Tuesday, 22 November 2016

नोटबंदी के पीछे का सच !


जाहिरा तौर पर सरकार जरूर यह बता रही है कि नोटबंदी देश के काले धन को समाप्त करने के लिए उठाया गया कदम है, लेकिन वास्तविकता यह है कि सरकार एक तीर से तीन शिकार कर रही है. पहला, काले धन का मुद्दा तात्कालिक तौर पर सुलझता नजर आ रहा है, दूसरी तरफ विरोधी पार्टियों और नेताओं को गहरा आर्थिक झटका लगा है और तीसरे, देश के एक एक आदमी के घरों और तिजोरियों में रखा सफेद धन बैंकों में जमा हो रहा है. इस वजह से बैंकों की आर्थिक स्थिति सुधरेगी और बैंक कॉर्पोरेट कम्पनियों के नये प्रस्तावों पर लोन पास करने में सक्षम होंगे. सरकार का असली लक्ष्य यही है. जैसा कि जाने अनजाने वित्तमंत्री ने अपनी पार्टी के नेताओं को संबोधित करते हुए कहा भी है. 
भारत में आर्थिक उदारीकरण को पंख लगाने का काम मनमोहन सिंह ने किया. भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर से लेकर प्रधानमंत्री तक उन्होंने कॉर्पोरेट कम्पनियों को सबसे लायक बेटे के तौर पर आगे बढ़ाया. उन्हें बैंक आसानी से लोन दे सके, इसके लिए बैंकों की लोन पॉलिसी को सरल बनाया ताकि कॉर्पोरेट कम्पनियों अपने कारोबार का अधिक से अधिक विस्तार करे और देश में व्यापार और रोजगार को गति मिले. देश की अर्थव्यवस्था को गति मिले. आर्थिक सुधारों के दम पर ही मनमोहन सिंह राजनीतिक व्यक्ति नहीं होते हुए भी दस वर्षों तक भारत के प्रधानमंत्री बने रहे. इसमें कोई दो राय नहीं कि देश की अर्थव्यवस्था में अप्रत्याशित उछाल आया, लेकिन दूसरी तरफ यह भी हुआ कि देश के बैंकों का एनपीए लगातार बढ़ता गया और हालात यहाँ तक आ पहुँचे कि देश के सारे बैंक घाटे में चलने लगे.
आम आदमी के लिए आज भी बैंकों से लोन लेना बेहद मुश्किल भरा टास्क है. आप घर, गाड़ी या किसी बिजनेस के लिए लोन लेना चाहते हैं, तो आपको भारी पेपरवर्क करना होता है. और अगर लोन चुकाने में आप डिफॉल्टर साबित होते हैं तो बैंक आपके घर गाड़ी पर कब्जा लेने से भी बाज नहीं आती. लेकिन कॉर्पोरेट कम्पनियों के साथ ऎसा व्यवहार नहीं किया जाता, क्योंकि मौजूदा आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि देश के औद्योगिक विकास के लिए कॉर्पोरेट कम्पनियों को विशेष सुविधाएँ देना जरूरी है, ताकि उनको अपना कारोबार पसारने में किसी तरह की दिक्कत न हो.
इसके लिए भारत सरकार ने 2013 में नया कंपनी कानून बनाया. इस कानून के मुताबिक नई कंपनी शुरू करने के लिए लोन मिलने में एक या दो दिन से अधिक समय नहीं लगना चाहिए। पहले यह समय सीमा नौ-दस दिनों की हुआ करती थी. बैंकों पर लोन देने के लिए सरकारी दबाव भी बढ़ने लगा. दबाव का अंदाजा इसी बात से लगा सकते हैं कि पिछले वित्तवर्ष में सड़सठ कंपनियों के ऊपर बैंकों का कुल 5.65 लाख करोड़ रुपए कर्ज था.
