Thursday, 20 February 2014

हमारे गाँव और ग्राम पंचायतें-3

ग्राम पंचायतें और न्याय व्यवस्था
ग्राम पंचायतें सबको न्याय और समय पर न्याय देने-दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं. मगर अफसोस की बात यह है कि ग्रामपंचायतें इस पहलू पर भी बेहद कमजोर हैं, खाना-पूर्त्ति भर रह गई हैं. रोजगार और बेहतर जीवन की तलाश में पढ़े-लिखे ग्रामीणों के  शहर पलायन कर जाने की वजह से गाँव में न्याय और कानून को बेहतर तरीके से समझ पा सकनेवाले लोगों की बेशक कमी हो गई है, मगर गाँव के छोटे-मोटे झगड़ों और विवादों को सही पंचों के चयन से निबटाना बहुत मुश्किल नहीं है. लेकिन सरकार इस दिशा में भी उदासीन है. ग्रामीण मामलों में न्याय के लिए आरंभिक तौर पर ग्राम पंचायतों के पास जाना अनिवार्य होना चाहिए था, जबकि यह वैकल्पिक है. पुलिस और राजस्व कर्मचारियों को ग्राम पंचायतों के सहयोगी के तौर पर काम करना चाहिए था, मगर ऎसा नहीं है, वे न्याय के अलग और ज्यादा ऑथेंटिक संस्था के तौर पर गाँव में दखल रखते हैं. इस वजह से ग्राम पंचायतों में जाने की बजाय सीधा सरकारी अधिकारियों के पास चले जाते हैं. और ज्यादातर मामले वहीं के वहीं सुलझने के बजाय उलझकर न्यायालय तक पहुँच जाते हैं, जहाँ व्यवस्थागत संसाधनों और न्यायधीशों की कमी की वजह से और हज़ारों-लाखों केस सालों से लम्बित हैं. न्याय व्यवस्था के साथ-साथ आम आदमी का भी समय और धन व्यर्थ बर्बाद होता है.        
खाप पंचायत
ग्राम पंचायती व्यवस्था के बीच हमारे देश के कुछ हिस्सों में एक और तरह की पंचायत सदियों से अस्तित्व में हैं, जो खाप पंचायत के तौर पर जानी जाती है. इसका वजूद पश्चिमी उत्तरप्रदेश और हरियाणा के गाँवों में देखने को मिलता है. इस पंचायत का गठन पूर्वजों ने मूलतः गाँव की पारिवारिक-सामाजिक समस्याएँ सुलझाने के लिए किया था.
‘खाप’ दो शब्दों से मिलकर बना है- और आप‘. ख का अर्थ है आकाश और आप का अर्थ है जल, अर्थात ऐसा संगठन जो आकाश की तरह सर्वोपरि हो और पानी की तरह निर्मल और सब के लिए सुलभ एवं न्यायकारी हो.

पहले खाप पंचायतें सामाजिक समस्याओं एवं कुरीतियों के खिलाफ ऐतिहासिक निर्णय लेने बैठती थीं और अपने स्तर पर ही हर विवाद का निष्पक्ष एवं सर्वमान्य हल करके कानून की मदद किया करती थीं. हाल के वर्षों में भी इन पंचायतों ने दहेज लेने और देने वालों को बिरादरी से बाहर करने और छोटी बारात लाने जैसे फरमान जारी कर कई कुप्रथाओं को खत्म करने में भी रचनात्मक भूमिका निभाई है. मगर आजकल ये सब खाप पंचायतें एक गोत्र के लड़के-लड़की के प्रेम और विवाह के खिलाफ मौत तक का फरमान सुनाने को लेकर चर्चा में ज्यादा है. समय के अनुसार खाप पंचायतें बदल नहीं पाईं और आधुनिक समाज तथा उसकी  बदलती हुई विचारधाराओं के साथ सहज सामंजस्य बिठा नहीं पा रही है. संस्कृति के नाम पर वह पुरानी मान्याताओं को कट्टरता से नई पीढ़ी से मनवाने पर अड़ी है और इस क्रम में वह उन मूल्यों को भी ध्वस्त करने में भी नहीं हिचक रही, जो मूल्य भारतीय धर्म और संस्कृति के प्राण हैं. भारतीय धर्म और संस्कृति मूलतः बेहद उदार है, जो अपने अलावा अन्य विचारों और रीति रिवाजों को समाप्त कर देने के बजाय उन्हें भी सहर्ष साथ चलने देता है. यही वजह है कि एक ही हिन्दू संस्कृति के होने के बावजूद अलग-अलग समुदाय अलग-अलग रीति-रिवाजों को मानते हैं. कहीं एक गोत्र में भी विवाह गलत है, तो कहीं अपने निकट रिश्तेदारों में विवाह भी सहजता और खुशीपूर्वक होता है. और हमारा संविधान भी हमारी उसी संस्कृति को लेकर चल रहा है. हमारा संविधान देश के हर नागरिक को स्वतंत्र रूप से जीवन जीने का अधिकार देता है. खाप पंचायतों को संस्कृति का अन्धानुकरण करने की बजाय समय के अनुसार स्वयं में बदलाव लाकर समाज की उन्नति के लिए काम करना चाहिए. 

