Tuesday, 25 December 2012

फूलों की खेती की शुरुआत कर लिखी जा रही बदलाव की नई इबारत

फोटो- मनोज कुमार 

बिहार के नालंदा ज़िले के बिन्द गाँव में पहली बार पारम्परिक खेती से अलग हटकर नगदी फसल के तौर पर फूल की खेती शुरू की गई है. परिवर्तन की यह पहल हमारे गाँव के सर्जक व प्रयोगकर्त्ता धनंजय कुमार ने की है.धनंजय कुमार ने यह परिवर्तनकारी शुरुआत अपने ही खेत से की है. अभी उन्होने एक बीघा खेत में गेंदे की विकसित किस्म पूसा नारंगी और पूसा वासंती लगाई है. फूल नवंबर महीने से ही खिलने शुरू हो गए हैं. सरमेरा-बिहटा फोरलेन इस खेत से सटकर गुजर रही है, इसलिए वहाँ से गुजरने वाले अनगिनत ग्रामीणों को आकर्षित कर रहे हैं. बिन्द सहित पास-पड़ोस के अनेक गाँवों के किसान फूल की इस खेती को लेकर उत्सुक और जिज्ञासु हैं. लगभग रोज़ ही कोई न कोई किसान धनंजय कुमार से मिलकर फूल की खेती के बारे में पूछताछ करते हैं. धनंजय कुमार उसके उत्पादन से लेकर मार्केटिंग तक से उन किसानों को अवगत कराते हैं. अबतक मिलने वाले अधिकांश किसानों ने लाभ को देखते हुए फूल की खेती करने का मन बनाया है. धनंजय कुमार मिलनेवाले किसानों को न सिर्फ फूलों की खेती को लेकर जागरूक और प्रोत्साहित कर रहे हैं, बल्कि वह पपीता, केला और मेंथा की खेती के लिए भी तैयार कर रहे हैं. धनंजय कुमार कहते हैं कि नालन्दा ज़िले की मिट्टी खेती के लिए बहुत ही उपयुक्त है. उर्वरा शक्ति से भरपूर यह मिट्टी इन नगदी फसलों के लिए भी मुफीद है. मगर जानकारी के अभाव में यहाँ के किसान अभी भी पारम्परिक खेती ही कर रहे हैं. पूर्वजों के समय से धान-गेहूँ यहाँ के किसानों की मूल फसल है. धान-गेहूँ में लाभ का मार्जिन बेहद कम है. अच्छी उपज होने पर भी चार से पाँच हज़ार रुपए से अधिक का लाभ नहीं होता. इस वजह से यहाँ के किसान लगातार खेती का कार्य छोड़ शहर की ओर नौकरी या किसी अन्य रोज़गार की तलाश में शहर भाग रहे हैं. धनंजय कुमार पिछले एक साल से इन किसानों के बीच काम कर रहे हैं. वह बताते हैं कि किसान खेती को लेकर बेहद निराश और उदासीन हैं. ज्यादातर किसान स्वयं खेती नहीं कर रहे हैं, बल्कि वह बटाईदारों या पट्टा पर खेत लेनेवाले ईंट भट्ठा मालिकों को अपने खेत दे देते हैं. बटाईदार छोटे किसान या मज़दूर हैं. विडम्बना यह है कि वे लोग भी खेती से बेजार हो चुके हैं. पारम्परिक खेती में मेहनत की तुलना में कम लाभ और मजदूरों के अभाव के चलते दिन ब दिन महँगी होती खेती की वजह से किसानों के खेती से दूर होते जाने की मुख्य वजह है. लेकिन धनंजय कुमार का मुम्बई से आकर खेती के लिए काम करना उन किसानों के लिए संजीवनी का काम किया है. धनंजय पिछले दो दशक से मुम्बई में पहले पत्रकारिता फिर टेलीविजन और सिनेमा से जुड़े रहे हैं. पत्रकारिता के क्षेत्र में जहाँ वह जनसत्ता और दोपहर का सामना से जुड़े रहे, वहीं टेलीविजन और सिनेमा में भी वह पहले डेली सोप शांति से लेकर शगुन और एक टुकड़ा चाँद का जैसे दसियों सीरियल लिख तथा हमार घरवाली जैसी सुपरहिट फिल्म निर्देशित कर लेखक व निर्देशक के तौर पर सफल पारी खेल चुके हैं. इसके अलावा वह थिएटर ऑफ रेलेवेंसके सर्जक व प्रयोगकर्त्ता मंजुल भारद्वाज के साथ वह सालों से थिएटर के माध्यम से बदलाव में अपनी महत्वपूर्ण भागदारी देते रहे हैं. इसके बाद 2011 में धनंजय कुमार ने हमारे गाँवका कॉंसेप्ट गढ़ा, जिसके तहत वह गाँव को मजबूत और आत्मनिर्भर बनाने की लक्ष्य-साधना में जुटे हैं. धनंजय कुमार इस बात से बेहद चिंतित है कि विकास की अंधी दौड़ में हमारे गाँव बदरूप शहर में परिवर्तित होते जा रहे हैं. वह कहते हैं, हमारे गाँव नष्ट होते जा रहे हैं. और हमारे गावों के नष्ट होने का मतलब है, हम भारतीयों की पहचान का नष्ट होना. हमें अपनी पहचान को बचाना है तो हमारे गाँव को बचाना होगा.
धनंजय कुमार इसी लक्ष्य को लेकर अपने खेतों में उतरे हैं. अपने गाँव बिन्द को उन्होंने प्रयोगभूमि के तौर पर चुना है, जहाँ वह खेती के साथ-साथ शिक्षा, सामाजिक-राजनीतिक सुधार और सांस्कृतिक चेतना पर भी काम कर रहे हैं. बिन्द में अभी वह डेमोंस्ट्रेशन सेंटर तैयार कर रहे हैं, जो आनेवाले वर्षों में देश में अनुभवपरक सार्थक बदलाव का केंद्र बनेगा. 

