शिक्षा, न्याय और व्यवसाय किसी भी समाज के विकास के जरूरी तत्व हैं.
इन तीनों में से किसी एक का भी चरित्र बिगड़ा तो तय मानिए समाज पतन की तरफ मुड़ चुका
है. और चरित्र बना रहे इसके लिए जरूरी है कि इन तीनों के बीच परस्पर मीठे संबंध
बने रहेंं !
भारतीय संदर्भ में, इन तीनों के अंतरसंबंधों पर विमर्श करना बेहद
जरूरी, प्रासंगिक और समसामयिक हो गया है, क्योंकि आजादी के बाद राजनीति और शासन के
तमाम विचारों के प्रयोग के बावजूद हम देख रहे हैं कि हमारा समाज निरंतर पतन की ओर
अग्रसर है. युवकों में या तो हताशा है या अमीर और साध सम्पन्न बनने की ललक. इसके
लिए वह किसी भी रास्ते से गुजरने को तैयार हैं. वो रास्ता चाहे भ्रष्ट और अमानवीय
की क्यों न हो! और यह उस देश का दुर्भाग्य है, जिस देश के युवा में संवेदनशीलता,
सामूहिकता और सामाजिकता की राह छोड़ केवल स्वयं आगे बढ़ने की राह पर चल पड़े. स्वयं
को आगे देखने की संकल्पना अच्छी है, लेकिन येनकेन प्रकारेण आखिरकार गर्त की तरफ ही
ले जाती है. और जब युवा ही पतनशील हो जायेंगे, तो फिर समाज और देश को कौन सही राह
ले जायेगा? परिणाम है आजादी के पश्चात श्रेष्ठ शासन व्यवस्था यानी लोकतंत्र को
अपनाने के बावजूद हमारा देश और समाज समता मूलक, न्यायपरक और विकासशील होने के बजाय
विषमता और अन्याय के चक्रव्यूह में फँसता जा रहा है. राजनीति के सारे आयाम हमने
आजमा लिए मध्यमार्ग, समाजवाद, वामपंथ और दक्षिणपंथ भी. लेकिन हम देख रहे हैं कि 70
साल के बाद भी आम आदमी को समुचित रोटी, शिक्षा और न्याय नहीं दे पाये हैं.
उदारीकरण और वैश्वीकरण के बाद आर्थिक और सामाजिक विषमताएँ और बढ़ी हैं. देश की 70
प्रतिशत आबादी अब भी जिन गाँवों में रहती हैं, वहाँ का मूलभूत मानवीय ढाँचा भी दयनीय है. हर आदमी
रोटी रोजगार के लिए भी शहर भागा चला आ रहा है. और नतीजा है कि शहरों की व्यवस्था
भी चरमरा गई है.
ऎसा क्यों हो रहा है..? कहाँ चूक हो रही है हमसे. बहुत चिंतन के बाद
हमने "हमारे गाँव" की संकल्पना की. हमारे गाँव की संकल्पना इसलिए कि हमारा देश आज भी
गाँवों का देश है. हमारी सारी संस्कृतियाँ, परम्पराएँ, रीति रिवाज और जीवनशैली
गाँव परक है. इसलिए हमारे समाज और देश का विकास बिना गाँव के संभव नहीं है.
महात्मा गाँधी भी यही चाहते थे, देश का विकास गाँव के रास्ते ही हो.
शहरीकरण और औद्योगिकीकरण के रास्ते विकास की राह पर देश को चलाने की परिणति हम देख
चुके. देश में आर्थिक विषमता लगातार बढ़ती जा रही है. देश के अधिकांश संसाधन पर कुछ
मुट्ठी पर उद्योगपतियों ने कब्जा जमा रखा है. विडम्बना यह है कि देश के बाकी लोगों
की नजर भी उसी राह चलकर अमीर बनने की है. इसलिए हर जगह अफरा तफरी मची है. न्याय और
न्याय की बात हाशिये पर चली गई है. मुख्य दौड़ सम्पत्ति बढ़ाने के लिए है. येनकेन
प्रकारेण. नतीजा है, हर तरफ अराजकता भरा माहौल है. शिक्षा से लेकर न्याय तक महँगा होता जा रहा है ; इतना महँगा कि आम आदमी की पकड़ से हर जरूरी मानवीय चीज दूर होती जा रही है. ऎसे में यह जरूरी है कि हम अपनी
दिशा और दशा पर विचार करें, चिंतन करें.
“हमारे गाँव” की संकल्पना उसी चिंतन से निकली है. इस संकल्पना में
गाँव हमारी व्यवस्था का द्वार है. गाँव को अगर हम साफ सुथरा कर दें, व्यवस्था में
गाँव के आम आदमी को भागीदार बना दें, तो हमारी बहुत सारी परेशानियाँ स्वतः खत्म हो
जायेंगी. हमें नेता की नहीं सहभागियों की जरूरत है, जो जीवन की हर प्रक्रियाओं में
साथ चले, सुख-दुख साथ भोगे और साथ विचार करे कि अच्छा क्या है और बुरा क्या..?
