Tuesday, 1 November 2011

आज मैं अपने गाँव जा रहा हूँ...!!!


मित्रों! आज रात की ट्रेन से मैं अपने गाँव जा रहा हूँ...वो गाँव जिसकी गोद में मैंने जन्म लिया,जिसकी गलियों में मैंने चलना सीखा, जिसकी हवाओं में मैंने उड़ना सीखा, जिसके स्कूल में जीवन का ककहरा सीखा,जिसकी रातों में मैंने सपने देखना सीखा,जिसकी खुश्बू ने सौन्दर्यबोध से परिचय कराया.
मित्रों, उस गाँव को आज से 27 साल पहले छोड़कर मैं शहर आया था, दुनिया की ऊँचाइयों और जीवन की गहराइयों को पढ़ने-समझने और देखने. इन 27 वर्षों में पाने की ललक में इस कदर उलझा रहा कि गाँव मेरी राह देख रहा है, इसका कभी ध्यान ही नहीं आया. गाँव से दूर पटना और फिर मुम्बई आकर मैंने क्या-क्या पाया, इसका आकलन तो कोई भी कर सकता है, लेकिन क्या-क्या खोया इसका आकलन सिर्फ मैं ही कर सकता हूँ.
हिसाब लगाता हूँ,तो पाता हूँ, मैंने पाया कम खोया ज्यादा. मासूमियत खोई,जवानी खोई,सौन्दयबोध खोया, सपने देखने की आदत खोई,चलना खोया,उड़ना खोया, संस्कार खोया, परिवार खोया,इंसानियत खोई. प्रकृति खोई,आज़ादी खोई,घर खोया.....खोया...खोया...खोया...ओह सब कुछ खो दिया...! फिर से सब पाना चाहता हूँ, इसीलिए गाँव जा रहा हूँ...
लेकिन गाँव में रह रहे लोग मुझे आगाह कर रहे हैं...जिस गाँव को आप छोड़कर आप आए थे, वो गाँव भी बिल्कुल वैसा नहीं रहा. इन वर्षों में गाँव ने भी बहुत कुछ खो दिया है...बैल खो दिए, खेतों में रोपनी करती मजदूर महिलाओं के गीत खो दिए...खलिहान खो दिए...आंगन खो दिए...संयुक्त परिवार से भरा-पूरा घर खो दिया....बच्चे खो दिए... युवा खो दिए...बूढ़ों की बच्चों के साथ की खिलखिलाहट खो दी... गोधूलि बेला में धूल उड़ाती गायों का रेला खो दिया....होली- चैता- बारहमासा खो दिया....नीम–बबूल के दातुन खो दिए...झाल-मजीरे-ढोलक की थाप खो दिए....कबीरपंथी आलाप खो दिए...खो दिए..खो दिए..
ओह ....!!! तो पाया किसने?
गाँव का टपोरी मुखिया बन गया है...लम्बी गाडी खरीद ली है..
एक साथ तीन लोगों की हत्या कर गाँव को दहशत से भर देनेवाला बदमाश जिला परिषद का अध्यक्ष बन गया है....वह लाल बत्ती की सरकारी गाड़ी से सुरक्षा-घेरे के बीच आता-जाता है.
स्कूल में बार-बार फेल होनेवाला इलाके का सबसे बड़ा ठीकेदार बन गया है...
फ्रॉड के केस में जेल जा चुका युवक सरपंच बन गया है....चोरी-चुपके देशी शराब बनानेवाला गाँव का सबसे बड़ा व्यापारी बन गया है...
कोई बात नहीं...मैं फिर भी गाँव आना चाहता हूँ...अपनी यादों को फिर से गाँव की हवाओं में बसाना चाहता हूँ.
मैं वहाँ अपनी पुश्तैनी खेती फिर से शुरू करना चाहता हूँ...अच्छा स्कूल और पुस्तकालय खोलना चाहता हूँ....पढ़ने-लिखने का माहौल बनाना चाहता हूँ....संस्कार-संस्कृति को पुनर्जीवित करना चाहता हूँ....चैता-फाग-बारहमासा की धुनें फिर से गुंजाना चाहता हूँ...खेतों में रोपनी-गीत गवाना चाहता हूँ...
तो आज मैं अपने गाँव जा रहा हूँ...!!!
 धनंजय कुमार

Monday, 24 October 2011

यह कैसा विकास है भाई???


