Friday, 9 September 2011

आँगन ग्राम गीत



2003 मे मुंबई मे आँगन सोसियो कल्चरल ऑर्गेनाइजेशन द्वारा आयोजित "बिहार गौरव दिवस" पर संबोधित करते संस्था के संस्थापक-अध्यक्ष श्री धनंजय कुमार   

श्रोतागण  

2003 मे मुंबई मे आँगन सोसियो कल्चरल ऑर्गेनाइजेशन द्वारा आयोजित "बिहार गौरव दिवस" पर  उपस्थित विशिष्ट अतिथि  (बाएँ से- श्री विवेक अबरोल,सांसद श्री संजय निरुपम और त्रिपुरा के पूर्व राज्यपाल व प्रख्यात राजनेता-विद्वान लेखक प्रो.सिद्धेश्वर प्रसाद .

2003 मे मुंबई मे आँगन सोसियो कल्चरल ऑर्गेनाइजेशन द्वारा आयोजित "बिहार गौरव दिवस" पर संबोधित करते संस्था के संस्थापक-अध्यक्ष श्री धनंजय कुमार   
हम धार बनें, आधार बनें,हम सृष्टि का श्रृंगार बनें.
हम आस बनें,विश्वास बनें,हर मौसम में मधुमास बनें.

एक है सूरज, चाँद एक है, धरती और आकाश एक है.
एक ग्राम के हम हैं वासी,एक लक्ष्य के हम अभिलाषी.
सुखी रहें हम फूलें फलें,आगे बढ़ें और बढतें रहें.
हम आस बनें,विश्वास बनें,हर मौसम में मधुमास बनें.

कितना सुन्दर गाँव हमारा, प्यारा-प्यारा नदी किनारा.
चहुँ ओर हरियाली डोले हवा में पंछी मिश्री घोले.
कहीं दीप जले, कहीं रंग उड़े,कहीं दादा-पोता संग चले.
हम आस बनें,विश्वास बनें,हर मौसम में मधुमास बनें.

अपने गाँव का पानी-मिट्टी,प्रेमसिक्त जैसे कोई चिट्ठी.
दिन लिखता है शौर्यगीत,जहाँ गाती रात कोई लोरी.
बरगद-पीपल एसी अपने,बिन खाट ही आयें मधुर सपनें.
हम आस बनें,विश्वास बनें,हर मौसम में मधुमास बनें.


अपना गाँव भी है फरटाइल,गली-गली अब है मोबाइल,
शहरका मुँह फिर क्योंकर देखें,अपनी किस्मत खुद ही लिखें.
भीड़ नहीं हम चेहरा बने,हर सक्सेस का सेहरा बनें. 
 हम आस बनें,विश्वास बनें,हर मौसम में मधुमास बनें.

बेटा - बेटी फर्क कहाँ अब,ऊँच जाति का दर्प कहाँ अब,
 हलवाहा कि हलवाला,मिट्टी ने फर्क मिटा डाला .
जब हवा चले,फसलें झूमें,धरती का भाल गगन चूमे.
हम आस बनें,विश्वास बनें,हर मौसम में मधुमास बनें.

                                                         धनंजय  कुमार 

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