Thursday, 30 August 2012

ऎसे मिलता है कृषि ऋण


इंडिया टुडे के नए अंक में पृष्ठ 40-41 पर "बैंक लोन मंजूर करो या मरो" शीर्षक से एक रिपोर्ट छापी गई है , जिसके रिपोर्ट-लेखक ने बयान किया है कि किस तरह बदमाशों के भय से दहशत में है बैकों के प्रबंधक. प्रभावशाली बिचौलिए लोन पास करने के लिए किस तरह धमकाते हैं और नकली दस्तावेजों के आधार पर लोन ज़बरन पास करवा लेते हैं. दूसरी तरफ उपमुख्यमंत्री सुशीलकुमार मोदी, जो कि प्रदेश के वित्त मंत्री भी हैं, का कथन है 'सरकारी दफ्तर के मुक़ाबले बैंकों में ज्यादा भ्रष्टाचार है.'
आम तौर पर नेताओं को गलतबयानी करनेवाला माना जाता है,लेकिन मेरा स्वयं का अनुभव भी मोदी जी के बयान से मिलता है. मैंने भी सोचा था किसान क्रेडिट कार्ड बनवा लिया जाय, ताकि कभी-कभार की पैसों की आवश्यक ज़रूरत को पूरा करने में मदद मिले, हालाँकि मेरे पिताजी खिलाफ थे. उनका कहना था कि कृषि कार्य अनिश्चितताओं से भरा है, लोन तो चुकाना ही होगा, फसल हो अथवा न हो, फिर मेरी इच्छा थी कि सुविधा का लाभ लेने में बुराई नहीं है. मगर मुझे फॉर्म भरते ही ज़रूरी जानकारी प्राप्त हो गई कि के सी सी बनवाने के लिए 3 से 4 हज़ार रुपए खर्च करने होंगे. मैंने कहा, मैं बैक द्वारा माँगे जानेवाले सारे दस्तावेज दूँगा, तब जवाब मिला कि लोन ब्रांच मैनेजर पास करेगा, बैंक नहीं, इसलिए रिश्वत के बिना काम मुश्किल है.यह अद्भुत जानकारी मुझे ब्लॉक में ही मुझे मिल गई थी, जब आवेदन वहाँ जमा करने गया. कृषि ऋण के लिए ब्लॉक से ही कागजात बैंक को फॉरवर्ड किए जाते हैं. मेरे पास यकीन करने  के अलावा कोई चारा नहीं था,क्योंकि गाँववालों से मुझको पहले ही मुझे यह अनुभव मिल चुका था कि बैक में सेविंग अकाउंट खोलने के लिए भी रिश्वत ली जाती है. चाहता तो मैं अधिकारी से भिड़ सकता था, लेकिन उचित नहीं समझा. एक तो  समयाभाव, दूसरे कम से कम उलझने की मेरी नीति.
इसी रिपोर्ट में बैंक के एक अधिकारी और पंजाब नेशनल बैंक ऑफिसर्स एसोसिएशन के महासचिव कुमार अरविंद का भी बयान है कि सर्कल अधिकारी किसान के एफिडेविट के आधार पर कब्ज़े का प्रमाणपत्र जारी कर देते हैं. फिर बैंक बिना सत्यापित एफिडेविट पर लोन जारी करने को मजबूर है. जबकि  हकीकत यह है कि एल पी सी यानी लैंड पजेशन सर्टिफिकेट सिर्फ किसान के एफिडेविट के आधार पर नहीं बनता. किसान द्वारा लिखे गए खेत के प्लॉट नं. को पहले कर्मचारी अपने रजिस्टर से मिलाता है, 'सही है' की टिप्पणी लिखता है, उसके बाद सी आई यानी सर्कल इंस्पेक्टर उसपर दस्तखत करता है, उसके बाद सी ओ साहब दस्तखत करते हैं और एलपीसी किसान तक पहुँचता है.
यह तो नियम की बात हुई, लेकिन वास्तव में किसान को हर ज़गह चढ़ावा चढ़ाना पड़ता है. एफिडेविट तो किसान को अतिरिक्त दंड है, इसे प्रदेश राजस्व विभाग और वकील का हिस्सा मानिए.
बहरहाल यह है कृषि ऋण की वस्तुस्थिति. अब इतने झंझट वाले काम में कोई मेरे जैसा ईमानदार किसान अपनी ऊर्जा लगाएगा यह तो सोचना भी बेमानी है. ऎसे में जो ऋण पास कराएगा उसकी मंशा कितनी सही होगी, समझा जा सकता है. इसमें सरकार की नीतियाँ भी ज़िम्मेदार है. सरकार को यह अच्छी तरह पता है कि आज ज्यादातर वैसे लोग किसानी का कार्य कर रहे हैं, जो पट्टे पर खेत लेकर खेती करते हैं, फिर वह एलपीसी कैसे बनवाएँगे..?
ऎसे में ज़रूरत है सही नीति और उसके सही-सही क्रियान्वयन की, ताकि किसानों को भी लाभ मिले, बैंकों को भी और सरकार को भी.

Photo-Manoj Kumar
धनंजय कुमार  

Wednesday, 22 August 2012

भारतीय किसानों के खिलाफ साज़िशों का दौर जारी है...


भारतीय किसानों के खिलाफ साज़िशों का दौर जारी है.
