Tuesday, 24 December 2013

स्त्री स्वर

मैं सामान नहीं हूँ, मैं जागीर नहीं हूँ
मुझसे यूँ न खेलो, मैं बस देह नहीं हूँ.

गुड्डी-गुड़िया नहीं पुकारो, कुल का दीपक हूँ मैं,
मैं भी नभ को छू सकती हूँ, जग की रौनक हूँ मैं.

कबतक ज़ुल्म करोगे, कब साथी समझोगे?
कभी हृदय से पूछो क्या मेरे बिन जी लोगे ?

छाया बनकर रही प्रेमवश,तुमने अक्षम माना
मुझको हर रिश्ते में लेकिन तुमने गलत ही जाना

देवी मुझको मत बोलो, बस इंसा ही रहने दो
मेरे हिस्से का सुख दे दो, मुझको भी जीने दो

मुझको कम ना आँको, ज़रा न तुमसे कम हूँ
मैं ममता,साहस, कौशल्य तीनों का संगम हूँ

धनंजय कुमार

Sunday, 1 December 2013

ज़रूरत है ऎसी ग्राम-नीति की जो गाँव को आत्मनिर्भर बनाए

राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी का मानना था भारतवर्ष की आत्मा गाँवों में बसती है, मगर आज़ादी के बाद हमारे गाँवों को हमने लगातार उजाड़ा. हमारी सरकारों ने प्रगति और विकास के पथ से गाँवों को दूर रखा, तो हमने दुनिया की दौड़ में खुद को आगे रखने की ललक में गाँवों को दुत्कार-डपट शहरों की चमक-दमक को ह्रदय में बसाया. और हमारे गाँव लगातार हमसे छूटते गए...मुरझाते गए, सूखते गए.
कहने तो सरकार ने आज़ादी के बाद लगातार गाँवों के विकास को ध्यान में रखकर अपनी नीतियाँ बनाई हैं, मगर क्या वो नीतियाँ फलदायी रहीं ? जवाब बिना हील-हुज्जत के ‘नहीं’ है. अगर फलदायी होतीं तो हमारे गाँव हाशिए पर नहीं चले जाते. गाँव छोड़कर हम भागते नहीं. हमारे गाँव संसाधनविहीन, प्रतिभाविहीन और ऊर्जाविहीन नहीं हो जाते.
ग्राम विकास के नाम पर सरकारों ने किसानों की सहायता करने की नीतियाँ बनाईं. उन्हें तरह – तरह की सब्सिडियाँ दी गई. मॉनसून के भरोसे खेती को नदियों पर बाँध बना, नहरों को खेतों से जोड़ और नलकूप की व्यवस्था कर कृत्रिम सिंचाई का सहारा दिया गया. परम्परावादी खेती को आधुनिक तकनीकों से जोड़ने की कोशिशें हुईं. किसानों को अपने उत्पाद की सही कीमत मिले इसके लिए सरकार द्वारा कृषि उत्पादों का मूल्य निर्धारित किया जाने लगा. मंडियाँ बनाई गईं. किसानों की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ हो, इसके लिए उन्हें आयकर से मुक्त रखा गया. मगर आज 65 सालों की सरकारी कवायद के बाद भी किसानों की स्थिति क्या है..? किसान खेत छोड़कर भाग रहे हैं, जो नहीं भाग सकते आत्महत्या कर रहे हैं.