देश विकास कर रहा है,यह ढोल बजा-बजाकर, तरह-तरह के आँकड़े दिखा बताए जा रहे हैं. बेशक आर्थिक आँकड़े सच हों. मगर यह भी एक कठोर सच्चाई है कि देश में गरीबी और गरीबों की संख्या कहीं अधिक बढ़ी है. विकास के इस स्वरूप ने विषमताएँ बढ़ाई हैं. मुट्ठी भर चालाक किस्म के लोग ज़रूर अमीर हुए हैं, किंतु बाहों से भी अधिक लोग गरीब हुए हैं-दरिद्रता की हद तक गरीब. दुखद यह है कि इस बढ़ते भौतिकवाद ने मानवीय संवेदनाएँ भी हमसे छीनी है. हमारी धंनलोलुपता असीमित बढ़ी है. संयुक्त परिवार के बाद अब एकल परिवार भी टूटन की ओर हैं. ये कैसा विकास है, जहाँ हम अंत में अकेले हुए जा रहे हैं!
गाँवों की हालत यह है कि युवा प्रतिभा और मजदूर दोनों शहरों की ओर पलायन कर गए हैं.बचे किसानों को अनिश्चितता ने और बुरी तरह दबोचा है. एक तरफ बाढ़ और सूखे की स्थिति ने उन्हें असहाय बनाया है, वहीं आधुनिक विकास ने उनके सामने मजदूरों की समस्या खड़ी कर दी है.खेती के लिए मजदूर नहीं मिलते, क्योंकि शहर जितनी नगद मजदूरी मजदूरों को देता है, बेचारे किसान नहीं दे सकते.लेकिन यह भी सच है कि ज्यादा पैसे के लालच में मजदूर शहर में नारकीय जीवन जी रहे हैं.लगभग सारे शहरों की स्थिति बिगड़ी है.पलायन की वजह से बढ़ी भीड़ ने शहर की खूबसूरती और चमक-दमक दोनों को ध्वस्त किया है. सड़कों पर जाम की स्थिति हो या नागरिक सुविधाओं की बात हो, हर जगह भीड़ ने कचरा किया है. भ्रष्टाचार को बढ़ाने में भी पलायन की ज़बरदस्त भूमिका रही है.
दूसरी तरफ गाँव प्रतिभा और मजदूरों की समस्या से त्रस्त है.गरीबों का रहना अब ग़ाँव में भी दूभर हो गया है,क्योंकि महँगाई समान अनुपात से बढ़ी है,लेकिन गाँव में कमाई के अवसर न्यूनतम हुए हैं.मजदूरों की कमी के चलते किसान बैल और हलवाहा की जगह ट्रैक्टर आदि से खेती करने को मजबूर हैं,जो कि नगदी की माँग करता है. और किसानों के पास कितनी नगदी होती है, यह बताना शर्मिदा करने जैसा होगा.
आधुनिक विकास ने गाँव को एक और तरीके से भी गरीब बनाया है-ग्रामीण विकास की सरकारी योजनाओं ने पैसों की जो 'बरसात' की है, उसने युवाओं को काहिल और भ्रष्ट बनाया है.गाँव में छूट गए लोग सरकारी धन की लूट में ज़ोर-शोर से लगे हैं. 20 साल का आदमी वृद्धा पेंशन ले रहा है.थोड़ा सा भी चालू-पुर्जा आदमी ठेकेदार बन जाने की जुगत में लगा है.कृषि के नाम पर मिल रहे अनुदानों की बंदरबाँट हो रही है.पंचायत के वार्ड मेंबर से लेकर बीडीओ साहब तक सरकारी लूट का लाभ उठा रहे हैं. और जो कमजोर हैं, मरने को अभिशप्त हैं.शहरों में भी और गाँवों में भी.
यह कैसा विकास है भाई???

Sunday, 16 October 2011

बराबरी और शुद्धता का लोकपर्व है छठ

छठ ठेंठ बिहारी लोकपर्व है, किंतु पिछले कुछ दशकों से इसकी पहचान राष्ट्रीय लोकपर्व के रूप में उभरी है. चूँकि बिहारियों की इस लोकपर्व में अद्भुत श्रद्धा और आस्था है, इसलिए रोटी-रोजगार के चक्कर में प्रवासी बनकर बिहारी जहाँ भी गए, छठ को अपने साथ लेते गए. आज स्थिति यह है कि पटना के गँगा तट से कहीं अधिक मुम्बई के अरब सागर तट और दिल्ली के यमुना तट पर छठ व्रतियों का मेला लगता है.
छठ की शुरुआत कब हुई, इसका कोई प्रामाणिक उल्लेख नहीं है. हाँ, पुराणों में इसकी चर्चा अवश्य है. इसमें सूर्य देवता की पूजा होती है और यह मुख्यतः पुत्र-प्राप्ति के लिए की जाती है. ज्योतिष की मानें, तो सूर्य आत्मा का कारक है और आत्मा की जन्म-मरण से मुक्ति के लिए पुत्र का होना अनिवार्य है. मान्यता यह है कि पितरों की आत्मा तभी तृप्त होती हैं अथवा मोक्ष मिलता है, जब मृत्यु के पश्चात पुत्र मुखाग्नि देता है और श्राद्ध करता है.
यहाँ पर यह जानना भी दिल्चस्प है कि छठ में पूजा सूर्य देवता की होती है, मगर छठि मैयासंबोधित कर पूजा-अर्चना की जाती है.,सूर्य को दूध और जल का अर्घ्य दिया जाता है. इस सन्दर्भ में कथा कुछ इस तरह है कि एक स्त्री को विवाह के बाद कई सालों तक कोई पुत्र नहीं हुआ. ससुराल में सास-ननद ने बाँझ कहकर प्रताड़ित करना शुरू कर दिया. दुखों से मुक्ति के लिए उस स्त्री ने आत्मा के कारक देवता सूर्य की पूजा की. सूर्य के आशीर्वाद से वह गर्भवती हो गई, मगर  सास-ननद की प्रताड़ना कम नहीं हुई. तब भगवान सूर्य ने स्वयं बूढ़ी स्त्री का वेश धरकर माँ की तरह उस स्त्री की सेवा की. प्रसव कराया. पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई. बूढ़ी स्त्री का रूप धारण किए सूर्य भगवान ने अपना परिचय छठि मैयाके तौर पर दिया. तभी से सूर्य को छठि मैया के रूप में पूजा जाने लगा.
यह पर्व साल में दो बार मनाया जाता है- कार्तिक मास और चैत्र मास में. अधिकांश लोग कतिकी छठ करते हैं. मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से छठ का विधान शुरू हो जाता है. चतुर्थी के विधान को संजत या नहाय-खाय बोलते हैं. इस दिन व्रती स्नान कर लौकी और ओल की तरकारी, चने की दाल और अरवा चावल का भात पकाते-खाते हैं. पंचमी को लोहंडा या खड़णा होता है. इस दिन व्रती दिनभर के उपवास के बाद रात में पूजा का प्रसाद ग्रहण करते हैं. फिर वही प्रसाद घर के बाकी सदस्य और आमंत्रित मेहमान खाते हैं. षष्ठी को व्रती फिर उपवास रखते हैं. सूर्यास्त के समय घाट (समुद्र,नदी, तलाब आदि कोई भी स्वच्छ जलाशय का किनारा) पर जाकर सूर्य या कहें छठि मैया को सन्ध्या अर्घ्य देते हैं. अगले  दिन यानी सप्तमी को सुबह का अर्घ्य देकर व्रती अपना निर्जला उपवास तोड़ते हैं. इस तरह सप्तमी को छठ-व्रत सम्पन्न होता है.
छठ को आमतौर पर लोग छठ-पूजा से संबोधित करते हैं. किंतु यह सिर्फ पूजा नहीं है,व्रत है. इसीलिए छठ को वास्तव में छठव्रतकहा गया है और छठ करनेवाले को व्रती. पुजारी या पुजारिन नहीं. व्रत शुद्धता का, पवित्रता का, समानता का, मानवीयता का और साक्षात भक्ति का. इस लोकपर्व में मन,आत्मा और व्यवहार तीनों की शुद्धि- निष्कलुषता ही मूल है. इसीलिए जाति-पाति,ऊँच-नीच और आडम्बरयुक्त धार्मिक कर्मकाण्डों से परे यह पर्व मनाया जाता है. अमीर हों या गरीब सभी एक ही घाट पर जमा हो सूर्य की पूजा करते हैं. उन्हें अर्घ्य देते है. पूजा के सामान और प्रसाद कच्चे बाँस के बने जिस डाला और सूप में रखकर व्रती घर से घाट पर ले जाते हैं, उस डाला या सूप को समाज की सबसे निम्न मानी जानेवाली जाति डोमजाति के लोग बनाते हैं. पूजा-विधान बिना किसी ब्राह्मण के स्वयं व्रती द्वारा किए जाते हैं. निश्चित रूप से ब्राह्मणवाद का इसमें खुला विरोध दर्ज है. परमात्मा से आत्मा के संवाद-सम्पर्क के लिए विभिन्न धर्मों के ब्राह्मणों, पादरियों और मुल्ला-मौलवियों ने जो दीवार खड़ी की है, छठव्रत उसे खारिज करता है और आत्मा को सीधे परमात्मा से जोड़ता है.
आज जबकि पूरी दुनिया में स्त्री-पुरुष की समानता की बात की जा रही है, छठ में स्त्री-पुरुष में कोई भेद नहीं है. सिर्फ स्त्री ही व्रत रखेगी, ऎसी कोई बाध्यता नहीं है, बल्कि पुरुष भी यह व्रत रखते हैं.
ऎसे में छठ पूरे मानव-जाति के लिए कितना प्रासंगिक और महत्वपूर्ण है यह समझा जाने योग्य है और यह जो छठ बिहार के लोकपर्व के रूप में देश-दुनिया में मशहूर हो रहा है, उसे पूरी मानव-जाति के पर्व के रूप में मनाने की आवश्यक्ता है.
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धनंजय कुमार