ग्राम पंचायत की संकल्पना इसी की कड़ी थी. गाँधीजी ने इस कड़ी के महत्व
को समझा था, इसीलिए उन्होंने ग्राम पंचायती व्यवस्था को मजबूत करने पर बल दिया था.
लेकिन दुनिया के साथ स्पर्द्धा की महत्वाकांक्षा में हमारे नेता उलझते चले गये और
हमारी व्यवस्था आज इस हाल में पहुँच गई है कि आम आदमी की पकड़ में न शिक्षा रही, न
न्यायव्यवस्था और न ही विकास की खुशी. दसवीं तक की शिक्षा के लिए बच्चों को पाँच
पाँच दस किलोमीटर चलना पड़ता है. बरसात,जाड़े और गर्मियों के विशेष कुछ महीनों में
कितनी दिक्कत होती है यह किसी से छुपी नहीं. हालाँकि इन सत्तर सालों के सफर में हर
गाँव में प्राथमिक विद्यालय तो सरकार ने खुलवा दिए हैं, लेकिन उनकी हालत दयनीय है.
मिड डे मील, पोशाक और पुस्तकों के नाम पर शिक्षकों के स्तर पर समझौता किया गया और
नतीजा है कि बच्चों को स्कूल जाने के बाद भी मतलब भर शिक्षा नहीं मिल पा रही
है.
कॉलेज की शिक्षा के लिए विद्यार्थियों को और भी तकलीफें उठानी पड़ती
हैं. ग्रामीण क्षेत्रों में डिग्री कॉलेज की शिक्षा के लिए भी कम से कम जिला
मुख्यालय का मुँह देखना पड़ता है. गाँव से 20 से 30 किलोमीटर दूर जाकर जिला
मुख्यालय में रहना और पढ़ाई करना गरीब परिवारों के लिए किसी जंग से कम नहीं
है. लड़कियों के मामले में तो समस्याएँ और भी गहरी हो जाती हैं. नतीजा यह है कि
ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा की स्थिति आज भी बेहद दयनीय है. हमारे गाँव की
संकल्पना में डिग्री कॉलेज तक की शिक्षा देने के लिए ब्लॉक स्तर पर कॉलेज खोलने विमर्श है. आमतौर पर ब्लॉक आसपास के पाँच सात किलोमीटर की परिधि में बसे गाँवों का
केन्द्र होता है. इससे लड़कियों को भी डिग्री स्तर तक की शिक्षा आसानी से
मिल सकेगी.
दूसरा तत्व है न्याय. न्याय के लिए ग्रामीणों को जिला मुख्यालय स्थित अदालतों के चक्कर लगाने पड़ते हैं, जो कि आवागमन के साथ साथ बाकी मामलों में भी
बेहद खर्चीला पड़ता है. पूरे जिले के लोग न्याय के लिए जिला मुख्यालय आते हैं,
इसलिए वहाँ भीड़ भी बहुत ज्यादा हो जाती है. इसकी जगह “हमारे गाँव” में अदालत को भी
ब्लॉक स्तर पर लाने का विमर्श है. ब्लॉक स्तर पर लोगों का आना जाना आसान होगा और
जिला मुख्यालय में भीड़ भी कम होगी. जिला और सत्र न्यायालयों पर बोझ भी कम होगा.
साथ ही, ग्राम पंचायतों को एक्टिव करने और उसे वैधानिक मान्यता देने की जरूरत है.
हर छोटे मोटे मामले के लिए कोर्ट आ धमकना भी भीड़ बढ़ाता है. इनमें से ढेर सारे
मामले पंचायतों में निबटाये जा सकते हैं. पंचायत में खर्च भी नहीं के बराबर आयेगा
और न्याय भी ज्यादा सही होगा.
और तीसरा और आखिरी तत्व है विकास. यह सही है कि बिना
औद्योगिकीकरण के देश का विकास संभव नहीं है, लेकिन उसका पहला केन्द्र ब्लॉक होना
चाहिए. हमारा देश चूँकि कृषिप्रधान देश है इसलिए हर ब्लॉक में फूड प्रोसेसिंग
यूनिट लगाये जाने की जरूरत है. और इस इंडस्ट्री में सरकार और किसानों की
पार्टनरशिप हो. ताकि बिजनेस का लाभ किसानों को भी मिले. इससे किसानों की आर्थिक
स्थिति संभलेगी. बाकी लोगों को भी रोजगार मिलेगा. और उपभोक्ता को भी सस्ता और
अच्छा सामान मिलेगा.
इस तरह भारतीय संदर्भ में “हमारे गाँव” की अवधारणा विकास की राह में
गाँव को पहला और सबसे बड़ा सहभागी मानती है.
धनंजय कुमार
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