धनंजय कुमार
मैं एक किसान हूँ. मेरे पिता और दादा-परदादा भी किसान थे. मगर तब यह देश
किसानों का देश हुआ करता था. मुझे बड़ा गर्व होता था, जब मैं पिता और दादा-परदादा
के बारे में सोचता था कि मेरे पूर्वज किसान थे. अनाज उपजाते थे, जो हर इंसान के
जीवन का आधार है, हर आदमी की ज़रूरत है. किसान यानी सबको भोजन देने वाला !
मगर आज़ादी के बाद हम लगातार हाशिए पर आते चले गए. हमारा देश अब हमारा नहीं
रहा, अंबानी-माल्या जैसे उद्योगपतियों का हो गया है. गाँवों और किसानों के बजाय यह
देश अब शहरों और पूँजीपतियों का हो गया है !
भूमण्डलीकरण ने हमें और भी किनारे कर दिया है. आज हर वस्तु,हर व्यक्ति पैसों
से आँका जाता है...और हम पैसेवाले नहीं हैं...विकास का मतलब बैंक बैलेंस, बड़ी
गाड़ी, बड़ा घर, शहरों की चमक-दमक, अंग्रेजी और अंग्रेजी पहनावा-आचार-विचार-व्यवहार
हो गया है...हमारा गाँव, हमारी बोली, हमारा काम, हमारा पहनावा-आचार-विचार-व्यवहार,
सब पिछड़ेपन का पर्याय बन गया और हम पिछड़ गए...लगातार पिछड़ते जा रहे हैं... हमारा
हिन्दुस्तान आगे बढ़ता जा रहा है, रोज़ तरक्की की अनगिनत सीढ़ियाँ चढ़ता जा रहा है,
मगर हम रोज़ पिछड़ते जा रहे हैं...! इतने पिछड़ गए हैं कि मेरा बेटा भी हमें पिछड़ा
मानता है! हमारे काम को हेय मानता है, क्योंकि हमारी कमाई करोड़ों में नहीं है.
बेटा इंजीनियर बन गया है, कम्प्यूटर इंजीनियर...लाख रुपए महीना कमाता
है...नौकरी के एक साल बाद ही शहर में एक करोड़ का घर खरीद लिया है. मुझसे कुछ पैसे
माँगे थे.-“ तीस साल से खेती कर रहे
हैं, तीन लाख तो दीजिए..” मैं तीन हज़ार भी नहीं दे सका. बैंक बैलेंस कहाँ से होगा ! बैंक में अकाउंट भी
नहीं है. बैंक को नजदीक से देखा भी नहीं है. उसने मुझे हिकारत भरा ताना दिया-“ क्या फायदा ऎसे काम का...?
आपसे अच्छा तो हमारे ऑफिस का पियून है...!
मुझे मोतियाबिंद हो गया है. ऑपरेशन के लिए डॉक्टर ने पाँच हज़ार का खर्च बताया
है. बेटे को चिट्ठी लिखी. बेटे ने पड़ोस के लड़के से मोबाइल कर कहलवाया है, “ ...शहर आ जाइए, पाँच नहीं,
पन्द्रह हज़ार लगेगा. बढ़िया लेंस लगवा दूँगा... आप पिछड़ी हुई ही बातें
करेंगे...पाँच हज़ार में देशी लेंस लगेगा, शहर आइए, पन्द्रह हज़ार का विदेशी लेंस
लगवा दूँगा...” मेरी आँखें अब रोज़ रोती
हैं....क्या हो गया हमारे देश को..! अब देखने के लिए भी विदेशी लेंस लगवाना पड़ेगा
! क्या विदेशी लेंस से मेरा पहले वाला देश दिखेगा..?
बेटा कहता है, “ खेत बेच दीजिए....यहाँ प्रॉपर्टी में सारा रुपया इंवेस्ट कर दूँगा... साल-दो
साल में दोगुनी कीमत हो जाएगी....” मगर मैंने साफ मना कर दिया, “ मेरे मरने के बाद जो जी करे करना, मगर मेरे जीते जी मेरे बाप-दादा की ज़मीन...
मेरे बाप-दादा के खून-पसीने और ज़िंदगी से सींची ये ज़मीन, ये मिट्टी, ये खेत नहीं
बेचूँगा...” बेटा चिढ़ गया...फिर पिछड़ा
बोला...कोई बात नहीं, ज़मीन तो बच गई...!
लेकिन अब सरकार मेरे खेत को ज़बरन खरीदना चाहती है. टाटा, अंबानी या कोई
विदेशी, पता नहीं कौन, यहाँ बहुत बड़ी फैक्टरी लगाना चाहते हैं. कीमत अभी के
बाज़ार-भाव से काफी ज्यादा मिलेगी...मगर मुझे नहीं बेचना खेत... सरकार के लोग कहते
हैं, “ बेचना पड़ेगा...”
किसान जमा हो रहे हैं-“....खेत नहीं बेचेंगे.” कुछ लोग डरा रहे हैं-“ सरकार से नहीं लड़ सकते. उसके पास पुलिस है, सेना है, हथियार हैं, गोला-बारूद
हैं...मगर हम किसानों के पास क्या है..? अपना बेटा भी चाहता है, खेत बेच दें...”
कई लोग पुलिस की गोली से मारे गए...! ठीक है, मुझे भी मार दो...मरना मंजूर है,
मगर खेत नहीं बेचेंगे...खेत नहीं बेचेंगे... हम किसान हैं. खेत हमारे माता-पिता
हैं, पालक हैं. उसे अपने आप से अलग नहीं होने देंगे. ...मार दो गोली...मार दो
गोली...मार दो गोली...
...फिर गोली चली..दस किसान मारे गए...पैंतीस की हालत गंभीर है.....
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