Friday, 14 October 2011

चाँद से बेहतर माँ


कभी लिखता, कभी मिटाता हूँ, शब्दों से चित्र बनाता हूँ,
ऎ माँ ! तुझे क्या झूठ कहूँ, तुझे चाँद से बेहतर पाता हूँ.

है याद मुझे वो लोरी माँ, तू चाँद के गीत सुनाती थी,
तेरी गोद में सपने बुनते-बुनते नींद मुझे आ जाती थी,
वही चाँद, मगर वो नींद नहीं, क्यों ठगा-ठगा रह जाता हूँ.
ऎ माँ, तुझे क्या झूठ कहूँ, तुझे चाँद से बेहतर पाता हूँ.

माँ ! ममता तेरी, क्षमता तेरी, दूध और भात, कटोरी तेरी,
माँ ! आँचल तेरा, लोरी तेरी, वो मीठी-मीठी थपकी तेरी,
झूठा श्रेय ले जाता था वो, आज समझ मैं पाता हूँ.
ऎ माँ !तुझे क्या झूठ कहूँ, तुझे चाँद से बेहतर पाता हूँ.

चाँद है अपना, झूठा सपना, संकट के पल टूटा सपना,
ये तो सुख का साथी है बस, दूर गगन का वासी है बस,
दुःख के पल बस माँ तुझको ही, अपने पास मैं पाता हूँ,
ऎ माँ ! तुझे क्या झूठ कहूँ, तुझे चाँद से बेहतर पाता हूँ.

परियों वाली सभी कहानी झूठी-झूठी लगती है,
एक कहानी तेरी बस माँ सच्ची- सच्ची लगती है,
भूल गया वो सारे किस्से, तुझको भूल न पाता हूँ,
ऎ माँ ! तुझे क्या झूठ कहूँ, तुझे चाँद से बेहतर पाता हूँ.

तेरा हक़ छीना है सबने, सपनेहों याकि हक़ीकत हो,
समझ गया अब राज सभी, क्योंकि माँ तुम एक औरत हो.
तू तो सबकी जननी है फिर, विवश तुझे क्यों पाता हूँ ?
ऎ माँ ! तुझे क्या झूठ कहूँ, तुझे चाँद से बेहतर पाता हूँ.

धनंजय कुमार

Monday, 10 October 2011

शिक्षा का बेड़ा गर्क किसने किया ?