आज आज़ादी के 65-66 साल बाद भी गाँवों को सँवारने की प्रक्रिया में जो सरकारी नीतियाँ खूब ढोल-बाजे के साथ अमल में लाई जा रही है,वह भी निरंतर उजड़ रहे गाँव को सँवारने की दिशा में ‘बीमारी कुछ इलाज कुछ’ की तरह किया जा रहा है. यही वजह है कि ग्राम पंचायतों को आर्थिक अधिकार देने, ग्रामीणों को तरह-तरह की आर्थिक सहायता (मनरेगा आदि) देने के बावजूद गाँव उजड़ रहे हैं. ग्राम विकास और ग्रामवासियों की आर्थिक सशक्तिकरण के नाम पर सरकारों द्वारा मुक्त हस्त लुटाई जा रही धनराशि जनता के हित में इस्तेमाल कम बर्बाद ज्यादा हो रही है. मुखिया जी गाँव के मालिक बन गए हैं. जो बीडीओ और जिलाधीश को खुश करके सरकारी धन का अपूर्व आनन्द प्राप्त कर रहे हैं. दिलचस्प यह है कि आम जनता भी इस सरकारी लूट से खुश है. आखिर खुश हो भी क्यों नहीं...हर तरीके की लूट में शामिल होने की उन्हें भी छूट है. कुछ रुपए की रिश्वत देकर गलत तथ्य पर आय प्रमाण पत्र से लेकर वैसे तमाम प्रमाणपत्र आराम से बन जा रहे हैं, जिनसे सरकारी सब्सिडियों की रेवड़ियाँ प्राप्त हो जाती हैं. विकास के नाम पर सड़कें बन रही हैं, इन्दिरा आवास बन रहे हैं, सामुदायिक भवन बन रहे हैं. रोजगार के नाम पर मनरेगा के तहत पेड़ लगाए जा रहे हैं, गलियाँ बनाई जा रही हैं, घर-घर शौचालय बनाए जा रहे हैं. किसानों को सहायता के नाम पर खाद-बीज से लेकर ट्रैक्टर-पॉलीहाउस पर हज़ारों-लाखों की सरकारी सब्सिडी जबरन बाँटी जा रही हैं. शिक्षा का स्तर सुधारने के लिए आँगनबाड़ी से लेकर कस्तूरबा विद्यालय बनाए जा रहे हैं. कॉपी-किताब से लेकर मिड डे मील-सायकिल और लैपटॉप बाँटे जा रहे हैं. ओह...! सार कहें तो हमारे गाँवों में मॉनसून से कई गुणा ज्यादा सरकारी धन बरस रहा है. मगर अफसोस की बात यह है कि जैसे बरसात के पानी को हम बेकार बह जाने देते हैं, वैसे ही सरकारी धन भी अनुपयोगी तरीके से बहाया जा रहा है. गाँव में एक कहावत है चोरों के सन्दर्भ में- ‘लूट लाए कूट खाए’, इसीलिए चोरों की आर्थिक स्थिति कभी सुधरती नहीं, सरकारी धन की भी यही स्थिति है, यही कारण है कि सालाना लाखों-करोड़ों लुटाए जाने के बाद भी गाँव की स्थिति बेहतर नहीं हो पा रही है. प्रतिभा और मजदूर रोटी-रोजगार के लिए बदस्तूर पलायन कर रहे हैं. और बेहतर जीवन की ललक में ग्रामवासियों का बेहतर डेस्टिनेशन अब भी शहर ही है. इससे यह स्पष्ट जाहिर होता है कि हमारे गाँव को लेकर अबतक सरकारों की जो दृष्टि और नीतियाँ रही हैं वह गलत रही हैं.