Wednesday, 19 February 2014

हमारे गाँव और ग्राम पंचायतें-2

स्वतंत्रता के बाद भी ग्राम पंचायतों को नहीं मिली स्वायत्तता

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद नवनिर्मित भारतीय सरकार ने ग्राम पंचायतों की प्राचीन परम्परा के महत्व को समझते हुए ग्राम पंचायतों को स्थानीय ग्रामीणों द्वारा मतों के आधार पर पंचों का चुनाव करने का अधिकार तो दिया, मगर कामकाज में सरकारी हस्तक्षेप बनाए रखा. लिहाजा पंचायतें अधिकार और संसाधनों के अभाव में प्राचीन प्रतिष्ठा हासिल नहीं कर सकीं और निष्प्रभावी ही बनी रहीं. ग्राम विकास के लिए बनी सारी कमिटियों ने सरकार को कमोवेश यही रिपोर्ट दी कि समुचित अधिकार और संसाधन नहीं होने की वजह से ग्राम पंचायतें अनुकूल लक्ष्य हासिल करने में अक्षम हैं. योजना आयोग द्वारा ग्रामीण क्षेत्र में विकास व गरीबी उन्मूलन से संबंधित प्रशासनिक व्यवस्था की समीक्षा के लिए 1985 में गठित जी. के. वी. राव समिति ने भी अपनी रिपोर्ट में कहा कि लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण की प्रक्रिया के प्रति सरकारों की उदासीनता की वजह से अधिकांश राज्यों में पंचायतें शक्ति, अधिकार और संसाधनों के अभाव में निष्प्रभावी होती जा रही हैं. मगर तमाम सिफारिशों के बावजूद सरकारें पंचायतों को अधिकार व संसाधन संपन्न बनाने के प्रति लापरवाह बनी रहीं. परिणामस्वरूप स्थानीय ग्रामीणों द्वारा ग्राम पंचायतों के प्रतिनिधियों के चुने जाने के बाद भी ग्राम सुधार और विकास में ग्राम पंचायतें कोई उल्लेखनीय परिवर्त्तन लाने में सफल नहीं हो सकीं.

90 के दशक में मिली ग्राम पंचायतों को आंशिक स्वायत्तता      
एल. एम. सिंघवी के नेतृत्व में गठित समिति की रिपोर्ट के आधार पर संसद ने 1992 में 73वें संविधान संशोधन विधेयक पास कर पंचायतों को संविधान की नौवीं सूची में शामिल किया। इसके तहत गाँववासियों के आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय के लिए पंचायतों को योजना बनाने और उसके निष्पादन के अधिकार दिए गए. अतिरिक्त व्यवस्था और उसके निर्बाध संचालन के लिए कर व अन्य शुल्क लगाने और वसूलने का अधिकार भी दिया गया. मगर ग्राम पंचायतों को पूरी स्वायत्तता नहीं दी गई. ग्राम पंचायतें ग्रामसभा की मदद से स्थानीय ज़रूरत के अनुसार योजना बनाने या उसकी प्राथमिकता तय करने को स्वतंत्र नहीं है. गाँव में लागू होने वाले कार्यक्रमों की रूपरेखा राजधानियों के वाताकुलित कमरे से बनकर आती है, जबकि उसे ग्रामसभा में तय किए जाने की ज़रूरत है. इससे शासन में ग्रामीणों की भागीदारी बढ़ेगी और लोकतंत्र मजबूत होगा. कार्यक्रमों के निष्पादन में सरकारी हस्तक्षेप को कम करके उसे पर्यवेक्षक के तौर पर सीमित करने की ज़रूरत है.
             