बाहर के अन्धकार को मिटाने के लिए कई प्रकाशश्रोत हैं-दीया से लेकर सूर्य तक. किंतु अंतर के अन्धकार को सिर्फ शिक्षा ही मिटा पाती है. वह शिक्षा ही है, जिससे मनुष्य स्वयं से लेकर ब्रह्म को जानता है. वह शिक्षा ही है, जो मनुष्य को जानवर से अलग करती है.
वैदिक काल में शिक्षा का यही रूप था. जब गुरूकुल में शिष्य न सिर्फ शास्त्र व शस्त्र आदि की शिक्षा ग्रहण करते थे, बल्कि अपने जीवन, परिवार व समाज से लेकर सम्पूर्ण सृष्टि में किस तरह अपना योगदान कर सकते हैं, वह शिक्षा भी प्राप्त करते थे. गुरुवर सिर्फ पाठ्य विषय पढ़ाना ही अपना कर्तव्य नहीं मानते थे, वरन शिष्य का सर्वंगीण विकास उनका ध्येय होता था, ताकि वह अपना कर्तव्य भली-भांति निभा सके.
मगर शिक्षा का जो स्वरूप आज हमारे सामने है, उसने मानव समाज को “रेसकोर्स” में लाकर खड़ा कर दिया है. बच्चे रेस का घोड़ा हैं और माता-पिता रेस में दाँव लगाने वाले खिलाड़ी. जैसे घोड़े पर दाँव लगाने वाला चाहता है कि उसका घोड़ा सबसे आगे रहे, वैसे ही माता-पिता की हरसंभव कोशिश होती है कि उनके बच्चे हर परीक्षा में सबसे आगे रहें. इस वजह से बच्चों के कोमल मन-मस्तिष्क पर अतिरिक्त दबाव पड़ रहा है. जो शिक्षा माता-पिता के विचार को इतना दबावपूर्ण बना रही है, बच्चों पर उसका कितना विपरीत असर डालती होगी, इसका अनुमान लगाया जा सकता. आए दिन सुनने को मिलता रहता है कि परीक्षा के तनाव से छात्र ने आत्महत्या कर ली. परीक्षा में कम नंबर आने या फेल जाने के बाद विद्यार्थी ने अपनी जानलीला समाप्त कर ली. शिक्षा का काम है व्यक्ति को अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाना. भय से आनंद की ओर ले जाना. फिर ये कैसी शिक्षा है,जो जाने-पहचाने भय और कुंठा की गर्त में खींच रही है. और विडंबना यह है कि हम जानते हुए भी खिंचे चले जाने को मजबूर हैं, सही वाक्य होगा, हम खिंचे जाने को उतावले हैं.
यह शिक्षा अक्षर ज्ञान से शुरू होकर रोटी-रोजगार पर समाप्त हो जाती है. यह पैसे कमाने का कौशल्य तो देती है, मगर जीवन का सच्चा सुख पाने का मार्ग नहीं दिखाती. क्या शिक्षा का कार्य सिर्फ रोटी देना है? पशु-पक्षी व अन्य जीव तो बिना शिक्षा लिए ही पेट भर लेते हैं. फिर बच्चों को शिक्षा दिलाने के लिए होड़ क्यों? 
शिक्षा का वास्तविक अर्थ है जीवन को आसान और आनन्दमय बनाना, परहितकारी बनाना. व्यक्ति सिर्फ स्वयं के लिए न जीकर पूरी सृष्टि के लिए जिए. वह दूसरों के काम आए. लेकिन आज की शिक्षा-व्यवस्था मनुष्य को आत्मकेन्द्रित बना रही है. वह सिर्फ अपने लिए जीना चाहता है. वह सबका जीवन अपने मनमुताबिक जीने की कभी तृप्त न होनेवाली लालसा से भरा है. इसी चाहत ने मानवीय मूल्यों का ज़बर्दस्त क्षय किया है. चारों तरफ भ्रष्टाचार, अनैतिकता और हिंसक प्रवृतियों का बोलबाला है.शिक्षा मनुष्य में नैतिक मूल्य भरती है, मगर ये कैसी शिक्षा है,जो हमें लालची,स्वार्थी और भ्रष्टाचारी बना रही है! जो जितना पढ़ा-लिखा, उतना ही अमानवीय!
हमारी वर्त्तमान शिक्षा व्यवस्था हमें अच्छा डॉक्टर, इंजीनियर, आइपीएस और आइएस तो बनाती है, मगर अच्छा इंसान नहीं बनने देती. विद्यादान कभी सबसे बड़ा दान हुआ करता था, किंतु आज शिक्षा सबसे बड़ा व्यवसाय बन गई है.रुपयों का लाभ सबको दिख रहा है,मगर मानवीय मूल्यों का अपूरणीय नुकसान क्यों किसी को दिखाई नहीं दे रहा ?!
गुरू जिनका दर्जा कभी भगवान से भी ऊपर कहा गया,आज वो गुरू अपना और अपने परिवार का पेट भरने के लिए बस नौकरी कर रहा है. बच्चों ने क्या पढ़ा, इससे उसे कोई सरोकार नहीं, महीने के आखिर में वेतन मिल जाय. क्या शिक्षा आज के गुरू का पैशन है? नहीं. उन्होंने इसलिए शिक्षण को चुना क्योंकि इसी क्षेत्र में जीविकोपार्जन का अवसर मिला.
शिक्षा के क्षेत्र में आई इस विकृति को दूर करने और शिक्षा के वास्तविक स्वरूप को पुनर्स्थापित करने की दिशा में अब थिएटरकर्मी भी जुट गए हैं. थिएटर को आमतौर पर प्रस्तुतियों-प्रदर्शनों और मनोरंजन तक सीमित कर दिया गया है, किंतु थिएटर ऑफ रेलेवेंस ने थिएटर को जीवन में बदलाव से जोड़ा है. थिएटर ऑफ रेलेवेंस ने अब शिक्षा के बदले और बिगड़े स्वरूप को संवारने की मुहिम शुरू की है.
थिएटर ऑफ रेलेवेंस के जनक मंजुल भारद्वाज ने वर्त्तमान शिक्षा पद्दति की इस विकृति को पहचाना है और उससे हो रहे तात्कालिक और दूरगामी दुष्प्रभाव और उससे बचने के उपाय को शिक्षा-समाज के बीच लाने का सूत्र प्रस्तुत किया है. उन्होंने शिक्षकों,छात्रों और पालकों के साथ-साथ पूरे समाज को इस अभियान से जोड़ा है. शिक्षा का अर्थ क्या है? शिक्षित होने का मतलब क्या है? शिक्षक की भूमिका क्या है? पालक की भूमिका क्या है? आदि विषयों पर कार्यशालाओं में लगातार काम कर रहे हैं.इसका बेहतर प्रतिसाद भी मिला है. बच्चों से लेकर पालकों-शिक्षकों सहित पूरे स्थानीय समाज में जागरूकता आ रही है.
थिएटर ऑफ रेलेवेंस परीक्षा में प्राप्त अंक प्रतिशत आधारित शिक्षा की जगह छात्र के मूल्य आधारित शिक्षा पर बल दे रहा है. रोजगारोन्मुखी शिक्षा को वह मूल्यपरक शिक्षा तक विस्तार देने में अग्रसर है थिएटर ऑफ रेलेवेंस.
थिएटर ऑफ रेलेवेंस की कार्यशालाओं में व्यक्ति के जन्म के औचित्य से लेकर उसकी पारिवारिक-सामाजिक भूमिका तक थिएटर के माध्यम से विद्यार्थियों सहित पालकों-शिक्षकों के समक्ष उपस्थित की जाती है. आत्मविश्वास,संवेदनशीलता,सामाजिक-राष्ट्रीय उत्तरदायित्व आदि भावबोध शिक्षा के वास्तविक स्वरूप से साक्षात्कार कराते हैं और एक सम्पूर्ण मनुष्य का निर्माण करते हैं. एक ऎसा मनुष्य जो अपने साथ-साथ पूरे समाज की भलाई के लिए चाहता है. शिक्षा की यही तो भूमिका है कि वह मनुष्य को ‘स्व’ से निकालकर ‘समस्त’ से जोड़ देती है.
धनंजय कुमार  
   