कॉरपोरेट्स से उम्मीद की जाती है कि वे आर्थिक सुधार की बुनियाद तैयार करेंगे, लेकिन विडम्बना यह रही कि देश की अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए मेहमान की तरह पाली पोसी गयी कई कॉर्पोरेट कम्पनियाँ स्वयं बैंक कर्ज में गहरे डूब गई हैं और कुछ डूबने के कगार पर हैं. सिर्फ 30 बड़ी कम्पनियों के पास बैंकों के सवा लाख करोड़ रुपए एनपीए के तौर पर हैं. ज्यादातर कॉर्पोरेट कम्पनियों ने बाजार पर अधिक से अधिक कब्जा जमाने के लिए अपनी क्षमता से कहीं ज्यादा विस्तार कर लिया है. ऎसे में यदि बैंकों से उसे समय पर लोन नहीं मिलते हैं तो उनके प्रोजेक्ट अधूरे रह जायेंगे और विकास की गति तथा रोजगार बढ़ने की संभावनाओं पर न सिर्फ विराम लग जायेगा, बल्कि मिले रोजगार पर भी आफत आ जायेगी.  ऎसे में सरकार भी चाहती है कि बैंक इन कम्पनियों को और लोन दे, जबकि बैंक और लोन देने की स्थिति में नहीं हैं.
अर्थशास्त्रियों का आकलन है कि अगर मौजूदा माहौल में सुधार नहीं होता है तो उद्योग जगत के लिए पूंजी जुटाना मुश्किल हो जाएगा. ऐसी स्थिति में देश की अर्थव्यवस्था को ठीक ठाक रखना सरकार के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण हो जायेगा. यही वजह है कि सरकार राजकोषीय घाटे को पाटने के लिए सारे क्षेत्रों में सबसिडी को कम कर रही है. और साथ ही काले धन की बरामदगी को लेकर एक बड़ा रिस्क लेने को मजबूर हुई.
नोटबंदी की वजह से देश में कितनी अफरा तफरी मची है इसका आकलन सरकार के पास भी है. उसे मालूम कि इसकी वजह से आम आदमी को जो परेशानी उठानी पड़ी है, उसका खामियाजा अगले चुनावों में उसकी पार्टी को उठाना पड़ सकता है. दूसरे, नोटबंदी से बाजार पर जो असर पड़ रहा है या पड़ेगा इसका आकलन भी सरकार के पास जरूर होगा, लेकिन मुश्किल यह है कि मौजूदा सरकार के सामने पूँजी जमा करने का और कोई विकल्प नहीं था. पिछली सरकारें भारतीय अर्थशास्त्र को इस तरह निबटा चुकी है कि मौजूदा सरकार के सामने कॉर्पोरेट कम्पनियों की अगवानी करने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं है.
धनंजय कुमार 

Friday, 9 September 2016

शिक्षा, न्याय और व्यवसाय : समाज और देश के जरूरी आधार हैं.

शिक्षा, न्याय और व्यवसाय किसी भी समाज के विकास के जरूरी तत्व हैं. इन तीनों में से किसी एक का भी चरित्र बिगड़ा तो तय मानिए समाज पतन की तरफ मुड़ चुका है. और चरित्र बना रहे इसके लिए जरूरी है कि इन तीनों के बीच परस्पर मीठे संबंध बने रहेंं !