ग्रामपंचायत, सरकारी कार्यक्रम और भ्रष्टाचार
बावजूद इसके सरकार ने गाँवों के सुधार और विकास के लिए जितने सारे कार्यक्रम चला रखे हैं अगर सही तरह से क्रियान्वित हो जाएँ तो सचमुच गाँव की कायापलट हो सकती है, मगर ग्राम पंचायतों के प्रतिनिधि और सरकारी अधिकारी सुधार और विकास के सरकारी कार्यक्रमों में जोंक की तरह चिपक गए हैं. ग्राम पंचायतें भी उसी तरह भ्रष्ट हो गई हैं, जैसे बाकी सारी सरकारी व्यवस्थाएँ. ग्राम पंचायतों के प्रतिनिधि सरकार के सुधार और विकास के कार्यक्रमों के लिए भेजी गई धनराशि के एक बड़े हिस्से की बँदरबाँट कर लेते हैं. इसमें सरकारी अधिकारियों का शेयर भी तय रहता है और गाँव के सुधार और विकास के कार्यक्रम आधे-अधूरे और अनुपयोगी रह जाते हैं. भवन, गली, पुलिया, नाली, चापाकल आदि सभी की गुणवत्ता निम्नतर स्तर की होती है, जो कुछ दिनों-महीनों बाद खराब होने लगते हैं.
ग्रामीण सब जानते-देखते हुए भी चुप रह जाते हैं, क्योंकि विभिन्न सरकारी योजनाओं में हर ग्रामीण किसी न किसी तरह जायज या नाजायज लाभांवित हो रहा है. राशन दुकानों में मिलने वाले किरासन तेल से लेकर अनाज तक तो वृद्धा पेंशन से लेकर इन्दिरा आवास    और पोशाक-साइकिल लेने से लेकर छात्रवृति पाने के लिए बनाये जाने वाले आय प्रमाण तक, लगभग हर ग्रामीण भ्रष्ट रास्तों पर चलकर लाभ हथियाने में जुटा है. ऎसे में भ्रष्टाचार पर शिकायत करने का नैतिक साहस कोई कहाँ से लाए? जो लोग जायज तौर पर सरकारी योजनाओं के लाभ का हकदार होने के बाद भी सरकारी योजनाओं का लाभ उठा पाने से वंचित हैं, वे बेचारे निहायत ही कमजोर हैं. वह अपना जायज हिस्सा पाने के लिए आवाज उठाना तो चाहते हैं, मगर कहाँ और कैसे, नहीं मालूम. और क्या सरकारी धन की लूट के उत्सव की गूँज में कोई उनकी आवाज सुन भी पाएगा.
फिर ज्यादातर जनप्रतिनिधि बाहुबली और आपराधिक पृष्ठभूमि के होते हैं, इसलिए कोई इन भ्रष्ट प्रतिनिधियों से दुश्मनी नहीं लेना चाहता. और कोई दुश्मनी ले भी तो क्यों? खर्च हो रहा पैसा उनका अपना नहीं, सरकारी है, और न ही जो कुछ बन रहा है, उसका इस्तेमाल सिर्फ वही करनेवाले हैं, फिर जब कोई और किए जा रहे भ्रष्टाचार के खिलाफ बोलने को तैयार नहीं है, तो वह अकेला क्यों बोले? फिर कोई जोखिम लेकर शिकायत करता भी है तो जाँच अधिकारी ले-देकर मामले को रफा-दफा कर देते हैं.          
ग्राम पंचायतों के जनप्रतिनिधियों को भी भ्रष्ट बनाने में देश की दोषपूर्ण चुनावी व्यवस्था बड़ी भूमिका निभा रही है. चुनाव लड़ने और जीतने के खर्चे ग्रामपंचायतों के चुनाव में भी बढ़ते जा रहे हैं. विधायक और सांसद की तरह मुखिया, सरपंच और पंच के चुनाव में भी चुनाव प्रचार के नाम पर हजारों-लाखों रुपए खर्च करने के साथ- साथ वो तमाम हथकंडे अपनाए जाने लगे हैं, जो चुनाव जीतने के लिए आवश्यक हैं. चुनाव से एक या दो दिन पहले वोटरों को दारू पिलाने से लेकर नकदी रुपए तक बाँटे जाते हैं. ग्रामपंचायतों के कमजोर होने की एक और बड़ी वजह जातिवाद भी है, जिसकी वजह से मतदान के समय योग्य उम्मीदवार को चुनने की बजाय लोग अपनी जाति के बदमाश और भ्रष्ट उम्मीदवार को चुनना पसंद करते हैं. अब गलत तरीके से चुने गए प्रतिनिधि अच्छा और ईमानदार काम करेंगे, इसकी कल्पना ही बेकार है.
        
कमजोर ग्रामसभा
भ्रष्टाचार नियंत्रण में ग्रामसभा बेहद प्रभावी हो सकती थी, मगर, आजादी के बाद भी गाँव में कृषि, रोजगार और अन्य नागरिक सुविधाओं की स्थिति में यथोचित सुधार नहीं हो पाने की वजह से गाँव के किसानों के बेटे-बेटियों का पढ़-लिखकर भी गाँव नहीं लौट पाना और युवा मजदूरों का रोजगार के लिए शहर की ओर पलायन की वजह से गाँव में जागरूक और समझदार लोगों की कमी हो गई है. गाँव की आबादी में अब गरीबों और मजदूरों का ही बाहुल्य है. जो न तो पढ़े-लिखे हैं और न ही बाहुबल में उतने मजबूत कि गाँवों में सक्रिय बदमाशों और धूर्त्तों का मुकाबला कर सकें. ऎसे में बदमाश और धूर्त्त किस्म के लोगों की चाँदी हो गई है.

दुखद यह है कि सरकारी मशीनरी भी इस दिशा में पूरी तरह उदासीन है. शिकायत की जाँच कर दोषियों पर कार्रवाई का पारम्परिक तरीका लगभग फेल हो चुका है. यह महज खानापूर्त्ति भर बनकर रह गया है. इसलिए भ्रष्टाचार को रोकने और भ्रष्टाचारियों को पकड़ने का कोई नया और प्रभावी तंत्र ढूँढना होगा. ग्राम पंचायतों में सही प्रतिनिधियों की भागीदारी और पंचायतों का ठीक तरह से संचालन सरकारी ग्राम सुधार व विकास कार्यक्रमों के माध्यम से गाँवों की दशा को बहुत हद तक सुधार सकता है. ग्रामीणों को सरकारी कार्यक्रमों के प्रति जागरूक बनाकर ग्रामसभा को मजबूत कर भ्रष्ट और धूर्त्त जनप्रतिनिधियों तथा सरकारी कर्मचारियों-अधिकारियों पर नकेल कसी जा सकती है.

शेष आगे.... 

