्वे करनेवालों को एकाध बार इस दिशा में भी सर्वे करना चाहिए कि खेती करके कितने किसान अरबपति बन गए..? क्यों देश का किसान अपने बाल-बच्चों को खेती करने के बजाय नौकरी करने की सलाह देता है..? किसानों के हल-बैल क्यों बिक गए...? इस देश में दारू बनानेवाला, गुटखा बनानेवाला, दवाई बनानेवाला, बिल्डिंगें बनानेवाला दिन दूनी रात चौगुनी रफ्तार से तरक्की कर रहा है, मगर किसान क्यों आत्महत्या कर रहा है..?

Sunday, 12 August 2012

मैं एक किसान हूँ


धनंजय कुमार 

मैं एक किसान हूँ. मेरे पिता और दादा-परदादा भी किसान थे. मगर तब यह देश किसानों का देश हुआ करता था. मुझे बड़ा गर्व होता था, जब मैं पिता और दादा-परदादा के बारे में सोचता था कि मेरे पूर्वज किसान थे. अनाज उपजाते थे, जो हर इंसान के जीवन का आधार है, हर आदमी की ज़रूरत है. किसान यानी सबको भोजन देने वाला !
मगर आज़ादी के बाद हम लगातार हाशिए पर आते चले गए. हमारा देश अब हमारा नहीं रहा, अंबानी-माल्या जैसे उद्योगपतियों का हो गया है. गाँवों और किसानों के बजाय यह देश अब शहरों और पूँजीपतियों का हो गया है !
भूमण्डलीकरण ने हमें और भी किनारे कर दिया है. आज हर वस्तु,हर व्यक्ति पैसों से आँका जाता है...और हम पैसेवाले नहीं हैं...विकास का मतलब बैंक बैलेंस, बड़ी गाड़ी, बड़ा घर, शहरों की चमक-दमक, अंग्रेजी और अंग्रेजी पहनावा-आचार-विचार-व्यवहार हो गया है...हमारा गाँव, हमारी बोली, हमारा काम, हमारा पहनावा-आचार-विचार-व्यवहार, सब पिछड़ेपन का पर्याय बन गया और हम पिछड़ गए...लगातार पिछड़ते जा रहे हैं... हमारा हिन्दुस्तान आगे बढ़ता जा रहा है, रोज़ तरक्की की अनगिनत सीढ़ियाँ चढ़ता जा रहा है, मगर हम रोज़ पिछड़ते जा रहे हैं...! इतने पिछड़ गए हैं कि मेरा बेटा भी हमें पिछड़ा मानता है! हमारे काम को हेय मानता है, क्योंकि हमारी कमाई करोड़ों में नहीं है.
बेटा इंजीनियर बन गया है, कम्प्यूटर इंजीनियर...लाख रुपए महीना कमाता है...नौकरी के एक साल बाद ही शहर में एक करोड़ का घर खरीद लिया है. मुझसे कुछ पैसे माँगे थे.- तीस साल से खेती कर रहे हैं, तीन लाख तो दीजिए.. मैं तीन हज़ार भी नहीं दे सका. बैंक बैलेंस कहाँ से होगा ! बैंक में अकाउंट भी नहीं है. बैंक को नजदीक से देखा भी नहीं है. उसने मुझे हिकारत भरा ताना दिया- क्या फायदा ऎसे काम का...? आपसे अच्छा तो हमारे ऑफिस का पियून है...!
मुझे मोतियाबिंद हो गया है. ऑपरेशन के लिए डॉक्टर ने पाँच हज़ार का खर्च बताया है. बेटे को चिट्ठी लिखी. बेटे ने पड़ोस के लड़के से मोबाइल कर कहलवाया है, ...शहर आ जाइए, पाँच नहीं, पन्द्रह हज़ार लगेगा. बढ़िया लेंस लगवा दूँगा... आप पिछड़ी हुई ही बातें करेंगे...पाँच हज़ार में देशी लेंस लगेगा, शहर आइए, पन्द्रह हज़ार का विदेशी लेंस लगवा दूँगा... मेरी आँखें अब रोज़ रोती हैं....क्या हो गया हमारे देश को..! अब देखने के लिए भी विदेशी लेंस लगवाना पड़ेगा ! क्या विदेशी लेंस से मेरा पहले वाला देश दिखेगा..? 