Sunday, 2 October 2011

बापू!आपको जन्मदिन की आत्मिक बधाई!

गाँधी के बहाने
आज 2 अक्टूबर है.भारत के राष्ट्रपिता कहे जाने वाले मोहनदास करमचन्द गाँधी का जन्मदिन.हर साल हमारी सरकारें (केन्द्र व राज्य,  दोनों) गाँधी जयंती मनाती हैं. सारे सरकारी संस्थान भी राष्ट्रपिता का बर्थडेधूमधाम से मनाते हैं. आज के लिए करोड़ों-अरबों रुपयों का बजट रखा जाता है. हर सेमिनार-समारोह में गाँधी को याद किया जाता है. उनके गुणों का बखान किया जाता है. उनके बताए मार्ग पर चलने के सन्देश-उपदेश दिए जाते हैं. दिलचस्प बात तो यह है कि वर्ष 2007 से अंतरराष्ट्रीय बिरादरी भी इस तरह के कार्यक्रम में शामिल हो गई है. गाँधी जयंती को विश्व अहिंसा दिवसके रूप में मनाया जाने लगा है.
मगर क्या इसका कोई औचित्य है? क्या यह सिर्फ ढकोसला और दिखावा नहीं है? क्या जीवन में गाँधी के बिल्कुल विपरीत चलने के अपराधबोध से बचने का यह तरीका है? या आनेवाली पीढ़ी के सामने अपने-आप को निर्मल और उदार साबित करने की महज कबूतर वाली कोशिश?.
जो भी हो,सच्चाई यही है कि स्कूलों,सरकारी संस्थानों,हमारे रुपयों और चौक-चौराहों से लेकर संयुक्त राष्ट्र संघ के दफ्तर तक में मोहनदास करमचन्द गाँधी महात्मा के रूप में पूरी दुनिया में मूर्तियों में विसर्जित कर दिए गए हैं. जीवंत रूप में गाँधी कहीं नज़र नहीं आते. व्यवहार में सर्वत्र सब पर शासन करने की अहंकारी नीयत और हिंसा के लिए हर वक़्त तैयार सूरतें नज़र आती हैं. अमेरिका-चीन हो या सड़क पर ऑटो चलाने वाला या मंचों पर जीवन-दर्शन समझाने वाले बाबा, सब दूसरे पर शासन करने के लिए व्यग्र हैं. सब दूसरे का सुख हड़प लेने की साज़िशों में जुटा हैं.
तो क्या गाँधी और उनके विचार सिर्फ सुखद अहसास भर हैं? उसका वास्तविक जीवन से कोई लेना-देना नहीं?
इसमें कोई दो मत नहीं कि गाँधी सत्तावादियों से जीत नहीं पाए. उन्होंने चाहा था कि भारत का विभाजन न हो, मगर हुआ. उन्होंने चाहा था कि भारतवर्ष में स्वराज आए, आज़ादी के 64 साल बाद भी नहीं आया. सत्ता को अपनी मुट्ठी में रखने की लड़ाई और तेज हुई. उन्होंने चाहा था कि हमारे समाज से अस्पृश्यता समाप्त हो और सारे भारतवासी संयुक्त परिवार सा जीवन जिएँ,मगर अस्पृश्यता क्या समाप्त होगी,संयुक्त परिवार भी लगातार विघटित हो रहे हैं. तो क्या गाँधी के विचार कल्पना भर थे?
कोई भी विचार तबतक काल्पनिक ही लगेगा, जबतक उसे सही तरह से अमल में नहीं लाया जाएगा. गाँधी के विचारों के साथ भी ऎसा ही हुआ. आज़ादी की लड़ाई में उनके सहयोगी नेताओं ने ही उनके साथ धोखा किया. नाथुराम गोडसे ने तो उनके शरीर को गोली मारी, मगर उनके विचारों को गोली मारने का काम उन्हीं लोगों ने किया, जो लोग गाँधी के सबसे विश्वस्त थे, और उनके विचारों के जैसा भारत बनाने की जिम्मेदारी ली थी.