महात्मा गाँधी ने गाँवों के विकास का जो स्वप्न देखा था, उसमें गाँव को आत्मनिर्भरता प्रदान करने की कल्पना थी. लोकतंत्र को राजधानियों तक सीमित रखने के बजाय गाँव तक पसारने की चाहत थी, मगर हमारे नीति-नियंताओं ने गाँवों के साथ-साथ गाँधी को भी ठगा. लोकतंत्र को जनता से जोड़ने के नाम पर ग्राम-पंचायतों का गठन तो किया गया, मगर ठीक वैसे ही जैसे बच्चों को बड़े नकली खिलौनों से बहला लेते हैं. सत्ता जनप्रतिनिधियों की अंजुरी से चलकर नौकरशाहों की जटा में समा गई. जनता ‘अमूल्य वोट’ का अधिकार पाकर धन्य हो गई. जनप्रतिनिधियों को राजधानियों का सुख प्राप्त हुआ तो नौकरशाहों को राजधानियों अथवा जिला मुख्यालयों का और जनता के नसीब में रहे गाँव. जनप्रतिनिधियों और नौकरशाहों को ही विकास की रूपरेखा तय करनी थी, इसलिए सरकारी धनों से पहला विकास राजधानियों का हुआ फिर जिला मुख्यालयों का. विकास के बजट से गाँव के विकास की बारी आई बिल्कुल आखिर में. यानी अब जब मामला बिल्कुल भयावह हो गया. वो भी तब जब नीति-नियंताओं को लगने लगा कि गाँव की आबादी को अगर गाँव में नहीं रोका गया तो हमारे शहर अस्त-व्यस्त हो जाएँगे.
कलतक गाँवों को विकास की पटरी से दूर रखा गया, वह साज़िश थी, मगर आज गाँवों के विकास के नाम पर जो धन लुटाया जा रहा है, वह नीति-नियंताओं की हवाई समझ है. खैरात बाँटने से न तो ग्रामवासियों का भला होना है, न ही हमारे गाँव का विकास होना है. ज़रूरत है ऎसी ग्राम-नीति की जो गाँव को आत्मनिर्भर बनाए. मनरेगा और सब्सिडी से ग्रामवासियों को गाँव में नहीं रोका जा सकता. ग्रामवासी गाँव में रहना तब पसन्द करेंगे जब गाँव में भी शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के बेहतर साधन उपलब्ध होंगे. सिर्फ कम कीमत पर अनाज देने, इन्दिरा आवास बना देने और स्कूलों के नाम पर भवन खड़ा कर देने और प्राइमरी हेल्थ सेंटर बना देने भर से ग्रामवासी खुशहाल नहीं हो जाएँगे. वह खुशहाल तब होंगे, जब उनके जीवन के मूलभूत सपने गाँव में ही पूरे हो सकेंगे.           