मुम्बई के नवभारत टाईम्स में आज फिर एक रिपोर्ट छापी गई है कि किस तरह खाद्य-सामग्रियों की कीमतों के बढ़ने से मध्य वर्ग के लिए घर चलाना मुश्किल हो गया है. रिपोर्ट औद्योगिक चैम्बर एसोचैम के सर्वे को आधार बनाकर लिखी गई है. सर्वे में इस शहरी मध्य वर्ग के दुख का कुछ इस तरह खुलासा किया गया है कि किसान विलेन के तौर पर उभरकर सामने आते हैं.
एसोचैम ने यह सर्वे जून-जुलाई महीने में देश के विभिन्न शहरों चेन्नै, अहमदाबाद, हैदराबाद, पुणे, चंडीगढ़, देहरादून, बेंगलुरू और दिल्ली एनसीआर के उन रहिवासियों से बातचीत करके तैयार किया है, जिनकी सेलेरी 35 से 50 हज़ार रुपए के बीच है. सर्वे में 88 प्रतिशत मिडिल क्लास परिवारों का कहना है कि खाद्य सामग्रियों की कीमतों में वृद्धि होने से उनका परिवार चलाना मुश्किल हो गया है. इसी सर्वे में यह भी ज़िक्र है कि लोन या मेडिकल किश्त और इंकमटैक्स देने के बाद उनके पास 40 हज़ार की सेलेरी में से बमुश्किल 20 हज़ार रुपए हाथ में आते हैं. इसमें बिजली का बिल, रसोई गैस का भुगतान करने के बाद बाकी पैसों से परिवार का गुजारा अब बहुत मुश्किल हो गया है.और इसका अहम कारण है खाने-पीने की चीज़ों में 100 से 300 प्रतिशत की वृद्धि हुई है.
इस मध्यवर्ग के परिवारों का घर, गाड़ी और बच्चों की पढ़ाई पर कितना खर्च होता है, सर्वे में इस बात का कहीं विश्लेषण नहीं है. खाद्य पदार्थों की कीमतें मध्यवर्ग को मुश्किल में डालने तक बढ़ गई हैं,तो इसमें इन बढ़ी कीमतों के लिए कौन ज़िम्मेदार है और बढ़ी कीमतों से कौन अपना घर भर रहा है, इस बात का भी कोई विश्लेषण नहीं है.
photo by  Sanjeev Kumar 
इस तरह के सर्वे करनेवालों को एकाध बार इस दिशा में भी सर्वे करना चाहिए कि खेती करके कितने किसान अरबपति बन गए..? क्यों देश का किसान अपने बाल-बच्चों को खेती करने के बजाय नौकरी करने की सलाह देता है..? किसानों के हल-बैल क्यों बिक गए...? इस देश में दारू बनानेवाला, गुटखा बनानेवाला, दवाई बनानेवाला, बिल्डिंगें बनानेवाला दिन दूनी रात चौगुनी रफ्तार से तरक्की कर रहा है, मगर किसान क्यों आत्महत्या कर रहा है..?

Sunday, 12 August 2012

मैं एक किसान हूँ


धनंजय कुमार 

मैं एक किसान हूँ. मेरे पिता और दादा-परदादा भी किसान थे. मगर तब यह देश किसानों का देश हुआ करता था. मुझे बड़ा गर्व होता था, जब मैं पिता और दादा-परदादा के बारे में सोचता था कि मेरे पूर्वज किसान थे. अनाज उपजाते थे, जो हर इंसान के जीवन का आधार है, हर आदमी की ज़रूरत है. किसान यानी सबको भोजन देने वाला !
मगर आज़ादी के बाद हम लगातार हाशिए पर आते चले गए. हमारा देश अब हमारा नहीं रहा, अंबानी-माल्या जैसे उद्योगपतियों का हो गया है. गाँवों और किसानों के बजाय यह देश अब शहरों और पूँजीपतियों का हो गया है !
भूमण्डलीकरण ने हमें और भी किनारे कर दिया है. आज हर वस्तु,हर व्यक्ति पैसों से आँका जाता है...और हम पैसेवाले नहीं हैं...विकास का मतलब बैंक बैलेंस, बड़ी गाड़ी, बड़ा घर, शहरों की चमक-दमक, अंग्रेजी और अंग्रेजी पहनावा-आचार-विचार-व्यवहार हो गया है...हमारा गाँव, हमारी बोली, हमारा काम, हमारा पहनावा-आचार-विचार-व्यवहार, सब पिछड़ेपन का पर्याय बन गया और हम पिछड़ गए...लगातार पिछड़ते जा रहे हैं... हमारा हिन्दुस्तान आगे बढ़ता जा रहा है, रोज़ तरक्की की अनगिनत सीढ़ियाँ चढ़ता जा रहा है, मगर हम रोज़ पिछड़ते जा रहे हैं...! इतने पिछड़ गए हैं कि मेरा बेटा भी हमें पिछड़ा मानता है! हमारे काम को हेय मानता है, क्योंकि हमारी कमाई करोड़ों में नहीं है.
बेटा इंजीनियर बन गया है, कम्प्यूटर इंजीनियर...लाख रुपए महीना कमाता है...नौकरी के एक साल बाद ही शहर में एक करोड़ का घर खरीद लिया है. मुझसे कुछ पैसे माँगे थे.- तीस साल से खेती कर रहे हैं, तीन लाख तो दीजिए.. मैं तीन हज़ार भी नहीं दे सका. बैंक बैलेंस कहाँ से होगा ! बैंक में अकाउंट भी नहीं है. बैंक को नजदीक से देखा भी नहीं है. उसने मुझे हिकारत भरा ताना दिया- क्या फायदा ऎसे काम का...? आपसे अच्छा तो हमारे ऑफिस का पियून है...!