भारतीय संदर्भ में, इन तीनों के अंतरसंबंधों पर विमर्श करना बेहद जरूरी, प्रासंगिक और समसामयिक हो गया है, क्योंकि आजादी के बाद राजनीति और शासन के तमाम विचारों के प्रयोग के बावजूद हम देख रहे हैं कि हमारा समाज निरंतर पतन की ओर अग्रसर है. युवकों में या तो हताशा है या अमीर और साध सम्पन्न बनने की ललक. इसके लिए वह किसी भी रास्ते से गुजरने को तैयार हैं. वो रास्ता चाहे भ्रष्ट और अमानवीय की क्यों न हो! और यह उस देश का दुर्भाग्य है, जिस देश के युवा में संवेदनशीलता, सामूहिकता और सामाजिकता की राह छोड़ केवल स्वयं आगे बढ़ने की राह पर चल पड़े. स्वयं को आगे देखने की संकल्पना अच्छी है, लेकिन येनकेन प्रकारेण आखिरकार गर्त की तरफ ही ले जाती है. और जब युवा ही पतनशील हो जायेंगे, तो फिर समाज और देश को कौन सही राह ले जायेगा? परिणाम है आजादी के पश्चात श्रेष्ठ शासन व्यवस्था यानी लोकतंत्र को अपनाने के बावजूद हमारा देश और समाज समता मूलक, न्यायपरक और विकासशील होने के बजाय विषमता और अन्याय के चक्रव्यूह में फँसता जा रहा है. राजनीति के सारे आयाम हमने आजमा लिए मध्यमार्ग, समाजवाद, वामपंथ और दक्षिणपंथ भी. लेकिन हम देख रहे हैं कि 70 साल के बाद भी आम आदमी को समुचित रोटी, शिक्षा और न्याय नहीं दे पाये हैं. उदारीकरण और वैश्वीकरण के बाद आर्थिक और सामाजिक विषमताएँ और बढ़ी हैं. देश की 70 प्रतिशत आबादी अब भी जिन गाँवों में रहती हैं, वहाँ का मूलभूत मानवीय ढाँचा भी दयनीय है. हर आदमी रोटी रोजगार के लिए भी शहर भागा चला आ रहा है. और नतीजा है कि शहरों की व्यवस्था भी चरमरा गई है.
ऎसा क्यों हो रहा है..? कहाँ चूक हो रही है हमसे. बहुत चिंतन के बाद हमने "हमारे गाँव" की संकल्पना की. हमारे गाँव की संकल्पना इसलिए कि हमारा देश आज भी गाँवों का देश है. हमारी सारी संस्कृतियाँ, परम्पराएँ, रीति रिवाज और जीवनशैली गाँव परक है. इसलिए हमारे समाज और देश का विकास बिना गाँव के संभव नहीं है.
महात्मा गाँधी भी यही चाहते थे, देश का विकास गाँव के रास्ते ही हो. शहरीकरण और औद्योगिकीकरण के रास्ते विकास की राह पर देश को चलाने की परिणति हम देख चुके. देश में आर्थिक विषमता लगातार बढ़ती जा रही है. देश के अधिकांश संसाधन पर कुछ मुट्ठी पर उद्योगपतियों ने कब्जा जमा रखा है. विडम्बना यह है कि देश के बाकी लोगों की नजर भी उसी राह चलकर अमीर बनने की है. इसलिए हर जगह अफरा तफरी मची है. न्याय और न्याय की बात हाशिये पर चली गई है. मुख्य दौड़ सम्पत्ति बढ़ाने के लिए है. येनकेन प्रकारेण. नतीजा है, हर तरफ अराजकता भरा माहौल है. शिक्षा से लेकर न्याय तक महँगा होता जा रहा है ; इतना महँगा कि आम आदमी की पकड़ से हर जरूरी मानवीय चीज दूर होती जा रही है. ऎसे में यह जरूरी है कि हम अपनी दिशा और दशा पर विचार करें, चिंतन करें.
“हमारे गाँव” की संकल्पना उसी चिंतन से निकली है. इस संकल्पना में गाँव हमारी व्यवस्था का द्वार है. गाँव को अगर हम साफ सुथरा कर दें, व्यवस्था में गाँव के आम आदमी को भागीदार बना दें, तो हमारी बहुत सारी परेशानियाँ स्वतः खत्म हो जायेंगी. हमें नेता की नहीं सहभागियों की जरूरत है, जो जीवन की हर प्रक्रियाओं में साथ चले, सुख-दुख साथ भोगे और साथ विचार करे कि अच्छा क्या है और बुरा क्या..?
