राष्ट्रपिता
महात्मा गाँधी का मानना था भारतवर्ष की आत्मा गाँवों में बसती है, मगर आज़ादी के बाद हमारे गाँवों को हमने लगातार उजाड़ा. हमारी सरकारों ने प्रगति
और विकास के पथ से गाँवों को दूर रखा, तो हमने दुनिया की दौड़ में खुद को आगे रखने
की ललक में गाँवों को दुत्कार-डपट शहरों की चमक-दमक को ह्रदय में बसाया. और हमारे
गाँव लगातार हमसे छूटते गए...मुरझाते गए, सूखते गए.
कहने तो सरकार
ने आज़ादी के बाद लगातार गाँवों के विकास को ध्यान में रखकर अपनी नीतियाँ बनाई हैं,
मगर क्या वो नीतियाँ फलदायी रहीं ? जवाब बिना हील-हुज्जत के ‘नहीं’ है. अगर फलदायी
होतीं तो हमारे गाँव हाशिए पर नहीं चले जाते. गाँव छोड़कर हम भागते नहीं. हमारे
गाँव संसाधनविहीन, प्रतिभाविहीन और ऊर्जाविहीन नहीं हो जाते.
ग्राम विकास के
नाम पर सरकारों ने किसानों की सहायता करने की नीतियाँ बनाईं. उन्हें तरह – तरह की
सब्सिडियाँ दी गई. मॉनसून के भरोसे खेती को नदियों पर बाँध बना, नहरों को खेतों से
जोड़ और नलकूप की व्यवस्था कर कृत्रिम सिंचाई का सहारा दिया गया. परम्परावादी खेती
को आधुनिक तकनीकों से जोड़ने की कोशिशें हुईं. किसानों को अपने उत्पाद की सही कीमत
मिले इसके लिए सरकार द्वारा कृषि उत्पादों का मूल्य निर्धारित किया जाने लगा.
मंडियाँ बनाई गईं. किसानों की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ हो, इसके लिए उन्हें आयकर से
मुक्त रखा गया. मगर आज 65 सालों की सरकारी कवायद के बाद भी किसानों की स्थिति क्या
है..? किसान खेत छोड़कर भाग रहे हैं, जो नहीं भाग सकते आत्महत्या कर रहे हैं.
आज आज़ादी के
65-66 साल बाद भी गाँवों को सँवारने की प्रक्रिया में जो सरकारी नीतियाँ खूब
ढोल-बाजे के साथ अमल में लाई जा रही है,वह भी निरंतर उजड़ रहे गाँव को सँवारने की
दिशा में ‘बीमारी कुछ इलाज कुछ’ की तरह किया जा रहा है. यही वजह है कि ग्राम
पंचायतों को आर्थिक अधिकार देने, ग्रामीणों को तरह-तरह की आर्थिक सहायता (मनरेगा
आदि) देने के बावजूद गाँव उजड़ रहे हैं. ग्राम विकास और ग्रामवासियों की आर्थिक
सशक्तिकरण के नाम पर सरकारों द्वारा मुक्त हस्त लुटाई जा रही धनराशि जनता के हित
में इस्तेमाल कम बर्बाद ज्यादा हो रही है. मुखिया जी गाँव के मालिक बन गए हैं. जो
बीडीओ और जिलाधीश को खुश करके सरकारी धन का अपूर्व आनन्द प्राप्त कर रहे हैं.