Tuesday, 18 February 2014

हमारे गाँव और ग्राम पंचायतें-1

ग्राम पंचायतें हमारे गाँव के सुधार और विकास में क्रांतिकारी और असाधारण भूमिका निभा सकती हैं. क्योंकि गाँव के सरोकार वहाँ रह रहे सभी ग्रामीणों से गहरे जुड़े हैं. हमारी ग्रामीण संरचना इस तरह की है कि परिवार और बिरादरी से अलग भी हर व्यक्ति के हित अहित आपस में गहरे और पारस्परिक तौर पर जुड़े हैं. भाषा, पहनावा, संस्कृति और विचार सब के एक से होने के कारण अलग-अलग घरों में रहकर भी सब आपस में भावनात्मक तौर पर एक दूसरे से जुड़े हैं. फिर वर्ण और जाति व्यवस्था के आधार पर बँटे सबके कार्य भी सबको एक दूसरों से जोड़ते हैं. फिर प्रकृति भी सबको एक सी प्रभावित करती है. बाढ़-सूखा, सर्दी-गर्मी सबपर एक सा असर डालते हैं. इसीलिए हमारे पूर्वजों ने ग्राम पंचायतों की अवधारणा पर गहरे काम किया. इतना गहरा कि चाणक्य जैसे कूटनीतिज्ञ ने ग्राम पंचायत को राजनीति की इकाई कहा.
जो सबसे कम शासन करे वही उत्तम सरकार मानी जाती है. हमारी ग्राम पंचायतें इसका सबसे बढ़िया उदाहरण है. राजनीतिक सत्ता का अर्थ है जन प्रतिनिधियों द्वारा उपलब्ध संसाधनों और उसके उपभोग का सही नियोजन कर सामूहिक जीवन को सरल और आनन्दमय बनाना. अगर सामाजिक जीवन इतना पूर्ण हो जाए कि व्यक्ति स्वयं ही स्वयं को नियमबद्ध कर ले तो फिर किसी पर सता की आवश्यकता ही नहीं रह जाती और न ही प्रतिनिधित्व के लिए संघर्ष रह जाता है. जैसे परिवार में प्रतिनिधित्व के सवाल पर कभी कोई मतभेद या किसी सदस्य का निजी स्वार्थ नहीं उभर पाता. परिवार का बड़ा या कोई अन्य योग्य सदस्य बिना किसी औपचारिक प्रक्रिया के परिवार का प्रतिनिधि यानी मुखिया बन जाता है. हरएक व्यक्ति स्वतंत्र भी होता है और जवाबदेह भी. परिवार में सत्ता होते हुए भी किसी सत्ता का अहसास नहीं होता. शायद इसी बुनियाद पर हमारे पूर्वजों ने पूरी वसुधा को अपना कुटुम्ब माना था और ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ का विचार गढ़ा था.
राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी राज्य की सत्ता को केन्द्रित और संगठित रूप में हिंसा का प्रतीक मानते थे. उनका सोचना था कि जाहिर तौर पर तो राजसत्ता शोषण को कम से कम करके लाभ पहुँचाती है, परंतु व्यक्तित्व, जो सब प्रकार की उन्नति की जड़ है, उसको नष्ट कर देती है. इसलिए वह राज्य के हाथों में सत्ता केन्द्रित न करके ट्रस्टीशिप की भावना का विस्तार करने का विचार रखते थे. जैसा कि हमारे संयुक्त परिवारों में देखने को मिलता है. इसी वजह से वह ग्राम पंचायतों को सबसे अधिक मजबूती दिलाना चाहते थे.   

पंचायत की अवधारणा
पंचायत की अवधारणा हमारे गाँव में प्राचीन काल से रही है. यह शब्द संस्कृत भाषा के पंचायतन् शब्द से बना है. पंचायतन यानी पाँच व्यक्तियों का समूह. मनुस्मृति के अनुसार गाँव के प्रधान को ग्रामिककहते थे. ग्रामिक गाँवों से कर वसूलने का कार्य करता था. मौर्यवंश के संस्थापक चन्द्रगुप्त मौर्य के राजनीतिक, आर्थिक और कूटनीतिक सलाहकार चाणक्य ने ग्राम को राजनीतिक इकाई के तौर पर वर्णित किया है. उस समय भी ग्राम के प्रधान को ‘ग्रामिक’ ही कहा जाता था, जिसे गाँव से जुड़े सारे राजनीतिक अधिकार प्राप्त थे. इतिहासकार बताते हैं कि भारत का स्वर्णिमकाल कहे जाने गुप्तकाल भी में ‘ग्राम’ शासन की सबसे छोटी इकाई था, जिसके प्रमुख को ‘ग्रामिक’ कहा जाता था. ग्रामिक ‘पंचमंडल’ यानी  पंचायत की सहायता से ग्राम का शासन चलाता था। पंचायत के सदस्य गाँव के वृद्ध होते थे. ग्रामिक और ग्राम पंचायत, ग्रामसभा के सहयोग से गाँव की समस्याओं को हल करते थे.  ग्रामपंचायत को युद्ध करने और सन्धि करने, इन दो अधिकारों को छोड़कर राज्य व शासन के शेष सभी अधिकार प्राप्त थे. 
ग्राम पंचायतों में शासन का हस्तक्षेप
ग्राम पंचायत में शासन का सीधा हस्तक्षेप शुरू हुआ मुस्लिम शासन काल से, जब  मुस्लिम शासकों ने गाँव पर अपना नियंत्रण रखने के लिए तीन अधिकारी बहाल किए- गाँव की देखभाल के लिए ‘मुकादम’, झगड़े निबटाने के लिए ‘चौधरी’ और राजस्व संबंधी कार्य के लिए ‘पटवारी’. मगर ग्राम पंचायत व्यवस्था भी चलती रही और गाँव आत्मनिर्भर बने रहे. मगर अंग्रेजों ने पूरी तरह से गाँव की व्यवस्था को अपने नियंत्रण में कर लिया. ग्रामपंचायतों को चलने तो दिया मगर उनके अधिकार सामाजिक जीवन और रीति-रिवाजों तक सीमित कर दिए. ग्राम पंचायतों से उसके राजनीतिक, आर्थिक और न्यायिक अधिकार पूरी तरह छीन लिए गए और गाँवों की स्वायत्तता खत्म कर दी. इस तरह, गाँव की व्यवस्था को सभी ग्रामवासियों के सहयोग से, जनतांत्रिक तरीके से चलाने की महान परंपरा ‘ग्राम पंचायत’ का लगभग अंत कर दिया गया.