बेटा कहता है, खेत बेच दीजिए....यहाँ प्रॉपर्टी में सारा रुपया इंवेस्ट कर दूँगा... साल-दो साल में दोगुनी कीमत हो जाएगी.... मगर मैंने साफ मना कर दिया, मेरे मरने के बाद जो जी करे करना, मगर मेरे जीते जी मेरे बाप-दादा की ज़मीन... मेरे बाप-दादा के खून-पसीने और ज़िंदगी से सींची ये ज़मीन, ये मिट्टी, ये खेत नहीं बेचूँगा... बेटा चिढ़ गया...फिर पिछड़ा बोला...कोई बात नहीं, ज़मीन तो बच गई...!
लेकिन अब सरकार मेरे खेत को ज़बरन खरीदना चाहती है. टाटा, अंबानी या कोई विदेशी, पता नहीं कौन, यहाँ बहुत बड़ी फैक्टरी लगाना चाहते हैं. कीमत अभी के बाज़ार-भाव से काफी ज्यादा मिलेगी...मगर मुझे नहीं बेचना खेत... सरकार के लोग कहते हैं, बेचना पड़ेगा...
किसान जमा हो रहे हैं-....खेत नहीं बेचेंगे. कुछ लोग डरा रहे हैं- सरकार से नहीं लड़ सकते. उसके पास पुलिस है, सेना है, हथियार हैं, गोला-बारूद हैं...मगर हम किसानों के पास क्या है..? अपना बेटा भी चाहता है, खेत बेच दें...
कई लोग पुलिस की गोली से मारे गए...! ठीक है, मुझे भी मार दो...मरना मंजूर है, मगर खेत नहीं बेचेंगे...खेत नहीं बेचेंगे... हम किसान हैं. खेत हमारे माता-पिता हैं, पालक हैं. उसे अपने आप से अलग नहीं होने देंगे. ...मार दो गोली...मार दो गोली...मार दो गोली...
...फिर गोली चली..दस किसान मारे गए...पैंतीस की हालत गंभीर है.....
     


Friday, 3 August 2012

जड़ों की ओर

प्रस्तुत कहानी लोकप्रिय दैंनिक समाचार पत्र "जनसत्ता" के  कोलकाता संस्करण के दीपावली विशेषांक 2014 में प्रकाशित हो चुकी है.

कहानी
धनंजय कुमार
अमावस्या की रात थी. अभी थोड़ी ही देर पहले चारों ओर घुप अंधेरा था. पूरा गाँव गहरी नींद में था. कुत्ते और झींगुर भी नींद के आनंद में डूबे थे. इतना सन्नाटा था, मानो गाँव खाली हो गया हो...कि तभी तेज उजाला फैला...ऎसा उजाला, जिसमें खलिहान में रखी रबी फसल धू-धू कर जलने लगी...सन्नाटे के बीच नगाड़े की तरह चीख-पुकार गूँज उठी... ‘दौड़ो...बचाओ..आग लग गई रे ...
सोता गाँव अचानक दौड़ पड़ा. जिसके हाथ जो आया, बाल्टी, लोटा, तसला...हर कोई पानी भरकर उस तरफ भागा, जिस तरफ आग की लपटें दिख रही थीं. मगर इतने पानी से क्या होने वाला था...! घर से भरकर ले जाया गया पानी ऊँट के मुँह में जीरे की तरह हुआ.
गर्मियों की यही तो त्रासदी है, खत्ता-पोखर तो क्या कुएँ तक सूख जाते हैं. ऊपर से जबसे सरकार ने गाँवों में चापाकल लगवाना शुरू किया है, तबसे कुओं की हालत और भी बुरी हो गई है. पहले गर्मी की शुरूआत में ही कुओं की उड़ाही होती थी. कुओं में सालभर का जमा कचरा-कीचड़ गाँव के लोगों की सहभागिता से साफ किया जाता था, और कुआँ रिस-रिस कर आते पानी से फिर ज़रूरतभर भर जाता था. ऎसी क्या इससे भी भयानक अगलगी पहले भी कई बार हो चुकी है, लेकिन तब एक साथ बीसियों बाल्टियाँ पानी के लिए कुएँ में कूद पड़ती थीं. कई बार तो डीजल इंजन चलाकर भी पानी जुटाया गया. मगर आज किसी कुएँ में पानी का दरस तक नहीं था.