दिलचस्प यह है कि आम जनता भी इस सरकारी लूट से खुश है. आखिर खुश हो भी क्यों
नहीं...हर तरीके की लूट में शामिल होने की उन्हें भी छूट है. कुछ रुपए की रिश्वत
देकर गलत तथ्य पर आय प्रमाण पत्र से लेकर वैसे तमाम प्रमाणपत्र आराम से बन जा रहे
हैं, जिनसे सरकारी सब्सिडियों की रेवड़ियाँ प्राप्त हो जाती हैं. विकास के नाम पर
सड़कें बन रही हैं, इन्दिरा आवास बन रहे हैं, सामुदायिक भवन बन रहे हैं. रोजगार के
नाम पर मनरेगा के तहत पेड़ लगाए जा रहे हैं, गलियाँ बनाई जा रही हैं, घर-घर शौचालय
बनाए जा रहे हैं. किसानों को सहायता के नाम पर खाद-बीज से लेकर ट्रैक्टर-पॉलीहाउस
पर हज़ारों-लाखों की सरकारी सब्सिडी जबरन बाँटी जा रही हैं. शिक्षा का स्तर सुधारने
के लिए आँगनबाड़ी से लेकर कस्तूरबा विद्यालय बनाए जा रहे हैं. कॉपी-किताब से लेकर
मिड डे मील-सायकिल और लैपटॉप बाँटे जा रहे हैं. ओह...! सार कहें तो हमारे गाँवों
में मॉनसून से कई गुणा ज्यादा सरकारी धन बरस रहा है. मगर अफसोस की बात यह है कि
जैसे बरसात के पानी को हम बेकार बह जाने देते हैं, वैसे ही सरकारी धन भी अनुपयोगी
तरीके से बहाया जा रहा है. गाँव में एक कहावत है चोरों के सन्दर्भ में- ‘लूट लाए
कूट खाए’, इसीलिए चोरों की आर्थिक स्थिति कभी सुधरती नहीं, सरकारी धन की भी यही
स्थिति है, यही कारण है कि सालाना लाखों-करोड़ों लुटाए जाने के बाद भी गाँव की
स्थिति बेहतर नहीं हो पा रही है. प्रतिभा और मजदूर रोटी-रोजगार के लिए बदस्तूर
पलायन कर रहे हैं. और बेहतर जीवन की ललक में ग्रामवासियों का बेहतर डेस्टिनेशन अब
भी शहर ही है. इससे यह स्पष्ट जाहिर होता है कि हमारे गाँव को लेकर अबतक सरकारों
की जो दृष्टि और नीतियाँ रही हैं वह गलत रही हैं.
महात्मा गाँधी
ने गाँवों के विकास का जो स्वप्न देखा था, उसमें गाँव को आत्मनिर्भरता प्रदान करने
की कल्पना थी. लोकतंत्र को राजधानियों तक सीमित रखने के बजाय गाँव तक पसारने की
चाहत थी, मगर हमारे नीति-नियंताओं ने गाँवों के साथ-साथ गाँधी को भी ठगा. लोकतंत्र
को जनता से जोड़ने के नाम पर ग्राम-पंचायतों का गठन तो किया गया, मगर ठीक वैसे ही जैसे
बच्चों को बड़े नकली खिलौनों से बहला लेते हैं. सत्ता जनप्रतिनिधियों की अंजुरी से
चलकर नौकरशाहों की जटा में समा गई. जनता ‘अमूल्य वोट’ का अधिकार पाकर धन्य हो गई.
जनप्रतिनिधियों को राजधानियों का सुख प्राप्त हुआ तो नौकरशाहों को राजधानियों अथवा
जिला मुख्यालयों का और जनता के नसीब में रहे गाँव. जनप्रतिनिधियों और नौकरशाहों को
ही विकास की रूपरेखा तय करनी थी, इसलिए सरकारी धनों से पहला विकास राजधानियों का
हुआ फिर जिला मुख्यालयों का. विकास के बजट से गाँव के विकास की बारी आई बिल्कुल
आखिर में. यानी अब जब मामला बिल्कुल भयावह हो गया. वो भी तब जब नीति-नियंताओं को
लगने लगा कि गाँव की आबादी को अगर गाँव में नहीं रोका गया तो हमारे शहर
अस्त-व्यस्त हो जाएँगे.
कलतक गाँवों को
विकास की पटरी से दूर रखा गया, वह साज़िश थी, मगर आज गाँवों के विकास के नाम पर जो
धन लुटाया जा रहा है, वह नीति-नियंताओं की हवाई समझ है. खैरात बाँटने से न तो
ग्रामवासियों का भला होना है, न ही हमारे गाँव का विकास होना है. ज़रूरत है ऎसी
ग्राम-नीति की जो गाँव को आत्मनिर्भर बनाए. मनरेगा और सब्सिडी से ग्रामवासियों को
गाँव में नहीं रोका जा सकता. ग्रामवासी गाँव में रहना तब पसन्द करेंगे जब गाँव में
भी शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के बेहतर साधन उपलब्ध होंगे. सिर्फ कम कीमत पर अनाज
देने, इन्दिरा आवास बना देने और स्कूलों के नाम पर भवन खड़ा कर देने और प्राइमरी
हेल्थ सेंटर बना देने भर से ग्रामवासी खुशहाल नहीं हो जाएँगे. वह खुशहाल तब होंगे,
जब उनके जीवन के मूलभूत सपने गाँव में ही पूरे हो सकेंगे.
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| हमारे गाँव के सर्जक धनंजय कुमार बिन्द प्रखण्ड के बीडीओ अशोक कुमार जी के साथ |
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| शिक्षा के क्षेत्र में जागरूकता बढ़ाने की दिशा में एक पहल 'देवनन्दन पब्लिक स्कूल. |