 
हमारे गाँव के सर्जक धनंजय कुमार बिन्द प्रखण्ड के बीडीओ अशोक कुमार जी के साथ 

शिक्षा के क्षेत्र में जागरूकता बढ़ाने की दिशा में एक पहल 'देवनन्दन पब्लिक स्कूल.

Thursday, 28 November 2013

क्वालिटी एजुकेशन देने में कामयाब हो रहा है 'देवनन्दन पब्लिक स्कूल'

'हमारे गाँव' विचार के तहत बिहार के नालन्दा ज़िला के बिन्द गाँव में शुरू किया देवनन्दन पब्लिक स्कूल निरंतर आगे बढ़ता जा रहा है. खुशी है कि स्कूल की तीनों टीचर्स अच्छा काम कर रही हैं. बच्चों की प्रोग्रेस किसी भी आगंतुक को लुभा ले रही है. शुद्ध हिन्दी भी नहीं बोल पाने वाले बच्चे अंग्रेजी सीख रहे हैं. पहली क्लास के बच्चे जो एडमिशन के वक़्त सही अल्फाबेट भी लिख - पढ़ नहीं पाते थे, अब इंग्लिश बुक की फ्लुएंट रीडिंग करने लगे हैं.
गाँव के बच्चों को आधुनिक भारत की धारा से जोड़ने के क्रम में मैंने 'हमारे गाँव' की संकल्पना में इंग्लिश मीडियम स्कूल की भूमिका को महत्वपूर्ण माना था. इसी के तहत देवनन्दन पब्लिक स्कूल की 2012 में स्थापना की गई. स्कूल शुरू करते वक़्त मुझे यह पता नहीं था कि टीचर ढूँढने में इतनी परेशानी आएगी. काफी मशक्कत के बाद भी मैं एक भी टीचर को अपने स्कूल से जोड़ नही पाया. कारण कोई भी टीचर शहर छोड़कर गाँव आने को तैयार नहीं हुआ. शहर से ज्यादा सेलरी देने को राज़ी होने के बाद भी.गाँव में जो टीचर मिल रहे थे, इंग्लिश में बिल्कुल साफ थे. अंदाज़ा लगाइए Fun  को वह 'फुन' प्रोनाउंस करते थे. लिहाजा सत्र 2012-13 में स्कूल शुरू नहीं हो पाया.
मैं समझ नहीं पा रहा था क्या करूँ...मेरी सारी कोशिशें बेकार साबित हुईं. तब मैंने निर्णय लिया कि गाँव की ही लड़कियों को टीचर बनाऊँगा. मैंने दो लड़कियों सिम्पी और आरती को लगभग चार महीने लगातार पढ़ाया और इस लायक बनाया कि नर्सरी से क्लास वन तक के बच्चों को ठीक से पढ़ा सके. और सुखद रहा कि दोनों ने पूरे मनोयोग से मेरे मिशन में मेरा साथ दिया. वे दोनों बिहारशरीफ के एक कॉलेज से बीए की पढ़ाई भी कर रही हैं. और शुरुआत में जहाँ वह बात करने में भी कमज़ोर थीं आज आत्मविश्वास से भरी हैं और मेरी अनुपस्थिति में भी ठीक से स्कूल चला ले रहीं हैं. इस बीच दो और लड़कियों पर मेहनत की-ममता और पूजा. ममता बीए में पढ़ती हैं. हालाँकि चार-पाँच महीने ही साथ रह पाई. अभी व्ह किसी और स्कूल में पढ़ा रही है. जबकि पूजा अभी ग्यारहवीं की छात्रा है. वह अब भी रेग्यूलर खासकर नर्सरी के बच्चों को पढ़ा रही है.
अगले साल सेकंड और थर्ड भी शुरू करने की तैयारी में हूँ. नई टीचर की तलाश शुरू कर दी है, पता नहीं इतिहास दोहराता है या इस बार बाहर से टीचर लाने में कामयाब हो पाता हूँ. मैं दोनों स्थिति के लिए तैयार हूँ.
बच्चों को घर से स्कूल लाने में गाड़ी की समस्या भी बड़ी संगीन रही. लोगों में प्रोफेशनलिज़्म और समय की कीमत की समझ बिल्कुल अल्प है. इस वजह से आठ -दस बच्चे स्कूल से हट भी गए. खैर डेढ़ सौ रुपए प्रति बच्चे का नुकसान सहकर किसी तरह काफी जद्दोजहद के बाद गाड़ी को समय पर चलवाने में कामयाब हो पाया हूँ. अगले सत्र में गाड़ी की सही व्यवस्था करने की कोशिश में अभी से जुटा हूँ.
बहरहाल खुशी है कि हर महीने कुछ हज़ार रुपए का नुकसान ही सही गाँवके बच्चों को क्वालिटी एजुकेशन दे पाने की दिशा में सार्थक तरीके से बढ़ रहा हूँ.



