हिंदी के नाम पर 14 सितंबर
को हर साल प्रायोजित सरकारी और गैर सरकारी विलाप होता है, लेकिन हिंदी निरंतर खतरे
के निशान की तरफ बढ़ती जा रही है. और विडम्बना यह है कि इसे रोकने के लिए न तो निरीह
हिंदी भाषी जनता कुछ कर पा रही है और न ही हमारी शक्तिशाली भारत सरकार. दोनों
मजबूर हैं ! और हिंदी बहादुरी के साथ वीरगति के पथ पर अग्रसर है!
देश के रोजगार की भाषा हिंदी नहीं है, इसलिए
हमारे बच्चों की शिक्षा का माध्यम भी हिंदी
नहीं है. अपने समाज और देश में सम्मान पाने की भाषा हिंदी नहीं है, इसलिए
आपसी बोलचाल की भाषा भी हिंदी नहीं है. देश के सारे समझदार लोग या तो अंग्रेजी में
बोलते हैं या रोमन हिंग्लिश में. फिर कैसे बचेगी हिंदी ? बहरहाल, हिंदी के नाम पर
सरकारी गैर सरकारी ढोंग का कोई मतलब नहीं. हिंदी अब हमारी अस्मिता की भाषा नहीं
रही, इसलिए उसके निरंतर ह्रास से भी हमें कोई परेशानी नहीं होती. हम उसके क्षय के
मौन दर्शक बने हैं. और बस दिल बहलाने के लिए हम हर साल 14 सितम्बर को हिंदी दिवस
मना लेते है. आम तौर पर, किसी को याद करने की परम्परा उसके नहीं होने के बाद निभाई
जाती है, लेकिन हिंदी के होते ही यह परम्परा हम निभा रहे हैं ! क्या यह अपनी भाषा
के प्रति हमारा उत्कट प्रेम और अद्भुत सम्मान है ?!
हिंदी की गति ऎसी क्यों
हुई, इसके कारणों पर किसी शोध की आवश्यकता नहीं है. इसके कारण हम सबको अच्छी तरह
पता हैं. स्वतंत्रता के 68 साल बाद भी हिंदी को हम अपने भारत की राष्ट्रभाषा नहीं
बना पाये हैं. यह अपने आप में दिलचस्प है कि भारत दुनिया का संभवतः एक मात्र ऎसा
देश है, जिसकी कोई अपनी आधिकारिक राष्ट्रभाषा नहीं है. देश का संविधान लागू होने
से पहले राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी की हार्दिक इच्छा थी कि हिंदी को भारतवर्ष की
राष्ट्रभाषा घोषित किया जाय, लेकिन कुछ गैर हिंदी प्रदेशों के राजनीतिज्ञों ने इसे
अपनी क्षेत्रीय अस्मिता के भाषाई और सांस्कृतिक अस्तित्व से जोड़ लिया और हिंदी को राष्ट्रभाषा
के बजाय देश की राजभाषा के तौर पर अंग्रेजी के बाद का दूसरा स्थान मिला. इसमें भी
विडम्बना (हालाँकि मैं इसे षडयंत्र मानता हूँ) यह रही कि पूरे देश तो छोड़िये,
हिंदी प्रदेशों में भी सरकारी कार्यालयों के कामकाज की मूल भाषा अंग्रेजी ही बनी
रही. हिंदी को आगे बढ़ाने के लिए हिंदी विभाग अवश्य खोले गए, लेकिन यह काम हिंदी
अधिकारियों के भरोसे छोड़ दिया गया. और हिंदी अधिकारी महज अनुवादक की भूमिका निभाते
रहे. वह अनुवाद भी इतना तकनीकी और बनावटी रहा कि आम हिंदी भाषियों के लिए भी
सरकारी हिंदी समझना दुरुह था. परिणाम हुआ आम हिंदी भाषियों ने भी अपनी जरूरत के
समय हिंदी के स्थान पर अंग्रेजी को ही अपनाना सरल समझा. इस तरह हिंदी आगे बढ़कर भी
पिछड़ती गई. हिंदी अनपढ़ों या कम पढ़े लिखों की भाषा भी न बन सकी. लोगों ने अपना काम
तो किसी तरह चलाया, लेकिन देश में अच्छी नौकरियाँ पाने का आधार अंग्रेजी शिक्षा ही
बनी रही, इसलिए हिंदी भाषियों को भी अपने बच्चों का भविष्य अंग्रेजी में ही दिखा.