सब चापाकल की तरफ भागे, मगर वह भी खराब पड़ा था. लोग दूसरे चापाकल की तरफ भागे. सब बर्तन लेकर जमा हो गए. कारू फटाफट चापाकल का हैंडल चलाने लगा. रब्बू गुस्से से बोला, ‘अरे यार इस तरह पानी भरते रहे, तबतक तो सब खतम हो जाएगा. सब लोग एक ही ज़गह जमा मत रहो. कुछ लोग ठाकुरबाड़ी के पास वाले चापाकल से पानी भरकर लाओ, कुछ लोग बसस्टैंड के पास वाले चापाकल की तरफ भागो.’
आग फैलती ही जा रही थी. कुछ लोग खलिहान में रखे गेहूँ, चने, मसुरी आदि फसलों के ढेर को दूर हटाने में लगे थे. मगर आग उन सबसे कई गुना ज्यादा अपने अँकवार में भर रही थी. लोग आग पर पानी फेंक रहे थे, मगर आग का बाल भी बाँका नहीं हो पा रहा था. बटोही की माँ छाती पीट-पीट कर रो रही थी, ‘ सब बर्बाद हो गया रे....भगवान, ये तुमने क्या जुलुम कर दिया… हम गरीबों ने क्या बिगाड़ा था तुम्हारा..? हाय रे हमारी दिल्ली की कमाई भी लुट गई..! मेरा लाल दिल्ली में मर-मर कर चार पैसा कमाता है, बीस हज़ार रुपया भेजा था, कमसे कम तीन बीघा खेत पट्टे पर ले लेना....खाने भर तो उपज जाएगा...उपजा तो बड़का दिन रात एक करके गेहूँ उपजा लिया, मगर सब खाक हो गया रे बेटा...! कितनी बार मना किया कि मत कर खेती....खेती में फायदा नहीं है, फायदा ही होता तो सब बड़े किसान खेती छोड़ते....!’
बटोही की माँ सोलह आने सच बोल रही थी. इस गाँव में 10 बीघा से लेकर 150-200 बीघा जोत वाले किसान हैं, मगर अब कोई खेती नहीं करते. ज़मींदारी खत्म होने और हरित क्रांति के बाद यहाँ के किसानों में भी खेती को लेकर ज़बरदस्त उत्साह था. वर्षा ऋतु के आगमन के साथ ही किशोरी मिस्त्री, सूरज मिस्त्री और भोनू मिस्त्री अपने-अपने घर के बाहर हल बनाने में जुट जाते थे. चारों तरफ घेर कर बैठे लोग खेती की चर्चा करते नहीं थकते थे.
गाँव के चारों ओर दूर तक फैले खेत विभिन्न फसलों से जब श्रृंगार करते थे, तब गाँव एक खूबसूरत टापू में बदल जाता था. ऎसा लगता था मानों प्रकृति ने यहीं अपना बसेरा बसा लिया हो.
फसल कट जाने के बाद झुंड के झुंड गाएँ खेतों में चरने उतरती थी, तो लगता था, अपने बाल सखाओं के साथ स्वयं कृष्ण अवतरित हो गए हों.
प्रकृति की मार किसानों पर पहले भी पड़ती थी- कभी बाढ़, तो कभी सूखा, तो कभी अगलगी...लेकिन किसान फिर भी धरती माता की गोद से अपने भरण-पोषण भर अनाज उठा लेते थे. लेकिन पहले सरकार की बेरुखी, उसके बाद मजदूरों का पंजाब की तरफ पलायन, फिर ग्लोबलाइजेशन के आते ही शहरों के प्रति लोगों के आकर्षण ने किसानों के सामने समस्या ही समस्या खड़ी कर दी. अनिश्चित खेती से त्रस्त किसानों ने अपने बाल-बच्चों को किसानी के बजाय डॉक्टरी, इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने और सरकारी नौकरियों के लिए प्रोत्साहित किया. जो किसान बराहिल, पटवारी और नौकर रखते थे, उनके बेटे ही नौकरी के लिए शहरों की ओर भागने लगे. जिनके खेतों में काम करके गाँव के सारे मजदूर अपना भरण-पोषण करने के साथ-साथ ब्याह-शादी से लेकर मरनी हरनी के काज भी इच्छानुसार कर लेते थे,.