गाँधी ने कहा था-मुझे भारत को केवल अंग्रेजों की पराधीनता से ही मुक्त कराने में दिलचस्पी नहीं है.मैं भारत को सभी प्रकार की पराधीनताओं से मुक्त कराने के लिए कटिबद्ध हूँ. मुझे एक शासक के स्थान पर दूसरे शासक को लाने की जरा भी इच्छा नहीं है.
(हरिजन, 18 अप्रैल 1936). मगर वास्तविकता में हुआ क्या? देश में सिर्फ शासक ही बदला. अंग्रेजों की भाषा से लेकर उसकी शासन-व्यवस्था तक को हुबहू अपना लिया गया.
गाँधी जी का कहना था-सच्चा स्वराज मुट्ठी भर लोगों के द्वारा सत्ता प्राप्ति से नहीं आएगा, बल्कि सत्ता का दुरूपयोग किए जाने की सूरत में, उसका प्रतिरोध करने की जनता की सामर्थ्य विकसित होने से आएगा.” (यंग इंडिया, 10 फरवरी 1927). लेकिन वास्तव में क्या हुआ? जनता ही बेचारी हो गई ! देश के संविधान में ज़रूर लिख दिया गया कि देश का हर नागरिक समान है,मगर क्या वास्तव में समानता है?
गाँधी जी ने यह भी कहा था–“स्वराज का अर्थ है सरकार के नियंत्रण से मुक्त होने का सतत प्रयास, यह सरकार विदेशी हो अथवा राष्ट्रीय.(यंग इंडिया, 10 मार्च 1927).क्या यह होता कभी दिखा? सत्ता के विकेन्द्रीकरण के लिए पंचायती राज की व्यवस्था ज़रूर कायम की गई,मगर आज 64 साल बाद भी सत्ता कुछ लोगों की मुट्ठी में ही है. केन्द्र और राज्य सरकारों का छोटा रूप. आम नागरिक के हाथ लाचारी और कुंठा के अलावा क्या है? वह कोई निर्णय नहीं ले सकता! कहने को तो भारत एक जनतांत्रिक देश है. भारतीय संविधान के अनुसार देश में आम आदमी का शासन है, लेकिन क्या वास्तव में ऎसा है?
वास्तविकता यह है कि आम आदमी को बिल्कुल उल्लू बनाया गया. सिर्फ वोट देने का अधिकार देकर उसके सारे अधिकारों का हरण कर लिया गया. उसे कब,क्या,कितना और कैसे चाहिए, इसका निर्धारण उसके हाथ में होना चाहिए था. गाँधी जी ने इसीलिए ग्रामसभा को शक्ति दिए जाने की बात कही थी, ताकि हर आदमी फैसले में भागीदार बनें. आज़ादी के बाद सत्तावादियों ने यह होने नहीं दिया.
भाषा के स्तर पर भी गाँधी जी का विचार था कि-अपनी संस्कृति की विरासत हमें संस्कृत,हिन्दी,गुजराती आदि देशी भाषाओं के द्वारा ही मिल सकती है.अंग्रेजी को अपनाना आत्मनाश होगा,सांस्कृतिक आत्महत्या होगी.लेकिन हक़ीकत में क्या हुआ? टाई पहनने वाले नेताओं और उनके समर्थकों ने हिन्दी का विरोध कर न सिर्फ ग़ाँधी को ठेगा दिखाया,बल्कि भारतवर्ष का भी बेडा गर्क कर दिया. इन लोगों ने हिन्दी को रोजगार से नहीं जुडने दिया. नतीजा रहा कि गरीब और पिछड़े भारतवासियों को भी मजबूरन अंग्रेजी की शरण में आना पडा. आज अंग्रेजी माध्यम में शिक्षा हासिल करना,हर भारतवासी के लिए गर्व का विषय है. क्या यह आज़ाद भारत के लिए दुर्भाग्य की बात नहीं है ?
अंग्रेजी ही वह कारण है कि आज शिक्षा विद्यादान से छिटककर अरबों-खरबों के कारोबार मे परिवर्तित हो गई है. वरना यह हमारा ही देश है,जहाँ आदरणीय मदनमोहन मालवीय जी ने भिक्षाटन से बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय जैसा अतिप्रतिष्ठित संस्थान खडा कर दिया, जिसपर आज भी हमको गर्व होता है. हिन्दी हमारे लिए कभी गर्व का विषय बनेगी ?  
दरअसल,अंग्रेजों के जाने के बाद भी अंग्रेजी एलिट (कथित पढ़े-लिखे ) की भाषा बनी रही. अंग्रेजी को बडे प्यार से पाला पोसा गया. देश की नौकरियों में उसे सबसे ऊँचा स्थान दिया गया. अंग्रेजी बोलना, अंग्रेजी में काम करना गर्व का विषय बन गया. अंग्रेजी को मुकुट पहनाना देश की अधिसंख्य आबादी को गुलाम बनाए रखने की साज़िश है. देश की 90 प्रतिशत से अधिक जनता आज भी अंग्रेजी से घबराती है. इसलिए न सिर्फ हिन्दी अन्य भारतीय भाषाओं के बोलनेवाले भी अंग्रेजी साज़िश के शिकार हुए. आज़ादी के समय शीर्ष पदों पर बैठे लोगों ने जानबूझकर हिन्दी के खिलाफ शेष भारतीय भाषा-भाषियों को खड़ा किया, ताकि अंग्रेजी नहीं जानने वाली बहुसंख्य आबादी आपस में लड़ती रह जाए और मुट्ठी भर अंग्रेजी जानने वाले और उनकी औलादों के हिस्से देश का सारा सुख आ जाए! हिन्दी के बजाय अंग्रेजी को तरजीह दिया जाना भी गाँधी को धोखा देना है.
गाँधी भारत को गाँवों का देश मानते थे, इसलिए गाँव के विकास में ही देश के विकास को देखते थे.उन्होंने स्वतंत्रता आन्दोलन में अपने योगदान की शुरुआत भी इसीलिए गाँव से ही की थी. गुजरात के खेड़ा गाँव में गांधी जी ने आश्रम बनाया, जहाँ उन्होंने कार्यकर्ताओं को संगठित किया. ग्रामीणों में विश्‍वास पैदा करने के लिए उन्होंने अपना कार्य गांवों की सफाई करने से आरंभ किया.और फिर वहाँ व्याप्त सामाजिक बुराईयों को समाप्त करने के लिए ग्रामीणों को प्रेरित किया. मगर देश के आधुनिक निर्माताओं ने यहाँ भी गाँधी को गच्चा दिया. गाँधी को धकियाकर उन नेताओं ने भारतवर्ष को आधुनिकता और विकास की राह पर दौड़ाने की कोशिश की और गाँवों को बडी चालाकी से हाशिए पर रखा. कृषि को प्रधानता देने के बजाय औद्योगीकरण और गाँव को संवारने के बजाय सिर्फ शहरों में सारी सुविधाएँ जुटाने में देश की पूरी ताकत झोंक दी. नतीजा हुआ गाँव पिछड़ गए और पलायन देश की बड़ी समस्या बन गई.
सिर्फ भारत ही नहीं, पूरी दुनिया हिंसा और आतंकवाद की चपेट में है. हर देश दूसरे देश पर प्रत्यक्ष- अप्रत्यक्ष रूप से शासन करने की लालसा में झूठ, षडयंत्र और हिंसा की नीति पर चल रहा है. ऎसे में गाँधी के जन्मदिन को अहिंसा दिवस के रूप में मनाने की क्या मजबूरी है? भारत की मजबूरी तो समझ में आती है. मगर दुनिया के बाकी देश क्यों मजबूर हुए जा रहे हैं? कहीं यह इंसानियत को पल दर पल त्यागने का अपरोधबोध तो नहीं ?!
कुछ भी हो, हमारे बापू मर के भी ज़िन्दा हैं- मन में न सही,सबकी  आत्मा में उनका स्थान है. उन्हें न तो हमारी धूर्त सरकारें हटा सकती हैं न पाकिस्तान और अमेरिका.
बापू!आपको जन्मदिन की आत्मिक बधाई!    