उदारीकरण के बाद नौकरियाँ पाने में अंग्रेजी की भूमिका और भी बड़ी हो गई. हिंदी भाषियों ने भी अपने बच्चों को हिंदी माध्यम के
स्कूलों-कॉलेजों में पढ़ाने के बजाय अंग्रेजी माध्यमों में पढ़ाना आवश्यक समझा. नतीजा
हुआ कि बच्चों की शिक्षा का माध्यम भी हिंदी की जगह अंग्रेजी बन गई.
देश भर में (खासकर गैर
हिंदी भाषी प्रदेशों में) हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए सरकारी स्तर पर कुछ
संस्थान खोले गये, लेकिन उनका काम भी रस्मी ही रहा. क्योंकि जब आम आदमी को अपने
दैनिक जीवन में हिंदी की आवश्यकता ही नहीं, तो फिर वह हिंदी समझने और सीखने पर
अपना समय क्यों नष्ट करें!
हिंदी के प्रचार प्रसार में
इन संस्थानों से ज्यादा योगदान हिंदी फिल्मों माना जाता रहा है और यह सच भी है.
जहाँ लोग हिंदी नहीं जानते, वहाँ भी हिंदी फिल्में देखी जाती रही हैं. दूरसंचार
क्रांति और उदारीकरण से पहले भी राजकपूर की फिल्में और उनके गाने विदेशों में
लोकप्रिय थे. टीवी कार्यक्रमों में प्रायः रशियन और चाइनीज हिंदी गाने गाते दिख
जाया करते थे. लेकिन अब फिल्मों की भाषा भी तेजी से बदल रही है. उदारीकरण के बाद
फिल्मों को भी दुनिया का बड़ा बाजार मिला, परिणाम हुआ फिल्मों के संवाद और गाने
हिंदी में लिखे जाने के बजाय हिंग्लिश में लिखे जाने लगे. टीवी सीरियलों में भी बोलचाल
की हिंदी यानी हिग्लिश लिखने पर जोर दिया जा रहा है. इससे हिंदी विभाग में अंधेरा
बढ़ने का खतरा बढ़ता जा रहा है.
हालाँकि देश में अभी भी कई
ऎसे हिंदी प्रेमी हैं, जो मानते हैं कि हिंदी का भविष्य अंधकारमय नहीं, बल्कि
संभावनाओं से भरा है, इसलिए एक दिन हिंदी खत्म हो जायेगी, इस बात की कल्पना करके
छाती पीटने और निराशावादी होने की आवश्यकता नहीं है, लेकिन सच क्या है...? सच यह
है कि वह भी अपने दैनिक जीवन में हिंदी के स्थान पर अंग्रेजी बोलते हैं या जरूरत
पड़ने पर हिंग्लिश बोलते हैं. ऎसे कथित हिंदी प्रेमी (मैं इन्हें कथित ही मानता
हूँ) प्रायः यह बोलते पाए जाते हैं कि हिंदी को सरल रहने दीजिए, शुद्धतावादी मत
बनिए. शुद्ध हिंदी के चक्कर में उसे किताबी या महाभारतकालीन हिंदी मत बनाइए. क्या
अंग्रेजी के संदर्भ में कोई ऎसा बोलता दिखता है..?! वहाँ तो आप जितने ही कठिन शब्द
या वाक्य विन्यास का प्रयोग करें, आप उतने ही बौद्धिक कहलायेंगे, लेकिन अच्छी
हिंदी बोलने या लिखनेवाला महभारतकालीन हो जाता है, हँसी का पात्र बन जाता है.