Saturday, 30 March 2013

भीषण शोषण के शिकार हैं किसान


अनाज, सब्जियाँ, फल और दूध हमारे जीवन का आधार हैं. हमारे शरीर के ज़रूरी पोषाहार इन्हीं चार अवयवों से मिलते हैं. इनके बिना हम स्वस्थ जीवन की कल्पना तक नहीं सकते. कुपोषण आज भी दुनिया की सबसे बड़ी समस्या है. अमेरिका जैसे देश में भी कुपोषण के शिकार लोग हैं. भारत में आधी से अधिक जनसंख्या कुपोषण का शिकार है. इसमें बड़ी आबादी गाँवों में रहनेवाले लोगों की है. गाँव, जहाँ न्यूनतम खर्चे में लोग अपना गुजर-बसर कर लेते हैं, वहाँ भी लोगों को भरपेट भोजन नहीं मिल पाता. पौष्टिक भोजन की तो बात ही कल्पना है. जबकि दुनिया का सारा अनाज, फल, सब्जियाँ और दूध गाँवों में ही उपजता है. कितनी विडम्बनापूर्ण है यह बात कि जहाँ अनाज उपजता है, वहीं के लोगों को भरपेट भोजन नहीं मिलता. जहाँ पौष्टिकता से भरपूर सब्जियाँ, फल और दूध  का प्रचुर मात्रा में उत्पादन होता है, वहीं के लोग कुपोषण के शिकार हैं. क्या देश के प्रबुद्धों ने कभी इस पर विचार किया है? अगर विचार किया होता तो ज़रूरी पोषाहार उगाने वाले किसान आज़ादी के 65 साल बाद भी कुपोषण के शिकार न होते. अपने बेटों को किसानी के काम से दूर जाने के लिए प्रेरित न करते. उन्हें पढ़ा-लिखाकर मामूली चपरासी की नौकरी के लिए भी शहर भेजने के लिए एड़ी-चोटी का ज़ोर न लगाते. जिस आँकड़ेबाजी पर दुनिया का बाज़ार टिका है, उस आँकड़े के गणित में भी खेत छोड़कर भाग रहे किसानों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है. सरकार किसानों को सहायता देने के नाम पर हर साल अरबों-खरबों रुपयों की सब्सिडी बाँटती है, फिर भी किसान खेत छोड़कर भाग रहे हैं. किसानी भारी घाटे का सौदा बनी है. खेती करके किसानों और उनके मजदूरों का पेट भरना भी मुश्किल है. क्यों? जबकि उन्हीं किसानों और मजदूरों की मेहनत और पसीने से उगाए अनाज, सब्जियाँ, फल और दूध की प्रोसेसिंग से बनी खाद्य व पेय वस्तुओं से प्रोसेसिंग इंडस्ट्री के व्यापारी लाखों-करोड़ों अर्जित कर रहे हैं. बासमती चावल उगानेवाले किसान अगले साल खेती करने के लिए कर्ज़ लेने को मजबूर हैं, जबकि बासमती चावल की खूबसूरत पैकेजिंग कर उपभोक्ताओं तक पहुंचानेवाले बिचौलिए खूबसूरत फिल्मी हीरोइनों के साथ महँगे होटलों में सपरिवार डिनर लेते हैं. आलू उत्पादक किसान अपनी मेहनत-पसीने से उगाए आलू को बाज़ार में बेचने से सड़कों पर गिराकर उस पर ट्रक चलवा देना अच्छा समझते हैं. जबकि चिप्स बनाने वाली कंपनियाँ सड़े हुए आलू फेंकने में भी अपना नुकसान पाती हैं. आखिर ऎसा क्यों होता है? क्या इस देश के बुद्धिजीवियों और बाज़ार विशेषज्ञों ने कभी इस पर सरसरी विचार भी किया है? अगर किया होता तो किसानों के हालात में सकारात्मक बदलाव आते.
इस देश के एक बड़े वर्ग को, जिनका खेती और किसानी से किसी भी स्तर पर सीधा सम्बन्ध नहीं है, उनको किसानों को मिलने वाली भारी (?) सरकारी सब्सिडी बेहद खलती है. हमें भी खलती है. मगर एक बुनियादी फर्क है- उन्हें लगता है किसान अकर्मण्य हैं, भारी सब्सिडी डकारने के बाद भी आत्महत्या कर हमारे महान देश को बदनाम कर देते हैं, जबकि हमें लगता है, भारी सब्सिडी की आड़ में वे हमारे भीषण शोषण को सफलतापूर्वक छुपा लेते हैं. सब्सिडी पाकर हम उनके