मुझे मोतियाबिंद हो गया है. ऑपरेशन के लिए डॉक्टर ने पाँच हज़ार का खर्च बताया है. बेटे को चिट्ठी लिखी. बेटे ने पड़ोस के लड़के से मोबाइल कर कहलवाया है, ...शहर आ जाइए, पाँच नहीं, पन्द्रह हज़ार लगेगा. बढ़िया लेंस लगवा दूँगा... आप पिछड़ी हुई ही बातें करेंगे...पाँच हज़ार में देशी लेंस लगेगा, शहर आइए, पन्द्रह हज़ार का विदेशी लेंस लगवा दूँगा... मेरी आँखें अब रोज़ रोती हैं....क्या हो गया हमारे देश को..! अब देखने के लिए भी विदेशी लेंस लगवाना पड़ेगा ! क्या विदेशी लेंस से मेरा पहले वाला देश दिखेगा..? 
बेटा कहता है, खेत बेच दीजिए....यहाँ प्रॉपर्टी में सारा रुपया इंवेस्ट कर दूँगा... साल-दो साल में दोगुनी कीमत हो जाएगी.... मगर मैंने साफ मना कर दिया, मेरे मरने के बाद जो जी करे करना, मगर मेरे जीते जी मेरे बाप-दादा की ज़मीन... मेरे बाप-दादा के खून-पसीने और ज़िंदगी से सींची ये ज़मीन, ये मिट्टी, ये खेत नहीं बेचूँगा... बेटा चिढ़ गया...फिर पिछड़ा बोला...कोई बात नहीं, ज़मीन तो बच गई...!
लेकिन अब सरकार मेरे खेत को ज़बरन खरीदना चाहती है. टाटा, अंबानी या कोई विदेशी, पता नहीं कौन, यहाँ बहुत बड़ी फैक्टरी लगाना चाहते हैं. कीमत अभी के बाज़ार-भाव से काफी ज्यादा मिलेगी...मगर मुझे नहीं बेचना खेत... सरकार के लोग कहते हैं, बेचना पड़ेगा...
किसान जमा हो रहे हैं-....खेत नहीं बेचेंगे. कुछ लोग डरा रहे हैं- सरकार से नहीं लड़ सकते. उसके पास पुलिस है, सेना है, हथियार हैं, गोला-बारूद हैं...मगर हम किसानों के पास क्या है..? अपना बेटा भी चाहता है, खेत बेच दें...
कई लोग पुलिस की गोली से मारे गए...! ठीक है, मुझे भी मार दो...मरना मंजूर है, मगर खेत नहीं बेचेंगे...खेत नहीं बेचेंगे... हम किसान हैं. खेत हमारे माता-पिता हैं, पालक हैं. उसे अपने आप से अलग नहीं होने देंगे. ...मार दो गोली...मार दो गोली...मार दो गोली...
...फिर गोली चली..दस किसान मारे गए...पैंतीस की हालत गंभीर है.....
     


Friday, 3 August 2012

जड़ों की ओर

प्रस्तुत कहानी लोकप्रिय दैंनिक समाचार पत्र "जनसत्ता" के  कोलकाता संस्करण के दीपावली विशेषांक 2014 में प्रकाशित हो चुकी है.

कहानी
धनंजय कुमार
अमावस्या की रात थी. अभी थोड़ी ही देर पहले चारों ओर घुप अंधेरा था. पूरा गाँव गहरी नींद में था. कुत्ते और झींगुर भी नींद के आनंद में डूबे थे. इतना सन्नाटा था, मानो गाँव खाली हो गया हो...कि तभी तेज उजाला फैला...ऎसा उजाला, जिसमें खलिहान में रखी रबी फसल धू-धू कर जलने लगी...सन्नाटे के बीच नगाड़े की तरह चीख-पुकार गूँज उठी... ‘दौड़ो...बचाओ..आग लग गई रे ...
सोता गाँव अचानक दौड़ पड़ा. जिसके हाथ जो आया, बाल्टी, लोटा, तसला...हर कोई पानी भरकर उस तरफ भागा, जिस तरफ आग की लपटें दिख रही थीं. मगर इतने पानी से क्या होने वाला था...! घर से भरकर ले जाया गया पानी ऊँट के मुँह में जीरे की तरह हुआ.
गर्मियों की यही तो त्रासदी है, खत्ता-पोखर तो क्या कुएँ तक सूख जाते हैं. ऊपर से जबसे सरकार ने गाँवों में चापाकल लगवाना शुरू किया है, तबसे कुओं की हालत और भी बुरी हो गई है. पहले गर्मी की शुरूआत में ही कुओं की उड़ाही होती थी. कुओं में सालभर का जमा कचरा-कीचड़ गाँव के लोगों की सहभागिता से साफ किया जाता था, और कुआँ रिस-रिस कर आते पानी से फिर ज़रूरतभर भर जाता था. ऎसी क्या इससे भी भयानक अगलगी पहले भी कई बार हो चुकी है, लेकिन तब एक साथ बीसियों बाल्टियाँ पानी के लिए कुएँ में कूद पड़ती थीं. कई बार तो डीजल इंजन चलाकर भी पानी जुटाया गया. मगर आज किसी कुएँ में पानी का दरस तक नहीं था.