क्यों? इसका संबध सिर्फ और सिर्फ हमारे
आत्मगौरव और हिंदी के प्रति प्रेम से है. जो बाहरी तौर पर हिंदी दिवस या हिंदी
पखवारा के अवसर पर दिखता तो है, लेकिन बाकी दिनों में विलुप्त हो जाता है.
विडम्बना तो यह है कि इन्हीं में से कुछ लोगों ने यह माँग भी करनी शुरू कर दी है
कि हिंदी को देवनागरी में लिखने के बजाय रोमन में लिखा जाय. मुझे लगता है यह सब
हिंदी को बचाने के बजाय निपटाने का प्रयास है. ऎसे हिंदी प्रेमी (इन्हें
सेलिब्रिटी कहना ज्यादा सही है) प्रायः हिंदी दिवस और हिंदी भाषा पर चर्चा के दौरान
मंचों और टीवी कार्यक्रमों में पुरोहित के तौर पर प्रकट होते हैं. बाकी जीवन में
अंग्रेजी या हिंग्लिश बोलते हुए ही गौरवान्वित महसूस करते हैं.
हिंदी सिनेमा जगत में ऎसे
पुरोहितों की बहुतायत है. उदारीकरण के बाद जब फिल्में वैश्विक हुईं, तब तो फिल्मों
की भाषा भी हिंग्लिश होने लगी, लेकिन उसके पहले भी हिंदी फिल्म जगत में अंग्रेजी
और अंग्रेजी दाँ लोगों की पकड़ ज्यादा मजबूत थी. अंग्रेजी बोलना गौरव और प्रतिष्ठा
की बात थी. इसलिए देख लीजिए, फिल्म के निर्माता संगठनों से लेकर हमारे लेखक संगठन
का नाम भी अंग्रेजी में है “फिल्म रायटर्स एसोसिएशन”. उसका संविधान अंगेजी में है.
उसके कामकाज की भाषा अंग्रेजी है. उनके पत्र व्यवहार अंग्रेजी में होते हैं. उनकी
कार्यकारिणी समिति की सभाएँ अंग्रेजी या हिंग्लिश में होती है. सभाओं में किन
विषयों पर चर्चा हुई और क्या निर्णय लिए गये, उसका अभिलेख भी अंग्रेजी में ही लिखा
जाता है.
मंचों पर बोलना होता है तो
हम बड़े गर्व से कहते हैं कि अंगेजी और चीनी भाषा के बाद पूरी दुनिया में बोली और
समझी जानेवाली तीसरी सबसे बड़ी भाषा हमारी हिंदी है. लेकिन सत्य यह है कि अच्छी हिंदी
समझने, बोलने और लिखने वालों की संख्या लगातार कम होती जा रही है. अंग्रेजी शब्दों
का चलन बढ़ता जा रहा है और हिंदी के ढेर सारे सामान्य शब्द भी प्रयोग से दूर होते जा
रहे हैं. ऎसे में हिंदी को बचाने का प्रयास सिर्फ हमारे कर्तव्य बोध के भरोसे नहीं
छोड़ा जा सकता. हिंदी को सचमुच यदि अपनी अस्मिता और आत्म गौरव से जोड़े रखना है, तो
हिंदी के लिए ईमानदारी से सोचना होगा और न सिर्फ सोचना होगा, हिंदी हमारी आवश्यकता
की भाषा कैसे बने, इसपर गंभीर चिंतन, मनन और काम करने होंगे.
इसे इस उदाहरण से भी समझा जा सकता है कि योग को
177 देशों का समर्थन मिला, लेकिन हिंदी को संयुक्त राष्ट्र संघ की
भाषा बनाने के लिए आजादी के 68 साल बाद भी हम 129 देशों का समर्थन नहीं जुटा पाए
हैं.
धनजंय कुमार
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