वे मालिक ही गाँव छोड़कर भागने लगे तो फिर बेचारे मजदूरों की क्या बिसात कि गाँव में रहकर अपना जीवन सुकून से जी लेते. पहली बार जब बंगाली बाबू के बेटे राजीव को डॉक्टरी की नौकरी मिली थी, तब पूरे गाँव के लिए वह उदाहरण बन गए थे. फिर तो डॉक्टर,इंजीनियर से लेकर बैंक के क्लर्क तक की झड़ी लग गई. मजूरटोली के कई लड़कों ने भी सिपाही से लेकर दारोगा तक की नौकरी पर कब्ज़ा जमाया. और देखते ही देखते गाँव युवाओं से खाली हो गया. आज गाँव में सिर्फ वही लोग रह गए है, इन्हें छूट गए कहना ज्यादा सही होगा, जो या तो बूढ़े हैं या अनपढ़. आज गाँव के हर घर का कोई न कोई सदस्य ज़िला मुख्यालय से लेकर राजधानी दिल्ली में नौकरी कर रहा है या नौकरी की तलाश कर रहा है. इस कारण अब ज्यादातर खेत परती ही रहते हैं, या फिर एक ही फसल दलहन लगाई जाती है. दलहन लगाने में ज्यादा झंझट नहीं है. खेत को जोतकर बीज छींट दिए...बस. न निकौनी की ज़रूरत न खाद-पानी की. फसल पकने के बाद कटनी के वक़्त मजदूरों की समस्या भी नहीं आती है. मजदूर बिन बुलाए भी चले आते हैं. जबकि यही मजदूर गेहूँ या धान काटने के लिए बुलाने पर भी आना-कानी करते हैं. इसलिए बुजुर्ग हो चुके ज्यादातर किसान दलहन ही लगाते हैं. धान-गेहूँ उन्हीं के बूते की बात है, जो खुद परिवार सहित  खेती में लग सकते हैं. इनमें लगभग सभी भूमिहीन लोग ही हैं,जो पहले खेतिहर मजदूर थे, या जिनमें बाप-दादाओं के ज़माने से खेती-किसानी को लेकर ललक थी. ये लोग खेती छोड़ चुके या छोड़ रहे किसानों से दो या तीन बीघा खेत नगद रकम चुका कर पट्टे पर सालभर के लिए ले लेते हैं और फिर धान-गेहूँ की पारम्परिक खेती करते हैं. ये बिना लाभ-हानि जोड़े फसल उपजाते हैं और अच्छी उपज पर खुशी से भर जाते हैं. जिन खलिहानों में आग लगी है, वे सब ज्यादातर ऎसे ही गरीब किसानों के खलिहान हैं.
आग की लपटें अब भी उठ रही थीं. लोटा, तसला और बाल्टी भर-भरकर पानी लानेवाले अब निराश हताश हो चुके थे. सारी फसल आग की लपेट में आ चुकी थी. आग की लपटें कम होती जा रही थीं. चीख-पुकार, शोर-शराबा भी थम चुका था. अजीब-सा सन्नाटा पसरा था. किसानों के खून-पसीने की गंध हवा में घुलकर देवताओं को दी जानेवाली आहुति के धुएँ की तरह वातावरण को सुवासित कर रही थी. 
पिछले पाँच महीने की मेहनत और सपने कुछ घड़ी में जलकर खाक हो गए थे.  
मदनपुर गाँव में लगी इस भयानक आग की खबर यूँ तो दूसरे दिन प्रदेश के हर अखबार में पहले पेज पर छपी थी. भले वह सिंगल कॉलम में थी, लेकिन दिन–रात चलने वाले राष्ट्रीय टीवी चैनलों पर इसकी कोई खबर नहीं थी. वहाँ राहुल गाँधी के सरकार में कोई महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी लेने की संभावना पर कयास और बहस के दौर चल रहे थे. मदनपुर गाँव के पंचायत भवन में लगे रंगीन टीवी पर अपने गाँव की खबर देखने के लिए आज भीड़ लगी थी. मगर अपनी कोई खबर न पा निराशा हुई. राहुल गाँधी की खबरों-बहसों से बदबू आने लगी, सो टीवी बंद कर दिया गया.
गर्मी के महीनों में खलिहानों में आग लगना आम बात है. यही वजह थी कि सरकार से लेकर ब्लॉक के अफसर तक इस घटना को दुभाग्यपूर्ण बता अपनी दिनचर्या में फिर से रम गए थे. लेकिन बिहार टाइम्स का रिपोर्टर अविनाश अभी भी बेचैनी महसूस कर रहा था. सरकार और उनके थोथे बयानों से उसे घिन आ रही थी. आखरी आदमी की आँखों के आँसू पोछने के संकल्प के साथ शासन कर रही सरकार, उनके मंत्री और अधिकारी इतने असंवेदनशील कैसे हैं..!
