आज 2 अक्टूबर है.भारत के राष्ट्रपिता कहे जाने वाले मोहनदास करमचन्द गाँधी का जन्मदिन.हर साल हमारी सरकारें (केन्द्र व राज्य, दोनों) गाँधी जयंती मनाती हैं. सारे सरकारी संस्थान भी राष्ट्रपिता का ‘बर्थडे’ धूमधाम से मनाते हैं. आज के लिए करोड़ों-अरबों रुपयों का बजट रखा जाता है. हर सेमिनार-समारोह में गाँधी को याद किया जाता है. उनके गुणों का बखान किया जाता है. उनके बताए मार्ग पर चलने के सन्देश-उपदेश दिए जाते हैं. दिलचस्प बात तो यह है कि वर्ष 2007 से अंतरराष्ट्रीय बिरादरी भी इस तरह के कार्यक्रम में शामिल हो गई है. गाँधी जयंती को ‘विश्व अहिंसा दिवस’ के रूप में मनाया जाने लगा है.
मगर क्या इसका कोई औचित्य है? क्या यह सिर्फ ढकोसला और दिखावा नहीं है? क्या जीवन में गाँधी के बिल्कुल विपरीत चलने के अपराधबोध से बचने का यह तरीका है? या आनेवाली पीढ़ी के सामने अपने-आप को निर्मल और उदार साबित करने की महज कबूतर वाली कोशिश?.
जो भी हो,सच्चाई यही है कि स्कूलों,सरकारी संस्थानों,हमारे रुपयों और चौक-चौराहों से लेकर संयुक्त राष्ट्र संघ के दफ्तर तक में मोहनदास करमचन्द गाँधी महात्मा के रूप में पूरी दुनिया में मूर्तियों में विसर्जित कर दिए गए हैं. जीवंत रूप में गाँधी कहीं नज़र नहीं आते. व्यवहार में सर्वत्र सब पर शासन करने की अहंकारी नीयत और हिंसा के लिए हर वक़्त तैयार सूरतें नज़र आती हैं. अमेरिका-चीन हो या सड़क पर ऑटो चलाने वाला या मंचों पर जीवन-दर्शन समझाने वाले बाबा, सब दूसरे पर शासन करने के लिए व्यग्र हैं. सब दूसरे का सुख हड़प लेने की साज़िशों में जुटा हैं.
तो क्या गाँधी और उनके विचार सिर्फ सुखद अहसास भर हैं? उसका वास्तविक जीवन से कोई लेना-देना नहीं?
इसमें कोई दो मत नहीं कि गाँधी सत्तावादियों से जीत नहीं पाए. उन्होंने चाहा था कि भारत का विभाजन न हो, मगर हुआ. उन्होंने चाहा था कि भारतवर्ष में स्वराज आए, आज़ादी के 64 साल बाद भी नहीं आया. सत्ता को अपनी मुट्ठी में रखने की लड़ाई और तेज हुई. उन्होंने चाहा था कि हमारे समाज से अस्पृश्यता समाप्त हो और सारे भारतवासी संयुक्त परिवार सा जीवन जिएँ,मगर अस्पृश्यता क्या समाप्त होगी,संयुक्त परिवार भी लगातार विघटित हो रहे हैं. तो क्या गाँधी के विचार कल्पना भर थे?
कोई भी विचार तबतक काल्पनिक ही लगेगा, जबतक उसे सही तरह से अमल में नहीं लाया जाएगा. गाँधी के विचारों के साथ भी ऎसा ही हुआ. आज़ादी की लड़ाई में उनके सहयोगी नेताओं ने ही उनके साथ धोखा किया. नाथुराम गोडसे ने तो उनके शरीर को गोली मारी, मगर उनके विचारों को गोली मारने का काम उन्हीं लोगों ने किया, जो लोग गाँधी के सबसे विश्वस्त थे, और उनके विचारों के जैसा भारत बनाने की जिम्मेदारी ली थी.