सब चापाकल की तरफ भागे, मगर वह भी खराब पड़ा था. लोग दूसरे चापाकल की तरफ भागे. सब बर्तन लेकर जमा हो गए. कारू फटाफट चापाकल का हैंडल चलाने लगा. रब्बू गुस्से से बोला, ‘अरे यार इस तरह पानी भरते रहे, तबतक तो सब खतम हो जाएगा. सब लोग एक ही ज़गह जमा मत रहो. कुछ लोग ठाकुरबाड़ी के पास वाले चापाकल से पानी भरकर लाओ, कुछ लोग बसस्टैंड के पास वाले चापाकल की तरफ भागो.’
आग फैलती ही जा रही थी. कुछ लोग खलिहान में रखे गेहूँ, चने, मसुरी आदि फसलों के ढेर को दूर हटाने में लगे थे. मगर आग उन सबसे कई गुना ज्यादा अपने अँकवार में भर रही थी. लोग आग पर पानी फेंक रहे थे, मगर आग का बाल भी बाँका नहीं हो पा रहा था. बटोही की माँ छाती पीट-पीट कर रो रही थी, ‘ सब बर्बाद हो गया रे....भगवान, ये तुमने क्या जुलुम कर दिया… हम गरीबों ने क्या बिगाड़ा था तुम्हारा..? हाय रे हमारी दिल्ली की कमाई भी लुट गई..! मेरा लाल दिल्ली में मर-मर कर चार पैसा कमाता है, बीस हज़ार रुपया भेजा था, कमसे कम तीन बीघा खेत पट्टे पर ले लेना....खाने भर तो उपज जाएगा...उपजा तो बड़का दिन रात एक करके गेहूँ उपजा लिया, मगर सब खाक हो गया रे बेटा...! कितनी बार मना किया कि मत कर खेती....खेती में फायदा नहीं है, फायदा ही होता तो सब बड़े किसान खेती छोड़ते....!’
बटोही की माँ सोलह आने सच बोल रही थी. इस गाँव में 10 बीघा से लेकर 150-200 बीघा जोत वाले किसान हैं, मगर अब कोई खेती नहीं करते. ज़मींदारी खत्म होने और हरित क्रांति के बाद यहाँ के किसानों में भी खेती को लेकर ज़बरदस्त उत्साह था. वर्षा ऋतु के आगमन के साथ ही किशोरी मिस्त्री, सूरज मिस्त्री और भोनू मिस्त्री अपने-अपने घर के बाहर हल बनाने में जुट जाते थे. चारों तरफ घेर कर बैठे लोग खेती की चर्चा करते नहीं थकते थे.
गाँव के चारों ओर दूर तक फैले खेत विभिन्न फसलों से जब श्रृंगार करते थे, तब गाँव एक खूबसूरत टापू में बदल जाता था. ऎसा लगता था मानों प्रकृति ने यहीं अपना बसेरा बसा लिया हो.
फसल कट जाने के बाद झुंड के झुंड गाएँ खेतों में चरने उतरती थी, तो लगता था, अपने बाल सखाओं के साथ स्वयं कृष्ण अवतरित हो गए हों.
प्रकृति की मार किसानों पर पहले भी पड़ती थी- कभी बाढ़, तो कभी सूखा, तो कभी अगलगी...लेकिन किसान फिर भी धरती माता की गोद से अपने भरण-पोषण भर अनाज उठा लेते थे. लेकिन पहले सरकार की बेरुखी, उसके बाद मजदूरों का पंजाब की तरफ पलायन, फिर ग्लोबलाइजेशन के आते ही शहरों के प्रति लोगों के आकर्षण ने किसानों के सामने समस्या ही समस्या खड़ी कर दी. अनिश्चित खेती से त्रस्त किसानों ने अपने बाल-बच्चों को किसानी के बजाय डॉक्टरी, इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने और सरकारी नौकरियों के लिए प्रोत्साहित किया. जो किसान बराहिल, पटवारी और नौकर रखते थे, उनके बेटे ही नौकरी के लिए शहरों की ओर भागने लगे. जिनके खेतों में काम करके गाँव के सारे मजदूर अपना भरण-पोषण करने के साथ-साथ ब्याह-शादी से लेकर मरनी हरनी के काज भी इच्छानुसार कर लेते थे,.वे मालिक ही गाँव छोड़कर भागने लगे तो फिर बेचारे मजदूरों की क्या बिसात कि गाँव में रहकर अपना जीवन सुकून से जी लेते. पहली बार जब बंगाली बाबू के बेटे राजीव को डॉक्टरी की नौकरी मिली थी, तब पूरे गाँव के लिए वह उदाहरण बन गए थे. फिर तो डॉक्टर,इंजीनियर से लेकर बैंक के क्लर्क तक की झड़ी लग गई. मजूरटोली के कई लड़कों ने भी सिपाही से लेकर दारोगा तक की नौकरी पर कब्ज़ा जमाया. और देखते ही देखते गाँव युवाओं से खाली हो गया. आज गाँव में सिर्फ वही लोग रह गए है, इन्हें छूट गए कहना ज्यादा सही होगा, जो या तो बूढ़े हैं या अनपढ़. आज गाँव के हर घर का कोई न कोई सदस्य ज़िला मुख्यालय से लेकर राजधानी दिल्ली में नौकरी कर रहा है या नौकरी की तलाश कर रहा है. इस कारण अब ज्यादातर खेत परती ही रहते हैं, या फिर एक ही फसल दलहन लगाई जाती है. दलहन लगाने में ज्यादा झंझट नहीं है. खेत को जोतकर बीज छींट दिए...