किंतु स्वतंत्रता आन्दोलन के जोर पकड़ने के बाद अंग्रेजों को सत्ता के विकेन्द्रीकरण के लिए बाध्य होकर 1907 के विकेन्द्रीकरण संबन्धी शाही कमीशन की सिफारिश के बाद अंग्रेजी सरकार को ग्राम पंचायत की परम्परा को पुनर्स्थापित करना पड़ा. हालाँकि शासन ने ग्राम पंचायतों को फैसले लेने का अधिकार नाम मात्र का ही दिया. फिर 1919 में अंग्रेजी सरकार ने जब प्रांतीय सरकारों को स्वशासन के सीमित अधिकार दिये, तो पंचायत अधिनियम भी बनाए, और ग्राम पंचायतों को स्वास्थ्य, स्वच्छता और तालाबों आदि की देखभाल के साथ-साथ छोटे-मोटे मामलों में न्याय करने के अधिकार दिए. मगर इन पंचायतों का स्वरूप हमारी प्राचीन पंचायती व्यवस्था जैसा जनतांत्रिक और स्वायत्त नहीं था. पंच स्थानीय ग्रामीणों द्वारा चुने जाने के बजाय सरकार द्वारा मनोनीत किए जाते थे.
शेष अगले भाग में... 

Thursday, 13 February 2014

हमारे गाँव को सही शिक्षा की ज़रूरत

हमारे गाँव और शिक्षा
शिक्षा मनुष्य की बुनियादी ज़रूरत है. बिना शिक्षा के न तो सम्मानपूर्वक जीवन यापन किया जा सकता है और न ही जीवन का वास्तविक-आध्यात्मिक मूल्य ही समझा जा सकता है.  हमारे पूर्वज शिक्षा के महत्व को अच्छी तरह जानते थे, इसीलिए उन्होंने शिक्षा देनेवाले आचार्यों और गुरुओं को भगवान के तुल्य माना. गुरू की तुलना त्रिदेव- ब्रह्मा, विष्णु और महेश से की है. यानी गुरू ब्रह्मा की तरह जन्मदाता हैं, विष्णु की तरह पालनकर्त्ता हैं और  महेश की तरह शिष्य के मार्ग में आनेवाली बाधाओं के संहारक हैं. इस तरह गुरू साक्षात् परमब्रह्म हैं यानी गुरू ज्ञानमय परमात्मा हैं.
आरंभ में गुरुकुल शिक्षा के प्रमुख केन्द्र थे. जहाँ गुरु के सान्निध्य में विद्यार्थी गुरू-शिष्य परम्परा के तहत शिक्षा ग्रहण किया करते थे. इसके लिए विद्यार्थियों को घर का त्यागकर गुरू के साथ उनके आश्रमों में रहना पड़ता था. गुरुकुल का खर्च भिक्षाटन और गाँवों के सहयोग से चलता था. हमारे गाँवों ने यही परम्परा उच्च शिक्षा में भी कायम रखी. इतिहासकार बताते हैं कि उच्च शिक्षा के लिए भारत वर्ष के बाहर भी विख्यात नालन्दा विश्वविद्यालय का खर्च आसपास के दो सौ गाँवों की आय से चलता था. विद्यार्थियों को शिक्षा, आवास, भोजन आदि सभी सुविधाएं नि:शुल्क थीं. यह जानकर मन आत्मगौरव से भर जाता है कि उस समय हमारे गाँव इतने सबल और आत्मनिर्भर थे!
शिक्षा की हमारी इस महान परम्परा को मुस्लिम आक्रमणकारियों ने नष्ट कर दिया. और तबसे हम शिक्षा में पिछड़े तो पिछड़ते ही चले गए, क्योंकि उसके बाद हम लगातार गुलाम ही रहे. मुस्लिमों ने विश्वविद्यालय नष्ट किए और अंग्रेजी हुकूमत ने आधुनिक शिक्षा देने  के नाम पर हमारे गाँव में अबतक चल रहे गुरूकुलों को मृतप्राय बना दिया.         
स्वतंत्रता के बाद भी हमारे गाँव में शिक्षा की स्थिति सुधरी नहीं, बल्कि अब तो दिनोंदिन और भी दयनीय होती जा रही है. हालाँकि हमारी सरकार ने शिक्षा को बच्चों के मौलिक अधिकार में शामिल कर 6 साल से 14 साल तक के बच्चों की शिक्षा को आवश्यक कर दिया है, ताकि सभी बच्चे अनिवार्य तौर पर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त कर सकें और ज्ञान, कौशल और मूल्यों से लैस होकर भारत का प्रबुध्द नागरिक बन सकें. यह अधिनियम गाँव के बच्चों को शिक्षा देने का की दिशा में बेहतर सुधार कर सकता है. मगर अभीतक सरकार विर्द्यार्थियों को बेहतर शिक्षा देने की जगह वोटबैंक तैयार करने की संभावनाओं पर काम कर रही दिखती है. जीवन-मूल्य परक शिक्षा की क्या बात करें, गाँव के इन स्कूलों में जीवन यापन के लिए रोजगार पाने योग्य शिक्षा भी नहीं मिल पा रही है. हालाँकि गाँव के बच्चों को शिक्षा देने के लिए सरकार ने विद्यालयों की संख्या तो बढ़ाई है. 