गाँधी ने कहा था-“ मुझे भारत को केवल अंग्रेजों की पराधीनता से ही मुक्त कराने में दिलचस्पी नहीं है.मैं भारत को सभी प्रकार की पराधीनताओं से मुक्त कराने के लिए कटिबद्ध हूँ. मुझे एक शासक के स्थान पर दूसरे शासक को लाने की जरा भी इच्छा नहीं है.”
(हरिजन, 18 अप्रैल 1936). मगर वास्तविकता में हुआ क्या? देश में सिर्फ शासक ही बदला. अंग्रेजों की भाषा से लेकर उसकी शासन-व्यवस्था तक को हुबहू अपना लिया गया.
गाँधी जी का कहना था-“सच्चा स्वराज मुट्ठी भर लोगों के द्वारा सत्ता प्राप्ति से नहीं आएगा, बल्कि सत्ता का दुरूपयोग किए जाने की सूरत में, उसका प्रतिरोध करने की जनता की सामर्थ्य विकसित होने से आएगा.” (यंग इंडिया, 10 फरवरी 1927). लेकिन वास्तव में क्या हुआ? जनता ही बेचारी हो गई ! देश के संविधान में ज़रूर लिख दिया गया कि देश का हर नागरिक समान है,मगर क्या वास्तव में समानता है?
गाँधी जी ने यह भी कहा था–“स्वराज का अर्थ है सरकार के नियंत्रण से मुक्त होने का सतत प्रयास, यह सरकार विदेशी हो अथवा राष्ट्रीय.(यंग इंडिया, 10 मार्च 1927).क्या यह होता कभी दिखा? सत्ता के विकेन्द्रीकरण के लिए पंचायती राज की व्यवस्था ज़रूर कायम की गई,मगर आज 64 साल बाद भी सत्ता कुछ लोगों की मुट्ठी में ही है. केन्द्र और राज्य सरकारों का छोटा रूप. आम नागरिक के हाथ लाचारी और कुंठा के अलावा क्या है? वह कोई निर्णय नहीं ले सकता! कहने को तो भारत एक जनतांत्रिक देश है. भारतीय संविधान के अनुसार देश में आम आदमी का शासन है, लेकिन क्या वास्तव में ऎसा है?
वास्तविकता यह है कि आम आदमी को बिल्कुल उल्लू बनाया गया. सिर्फ वोट देने का अधिकार देकर उसके सारे अधिकारों का हरण कर लिया गया. उसे कब,क्या,कितना और कैसे चाहिए, इसका निर्धारण उसके हाथ में होना चाहिए था. गाँधी जी ने इसीलिए ग्रामसभा को शक्ति दिए जाने की बात कही थी, ताकि हर आदमी फैसले में भागीदार बनें. आज़ादी के बाद सत्तावादियों ने यह होने नहीं दिया.
भाषा के स्तर पर भी गाँधी जी का विचार था कि-“अपनी संस्कृति की विरासत हमें संस्कृत,हिन्दी,गुजराती आदि देशी भाषाओं के द्वारा ही मिल सकती है.अंग्रेजी को अपनाना आत्मनाश होगा,सांस्कृतिक आत्महत्या होगी.” लेकिन हक़ीकत में क्या हुआ? टाई पहनने वाले नेताओं और उनके समर्थकों ने हिन्दी का विरोध कर न सिर्फ ग़ाँधी को ठेगा दिखाया,बल्कि भारतवर्ष का भी बेडा गर्क कर दिया. इन लोगों ने हिन्दी को रोजगार से नहीं जुडने दिया. नतीजा रहा कि गरीब और पिछड़े भारतवासियों को भी मजबूरन अंग्रेजी की शरण में आना पडा. आज अंग्रेजी माध्यम में शिक्षा हासिल करना,हर भारतवासी के लिए गर्व का विषय है. क्या यह आज़ाद भारत के लिए दुर्भाग्य की बात नहीं है ?
अंग्रेजी ही वह कारण है कि आज शिक्षा विद्यादान से छिटककर अरबों-खरबों के कारोबार मे परिवर्तित हो गई है. वरना यह हमारा ही देश है,जहाँ आदरणीय मदनमोहन मालवीय जी ने भिक्षाटन से बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय जैसा अतिप्रतिष्ठित संस्थान खडा कर दिया, जिसपर आज भी हमको गर्व होता है. हिन्दी हमारे लिए कभी गर्व का विषय बनेगी ?