बस. न निकौनी की ज़रूरत न खाद-पानी की. फसल पकने के बाद कटनी के वक़्त मजदूरों की समस्या भी नहीं आती है. मजदूर बिन बुलाए भी चले आते हैं. जबकि यही मजदूर गेहूँ या धान काटने के लिए बुलाने पर भी आना-कानी करते हैं. इसलिए बुजुर्ग हो चुके ज्यादातर किसान दलहन ही लगाते हैं. धान-गेहूँ उन्हीं के बूते की बात है, जो खुद परिवार सहित  खेती में लग सकते हैं. इनमें लगभग सभी भूमिहीन लोग ही हैं,जो पहले खेतिहर मजदूर थे, या जिनमें बाप-दादाओं के ज़माने से खेती-किसानी को लेकर ललक थी. ये लोग खेती छोड़ चुके या छोड़ रहे किसानों से दो या तीन बीघा खेत नगद रकम चुका कर पट्टे पर सालभर के लिए ले लेते हैं और फिर धान-गेहूँ की पारम्परिक खेती करते हैं. ये बिना लाभ-हानि जोड़े फसल उपजाते हैं और अच्छी उपज पर खुशी से भर जाते हैं. जिन खलिहानों में आग लगी है, वे सब ज्यादातर ऎसे ही गरीब किसानों के खलिहान हैं.
आग की लपटें अब भी उठ रही थीं. लोटा, तसला और बाल्टी भर-भरकर पानी लानेवाले अब निराश हताश हो चुके थे. सारी फसल आग की लपेट में आ चुकी थी. आग की लपटें कम होती जा रही थीं. चीख-पुकार, शोर-शराबा भी थम चुका था. अजीब-सा सन्नाटा पसरा था. किसानों के खून-पसीने की गंध हवा में घुलकर देवताओं को दी जानेवाली आहुति के धुएँ की तरह वातावरण को सुवासित कर रही थी. 
पिछले पाँच महीने की मेहनत और सपने कुछ घड़ी में जलकर खाक हो गए थे.  
मदनपुर गाँव में लगी इस भयानक आग की खबर यूँ तो दूसरे दिन प्रदेश के हर अखबार में पहले पेज पर छपी थी. भले वह सिंगल कॉलम में थी, लेकिन दिन–रात चलने वाले राष्ट्रीय टीवी चैनलों पर इसकी कोई खबर नहीं थी. वहाँ राहुल गाँधी के सरकार में कोई महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी लेने की संभावना पर कयास और बहस के दौर चल रहे थे. मदनपुर गाँव के पंचायत भवन में लगे रंगीन टीवी पर अपने गाँव की खबर देखने के लिए आज भीड़ लगी थी. मगर अपनी कोई खबर न पा निराशा हुई. राहुल गाँधी की खबरों-बहसों से बदबू आने लगी, सो टीवी बंद कर दिया गया.
गर्मी के महीनों में खलिहानों में आग लगना आम बात है. यही वजह थी कि सरकार से लेकर ब्लॉक के अफसर तक इस घटना को दुभाग्यपूर्ण बता अपनी दिनचर्या में फिर से रम गए थे. लेकिन बिहार टाइम्स का रिपोर्टर अविनाश अभी भी बेचैनी महसूस कर रहा था. सरकार और उनके थोथे बयानों से उसे घिन आ रही थी. आखरी आदमी की आँखों के आँसू पोछने के संकल्प के साथ शासन कर रही सरकार, उनके मंत्री और अधिकारी इतने असंवेदनशील कैसे हैं..!
’तो क्या चाहते हैं, हम भी जल मरें...! बीडीओ ने बड़ी हिकारत से जवाब दिया.
’किसानों के खलिहान हर साल यूँ ही प्रदेश में कहीं न कहीं खाक होते हैं...आपलोग खानापूर्ति कर चुप हो जाते हैं. कोई ठोस इंतज़ाम क्यों नहीं करते ?’ अविनाश ने शांति से पूछा.
‘प्रभावित किसानों के लिए मुआवजे की घोषणा भी कर दी गई है.’
‘मुआवजा समाधान नहीं है बीडीओ साहब. आग न लगे और लगे तो जल्दी उस पर काबू पा लिया जा सके, आप इसके लिए कोई ठोस इंतज़ाम कीजिए.’
‘आप क्या चाह्ते हैं, हर गाँव में फायर ब्रिगेड का ब्रांच खोल दिया जाय..? तो बात कीजिए मंत्री जी से. हम तो उनके आदेशपाल भर हैं. जैसा वो कहेंगे हम करेंगे. शायद मंत्री जी आपकी बात सुनें. अब हमको हमारा काम करने देंगे..? सोमवार को मंत्री जी अपने हाथों किसानों को मुआवजा राशि बाँटने आ रहे हैं.’