ग्राम पंचायत की संकल्पना इसी की कड़ी थी. गाँधीजी ने इस कड़ी के महत्व को समझा था, इसीलिए उन्होंने ग्राम पंचायती व्यवस्था को मजबूत करने पर बल दिया था. लेकिन दुनिया के साथ स्पर्द्धा की महत्वाकांक्षा में हमारे नेता उलझते चले गये और हमारी व्यवस्था आज इस हाल में पहुँच गई है कि आम आदमी की पकड़ में न शिक्षा रही, न न्यायव्यवस्था और न ही विकास की खुशी. दसवीं तक की शिक्षा के लिए बच्चों को पाँच पाँच दस किलोमीटर चलना पड़ता है. बरसात,जाड़े और गर्मियों के विशेष कुछ महीनों में कितनी दिक्कत होती है यह किसी से छुपी नहीं. हालाँकि इन सत्तर सालों के सफर में हर गाँव में प्राथमिक विद्यालय तो सरकार ने खुलवा दिए हैं, लेकिन उनकी हालत दयनीय है. मिड डे मील, पोशाक और पुस्तकों के नाम पर शिक्षकों के स्तर पर समझौता किया गया और नतीजा है कि बच्चों को स्कूल जाने के बाद भी मतलब भर शिक्षा नहीं मिल पा रही है.
कॉलेज की शिक्षा के लिए विद्यार्थियों को और भी तकलीफें उठानी पड़ती हैं. ग्रामीण क्षेत्रों में डिग्री कॉलेज की शिक्षा के लिए भी कम से कम जिला मुख्यालय का मुँह देखना पड़ता है. गाँव से 20 से 30 किलोमीटर दूर जाकर जिला मुख्यालय में रहना और पढ़ाई करना गरीब परिवारों के लिए किसी जंग से कम नहीं है. लड़कियों के मामले में तो समस्याएँ और भी गहरी हो जाती हैं. नतीजा यह है कि ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा की स्थिति आज भी बेहद दयनीय है. हमारे गाँव की संकल्पना में डिग्री कॉलेज तक की शिक्षा देने के लिए ब्लॉक स्तर पर कॉलेज खोलने विमर्श है. आमतौर पर ब्लॉक आसपास के पाँच सात किलोमीटर की परिधि में बसे गाँवों का केन्द्र होता है. इससे लड़कियों को भी डिग्री स्तर तक की शिक्षा आसानी से मिल सकेगी.
दूसरा तत्व है न्याय. न्याय के लिए ग्रामीणों को जिला मुख्यालय स्थित अदालतों के चक्कर लगाने पड़ते हैं, जो कि आवागमन के साथ साथ बाकी मामलों में भी बेहद खर्चीला पड़ता है. पूरे जिले के लोग न्याय के लिए जिला मुख्यालय आते हैं, इसलिए वहाँ भीड़ भी बहुत ज्यादा हो जाती है. इसकी जगह “हमारे गाँव” में अदालत को भी ब्लॉक स्तर पर लाने का विमर्श है. ब्लॉक स्तर पर लोगों का आना जाना आसान होगा और जिला मुख्यालय में भीड़ भी कम होगी. जिला और सत्र न्यायालयों पर बोझ भी कम होगा. साथ ही, ग्राम पंचायतों को एक्टिव करने और उसे वैधानिक मान्यता देने की जरूरत है. हर छोटे मोटे मामले के लिए कोर्ट आ धमकना भी भीड़ बढ़ाता है. इनमें से ढेर सारे मामले पंचायतों में निबटाये जा सकते हैं. पंचायत में खर्च भी नहीं के बराबर आयेगा और न्याय भी ज्यादा सही होगा. 
और तीसरा और आखिरी तत्व है विकास. यह सही है कि बिना औद्योगिकीकरण के देश का विकास संभव नहीं है, लेकिन उसका पहला केन्द्र ब्लॉक होना चाहिए. हमारा देश चूँकि कृषिप्रधान देश है इसलिए हर ब्लॉक में फूड प्रोसेसिंग यूनिट लगाये जाने की जरूरत है. और इस इंडस्ट्री में सरकार और किसानों की पार्टनरशिप हो. ताकि बिजनेस का लाभ किसानों को भी मिले. इससे किसानों की आर्थिक स्थिति संभलेगी. बाकी लोगों को भी रोजगार मिलेगा. और उपभोक्ता को भी सस्ता और अच्छा सामान मिलेगा.
इस तरह भारतीय संदर्भ में “हमारे गाँव” की अवधारणा विकास की राह में गाँव को पहला और सबसे बड़ा सहभागी मानती है.
धनंजय कुमार