अहसान तले दब जाते हैं और शोषण के खिलाफ विद्रोह तो क्या आह तक नहीं कर पाते. गैर किसान प्रबुद्धों सरकारी सब्सिडी (इसे शोषण का मुआवजा कहना सही होगा) हमें नहीं चाहिए. हम परजीवी नहीं हैं. मेहनत करना हमें आता है. चिलचिलाती धूप हो या कड़कड़ाती ठंढ या कि हहराती प्रलयंकर बरसात हम किसी से नहीं डरते, हम बिना एसी, बिना अलाव और बिना छाते-रेनकोट के मज़े से जीना जानते हैं. हम प्रकृति की विभीषिका के आदी हैं. आप हमारी तरफ उंगली उठाने या हमें बेचारा समझने से पहले अपने गिरेबाँ में झाँकिए...क्या आप हमारी परिस्थिति में कुछ दिन भी जी सकते हैं ? और रही सब्सिडी की बात, तो हमसे ज्यादा सब्सिडी आप भोगते हैं- गैस सिलिंडर से लेकर डीजल-पेट्रोल तक. परजीवी हम नहीं आप हैं. हमारे शोषण पर ही आपके कपड़ों की सफेदी है. इसीलिए शायद भारतीय जनमानस में एक लोकोक्ति प्रसिद्ध है-‘ कमाए लँगोटी खाये धोती ’.
किसानों को मत दीजिए सब्सिडी. सब्सिडी की किस तरह सरकार से लेकर उद्योगपति तक बँदरबाँट करते हैं, यह हम किसानों से बेहतर आप जानते हैं. हमें अपनी वस्तु का वास्तविक मूल्य दे दीजिए, बिना सब्सिडी आनंदपूर्वक जी लेंगे. किसी भी वस्तु का बाज़ार मूल्य उसकी लागत के आधार पर तय होता है. हमारी उपज का बाज़ार मूल्य भी वैसे ही आँकिए. फिर देखिए कौन कुपोषण का शिकार होता है !
इस देश के ज्यादातर किसान कम जोत वाले हैं- एक से दो एकड़ खेत वाले. हम दस एकड़वाले एक आम किसान का उदाहरण यहाँ लेते हैं. वह किसान अपने दस एकड़ खेत में धान और गेहूँ दोनों फसलों की अच्छी पैदावार करता है (प्रकृति अनुरूप रही तो, क्योंकि हम आज इक्कीसवीं सदी में भी प्रकृति पर आश्रित हैं) तो वह 12.8 क्विंटल प्रति एकड़ के हिसाब से धान या गेहूँ की उपज हासिल कर पाएगा. यानी दस एकड़ में 128 क्विंटल धान या गेहूँ वह उपजा पाएगा. सरकार के समर्थन मूल्य के आधार पर हिसाब लगाएँ तो 1350 रुपए प्रति क्विंटल की दर से उस किसान को गेहूँ के बदले कुल 1 लाख 72 हज़ार 8 सौ की राशि प्राप्त होती है, जबकि इतने ही धान के लिए किसान को 1250 रुपए प्रति क्विंटल के हिसाब से 1 लाख 60 हज़ार की राशि प्राप्त होती है. यानी एक साल की दोनों फसलों से उसे 3 लाख 32 हज़ार 8 सौ रुपए प्राप्त हुए. अब इसमें से उसके खर्चे को आधा कम कर दीजिए. यानी बचे 1 लाख 56 हज़ार 4 सौ रुपए. फिर उसमें उसकी और उसके परिवार की सालभर की मेहनत के मूल्य को घटाइए. बताइए कितना बचा उस किसान को...? क्या इस किसान से इस देश के किसी दफ्तर में काम करने वाले एक चपरासी की अर्निंग ज्यादा नहीं है ? क्या यह किसानों का अमानवीय शोषण नहीं है?
फुटपाथ पर बैठा छोटा से छोटा हॉकर और विभिन्न प्रकार की छोटी-छोटी सेवाएँ देनेवाला भी अपने सामान या सेवा का मूल्य स्वयं तय करता है, किंतु किसान अपनी उपज की कीमत तय नहीं पाता. क्या यह किसानों के साथ सभ्य समाज की ज्यादती नहीं है? भले समाज के भले सज्जनों हमें सब्सिडी मत दीजिए, हमें इनकम टैक्स में छूट भी मत दीजिए, हमें बस हमारे सामान की सही कीमत दे दीजिए. हम अपना और अपने परिवार का गुजारा चेहरे पर शिकन लाए बिना कर लेंगे. सज्जनों हम किसान भी चाहते हैं सरकारी सब्सिडी का खेल बंद हो, क्योंकि यह अनुदान नहीं, हमारी राष्ट्रीय धनराशि की लूट है.
धनंजय कुमार 