प्रभावित किसानों के बीच मुआवजा राशि बाँटे जाने के दिन ब्लॉक के पास लगे मंच पर खूब हंगामा हुआ. सूची में उन्हीं किसानों के नाम थे, जिनके अपने खेत थे और जिनके पास एलपीसी यानी लैंड पजेशन सर्टिफिकेट अथवा खेत की रसीद थी. मुआवजा पानेवालों की सूची में अपने आप को न पाकर कई किसान उग्र हो गए. मंत्री जी की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी लेनेवाली पुलिस को मंत्रीजी को सुरक्षित बाहर ले जाने के लिए लाठीचार्ज करना पड़ा. मगर किसानों की सुरक्षा की जिम्मेदारी लेने वाला चूँकि खुद ही जान बचाकर भागने में परेशान था, इसलिए पचास से अधिक किसान घायल हुए. रामदीन और गिरधारी की हालत गंभीर है. सर में चोट आई है. पटना के सरकारी अस्पताल में उन्हें भर्ती किया गया है.
मंत्री जी ने इस हंगामे के लिए उन किसानों को ही दोषी ठहराया कि हंगामा करनेवाले लोग किसान नहीं, बल्कि विरोधी दल के कार्यकर्ता और भाड़े के लोग थे. राष्ट्रीय न्यूज चैनलों पर हंगामा, लाठीचार्ज और मंत्री जी का बयान ब्रेकिंग न्यूज के तौर पर चलाया गया. शाम होते-होते बहस के लिए विभिन्न दलों के प्रवक्ताओं के साथ पैनलिस्ट भी जमा हो गए.खूब गर्मागर्म बहसे हुईं, मगर पंचायत भवन में रंगीन टीवी देख रहे भुक्तभोगी ग्रामीणों को कुल मिलाकर इतना ही समझ में आया कि सब तमाशा है और वे सब जमूरे.
इस तरह की टीवी रिपोर्टिंग से बिहार टाईम्स के संवाददाता अविनाश कुमार को बहुत गुस्सा आ रहा था. ‘अपना भारत’ के बिहार ब्यूरो चीफ प्रकाश कुमार उसका खास मित्र है. अविनाश का मन किया ऎसी घटिया और झूठी रिपोर्टिंग के लिए प्रकाश को खूब गालियाँ दे. मगर मन मसोसकर रह गया. अविनाश कुमार को इस लिए भी ज्यादा गुस्सा आ रहा था कि वह खुद भी एक किसान परिवार से था. वह किसानों की स्थिति-परिस्थिति से अच्छी तरह वाकिफ था. उसके पिताजी बीस बीघा जोत वाले साधारण, लेकिन मेहनती किसान थे.
कई साल पहले, जब अविनाश छोटा सा था-तीन या चार साल का, गाँव में भयंकर बाढ़ आई थी. गाँव के चारों ओर लगी धान की फसल डूब गई थी. उफनती नदी का तटबंध न टूटे इसके लिए गाँव के किसानों और मजदूरों ने दो दिन लगातार गुमाम किया था. जहाँ भी तटबंध कमजोर दिख रहा था, पानी रिस रहा था, वहाँ मिट्टी डालकर तटबंध को मजबूत बनाया जा रहा था. पिछले दस दिनों से बरसात लगातार हो रही थी. सब भगवान से प्रार्थना कर रहे थे कि अब बस करो भगवान! इतना पानी बहुत है. लेकिन शायद भगवान किसानों से नाराज़ थे. बरसात बंद हो इसके लिए बच्चों ने नंगी देह पर कालिख पोत पूरे गाँव की गलियों में घूम-घूम कर टीन बजाने का टोटका भी किया, मगर भगवान की नाराज़गी कम नहीं हुई. नदी में पानी बढ़ता ही जा रहा था. तीन दिन दो रात किसान की भगवान से लड़ाई चलती रही. आखिरकार भगवान की ही जीत हुई. भगवान गणेश की सवारी चूहे का इसमें अद्भुत योगदान रहा. चूहों ने तटबंध में सैकड़ों- हज़ारों बिल बना रखे थे. और यही बिल अंतत: तटबंध टूटने का कारण बना. किसान-मजदूर दूर खड़ा हो अपनी बर्बादी का तमाशा देखते रहे. देखते ही देखते पूरी नदी फसल लगे खेतों की ओर मुड़ गई.
हफ्ते बाद नदी का गुस्सा जब थमा, तब जाकर खेतों से पानी हटा. लेकिन तबतक सबकुछ बर्बाद हो चुका था. नदी के अगल-बगल के खंधों में धान की जगह बालू के ऊँचे-ऊंचे टीले दिखाई दे रहे थे. किसानों ने अपना सर पीट लिया.
अविनाश के पिता ने मगर हार नहीं मानी. जब बरसात बीत गई, वह अपने बैलों और हलवाहों के साथ बालू के टीलों के खिलाफ भिड़ गए. उनके साथी किसानों ने ऎसा करने से मना किया, कि इन खेतों से बालू हटाकर उपजाऊ बनाना नामुमकिन है. मगर उनके सामने कोई और रास्ता नहीं था. बाकी किसानों के कुछ खेत तो बचे थे, लेकिन उनके सारे खेत बर्बाद हो गए थे.खेत को यूँ ही छोड़ने का मतलब था परिवार को भूखों मारना. घर में जमा अनाज से एक साल परिवार को खिलाया जा सकता था, उसके बाद....? अविनाश के पिता के चारों ओर अंधेरा छा गया. उन्होंने तय किया उन्हें हर हाल में अंधेरे से लड़ना है. मगर साथ में यह भी तय कर लिया कि अविनाश को खेती नहीं करने देना है.