2012 एक सर्वे के अनुसार, ग्रामीण इलाकों के 6-14 साल के 96.5% बच्चों को स्कूल से जोड़ा जा चुका है. मगर यह डेटा सिर्फ हमारे नेताओं और शिक्षा अधिकारियों के खुश होने के लिए अच्छा है. वस्तुस्थित यह है कि ग्रामीण क्षेत्रों के इन स्कूलों के रजिस्टरों में जितने विद्यार्थियों की संख्या दर्ज है, उनका संबंध स्कूलों से मध्याह्ण भोजन, पोशाक और साइकिल लेने भर से है, पढ़ाई से नहीं. गुरू भी अब ज्ञानमय परमात्मा नहीं, अपना जीवन यापन करने के लिए सरकारी नौकरी करनेवाले शिक्षक बन गए हैं. अफसोस तो यह है कि हमारे गाँव के स्कूलों में ऎसे शिक्षकों की भी भारी कमी है.
दरअसल हुआ यह कि सारे बच्चों को शिक्षा देने की कवायद में विद्यालय तो बनते चले गए, मगर प्रशिक्षित शिक्षकों को उसी अनुपात में तैयार करने की दिशा में गुणात्मक कार्य नहीं किया गया. और पहले से विभिन्न स्कूलों में पदस्थापित प्रशिक्षित शिक्षकों को ही नए स्कूलों में स्थानांतरित कर दिया गया. इस तरह सभी स्कूलों में शिक्षकों की कमी हो गई. इसकी भरपाई राज्य सरकारों ने कॉंन्ट्रैक्ट बेसिस पर अप्रशिक्षित शिक्षकों की नियुक्ति कर करने की नीति बनाई. मगर, यह नीति भ्रष्टाचार को बढ़ाने वाली और अयोग्य शिक्षकों की भर्त्ती करनेवाली साबित हुई है. प्रशिक्षित शिक्षकों के अभाव और वास्तविक वेतन दे पाने में असमर्थ सरकारें शिक्षकों को तय मापदंडों पर परखकर नियुक्त करने के बजाय कॉन्ट्रैक्ट बेसिस और कम वेतन पर शिक्षकों को नियुक्त कर रही है. इस वजह से ये अप्रशिक्षित शिक्षक (अनट्रेंड टीचर) बच्चों को सही तरह से पढ़ाने में अक्षम तो हैं ही, कम वेतन पाने से असंतुष्ट भी. फिर मध्याहण भोजन, पोशाक और साइकिल वितरण की जिम्मेदारी भी सरकार ने इनपर लाद दी गई है. नतीजा है, शिक्षा के नाम पर सरकारें ज्यादा से ज्यादा बच्चों को स्कूल से जोड़ने की कामयाबी पर डेटा द्वारा तो अपनी पीठ थपथपा ले रही है, मगर शिक्षा और उसकी गुणवत्ता बिल्कुल ही चौपट हो गई है. स्थिति यह है कि दसवीं पास विद्यार्थी को भी किताब तक पढ़ना नहीं आता. ऎसी शिक्षा किस काम की?
शिक्षा की ऎसी दुर्गति के लिए सरकार की राजनीति से प्रेरित शिक्षानीति सर्वाधिक जिम्मेदार है. देश के 6 वर्ष से 14 वर्ष तक के हर बच्चे को स्कूल से जोड़ने की कवायद में सरकार ने शिक्षा का सत्यानाश कर दिया है. शिक्षा मद की राशि का एक बड़ा भाग मध्याह्ण भोजन, किताबें, पोशाक और साइकिल आदि बाँटने में खर्च कर दिया जा रहा है. शिक्षा के लिए ज़रूरी योग्य शिक्षक और शिक्षण समय उपेक्षित रह जाता है.
यह सच है कि गाँव में स्कूलों से दूर सिर्फ उनके ही बच्चे हैं, जो गरीब हैं और जिनको अपने बच्चे को स्कूल भेजने से ज्यादा लाभदायक दिखता है, बच्चों को काम पर भेजना या अपने साथ काम करवाना. गाँवों में इनकी संख्या अधिकतम हैं. सरकार की मध्याह्ण भोजन, पोशाक और साइकिल आदि योजना ने इनके बच्चों को स्कूल से जोड़ा भी है. हालाँकि अब भी ढेर ऎसे बच्चे हैं, जो स्कूल नहीं जाते, वजह है उनके माता-पिता में शिक्षा के प्रति सही जागरूकता का अभाव और शिक्षा के नाम पर चलाई जा रही रस्मी शिक्षा से उनका मोहभंग.    सरकारी कवायद में चौपट हुई पढ़ाई व्यवस्था ने उन परिवारों को मायूस कर दिया, जो गाँव में रहकर थोड़ी-बहुत खेती और छोटा-मोटा व्यापार कर रहे हैं. वह शिक्षा के महत्व को समझते हैं और अपने बच्चे को अच्छी शिक्षा दिलाना चाहते हैं. इस वजह से अब गाँव में भी प्रायवेट स्कूलों का चलन शुरू हो गया है. हालाँकि उन स्कूलों में शिक्षा का स्तर बेहद खराब है, क्योंकि ठीक-ठाक पढ़े-लिखे युवा गाँव में न तो रहना चाहते हैं, न जाना चाहते हैं, क्योंकि उन्हें मालूम है कि गाँव में उनका भविष्य संवरने के बजाय चौपट ही होगा.         