’तो क्या चाहते हैं, हम भी जल मरें...! बीडीओ ने बड़ी हिकारत से जवाब दिया.
’किसानों के खलिहान हर साल यूँ ही प्रदेश में कहीं न कहीं खाक होते हैं...आपलोग खानापूर्ति कर चुप हो जाते हैं. कोई ठोस इंतज़ाम क्यों नहीं करते ?’ अविनाश ने शांति से पूछा.
‘प्रभावित किसानों के लिए मुआवजे की घोषणा भी कर दी गई है.’
‘मुआवजा समाधान नहीं है बीडीओ साहब. आग न लगे और लगे तो जल्दी उस पर काबू पा लिया जा सके, आप इसके लिए कोई ठोस इंतज़ाम कीजिए.’
‘आप क्या चाह्ते हैं, हर गाँव में फायर ब्रिगेड का ब्रांच खोल दिया जाय..? तो बात कीजिए मंत्री जी से. हम तो उनके आदेशपाल भर हैं. जैसा वो कहेंगे हम करेंगे. शायद मंत्री जी आपकी बात सुनें. अब हमको हमारा काम करने देंगे..? सोमवार को मंत्री जी अपने हाथों किसानों को मुआवजा राशि बाँटने आ रहे हैं.’
प्रभावित किसानों के बीच मुआवजा राशि बाँटे जाने के दिन ब्लॉक के पास लगे मंच पर खूब हंगामा हुआ. सूची में उन्हीं किसानों के नाम थे, जिनके अपने खेत थे और जिनके पास एलपीसी यानी लैंड पजेशन सर्टिफिकेट अथवा खेत की रसीद थी. मुआवजा पानेवालों की सूची में अपने आप को न पाकर कई किसान उग्र हो गए. मंत्री जी की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी लेनेवाली पुलिस को मंत्रीजी को सुरक्षित बाहर ले जाने के लिए लाठीचार्ज करना पड़ा. मगर किसानों की सुरक्षा की जिम्मेदारी लेने वाला चूँकि खुद ही जान बचाकर भागने में परेशान था, इसलिए पचास से अधिक किसान घायल हुए. रामदीन और गिरधारी की हालत गंभीर है. सर में चोट आई है. पटना के सरकारी अस्पताल में उन्हें भर्ती किया गया है.
मंत्री जी ने इस हंगामे के लिए उन किसानों को ही दोषी ठहराया कि हंगामा करनेवाले लोग किसान नहीं, बल्कि विरोधी दल के कार्यकर्ता और भाड़े के लोग थे. राष्ट्रीय न्यूज चैनलों पर हंगामा, लाठीचार्ज और मंत्री जी का बयान ब्रेकिंग न्यूज के तौर पर चलाया गया. शाम होते-होते बहस के लिए विभिन्न दलों के प्रवक्ताओं के साथ पैनलिस्ट भी जमा हो गए.खूब गर्मागर्म बहसे हुईं, मगर पंचायत भवन में रंगीन टीवी देख रहे भुक्तभोगी ग्रामीणों को कुल मिलाकर इतना ही समझ में आया कि सब तमाशा है और वे सब जमूरे.
इस तरह की टीवी रिपोर्टिंग से बिहार टाईम्स के संवाददाता अविनाश कुमार को बहुत गुस्सा आ रहा था. ‘अपना भारत’ के बिहार ब्यूरो चीफ प्रकाश कुमार उसका खास मित्र है. अविनाश का मन किया ऎसी घटिया और झूठी रिपोर्टिंग के लिए प्रकाश को खूब गालियाँ दे. मगर मन मसोसकर रह गया. अविनाश कुमार को इस लिए भी ज्यादा गुस्सा आ रहा था कि वह खुद भी एक किसान परिवार से था. वह किसानों की स्थिति-परिस्थिति से अच्छी तरह वाकिफ था. उसके पिताजी बीस बीघा जोत वाले साधारण, लेकिन मेहनती किसान थे.