खुद खेतों में कभी बाढ़ कभी सूखा कभी अगलगी से जूझते रहे, मगर अविनाश को पटना में रहकर पढ़ाई करने में कभी किसी तरह की कमी नहीं आने दी. उनके साथी किसान अपने बच्चों को डॉक्टर, इंजीनियर या आईएएस, आईपीएस बनाना चाहते थे,मगर वह अविनाश को सिर्फ पढ़ने के लिए मोटीवेट करते रहे. क्या बनना है, इसका निर्णय अविनाश को ही लेने की आजादी दी. अविनाश ने पत्रकार बनना पसंद किया. पत्रकार की स्वतंत्रता से वह बड़ा फेसिनेटेड था. एक कमजोर से कमजोर आदमी के भी दुख, शोषण और चाहत को वह देश दुनिया के सामने अभिव्यक्त कर सकता था.
हालाँकि यह देखने के लिए उसके पिता ज़िंदा नहीं रहे. एक मनहूस सुबह अविनाश को फोन पर खबर मिली कि उसके पिता का निधन हो गया है. अचानक उसके सामने घनघोर अंधेरा छा गया था. चेतना लौटी तो उसे समझ में आया कि उसके पिता किस तरह खुद को जला उसके जीवन में उजाला भर रहे थे.
नौकरी की तलाश में जब वह निकला तो तुरंत ही उसे प्रदेश के सबसे बड़े अखबार बिहार टाईम्स में जगह मिल गई. उसमें वह पहले भी कई आलेख लिख चुका था. संपादक उसकी लेखन शैली और भाषा के प्रशंसक थे. मामूली से मामूली खबर को भी अविनाश ऎसा मानवीय दृष्टिकोण देता था कि साथी पत्रकार भी कायल हो जाया करते.
अविनाश मदनपुर की इस अगलगी और उस पर रिपोर्टिंग से बहुत अपसेट था. उसने तय किया कि अब वह सारा सच लिखेगा. सरकारों की नाकामियाँ, नेताओं की राजनीति, अफसरों की मंत्रियों के प्रति स्वामीभक्ति, किसानों का दुख और पत्रकारों की कुंद और चाटूकार पत्रकारिता सब पर वह बेबाकी से लिखेगा.
फर्स्ट पेज इंचार्ज अखिलेश को उसने पहले ही बता दिया था कि बॉटम के लिए एक सीरिज स्टोरी दे रहा है, कमसेकम पाँच किश्त में जाएगी. अखिलेश खुश हुआ कि पाँच दिन के लिए बॉटम स्टोरी का टेंशन खत्म हुआ.
अविनाश की आँख आज सुबह थोड़ी देर से खुली. स्टोरी लिखने के बाद उसे सुकून मिला था. बेडरूम में सूरज की रोशनी चमक रही थी. वह बेडरूम से बाहर आया और वॉश बेसिन के पास आ कुल्ला किया चेहरा धोया, फिर माँ को आवाज दी, ‘ माँ चाय बनाना.’ माँ किचन में खाना बनाने में जुटी थी.
अविनाश बालकनी में आ गया.अखबार आया हुआ था. अखबारवाला रोज सड़क से ही बालकनी में अखबार फेंक जाता है. वहीं कुर्सी पर बैठ कर वह अखबार देखने लगा. मुख्यमंत्री की सेवायात्रा और वहाँ की गई घोषणाएँ अखबार की लीड स्टोरी थी. पिछले तीन दिनों से रोज इसी तरह की न्यूज लीड बनाई जा रही थी. दो पत्रकार संजीव और आकाश मुख्यमंत्री की यात्रा और उनकी घोषणाओं को कवर करने के लिए अखबार द्वारा डिप्यूट किए गए थे. अविनाश को लीड स्टोरी बिल्कुल पसंद नहीं आई. उसे लगा यह लीड नहीं बल्कि लीद है. उसने संपादक से एक बार कहा भी था कि इस तरह की न्यूज अखबार की विश्वसनीयता को कम करते हैं. जिस तरह से मुख्यमंत्री और उनकी घोषणाओं को लीड बनाकर छापा जा रहा है, उससे लगता है कि यह अखबार नहीं, मुखपत्र है. मगर संपादक ने अविनाश से यह कहकर पीछा छुड़ा लिया था कि समय के साथ चलने में ही होशियारी होती है अविनाश...! जब तुम संपादक बनोगे, तब समझ में आ जाएगा.’ लीड न्यूज की हेडलाइन पढ़ने के बाद बिना पूरी खबर पढ़े वह बॉटम न्यूज की तरफ बढ़ गया. उसे झटका-सा लगा. बॉटम में उसकी स्टोरी की जगह कृषि मंत्री की किसी बिजनेसमैन के साथ खींसे निपोड़े तस्वीर के साथ ऑर्गेनिक सब्जी मुम्बई भेजे जाने के करार की खबर छपी थी. उसने अखबार पलटकर देखा, बैक पेज पर बिपाशा बसु की लगभग अधनंगी बड़ी-सी तस्वीर के साथ उसका इंटरव्यू छपा था. उसे बड़ा गुस्सा आया. उसने तुरंत अखिलेश को फोन लगाया, पता चला वह अभी तक सो रहा है. घड़ी देखी साढ़े सात बजे थे. फर्स्ट पेज इंचार्ज होने की वजह से वह देर रात घर लौटता है, इसलिए रोज ही वह सुबह देर से जागता है. पत्नी ने फोन उठाया था, उसी ने अविनाश को यह जानकारी दी. ‘ कुछ ज़रूरी बात है, तो उन्हें उठाऊँ क्या? पत्नी ने पूछा. अविनाश ने हाँ कहना चाहा, मगर कुछ सोचकर ना कह दी. उसे बड़ा गुस्सा आ रहा था. वह समझ नहीं पा रहा था, आखिर उसकी स्टोरी क्यों नहीं छापी गई. इसी बीच मोबाइल रिंग हुआ. अखिलेश का कॉल था. उसने अविनाश के सामने लगभग सफाई दी, ‘ सॉरी यार, मैं तुम्हारी स्टोरी अपने पेज पर नहीं लगा सका.’ संपादक जी ने कहा कि इसे रीजनल पेज पर दे दो. इसलिए मैंने तुम्हारी स्टोरी अनिल को दे दी है. आज स्टोरी लगाएगा वो. सॉरी यार, मुझे दोषी मत मानना.’ अविनाश प्रत्युत्तर में कुछ नहीं बोला. चुपचाप कॉल कट कर दिया. अविनाश के भीतर ठीक वैसी ही आग लगी थी, जैसी मदनपुर के खलिहान में लगी थी. खलिहान में आग कैसे लगी थी, यह किसानों को पता नहीं था, मगर अविनाश के मन-मस्तिष्क में आग लगानेवाला उसी के अखबार का संपादक था. उसी संपादक ने उसकी लेखनी से प्रभावित होकर दो साल पहले उसे नौकरी पर रखा था. तब वह कितना सज्जन और सहृदय लगा था, मगर आज संपादक पर बहुत गुस्सा आ रहा था उसे. उसने तय किया ऑफिस जाते ही संपादक से जवाब माँगेगा.
शाम पाँच बजे अक्सर वह अपने दफ्तर पहुँचता था, लेकिन आज वह तीन बजे ही दफ्तर आ गया था. संपादक अपनी केबिन में खिलखिला-खिलाकर फोन पर किसी से बात कर रहे थे. अविनाश बिना अनुमति आज केबिन में घुस आया था. संपादक को भी उसका आना सहज नहीं लगा. उसने ‘अच्छा थोड़ी देर बात फोन करता हूँ’ सामनेवाले को ऎसा कह अविनाश की तरफ मुखातिब हुआ, ‘क्या बात है अविनाश..?’
‘सर, मेरी स्टोरी आपने फर्स्ट पेज से क्यों हटवा दी..?’
‘क्योंकि वह फर्स्ट पेज की स्टोरी नहीं थी. तुम्हारी लिखी स्टोरी थी, इसलिए मैंने रीजनल पेज के लिए फॉरवर्ड कर दी, वरना वो छपती भी नहीं.’
’क्यों सर..?’
‘अविनाश तुम दो साल से इस अखबार में काम कर रहे हो, अभी तक तुम्हारे अंदर न्यूज सेंस डेवलप नहीं हुआ है. गाँव और किसान-मजदूर की स्टोरी कौन पढ़ता है? वे खुद अखबार नहीं पढ़ते.’
‘तो क्या बिपाशा बसु आपका अखबार पढ़ती है..? उसे क्यों पूरे पेज में छापा है?’
‘क्योंकि पाठक उसे पढ़ना चाहते हैं. हमारे अखबार के असली खरीदार शहरी पाठक हैं. गाँव के लोग हमारे खरीदार नहीं हैं. अखबार निकालते वक़्त हमेशा इस बात को ध्यान में रखना होता है.’
‘सर, अखबार निकालने और बनियागिरी में कुछ तो फर्क होता होगा...!
संपादक चिढ़ गया, ‘ तो तुम अखबार और बनियागिरी में फर्क मुझे बतलाओगे? तुम क्या समझते हो, बड़ी-बड़ी आदर्श की बातें करने से अखबार चलता है? जिन गरीब लोगों पर तुम स्टोरियाँ लिखते हो, उनके पैसे से यह अखबार का कागज़ भी नहीं खरीदा जा सकता है...! तुम्हें हर महीने बीस हज़ार की जो सेलरी मिलती है, वो कहाँ से आती है, पता है तुम्हें..?’
अविनाश को लकवा–सा मार गया. उसने सचमुच ऎसा कभी सोचा नहीं था. उसे अपने आप से भी दोगलेपन की बदबू आने लगी. वह चुपचाप संपादक के कमरे से बाहर निकल आया.
वह अपने फ्लैट पर लौट आया. इतनी जल्दी आया देख माँ आश्चर्य से बोल पड़ी, ‘ अविनाश आज बहुत जल्दी दफ्तर से आ गए... तबियत तो ठीक है न...?’
‘माँ सामान बाँधो, हम अपने गाँव चलेंगे...’ अविनाश अपने कपड़े समेटने लगा.
माँ को कुछ समझ में नहीं आया...वह चुप रही. फिर अविनाश ही बोला, ‘ माँ, हम खेती करेंगे. अपनी मेहनत और पसीने की कमाई तुम्हें खिलाना चाहते हैं माँ...हाँ माँ, हम खेती करेंगे...’ वह माँ से लिपट गया. उसकी आँखों में आँसू थे.