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| फोटो- मनोज कुमार |
बिहार के नालंदा ज़िले के बिन्द गाँव में पहली बार पारम्परिक खेती से अलग हटकर
नगदी फसल के तौर पर फूल की खेती शुरू की गई है. परिवर्तन की यह पहल “हमारे गाँव” के सर्जक व प्रयोगकर्त्ता धनंजय कुमार ने की
है.धनंजय कुमार ने यह परिवर्तनकारी शुरुआत अपने ही खेत से की है. अभी उन्होने एक
बीघा खेत में गेंदे की विकसित किस्म पूसा नारंगी और पूसा वासंती लगाई है. फूल
नवंबर महीने से ही खिलने शुरू हो गए हैं. सरमेरा-बिहटा फोरलेन इस खेत से सटकर गुजर
रही है, इसलिए वहाँ से गुजरने वाले अनगिनत ग्रामीणों को आकर्षित कर रहे हैं. बिन्द
सहित पास-पड़ोस के अनेक गाँवों के किसान फूल की इस खेती को लेकर उत्सुक और जिज्ञासु
हैं. लगभग रोज़ ही कोई न कोई किसान धनंजय कुमार से मिलकर फूल की खेती के बारे में
पूछताछ करते हैं. धनंजय कुमार उसके उत्पादन से लेकर मार्केटिंग तक से उन किसानों
को अवगत कराते हैं. अबतक मिलने वाले अधिकांश किसानों ने लाभ को देखते हुए फूल की
खेती करने का मन बनाया है. धनंजय कुमार मिलनेवाले किसानों को न सिर्फ फूलों की
खेती को लेकर जागरूक और प्रोत्साहित कर रहे हैं, बल्कि वह पपीता, केला और मेंथा की
खेती के लिए भी तैयार कर रहे हैं. धनंजय कुमार कहते हैं कि नालन्दा ज़िले की मिट्टी
खेती के लिए बहुत ही उपयुक्त है. उर्वरा शक्ति से भरपूर यह मिट्टी इन नगदी फसलों
के लिए भी मुफीद है. मगर जानकारी के अभाव में यहाँ के किसान अभी भी पारम्परिक खेती
ही कर रहे हैं. पूर्वजों के समय से धान-गेहूँ यहाँ के किसानों की मूल फसल है.
धान-गेहूँ में लाभ का मार्जिन बेहद कम है. अच्छी उपज होने पर भी चार से पाँच हज़ार
रुपए से अधिक का लाभ नहीं होता. इस वजह से यहाँ के किसान लगातार खेती का कार्य छोड़
शहर की ओर नौकरी या किसी अन्य रोज़गार की तलाश में शहर भाग रहे हैं. धनंजय कुमार
पिछले एक साल से इन किसानों के बीच काम कर रहे हैं. वह बताते हैं कि किसान खेती को
लेकर बेहद निराश और उदासीन हैं. ज्यादातर किसान स्वयं खेती नहीं कर रहे हैं, बल्कि
वह बटाईदारों या पट्टा पर खेत लेनेवाले ईंट भट्ठा मालिकों को अपने खेत दे देते
हैं. बटाईदार छोटे किसान या मज़दूर हैं. विडम्बना यह है कि वे लोग भी खेती से बेजार
हो चुके हैं. पारम्परिक खेती में मेहनत की तुलना में कम लाभ और मजदूरों के अभाव के
चलते दिन ब दिन महँगी होती खेती की वजह से किसानों के खेती से दूर होते जाने की
मुख्य वजह है. लेकिन धनंजय कुमार का मुम्बई से आकर खेती के लिए काम करना उन
किसानों के लिए संजीवनी का काम किया है. धनंजय पिछले दो दशक से मुम्बई में पहले
पत्रकारिता फिर टेलीविजन और सिनेमा से जुड़े रहे हैं. पत्रकारिता के क्षेत्र में
जहाँ वह जनसत्ता और दोपहर का सामना से जुड़े रहे, वहीं टेलीविजन और सिनेमा में भी
वह पहले डेली सोप शांति से लेकर शगुन और एक टुकड़ा चाँद का जैसे दसियों सीरियल लिख
तथा हमार घरवाली जैसी सुपरहिट फिल्म निर्देशित कर लेखक व निर्देशक के तौर पर सफल
पारी खेल चुके हैं. इसके अलावा वह “थिएटर ऑफ रेलेवेंस” के सर्जक व प्रयोगकर्त्ता मंजुल भारद्वाज के साथ
वह सालों से थिएटर के माध्यम से बदलाव में अपनी महत्वपूर्ण भागदारी देते रहे हैं.
इसके बाद 2011 में धनंजय कुमार ने “हमारे गाँव” का कॉंसेप्ट गढ़ा, जिसके तहत वह गाँव को मजबूत और
आत्मनिर्भर बनाने की लक्ष्य-साधना में जुटे हैं. धनंजय कुमार इस बात से बेहद
चिंतित है कि विकास की अंधी दौड़ में हमारे गाँव बदरूप शहर में परिवर्तित होते जा
रहे हैं. वह कहते हैं, “हमारे गाँव नष्ट
होते जा रहे हैं. और हमारे गावों के नष्ट होने का मतलब है, हम भारतीयों की पहचान
का नष्ट होना. हमें अपनी पहचान को बचाना है तो हमारे गाँव को बचाना होगा.”
धनंजय कुमार इसी लक्ष्य को लेकर अपने खेतों में
उतरे हैं. अपने गाँव बिन्द को उन्होंने प्रयोगभूमि के तौर पर चुना है, जहाँ वह
खेती के साथ-साथ शिक्षा, सामाजिक-राजनीतिक सुधार और सांस्कृतिक चेतना पर भी काम कर
रहे हैं. बिन्द में अभी वह डेमोंस्ट्रेशन सेंटर तैयार कर रहे हैं, जो आनेवाले
वर्षों में देश में अनुभवपरक सार्थक बदलाव का केंद्र बनेगा.