दरअसल,अंग्रेजों के जाने के बाद भी अंग्रेजी एलिट (कथित पढ़े-लिखे ) की भाषा बनी रही. अंग्रेजी को बडे प्यार से पाला पोसा गया. देश की नौकरियों में उसे सबसे ऊँचा स्थान दिया गया. अंग्रेजी बोलना, अंग्रेजी में काम करना गर्व का विषय बन गया. अंग्रेजी को मुकुट पहनाना देश की अधिसंख्य आबादी को गुलाम बनाए रखने की साज़िश है. देश की 90 प्रतिशत से अधिक जनता आज भी अंग्रेजी से घबराती है. इसलिए न सिर्फ हिन्दी अन्य भारतीय भाषाओं के बोलनेवाले भी अंग्रेजी साज़िश के शिकार हुए. आज़ादी के समय शीर्ष पदों पर बैठे लोगों ने जानबूझकर हिन्दी के खिलाफ शेष भारतीय भाषा-भाषियों को खड़ा किया, ताकि अंग्रेजी नहीं जानने वाली बहुसंख्य आबादी आपस में लड़ती रह जाए और मुट्ठी भर अंग्रेजी जानने वाले और उनकी औलादों के हिस्से देश का सारा सुख आ जाए! हिन्दी के बजाय अंग्रेजी को तरजीह दिया जाना भी गाँधी को धोखा देना है.
गाँधी भारत को गाँवों का देश मानते थे, इसलिए गाँव के विकास में ही देश के विकास को देखते थे.उन्होंने स्वतंत्रता आन्दोलन में अपने योगदान की शुरुआत भी इसीलिए गाँव से ही की थी. गुजरात के खेड़ा गाँव में गांधी जी ने आश्रम बनाया, जहाँ उन्होंने कार्यकर्ताओं को संगठित किया. ग्रामीणों में विश्वास पैदा करने के लिए उन्होंने अपना कार्य गांवों की सफाई करने से आरंभ किया.और फिर वहाँ व्याप्त सामाजिक बुराईयों को समाप्त करने के लिए ग्रामीणों को प्रेरित किया. मगर देश के आधुनिक निर्माताओं ने यहाँ भी गाँधी को गच्चा दिया. गाँधी को धकियाकर उन नेताओं ने भारतवर्ष को आधुनिकता और विकास की राह पर दौड़ाने की कोशिश की और गाँवों को बडी चालाकी से हाशिए पर रखा. कृषि को प्रधानता देने के बजाय औद्योगीकरण और गाँव को संवारने के बजाय सिर्फ शहरों में सारी सुविधाएँ जुटाने में देश की पूरी ताकत झोंक दी. नतीजा हुआ गाँव पिछड़ गए और पलायन देश की बड़ी समस्या बन गई.
सिर्फ भारत ही नहीं, पूरी दुनिया हिंसा और आतंकवाद की चपेट में है. हर देश दूसरे देश पर प्रत्यक्ष- अप्रत्यक्ष रूप से शासन करने की लालसा में झूठ, षडयंत्र और हिंसा की नीति पर चल रहा है. ऎसे में गाँधी के जन्मदिन को अहिंसा दिवस के रूप में मनाने की क्या मजबूरी है? भारत की मजबूरी तो समझ में आती है. मगर दुनिया के बाकी देश क्यों मजबूर हुए जा रहे हैं? कहीं यह इंसानियत को पल दर पल त्यागने का अपरोधबोध तो नहीं ?!
कुछ भी हो, हमारे बापू मर के भी ज़िन्दा हैं- मन में न सही,सबकी आत्मा में उनका स्थान है. उन्हें न तो हमारी धूर्त सरकारें हटा सकती हैं न पाकिस्तान और अमेरिका.
बापू!आपको जन्मदिन की आत्मिक बधाई!