Tuesday, 17 March 2015

किसानों के नाम पर झूठा विलाप


भूमि अधिग्रहण कानून को लेकर देश में मचे शोरशराबे से लगता है कि किसानों को लेकर हमारे सारे राजनेता बहुत चिंतित हैं. विरोधी पक्ष के नेतागण उपवास रख रहे हैं, रैलियाँ कर रहे हैं और किसानों को गुस्से से भरा भाषण पिला रहे हैं, तो सत्ता पक्ष के नेता किसानों के हित में भूमि अधिग्रहण कानून के फायदे गिना रहे हैं. लेकिन सच्चाई यह है कि राजनेता चाहे वह काँग्रेसी हों या भाजपाई या नीतीश कुमार, सब ढोंग कर रहे हैं. इनमें से किसी को भी किसानों के हित से कोई लेना-देना नहीं है. सब किसानों के नाम पर झूठा विलाप कर रहे हैं.

जिस भूमि अधिग्रहण कानून में किसानों के हक को और सुरक्षा देने के नाम पर विपक्ष में रहते हुए बीजेपी के नेतागण कल संसद से लेकर टीवी न्यूज चैनल पर काँग्रेस को घेर रहे थे, वही बीजेपी सत्ता में आने के बाद किसानों के सारे हक छीनने पर आमादा है. जो काँग्रेसी आज बीजेपी के भूमि अधिग्रहण कानून को किसान विरोधी बताकर हंगामा करते दिख रहे हैं, वे आजादी के 60 साल के बाद तक किसान विरोधी अंग्रेजी कानून का डंडा चला किसानों को धौंसियाते रहे. नीतीश कुमार, जो अपने आपको किसान के सबसे बड़े पैरोकार के रूप में खुद को प्रकट कर रहे हैं, उनके प्रदेश बिहार में किसानों की कौन सी फजीहत नहीं है. रेवेन्यु कर्मचारी से लेकर सीओ - बीडीओ तक किसान के आका बने हैं. किसान के नाम पर तरह - तरह की सब्सिडियाँ बाँटी जा रही हैं, लेकिन इसका फायदा किसानों के बजाय अफसरों से लेकर मंत्रियों और कृषि क्षेत्र में व्यापार कर रहे उद्योगपतियों और उनके दलालों को मिल रहा है. किसानों के खलिहानों में धान रखे हैं और अफसर कह रहे हैं कि धान खरीद का कोटा पूरा हो गया है. नीतीश कुमार वाकई अगर किसानों के हित चाहते, तो क्या किसानों के धान बिकने से पहले ही कोटा पूरा हो जाता? ये कैसा कोटा है भाई? दरअसल, यह कोटेबाजी भी एक तरह का ढोंग है, जो किसानों के नाम पर वाहवाही भी लाकर देता है और व्यापारियों की भी चाँदी करता है. कोटा पूरा हो जाने की वजह से जो किसान धान नहीं बेच पाए, अब वह खुले बाजार के खरीदारों के पास जाएँगे, जहाँ उनको धान के न्यूनतम सरकारी मूल्य से पाँच सौ रुपए प्रति क्विंटल के हिसाब से कम मूल्य पर धान बेचना होगा. इसके अलावा जिन किसानों को सरकारी खरीद में धान बेचने का सौभाग्य प्राप्त हो गया, उनको भी सौ से लेकर तीन सौ रुपए प्रति क्विंटल के हिसाब से घूस देने पड़े. तो यह है नीतीश कुमार जी की किसान चिंता की वास्तविकता.

बीजेपी की चिंता की बानगी मौजूदा वित्त मंत्री और देश के मानिंद वकील अरुण जेटली जी की दलील में देखिए. भूमि अधिग्रहण अध्यादेश लाने के तुरंत बाद एक चैनल से बात करते हुए बता रहे थे कि अधिगृहीत जमीन का मुआवजा तो ज्यादा मिल ही रहा है, वहाँ उद्योगपतियों के उद्योग-धंधों के लगने की वजह से जो विकास होगा, उसकी वजह से किसानों की बची जमीन की कीमत भी कई गुणा बढ़ जाएगी. यानी कि किसानों की जमीन की कीमत बढ़ाकर जेटली साहब किसान को बचाना चाहते हैं. क्या यह संभव है ? जमीन की कीमत के बढ़ने से बेशक तात्कालिक तौर पर उस किसान को फायदा होता दिख रहा है, किंतु वास्तव में किसान और देश, दोनों के साथ यह बड़ा छल है. किसानों का वास्तविक फायदा तब होगा, जब खेतों में उत्पादित उसकी फसलों को बाजार से सही कीमत मिलेगी. तमाम तरह की अनिश्चितताओं, दुश्वारियों और फसल की लाभ सहित कीमत नहीं मिलने से परेशान किसान पहले ही खेती से पलायन कर रहा है, जब उसके खेतों को ज्यादा कीमत मिलेगी, तो जाहिर है किसान खेत बेच देगा. आँकड़े भी लगातार बता रहे हैं कि खेती की जमीन और किसान देश में लगातार कम हो रहे हैं. जबकि आबादी बढ़ती जा रही है. यानी खानेवाले बढ़ रहे हैं और खाद्य पदार्थ उपजाने वाले कम होते जा रहे हैं. मतलब, भविष्य में बीजेपी सरकार विदेशों से अनाज आदि मँगवाकर देश की खाद्य जरूरतें पूरी करना चाहती है. बीजेपी की कृषि नीति की कलई महाराष्ट्र में किसानों की आत्महत्या के बाद उसके परिजनों को मिलने वाले सरकारी मुआवजे की रकम को एक लाख से बढ़ाकर पाँच लाख करने के विमर्श चिंतन से भी खुलती है. किसान के सामने आत्महत्या की स्थिति बने ही नहीं, इस दिशा में सार्थक कदम उठाने के बजाय मुआवजा बाँटकर दयालु और दानी होने का खिताब पाना ज्यादा जरूरी लगता है.