किसान 

धनंजय कुमार   
                   

Tuesday, 26 March 2013


"हमारे गाँव" के तहत गाँव के किसानों-मजदूरों और विकास की दौड़ में छूट गए ग्रामीणों के बीच शिक्षा का प्रकाश फैलाने और खेती को लाभ का कार्य बनाने की लक्ष्य प्राप्ति की दिशा में किए जा रहे कार्यों की झलक. 























Tuesday, 19 February 2013

नालन्दा के बिन्द गाँव में शुरू हुआ “देवनन्दन पब्लिक स्कूल”

शिक्षा हमारी मूलभूत ज़रूरत है. हम भौतिक जीवन जीना चाहें या आध्यात्मिक जीवन शिक्षा हर राह पर हमारी चेतना को संवारती है. इसीलिए हमारे गाँवके तहत हमने सबसे पहले शिक्षा पर ही काम करना शुरू किया. इसकी संकल्पना करते वक़्त हमारे पास पहला सवाल था - कैसी शिक्षा? रोजगारोन्मुख बनाने वाली शिक्षा या समाजोन्मुखी बनाने वाली शिक्षा. आम ग्रामीण जनमानस चाहती है, वैसी शिक्षा या भविष्य को सचमुच संवारे वैसी शिक्षा..? हमारे बच्चों को अच्छी नौकरी करने लायक बनाए, वैसी शिक्षा या दुनिया में कहीं भी किसी भी विषम परिस्थिति में मानवीय बने रहने लायक बनाए, वैसी शिक्षा..? तो हमने तय किया कि शिक्षा वो जो गणित के जोड़-घटाव के साथ-साथ जीवन के जोड़-घटाव में भी हमारे बच्चों को अव्वल बनाए !
फिर हमारे सामने प्रश्न उभरा-शिक्षा का माध्यम क्या हो? यानी शिक्षा का माध्यम स्थानीय भाषा यानी हिन्दी हो या पूरी दुनिया की सम्पर्क भाषा बन चुकी अंग्रेजी भाषा...? बहुत विचार कर हमने अंग्रेजी को ही माध्यम के तौर पर चुनना श्रेयस्कर समझा. क्योंकि आम जनमानस में अंग्रेजी को लेकर बड़ा भय व्याप्त है. किसी तरह दो-चार पंक्ति टूटी-फूटी अंग्रेजी बोलने वाला व्यक्ति भी पढ़ा-लिखा होने का रौब गाँठ लेता है. हमने तय किया आम जनमानस के भय और अंग्रेजी बोलनेवाले के रौब को समाप्त करने की आवश्यकता है.
गाँव तो छोड़िए मुम्बई-दिल्ली तक में हमने देखा है कि अँग्रेजी के नाम पर टुच्चा-सा स्कूल भी किस तरह हम पर और हमारे बच्चों पर आर्थिक और मानसिक ज्यादतियाँ करता है. हमारे स्वाभिमान पर तो आठों पहर नकेल कसे रहता है. हम हमेशा अपने बच्चों के स्कूल से अपमानित किए जाने और निष्कासित कर दिए जाने से आक्रांत रहते हैं. इसी भय के तहत हम भारी से भारी डोनेशन देने से लेकर स्कूल की ऊटपटांग माँगों-फरमाईशों के सामने सजदा किए रहते हैं. ऎसा इसलिए कि हम यह आत्मसात किए बैठे हैं कि ये अंग्रेजी स्कूल ही हमारे बच्चों के भविष्य का निर्माता हैं. यह सच है कि विद्यालय हमारे बच्चों के भविष्य-निर्माण में महती भूमिका निभाते हैं...लेकिन अँग्रेजी के नाम पर चलाए जा रहे ये संस्थान विद्यालय कहलाने योग्य भी हैं...? विद्यालय का पहला कार्य है शिक्षार्थियों का चरित्र-निर्माण करना. उनमें मनुष्य होने के गुण भरना. भारी डोनेशन की नींव पर खड़े ये स्कूल क्या चरित्र-निर्माण की बात कर सकने योग्य भी हैं...?
अतः यह चिंता सर्वथा प्रासंगिक है कि शिक्षा के नाम पर अपने बच्चों को हम क्या दे रहे हैं...? जबरिया डोनेशन के बल पर ली जा रही शिक्षा क्या कल्याणकारी होगी ?
हमारे गाँव के तहत हमने वैसी शिक्षा को मूर्तता प्रदान करने का स्वप्न देखा है, जो शिक्षार्थी के साथ-साथ पूरी सृष्टि के लिए कल्याणकारी हो. 6 फरवरी 2013 को नालन्दा जिले के बड़े और सुन्दर से बिन्द गाँव में देवनन्दन पब्लिक स्कूल की शुरूआत कर हमने इस दिशा में पहला कदम बढ़ाया है. इसकी ओपनिंग पर हमने आम ग्रामीणों के साथ-साथ बिन्द प्रखण्ड विकास पदाधिकारी अशोक कुमार जी को भी आमंत्रित किया, ताकि हमारी सरकार तक भी हमारा विचार पहुंचे.
देवनन्दन पब्लिक स्कूल में इस वर्ष नर्सरी से पहले क्लास तक की पढ़ाई की व्यवस्था की गई है. आगे ज़रूरत के अनुसार क्लास बढ़ती चली जाएगी. बस ज़रूरत है आपकी शुभकामनाओं की.