Sunday, 23 December 2012

Dreams are blooming...in village Bind.


Horticulture- to empower the farmers By Dhananjay Kumar.


photo by Manoj Kumar


photo by Manoj Kumar



Photo-Dhananjay Kumar 



Friday, 14 December 2012

VIJAYASH ka DHOOM DHADAKA !

VIJAYASH ka DHOOM DHADAKA
video by ms Rupam Kumari
uploaded by Lalan Kumar Kanj

Tuesday, 11 December 2012

मनरेगा और एफडीआई किसानों के लिए ताबूत में आखिरी कील हैं

फोटो - मनोज कुमार

 धनंजय कुमार
किसानों की स्थिति लगातार बदतर होती जा रही है. केन्द्र व राज्य सरकारें भले ही किसानों की बेहतर स्थिति के लिए अरबों-खरबों रुपयों की सब्सिडी बाँटने और किसानों के हित के लिए सतत कल्याणकारी नीतियाँ बनाने के दावे कर रही हो, मगर सच्चाई बिल्कुल उलट है. अरबों-खरबों की सब्सिडी किसानों के नाम पर बँदरबाँट की भेंट चढ़ रही है और रोज़ किसान अपने खेत छोड़कर भाग रहे हैं या इंडस्ट्री के नाम पर सरकारों व एस्टेट एजेंटों द्वारा जबरन ख्देड़े जा रहे हैं. मैं स्वयं किसान परिवार से हूँ. मेरा लालन-पालन, शिक्षा-दीक्षा सब कृषि की वजह से ही हुआ, मगर आज से 40 साल पहले ही मेरे पिता ने स्वप्न देख लिया था या कहिए कसम ले ली थी कि बेटा किसान नहीं बनेगा. इसी तरह मेरे पिताजी के अन्य मित्रों के बेटे भी अपने पिताओं की चाहत (मजबूरी कहना उपयुक्त होगा) के चलते आज कलेक्टर से लेकर क्लर्क तक बन भारत अथवा किसी राज्य सरकार की चाकरी कर रहे हैं, मगर कोई किसान नहीं बना. सरकार के वैज्ञानिकों के शोध व रिकॉर्ड्स आज भी बताते हैं कि बिहार के नालंदा ज़िले के खेतों की मिट्टी कृषि कार्य के लिए सर्वोत्तम है, बावजूद इसके नालंदा के लगभग युवा खेती छोड़ कोई छोटी-मोटी नौकरी भी करने को लालायित हैं. हाँ सरकारें अपने कृषि विभाग के आँकड़ों के आधार पर ज़रूर दावे कर खुश हो रही है कि कृषि के क्षेत्र में प्रदेश व देश लगातार तरक्की कर रहा है. यही रटंत आँकड़ा नालंदा ज़िले के ही बिन्द प्रखण्ड के दफ्तर में एक दिन चर्चा के केन्द्र में उछला. कृषि विभाग के एक छोटे से कर्मचारी ने गर्व से आँकड़ा प्रकट किया कि हमने कितने हेक्टेयर खेतों में फलाँ-फलाँ फसलें लगवाईं. हमारे ज़िला नालंदा ने आलू से लेकर धान उत्पादन में विश्व रिकॉर्ड बनाए. यह सब सरकार की किसान समर्थक नीतियों और हमारे बेहतर क्रियान्वयन का नतीजा है. इस पर मैंने पूछा कि अगर कृषि के क्षेत्र में इतना उत्साहजनक विकास हुआ है तो यह बताइए कि क्या आपके विभाग के छोटे कर्मचारी से लेकर किसी बड़े अफसर ने इस्तीफा देकर खेती से जुड़ने का एक उदाहरण भी प्रस्तुत किया है? इसपर इस कर्मचारी को बचाव में कोई जवाब नहीं सूझा, वह अ...ब... करने लगा, जबकि बाकी श्रोता हँस पड़े. तो यह है कृषि और किसानों की वस्तुस्थिति, वह भी उस प्रदेश में, जिस प्रदेश के मुख्यमंत्री सालों से देश की हर थाली में अपने प्रदेश के खेतों में उपजे अन्न, फल अथवा सब्ज़ियों से बना एक व्यंजन परोसना चाहते हैं. बहरहाल यह कहने में कोई हिचक नहीं है कि किसानों के नाम पर हर सरकारी नीति और योजना सिर्फ लूट है, और लूट के सिवा कुछ नहीं है. सच यह है कि किसानों की दशा लगातार बिगड़ रही है.