कई साल पहले, जब अविनाश छोटा सा था-तीन या चार साल का, गाँव में भयंकर बाढ़ आई थी. गाँव के चारों ओर लगी धान की फसल डूब गई थी. उफनती नदी का तटबंध न टूटे इसके लिए गाँव के किसानों और मजदूरों ने दो दिन लगातार गुमाम किया था. जहाँ भी तटबंध कमजोर दिख रहा था, पानी रिस रहा था, वहाँ मिट्टी डालकर तटबंध को मजबूत बनाया जा रहा था. पिछले दस दिनों से बरसात लगातार हो रही थी. सब भगवान से प्रार्थना कर रहे थे कि अब बस करो भगवान! इतना पानी बहुत है. लेकिन शायद भगवान किसानों से नाराज़ थे. बरसात बंद हो इसके लिए बच्चों ने नंगी देह पर कालिख पोत पूरे गाँव की गलियों में घूम-घूम कर टीन बजाने का टोटका भी किया, मगर भगवान की नाराज़गी कम नहीं हुई. नदी में पानी बढ़ता ही जा रहा था. तीन दिन दो रात किसान की भगवान से लड़ाई चलती रही. आखिरकार भगवान की ही जीत हुई. भगवान गणेश की सवारी चूहे का इसमें अद्भुत योगदान रहा. चूहों ने तटबंध में सैकड़ों- हज़ारों बिल बना रखे थे. और यही बिल अंतत: तटबंध टूटने का कारण बना. किसान-मजदूर दूर खड़ा हो अपनी बर्बादी का तमाशा देखते रहे. देखते ही देखते पूरी नदी फसल लगे खेतों की ओर मुड़ गई.
हफ्ते बाद नदी का गुस्सा जब थमा, तब जाकर खेतों से पानी हटा. लेकिन तबतक सबकुछ बर्बाद हो चुका था. नदी के अगल-बगल के खंधों में धान की जगह बालू के ऊँचे-ऊंचे टीले दिखाई दे रहे थे. किसानों ने अपना सर पीट लिया.
अविनाश के पिता ने मगर हार नहीं मानी. जब बरसात बीत गई, वह अपने बैलों और हलवाहों के साथ बालू के टीलों के खिलाफ भिड़ गए. उनके साथी किसानों ने ऎसा करने से मना किया, कि इन खेतों से बालू हटाकर उपजाऊ बनाना नामुमकिन है. मगर उनके सामने कोई और रास्ता नहीं था. बाकी किसानों के कुछ खेत तो बचे थे, लेकिन उनके सारे खेत बर्बाद हो गए थे.खेत को यूँ ही छोड़ने का मतलब था परिवार को भूखों मारना. घर में जमा अनाज से एक साल परिवार को खिलाया जा सकता था, उसके बाद....? अविनाश के पिता के चारों ओर अंधेरा छा गया. उन्होंने तय किया उन्हें हर हाल में अंधेरे से लड़ना है. मगर साथ में यह भी तय कर लिया कि अविनाश को खेती नहीं करने देना है.
खुद खेतों में कभी बाढ़ कभी सूखा कभी अगलगी से जूझते रहे, मगर अविनाश को पटना में रहकर पढ़ाई करने में कभी किसी तरह की कमी नहीं आने दी. उनके साथी किसान अपने बच्चों को डॉक्टर, इंजीनियर या आईएएस, आईपीएस बनाना चाहते थे,मगर वह अविनाश को सिर्फ पढ़ने के लिए मोटीवेट करते रहे. क्या बनना है, इसका निर्णय अविनाश को ही लेने की आजादी दी. अविनाश ने पत्रकार बनना पसंद किया. पत्रकार की स्वतंत्रता से वह बड़ा फेसिनेटेड था. एक कमजोर से कमजोर आदमी के भी दुख, शोषण और चाहत को वह देश दुनिया के सामने अभिव्यक्त कर सकता था.
हालाँकि यह देखने के लिए उसके पिता ज़िंदा नहीं रहे. एक मनहूस सुबह अविनाश को फोन पर खबर मिली कि उसके पिता का निधन हो गया है. अचानक उसके सामने घनघोर अंधेरा छा गया था. चेतना लौटी तो उसे समझ में आया कि उसके पिता किस तरह खुद को जला उसके जीवन में उजाला भर रहे थे.
नौकरी की तलाश में जब वह निकला तो तुरंत ही उसे प्रदेश के सबसे बड़े अखबार बिहार टाईम्स में जगह मिल गई. उसमें वह पहले भी कई आलेख लिख चुका था. संपादक उसकी लेखन शैली और भाषा के प्रशंसक थे. मामूली से मामूली खबर को भी अविनाश ऎसा मानवीय दृष्टिकोण देता था कि साथी पत्रकार भी कायल हो जाया करते.