किसान हमारी प्राचीन भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ थे. लेकिन आजादी के बाद देश के नीतिकारों ने अर्थव्यवस्था की जो राह चुनी, वह किसानों की रीढ़ तोड़नेवाली साबित हुई है. किसानी आज पूरी तरह घाटे का सौदा बनी है. किसान खेत छोड़कर भाग रहे हैं या आत्महत्या कर रहे हैं, लेकिन हमारी सरकारें इतरा रही हैं कि भारत दुनिया की बड़ी आर्थिक शक्ति बनने के क्रम में है. यह ख्वाब हमें ग्लोबलाइजेशन के शुरू होने के साथ से ही दिखाया जा रहा है, लेकिन सच्चाई यह है कि देश की आधी से अधिक आबादी अभी भी पेट भरने की चिंता से ग्रस्त है. सरकार गाँवों की 75 प्रतिशत आबादी और नगरों-महानगरों की 50 प्रतिशत आबादी को सस्ती कीमत पर पेट भरने भर अनाज बाँट रही है. बाकी आबादी में से अच्छी नौकरियाँ या व्यवसाय कर प्रति महीने लाख रुपए कमानेवाला मध्यवर्ग भी घर गाड़ी और बच्चों की पढ़ाई की चिंता में डूबा है. वह अपने लिए जरूरी सुविधाएँ जुटाने में त्रस्त और पस्त है. आर्थिक - सामाजिक विषमता लगातार बढ़ती जा रही है. कुछ धन्नासेठों को छोड़ दें, तो कोई सुकून का जीवन कोई भी नहीं जी पा रहा है. इसकी वजह है हमारी अर्थव्यवस्था.

हमारी प्राचीन अर्थव्यवस्था कृषि पर आधारित थी. अर्थव्यवस्था के केन्द्र में किसान था. वह खेतों से अनाज आदि उपजाता था और मजदूर से लेकर तमाम तरह के शिल्पकार-कलाकार उसके आश्रय में सुकून से पलते थे. बढ़ई, कुम्हार, लुहार, चर्मकार आदि खेती के सीजन में किसानों के लिए खेती की जरूरत की चीजें बनाते थे और बाकी समय में निश्चित होकर अपने शिल्प और कला को निखारते थे, क्योंकि सारी जरूरतें किसान पूरी करते थे. ब्राह्मण भी पूजा-पाठ से बचा समय अध्ययन-अध्यापन में लगाते थे. सुरक्षा का जिम्मा सम्भालने वाले सिपाही और राजा को भी किसान ही कर देता था. वह सह-अस्तित्व पर आधारित अर्थव्यवस्था थी. सबके मानवीय सरोकार एक दूसरे से जुड़े थे. जबकि देश की मौजूदा अर्थव्यवस्था सह-अस्तित्व के बजाय शोषण पर आधारित है. इसमें अधिकतम मुनाफा कमाने और पूँजी बढ़ाने की ललक ज्यादा है और मानवीय सरोकार न्यूनतम. यही कारण है कि जीवन के भौतिक ऎशो-आराम कुछ लोगों तक सिमट कर रह गए हैं.. अपने आपको आगे बढ़ाने और बनाए रखने के लिए गलाकाट प्रतिस्पर्द्धा चल रही है. और दुखद यह है कि हमारे राजनेता इस गलाकाटू अर्थव्यवस्था को पोसने में जी जान से जुटे हैं. किसानों की कीमत पर उद्योगपतियों को आगे बढ़ा रहे हैं. इसमें उन्हें अपना तात्कालिक हित भी सधता दिखता है कि उद्योगपति उनका सारा खर्च उठा रहे हैं. चुनाव के समय मतदाता को लुभाने के लिए पार्टी को भारी भरकम चंदा देते हैं. किसान क्या देते हैं ?! इन्कमटैक्स भी नहीं देते! लेकिन उनका यह सोच देश को किस कंगाली की तरफ ले जा रहा है, इसका अभी अहसास तक शायद नहीं है. सब देशहित और गरीबों की बात कर देश को लूटने में मस्त हैं. चिंता गहरी है, मगर पत्रकारों को इस पर विमर्श की फुर्सत नहीं है. फिर देश को ढोंगी नेताओं से कौन बचाएगा?

धनंजय कुमार


धनंजय कुमार
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