गाँव के स्कूलों में शिक्षा का माध्यम क्या हो, इस पर भी सरकारें अबतक कंफ्यूज हैं. नौकरियों में अंग्रेजी माध्यम से पढ़े विद्यार्थियों की प्रधानता है, मगर हमारे गाँव के स्कूल अंग्रेजी माध्यम तो जाने छोड़िए, विषय के तौर पर पढ़ा पाने में भी फिसड्डी है. नतीजा है, पढ़ाई को लेकर गंभीर छात्र भी अंग्रेजी में कमजोर होने की वजह से आत्मविश्वास में कमी का शिकार शो जाते हैं, और शहरी छात्रों की तुलना में आत्महीनता से ग्रस्त हो जाते हैं. इस वजह से अच्छी नौकरियों में भी उन्हें अपेक्षित सफलता नहीं मिलती. और ज्यादातर छात्र डिग्री होल्डर होकर भी बेरोजगार रह जाते हैं, या फिर छोटी-मोटी नौकरी कर शिक्षा का लाभ उठाने से वंचित रह जाते हैं.
गाँव के विद्यार्थी दसवीं तक तो किसी तरह पढ़ ले रहे हैं, मगर कॉलेज की शिक्षा के लिए अभी भी वे शहरों पर ही आश्रित हैं. शहरों में किराये पर रूम लेकर रहना व अन्य ज़रूरतें पूरी करने में उन्हें हर महीने कमसेकम एक हज़ार रुपए की ज़रूरत पड़ती है. इनके माता-पिता जब प्राइमरी शिक्षा दिलाने में भी आर्थिक तौर पर असमर्थ हैं, तो अपने बच्चों को वे कॉलेज की शिक्षा कैसे दिला पाएँगे? इस विषय पर सरकार पूरी तरह मौन है. हमारी सरकारों को इस पर विचार करने की ज़रूरत है.
इनके लिए ब्लॉक स्तर पर कॉलेज खोले जाने की ज़रूरत है. सरकार के सामने यह एक मुश्किल टास्क है, क्योंकि इसके लिए काफी धन और योग्य शिक्षकों की आवश्यकता है. मगर सरकार यदि सबको शिक्षा परक रोजगार देना चाहती है, तब तो उसे यह करना ही पड़ेगा. प्राचीन काल में इसीलिए कई सारे रोजगार पारम्परिक घरेलु प्रशिक्षण पर आधारित होते थे, जिनमें बच्चे परिवारगत रोजगार परिवार के साथ काम करके सीख लेते थे. ऎसे कार्यों में कृषि से लेकर, मिट्टी व धातु के वर्तन बनाना, लोहे के सामान बनाना, लकड़ी के सामान बनाना, चमड़े के सामान बनाना, कपड़े बनाना आदि रोजगार शामिल थे. इनके अलावा सैलून,लॉड्री आदि सेवापरक रोजगार भी पारम्परिक तौर पर ही बच्चे सीख लेते थे. मगर जाति और वर्ण के नाम पर भेदभाव और घृणा ने इन पारम्परिक शिक्षण को बेमानी बना दिया. अब हर किसी के लिए स्कूल और कॉलेज की पढ़ाई अनिवार्य सी हो गई है. ऎसे में आवश्यक है कि सरकार गाँव के हर बच्चे के लिए कॉलेज में पढ़ाई की व्यवस्था करे. और जबतक सरकार ब्लॉक स्तर पर कॉलेज खोलने में स्वयं को असमर्थ पाती है, उसे वैकल्पिक व्यवस्थाओं पर विचार करना होगा.
यह व्यवस्था दो तरह की हो सकती है- एक, गाँव के विद्यार्थियों के शहर स्थित कॉलेज आने-जाने के लिए बस की मुफ्त सुविधा उपलब्ध कराए या दूसरी, शहर में ही उनके निवास के लिए हॉस्टल का प्रबन्ध करे. लड़कियों को कॉलेज की शिक्षा दिलाने में ये प्रबन्ध बेशक उल्लेखनीय सुधार करेंगे. अभी लड़कियों की पढ़ाई तो तकरीबन अधूरी ही रह जाती है. लड़कियाँ चाहकर भी आर्थिक और असुरक्षा कारणों से भी कॉलेज की शिक्षा हासिल नहीं पाती. गरीबों को शिक्षा देने की सरकारी कवायद इन व्यवस्थाओं के बाद ही अपनी पूर्णता हासिल कर पाएगी.
‘हमारे गाँव’ गाँव के विद्यार्थियों को कॉलेज स्तर की शिक्षा मिले, इसके लिए सरकार का सहयोग उसी प्रकार करेगा, जिस प्रकार नालन्दा विश्वविद्यालय को चलाने में 200 गाँव किया करते थे.