अविनाश मदनपुर की इस अगलगी और उस पर रिपोर्टिंग से बहुत अपसेट था. उसने तय किया कि अब वह सारा सच लिखेगा. सरकारों की नाकामियाँ, नेताओं की राजनीति, अफसरों की मंत्रियों के प्रति स्वामीभक्ति, किसानों का दुख और पत्रकारों की कुंद और चाटूकार पत्रकारिता सब पर वह बेबाकी से लिखेगा.
फर्स्ट पेज इंचार्ज अखिलेश को उसने पहले ही बता दिया था कि बॉटम के लिए एक सीरिज स्टोरी दे रहा है, कमसेकम पाँच किश्त में जाएगी. अखिलेश खुश हुआ कि पाँच दिन के लिए बॉटम स्टोरी का टेंशन खत्म हुआ.
अविनाश की आँख आज सुबह थोड़ी देर से खुली. स्टोरी लिखने के बाद उसे सुकून मिला था. बेडरूम में सूरज की रोशनी चमक रही थी. वह बेडरूम से बाहर आया और वॉश बेसिन के पास आ कुल्ला किया चेहरा धोया, फिर माँ को आवाज दी, ‘ माँ चाय बनाना.’ माँ किचन में खाना बनाने में जुटी थी.
अविनाश बालकनी में आ गया.अखबार आया हुआ था. अखबारवाला रोज सड़क से ही बालकनी में अखबार फेंक जाता है. वहीं कुर्सी पर बैठ कर वह अखबार देखने लगा. मुख्यमंत्री की सेवायात्रा और वहाँ की गई घोषणाएँ अखबार की लीड स्टोरी थी. पिछले तीन दिनों से रोज इसी तरह की न्यूज लीड बनाई जा रही थी. दो पत्रकार संजीव और आकाश मुख्यमंत्री की यात्रा और उनकी घोषणाओं को कवर करने के लिए अखबार द्वारा डिप्यूट किए गए थे. अविनाश को लीड स्टोरी बिल्कुल पसंद नहीं आई. उसे लगा यह लीड नहीं बल्कि लीद है. उसने संपादक से एक बार कहा भी था कि इस तरह की न्यूज अखबार की विश्वसनीयता को कम करते हैं. जिस तरह से मुख्यमंत्री और उनकी घोषणाओं को लीड बनाकर छापा जा रहा है, उससे लगता है कि यह अखबार नहीं, मुखपत्र है. मगर संपादक ने अविनाश से यह कहकर पीछा छुड़ा लिया था कि समय के साथ चलने में ही होशियारी होती है अविनाश...! जब तुम संपादक बनोगे, तब समझ में आ जाएगा.’ लीड न्यूज की हेडलाइन पढ़ने के बाद बिना पूरी खबर पढ़े वह बॉटम न्यूज की तरफ बढ़ गया. उसे झटका-सा लगा. बॉटम में उसकी स्टोरी की जगह कृषि मंत्री की किसी बिजनेसमैन के साथ खींसे निपोड़े तस्वीर के साथ ऑर्गेनिक सब्जी मुम्बई भेजे जाने के करार की खबर छपी थी. उसने अखबार पलटकर देखा, बैक पेज पर बिपाशा बसु की लगभग अधनंगी बड़ी-सी तस्वीर के साथ उसका इंटरव्यू छपा था. उसे बड़ा गुस्सा आया. उसने तुरंत अखिलेश को फोन लगाया, पता चला वह अभी तक सो रहा है. घड़ी देखी साढ़े सात बजे थे. फर्स्ट पेज इंचार्ज होने की वजह से वह देर रात घर लौटता है, इसलिए रोज ही वह सुबह देर से जागता है. पत्नी ने फोन उठाया था, उसी ने अविनाश को यह जानकारी दी. ‘ कुछ ज़रूरी बात है, तो उन्हें उठाऊँ क्या? पत्नी ने पूछा. अविनाश ने हाँ कहना चाहा, मगर कुछ सोचकर ना कह दी. उसे बड़ा गुस्सा आ रहा था. वह समझ नहीं पा रहा था, आखिर उसकी स्टोरी क्यों नहीं छापी गई. इसी बीच मोबाइल रिंग हुआ. अखिलेश का कॉल था. उसने अविनाश के सामने लगभग सफाई दी, ‘ सॉरी यार, मैं तुम्हारी स्टोरी अपने पेज पर नहीं लगा सका.’ संपादक जी ने कहा कि इसे रीजनल पेज पर दे दो. इसलिए मैंने तुम्हारी स्टोरी अनिल को दे दी है. आज स्टोरी लगाएगा वो. सॉरी यार, मुझे दोषी मत मानना.’ अविनाश प्रत्युत्तर में कुछ नहीं बोला. चुपचाप कॉल कट कर दिया. अविनाश के भीतर ठीक वैसी ही आग लगी थी, जैसी मदनपुर के खलिहान में लगी थी. खलिहान में आग कैसे लगी थी, यह किसानों को पता नहीं था, मगर अविनाश के मन-मस्तिष्क में आग लगानेवाला उसी के अखबार का संपादक था. उसी संपादक ने उसकी लेखनी से प्रभावित होकर दो साल पहले उसे नौकरी पर रखा था. तब वह कितना सज्जन और सहृदय लगा था, मगर आज संपादक पर बहुत गुस्सा आ रहा था उसे. उसने तय किया ऑफिस जाते ही संपादक से जवाब माँगेगा.