‘देवनन्दन पब्लिक स्कूल’ बिन्द, नालन्दा
हमारे गाँव के तहत शुरू किए गए ‘देवनन्दन पब्लिक स्कूल’ के शुभारंभ के अवसर पर बिन्द प्रखण्ड विकास पदाधिकारी अशोक कुमार के साथ ‘हमारे गाँव’ के स्वप्न द्रष्टा व प्रयोगकर्त्ता धनंजय कुमार, शिक्षिका और विद्यार्थी. 



                        
      

Saturday, 16 February 2013


"हमारे गाँव" के तहत शुरू किए गए विभिन्न कार्यक्रमों की झलक चित्रों के माध्यम से.                      .(फोटो-मनोज कुमार)



प्रखण्ड विकास पदाधिकारी अशोक कुमार को "हमारे गाँव" के तहत शुरू की गई खेती के बारे में चर्चा करते धनंजय कुमार 


देवनन्दन पब्लिक स्कूल के शुभारंभ के अवसर पर (बाएँ से) ताजनीपुर पंचायत के मुखिया दुलारचन्द रजक,हमारे गाँव के सर्जक व प्रयोगकर्त्ता धनंजय कुमार, साबरी के निदेशक संजीव कुमार, लोदीपुर पंचायत के मुखिया धर्मेन्द्र ठाकुर और प्रगतिशील किसान लल्लू जी

देवनन्दन पब्लिक स्कूल,बिन्द,नालन्दा

उच्च विद्यालय बिन्द के प्रभारी प्राचार्य भगीरथ प्रसाद और धनंजय कुमार

राजस्व कर्मचारी सूर्यकांत चतुर्वेदी के साथ धनंजय कुमार.








बिन्द प्रखण्ड के प्रखण्ड विकास पदाधिकारी अशोक कुमार के साथ धनंजय कुमार.साथ में साबरी के निदेशक संजीव कुमार


बिन्द प्रखण्ड के प्रखण्ड विकास पदाधिकारी अशोक कुमार के साथ धनंजय कुमार.साथ में साबरी के निदेशक संजीव कुमार

बिन्द प्रखण्ड के प्रखण्ड विकास पदाधिकारी अशोक कुमार के साथ धनंजय कुमार.साथ में देवनन्दन पब्लिक स्कूल के शिक्षक  आरती, सिम्पी तथा छात्राएँ सुहाना व अंकिता.