Saturday, 1 October 2011

जीवनपथ

जीवनपथ पर चलने वाले दुख से मत घबरा,
फूल जो चुनने निकला है,काँटों से भी हाथ मिला.
सुख नहीं जब रह पाया,तो फिर दुख कैसे रह पाएगा,
आना-जाना रीत है जग की,आया है वो जाएगा,
रुकना मत किसी मोड़ पे थककर,आगे क़दम बढ़ा. 
फूल जो चुनने निकला है,काँटों से भी हाथ मिला.

Saturday, 10 September 2011

ग़ाँव को बचाइए !!! वरना सब मारे जाएँगे!!!

मेरी गली 

हमारे गाँव प्रकृति की अनमोल देन हैं. हवा, पानी, मिट्टी, पहाड और पेड-पौधे क्या कुछ नही दिया है प्रकृति ने. मगर बदले मे प्रकृति को हमने क्या दिया? कथित विकास के नाम पर हमने हवा मे चिमनियो का धुआँ भर दिया. पानी मे तरह-तरह की गँदगियाँ घोल दी. मिट्टी मे खाद नाम का ज़हर मिला दिया. पेड-पौधो और पहाडो को नष्ट कर बडी-बडी इमारते और कल-कारखाने बना दिए.
हमारे गाँव आज़ादी के भारत की तस्वीर बदल सकते थे. लेकिन हमारी सरकारो ने गाँव को सदा हाशिए पर रखा. हमे पढाया तो जाता रहा कि भारत गाँवो का देश है,लेकिन देश के विकास की राह शहरो से निकाली गई.नए-नए शहर बसाए गए.शहरो को सँवारने मे तन, मन और देश का अपार धन लगाया गया.मगर गाँव को सँवारना तो दूर बचाने का भी प्रयास नहीं किया गया.आज़ादी के 64 साल बाद भी केन्द्र अथवा किसी राज्य सरकार के पास ग़ाँव को बचाने की कोई नीति या योजना नहीं है.ग्रामीण विकास के नाम पर गाँवो को विकास की अँधी दौड मे जबरन धकेला जा रहा है.गाँवो को सडको से जोडा जा रहा है और सडको  के रास्ते शहर जबरन गाँव मे घुसे आ रहे हैं.और इसका सबसे पहला शिकार हो रहे हैं हमारे उपजाउ खेत.किसानो के खेत एक तरफ विकास के नाम पर सरकार छीन रही है, दूसरी तरफ उँची कीमत का लालच दे बिल्डर और इंवेस्टर.किसान मजबूर हैं.खेती के लिए ज़रूरी इंफ्रास्ट्रक्चर का घोर अभाव है.बिजली नहीं है,किसान मॉनसून के भरोसे हैं. नतीजा खेती चौपट है. कभी बाढ मे फसले डूब जाती हैं तो कभी पानी के अभाव मे फसले सूख जाती हैं. किसान इन विपदाओ से फसलो को उबारकर अच्छी पैदावार कर भी लेते हैं तो उचित बाज़ार मूल्य नहीं मिलता और किसानो को फिर निराशा और कुंठा के गर्त मे डूबना पडता है.इस देश मे बडे व्यापारी से लेकर सडक किनारे बैठा मामूली मोची भी अपनी मेहनत और उत्पाद की कीमत खुद तय करता है, लेकिन किसान अपने अनाज,फूल या फल की कीमत तय नही करता.उसकी कीमत बाज़ार या सरकार तय करती है.खेती करना किसान के लिए घाटे का काम बन गया है. लिहाजा, किसानो का खेती से मोह्भँग होता जा रहा है. किसान अपने बाल-बच्चो को पढा लिखा कर नौकरी के लिए शहर भेजना चाहते हैं,इसके लिए खेत बेचने से भी नहीं झिझकते.और उनके खेत खरीद रहे हैं वे व्यापारी, जिनको पता है, यह ग़ाँव भी कल शहर बन जाएगा और उन्हे अच्छी कमाई होगी. दोस्तो, इस तरह से लगातार हमारे गाँव खत्म हो रहे हैं.हमारे गाँव बचाए जाने चाहिए,क्योंकि गाँव मे ही प्रकृति बसती है.अगर प्रकृति नष्ट हो गई, तो हम भी नही बचेंगे.खेत नही बचेंगे तो चावल, गेहूँ, सब्ज़ी, फल आदि कहाँ से आएँगे? क्या हम कार,कम्प्यूटर खाकर ज़िन्दा रह सकेंगे???