शाम पाँच बजे अक्सर वह अपने दफ्तर पहुँचता था, लेकिन आज वह तीन बजे ही दफ्तर आ गया था. संपादक अपनी केबिन में खिलखिला-खिलाकर फोन पर किसी से बात कर रहे थे. अविनाश बिना अनुमति आज केबिन में घुस आया था. संपादक को भी उसका आना सहज नहीं लगा. उसने ‘अच्छा थोड़ी देर बात फोन करता हूँ’ सामनेवाले को ऎसा कह अविनाश की तरफ मुखातिब हुआ, ‘क्या बात है अविनाश..?’
‘सर, मेरी स्टोरी आपने फर्स्ट पेज से क्यों हटवा दी..?’
‘क्योंकि वह फर्स्ट पेज की स्टोरी नहीं थी. तुम्हारी लिखी स्टोरी थी, इसलिए मैंने रीजनल पेज के लिए फॉरवर्ड कर दी, वरना वो छपती भी नहीं.’
’क्यों सर..?’
‘अविनाश तुम दो साल से इस अखबार में काम कर रहे हो, अभी तक तुम्हारे अंदर न्यूज सेंस डेवलप नहीं हुआ है. गाँव और किसान-मजदूर की स्टोरी कौन पढ़ता है? वे खुद अखबार नहीं पढ़ते.’
‘तो क्या बिपाशा बसु आपका अखबार पढ़ती है..? उसे क्यों पूरे पेज में छापा है?’
‘क्योंकि पाठक उसे पढ़ना चाहते हैं. हमारे अखबार के असली खरीदार शहरी पाठक हैं. गाँव के लोग हमारे खरीदार नहीं हैं. अखबार निकालते वक़्त हमेशा इस बात को ध्यान में रखना होता है.’
‘सर, अखबार निकालने और बनियागिरी में कुछ तो फर्क होता होगा...!
संपादक चिढ़ गया, ‘ तो तुम अखबार और बनियागिरी में फर्क मुझे बतलाओगे? तुम क्या समझते हो, बड़ी-बड़ी आदर्श की बातें करने से अखबार चलता है? जिन गरीब लोगों पर तुम स्टोरियाँ लिखते हो, उनके पैसे से यह अखबार का कागज़ भी नहीं खरीदा जा सकता है...! तुम्हें हर महीने बीस हज़ार की जो सेलरी मिलती है, वो कहाँ से आती है, पता है तुम्हें..?’
अविनाश को लकवा–सा मार गया. उसने सचमुच ऎसा कभी सोचा नहीं था. उसे अपने आप से भी दोगलेपन की बदबू आने लगी. वह चुपचाप संपादक के कमरे से बाहर निकल आया.
वह अपने फ्लैट पर लौट आया. इतनी जल्दी आया देख माँ आश्चर्य से बोल पड़ी, ‘ अविनाश आज बहुत जल्दी दफ्तर से आ गए... तबियत तो ठीक है न...?’
‘माँ सामान बाँधो, हम अपने गाँव चलेंगे...’ अविनाश अपने कपड़े समेटने लगा.
माँ को कुछ समझ में नहीं आया...वह चुप रही. फिर अविनाश ही बोला, ‘ माँ, हम खेती करेंगे. अपनी मेहनत और पसीने की कमाई तुम्हें खिलाना चाहते हैं माँ...हाँ माँ, हम खेती करेंगे...’ वह माँ से लिपट गया. उसकी आँखों में आँसू थे.