क्यों बिगड़ रहे हैं हालात
गाँधी जी ने आज़ादी का वास्तविक सुख देश के किसानों के घरों में देखना चाहा था, इसीलिए भारत में अंग्रेजों के खिलाफ अपनी लड़ाई उन्होंने चम्पारण के नील की खेती करनेवाले किसानों के साथ शुरू की थी, मगर कालांतर में किसान लगातार हाशिए पर धकेले जाते चले गए. हरित क्रांति को भले ही किसानों की भलाई के लिए प्रचारित किया गया, मगर वह भी देश को भुखमरी से बचाने के क्रम में उठाया गया किसान विरोधी कदम था. इसका नतीजा आज पंजाब के किसान और खेत भुगत रहे हैं. किसान कैसर और कर्ज से ग्रस्त हैं तो खेत लगातार घटते वाटर लेबल और उर्वरा क्षमता से बांझपन के कगार पर हैं.
किसानों की बदहाल हालत के लिए मुख्य रूप से ज़िम्मेदार फैक्टर है सरकारों द्वारा किसानों और उनके खेतों को कम करके आँका जाना. आज़ादी से पहले जिन खेतों पर देश की नब्बे प्रतिशत से अधिक आबादी आश्रित थी, उसको देश की आर्थिक व्यवस्था का आधार मानने के बजाय देश के कर्णधार नेताओं और नौकरशाहों ने इंडस्ट्रीयलायजेशन को मूल आधार बनाया. नतीजा रहा बाज़ार पर किसानों का प्रभुत्व होने के बजाय उद्योगपतियों और व्यापारियों का दबदबा बना. और बनता गया. किसान बाज़ार से दूर मिट्टी तक सीमित कर दिए गए और अंततः मिट्टी में ही मिल गए.
मनरेगा और एफडीआई ताबूत में आखिरी कील हैं
मनरेगा को देश के महान आधुनिक अर्थशास्त्री और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि मानते हुए गर्व से फूले नहीं समा रहे हैं, मगर दरहकीकत यह है कि बाज़ार की मार से अधमरे किसानों के लिए यह ज़हर का काम कर रहा है. मनरेगा के पीछे श्रीमान सिंह और उनके वृदों का सुमधुर गीत यह है कि मनरेगा गाँव से मजदूरों के पलायन को रोकने में कारगर होगा, जबकि सच्चाई यह प्रकट हो रही है मनरेगा के तहत साल के सौ दिन प्रतिदिन लगभग डेढ़ सौ रुपए पानेवाले मजदूर किसानों की पहुँच से बाहर हो गए हैं. पलायन की वजह से मजदूरों की
कमी झेल रहे किसानों पर मजदूरों का महँगा हो जाना सर मुड़ाते ओले पड़ने जैसा है. इसी तरह मनरेगा के बाद एफडीआई किसानों पर और भी भारी पड़ने वाली है. श्रीमान सिंह का तर्क है कि इससे बिचौलियों का सफाया हो जाएगा और किसान को अपनी उपज का अधिकतम मूल्य मिलेगा. बेचारे किसान जो छोटे व्यापारियों से पार नहीं पा रहे थे अब वॉल-मार्ट जैसी मल्टीनेशनल कम्पनी से स्वतः निबट लेंगे, यह हास्यास्पद और मूर्खतापूर्ण सोच नहीं तो और क्या है! अगर यह मूर्खतापूर्ण नहीं है तो फिर देश को पुनः गुलामी की ओर धकेलने का अद्भुत प्रयास ज़रूर है. हे गाँधी!