धनंजय कुमार  

Friday, 9 September 2011

आँगन ग्राम गीत



2003 मे मुंबई मे आँगन सोसियो कल्चरल ऑर्गेनाइजेशन द्वारा आयोजित "बिहार गौरव दिवस" पर संबोधित करते संस्था के संस्थापक-अध्यक्ष श्री धनंजय कुमार   

श्रोतागण  

2003 मे मुंबई मे आँगन सोसियो कल्चरल ऑर्गेनाइजेशन द्वारा आयोजित "बिहार गौरव दिवस" पर  उपस्थित विशिष्ट अतिथि  (बाएँ से- श्री विवेक अबरोल,सांसद श्री संजय निरुपम और त्रिपुरा के पूर्व राज्यपाल व प्रख्यात राजनेता-विद्वान लेखक प्रो.सिद्धेश्वर प्रसाद .

2003 मे मुंबई मे आँगन सोसियो कल्चरल ऑर्गेनाइजेशन द्वारा आयोजित "बिहार गौरव दिवस" पर संबोधित करते संस्था के संस्थापक-अध्यक्ष श्री धनंजय कुमार   
हम धार बनें, आधार बनें,हम सृष्टि का श्रृंगार बनें.
हम आस बनें,विश्वास बनें,हर मौसम में मधुमास बनें.

एक है सूरज, चाँद एक है, धरती और आकाश एक है.
एक ग्राम के हम हैं वासी,एक लक्ष्य के हम अभिलाषी.
सुखी रहें हम फूलें फलें,आगे बढ़ें और बढतें रहें.
हम आस बनें,विश्वास बनें,हर मौसम में मधुमास बनें.

कितना सुन्दर गाँव हमारा, प्यारा-प्यारा नदी किनारा.
चहुँ ओर हरियाली डोले हवा में पंछी मिश्री घोले.
कहीं दीप जले, कहीं रंग उड़े,कहीं दादा-पोता संग चले.
हम आस बनें,विश्वास बनें,हर मौसम में मधुमास बनें.

अपने गाँव का पानी-मिट्टी,प्रेमसिक्त जैसे कोई चिट्ठी.
दिन लिखता है शौर्यगीत,जहाँ गाती रात कोई लोरी.
बरगद-पीपल एसी अपने,बिन खाट ही आयें मधुर सपनें.
हम आस बनें,विश्वास बनें,हर मौसम में मधुमास बनें.


अपना गाँव भी है फरटाइल,गली-गली अब है मोबाइल,
शहरका मुँह फिर क्योंकर देखें,अपनी किस्मत खुद ही लिखें.
भीड़ नहीं हम चेहरा बने,हर सक्सेस का सेहरा बनें. 
 हम आस बनें,विश्वास बनें,हर मौसम में मधुमास बनें.

बेटा - बेटी फर्क कहाँ अब,ऊँच जाति का दर्प कहाँ अब,
 हलवाहा कि हलवाला,मिट्टी ने फर्क मिटा डाला .
जब हवा चले,फसलें झूमें,धरती का भाल गगन चूमे.
हम आस बनें,विश्वास बनें,हर मौसम में मधुमास बनें.

                                                         धनंजय  कुमार 

हमारे गाँव



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गाँव !
प्रकृति और मनुष्य की संगमस्थली!
जी हाँ,जिस जगह पर प्रकृति मनुष्य को सीने से लगाती है,वही गाँव है. इसीलिए गाँव जीवनदायिनी है. भोजन के लिए अनाज से लेकर फूल,फल और औषधि के लिए जड़ी-बूटियाँ भी गाँव से ही हमें प्राप्त होते हैं. गाँव किसी भी देश के विकास में अपना बहुमूल्य योगदान करते हैं.
भारत गाँवों का देश है,मगर संभ्रांत वर्ग की दृष्टि में हमारे गाँव देश के लिए बोझ बने हैं. वहां रहने वाले लोग income tax नहीं भरते,मगर vote के चक्कर में सरकार income tax भरने वालों का पैसा शहरों में लगाने के बजाय गाँवों पर खर्च कर रही है.और गाँव के लोग हैं कि मामूली रोज़ी-रोज़गार के लिए भी शहर भागे आ रहे हैं.शहरों में भीड़ बढती जा रही है.
गाँव के लोग भी गावों में नहीं रहना चाहते.वह खेती नहीं करना चाहते,क्योंकि उनके लिए खेती साल दर साल घाटे का कारोबार बनती जा रही है.वह खेत बेचकर भी अपने बाल-बच्चों को ऊँची शिक्षा दिलाना चाहते हैं,ताकि बच्चे अच्छी नौकरी पा सकें और गाँव से पाला छूटे.स्वाभाविक सा प्रश्न है,ऐसा क्यों?
तो उत्तर भी उतना ही सहज है कि गाँव को हमने लगातार कम करके आँका. विकास की धुरी हमने शहर को बनाया और गाँव की लगातार हम उपेक्षा करते रहे.हमारी किताबों में हमें पढाया जाता तो रहा कि भारत गाँवों का देश है,मगर आज़ादी के बाद भी हमारे गाँव विकास की धुरी नहीं बन सके. मुझे यह कहने में कोई झिझक नहीं कि भारत को भले ही 1947 में आज़ादी मिल गयी, लेकिन हमारे गाँव आज भी गुलाम हैं.स्वतंत्रता से पहले अंग्रेज भारतवर्ष से सस्ती कीमत पर कच्चा माल बाहर ले जाते थे और फिर उससे ही सामान बनाकर महँगी कीमत पर भारतवासियों को बेचते थे.वही स्थिति आज गाँवों की है; व्यापारी आलू से लेकर लीची तक गाँव से औने पौने दाम में ले जाते हैं और फिर चिप्स,शराब,जूस आदि के रूप में मंहगी कीमत पर हमें बेचते हैं.यह हमारे आर्थिक नीति निर्माताओं के लिए दशकों पहले सोचने का विषय यह होना चाहिए था कि हमारे किसान,जो देश को खिला-पिला कर तंदुरुस्त रखते हैं, वो अपने खेतों में हल नहीं चला पा रहे हैं और शराब जैसी अज़रुरी चीज़ बनाने वाले लोग हवाई जहाज चला रहे हैं.
सुन रहे हैं लोग...  
धनंजय कुमार