Friday, 30 June 2017

चीन की धमकी और हमारे दु:खस्वप्न !!

खबर है कि चीन हमें धमका रहा है. पार्ट टाइम रक्षा मंत्री कह रहे हैं डरने की बात नहीं है. भारत 1962 से बहुत आगे निकल चुका है. कुछ विद्वान रक्षा विशेषज्ञ बता रहे हैं कि चीन के सामने भारत की औकात नहीं के बराबर है, इसलिए पंगे में न पड़े.
चीन भी यह बात जानता है कि पाकिस्तान जिसको नंगा कर देता है, उसकी औकात क्या होगी! चीन क्या पूरी दुनिया जानती है कि भारत सबसे दोस्ती चाहता है, किसी से पंगा लेनेवाला देश नहीं है. हम राष्ट्रवादी लोग इसे अपना गुण मानते हैं कि हम मानवतावादी और सहिष्णु हैं. लेकिन दुनिया के बाकी देश भी ऐसा मानते हैं?
हमने कभी किसी पर आक्रमण नहीं किया. किसी की संप्रभुता को जीतने के बजाय हमने दिलों को जीता है ! यही कारण है कि हमारे महात्मा गांधी की मूर्तियाँ दुनिया में सबसे ज्यादा लगी हैं. गांधी के जन्मदिन को दुनिया ने अहिंसा दिवस के रूप में मनाना शुरू किया. यानी दुनिया को अहिंसा की जरूरत सबसे ज्यादा है. हिंसक देश भी मानते है कि अहिंसा मनुष्य का पहला धर्म है.
चीन तो बुद्ध को माननेवाला देश है, लेकिन वहीं के महान नेता ने कहा है कि सत्ता बन्दूक की गोली से निकलती है. इसलिए बुद्धिज़्म को अपना धर्मं मानने के बावजूद चीन बंदूकों में हमसे आगे है. 62 के युद्ध में हमको बुरी तरह हरा चुका है,इसलिए भी उसका मनोबल ऊंचा है. एक और गुण भी है उसके पास, एक नंबर का धोखेबाज है. हमारे संस्कारों में युद्ध भी नीति अनीति से लड़ने की सीख है. जबकि दुनिया कहती है लव एंड वार में सबकुछ जायज है.
भारत की अगर वाकई कोई औकात नहीं है, तो हमारे नेता क्यों लाल किले से झूठे भाषण देते रहते हैं ? अपनी सामरिक क्षमता का क्यों और किसके लिए प्रदर्शन करते रहते हैं ?
युद्ध हो ये अच्छी बात नहीं, लेकिन युद्ध से भागना उससे भी बुरी बात है. नेहरू चीन से हार गये, लेकिन  इसके बाद भारत ने दो बार पाकिस्तान को भारी शिकस्त दी. इन्दिरा गाँधी ने बाग्लादेश बना दिया और दुनिया देखती रह गई!  
कूटनीतिक स्तर पर हमारी स्थिति तब भी बेहद मजबूत थी, जब दुनिया दो धड़ों में बँटी थी और युद्ध निर्णायक लग रहा था. नेहरू दुनिया को युद्ध के परे रास्ता दिखाने में कामयाब हो गये थे. इन्दिरा गाँधी ने अपनी कूटनीतिक सूझबूझ और देश के सामरिक बल से बाहुबली अमेरिका को भी पट्टी पढ़ा दी थी. फिर आज हालात इतने बुरे क्यों हैं देश के? किसी की धमकी भर से हम क्यों काँपने लगते हैं ? बचने का रास्ता ढूँढने लगते हैं ? क्या चीन में इतनी शक्ति है कि वह हमें बरबाद कर देगा ? क्या चीन युद्ध का बोझ बर्दाश्त करने की स्थिति में है. क्या उसे अपनी बरबादी का डर नहीं है ?
हमारे यहाँ कहावत है बनिया लड़ाई नहीं चाहता, क्योंकि वह जानता है कि लड़ाई में उलझेगा तो व्यापार चौपट हो जायेगा. दुनिया जैसे जैसे आगे बढ़ रही है, अर्थ और बाजार तरक्की के सबसे जरूरी घटक होते जा रहे हैं. चीन इस बाजारवाद में अमेरिका को पछाड़ने में लगा है. और इस बाजारवाद में बेहद अहम हो जाता है उपभोक्ता. भारत चीन के बाद दुनिया का सबसे बड़ा बाजार है. कुछ सालों बाद बाजार के मामले में हम चीन से भी आगे चले जाने वाले हैं. ऐसे में हमारा रोल और भी बड़ा हो जायेगा. फिर भी हम डरते हैं. क्या डरकर जिया जा सकता है ?
डरकर जीने वाले कायर कहलाते हैं. क्या भारत कायरों का देश है ? क्या हमारी बहादुरी सिर्फ अपने ही देश के गरीबों और कमजोरों को मारने तक सीमित है?
सत्ता व्यापारियों की इशारे पर चलती है, इसके उदाहरण हम पूरी दुनिया में देख रहे हैं. हथियारों का बाजार लगातार बढ़ रहा है. दुनिया को युद्ध की भूमि में धकेल कर हथियारों के व्यापारी फल फूल रहे हैं. और वह चाहते हैं कि यह स्थिति बनी रहे, लेकिन बाकी व्यापारी? क्या टीवी, कम्प्यूटर और मोबाइल के व्यापारी भी ऐसा ही चाहते हैं ?
आधुनिक दुनिया पैसों और सुविधाओं के कांधे पर सवार है. फिर हथियारों के व्यापारी ज्यादा ताकतवर क्यों हैं? क्यों भय के खेल में हमारे नेता और चिंतक फँस जाते हैं? देश के बहादुरों को क्यों नहीं सरहद पर भेजते. गाय बचाने से ज्यादा जरूरी है देश को बचाना ! फिर चीन की चुनौती स्वीकार करने से हमारे बहादुर देशभक्त क्यों डरते हैं?
Dhananjay Kumar