Sunday, 9 February 2014

हमारे गाँव और सस्ते गल्ले की सरकारी दुकान

हमारे गाँवों का मुख्य व्यवसाय आज भी कृषि है. कृषि उत्पादन पहले की अपेक्षा बढ़ा भी है. फिर भी अंतरराष्ट्रीय सर्वेक्षण से यह दुखद सच उद्घाटित होता है कि दुनिया का हर दूसरा कुपोषित नागरिक भारतीय है. भारत सरकार  भी मानती है कि गाँव की 75% प्रजा भूख से जूझ रही है. निश्चित तौर पर यह हमारे लिए चिंता और चिंतन की बात है कि कृषिप्रधान देश होने के बावजूद हमारे देशवासी सेहत के योग्य भोजन पाने में अक्षम क्यों है, जबकि देश के सरकारी गोदाम अनाज से भरे हैं. रखे-रखे अनाज गोदामों में सड़ भी रहे हैं ?  सरकार इसकी वजह गरीबी को मानती है. आम आदमी गरीब है, इसलिए ज़रूरत भर अनाज भी वह खरीद नहीं पाती. सरकार इसमें अपनी असफलता मानने से भी नहीं हिचकती, क्योंकि गरीबी दूर नहीं कर पाने की वजह वह देश की बढ़ती जनसंख्या को मानती है, जिसके लिए उससे कहीं अधिक जिम्मेवार जनता है.    
बहरहाल, उच्चतम न्यायालय की फटकार के बाद भारत सरकार ने भोजन को नागरिक के अधिकार में शामिल किया, ताकि हर आदमी को दोनों समय का भोजन अनिवार्य रूप से मिल सके. इसमें कोई दो राय नहीं कि यह एक नेक निर्णय है. एक तरफ अनाज गोदामों में सड़ता रहे और दूसरी तरफ जनता भूख से मर जाय, कुपोषण का शिकार बनकर बीमारियों से मर जाय, लोकतंत्र में इससे अधिक क्रूर मज़ाक कुछ और नहीं हो सकता. सरकार उन ज़रूरतमंदों तक अनाज पहुँचाने का काम करती है, बेशक यह एक उत्तम काम है, मगर सरकार जिस तरह से यह काम कर रही है, उसमें उसकी मंशा पर शक और सवाल दोनों खड़े होते हैं.
भारत की भूखी जनता तक अनाज पहुँचाने की व्यवस्था (पीडीएस) पहली बार 1940 के दशक में अंग्रेजी हुकूमत को तब करनी पड़ी थी, जब बंगाल में भीषण अकाल पड़ा था. उसके बाद भारत सरकार को फिर इस प्रणाली की मदद लेनी 60 के दशक में देश में आए भयंकर अकाल से जनता को बचाने के लिए. उसके बाद देश में हरित क्रांति आई, अनाज की पैदावार दूनी हो गई. इसके साथ ही बिजली के प्रसार और सिंचाई के लिए नहर आदि अन्य विकल्पों ने सूखे की आशंका को कमतर बना दिया. मगर पीडीएस फिर भी रुका नहीं, तब से वह  लगातार अपनी सेवा देता आ रहा है. और अब जब सरकार ने भोजन को नागरिक अधिकार में शामिल कर दिया है तब पीडीएस की भूमिका और उपयोगिता और बढ़ गई है. देशभर में अभी तकरीबन 5 लाख पीडीएस दुकानें हैं.
मगर गाँव के ज़रूरतमंदों तक सरकार जिस तरह से अनाज पहुँचाती है, वह अव्यावहारिक, खर्चीला और भ्रष्टाचार से भरी कुव्यवस्था का शिकार है. सरकार यह अनाज विदेशों से नहीं मँगवाती, बल्कि राज्य सरकारें गाँव के किसानों से ही खरीदकर भारत सरकार को देती है. भारत सरकार उस अनाज को शहर स्थित खाद्य निगम के गोदामों में जमा करती है. फिर केन्द्र सरकार पीडीएस के तहत बाँटने के लिए गोदाम से अनाज वापस राज्य सरकार के पास भेजती है और राज्य सरकार उसे गाँव स्थित पीडीएस दुकानों में भेजती है. यानी गाँव से शहर गया अनाज वापस गाँव आता है. इस तरह अनाज की इस आवाजाही में करोड़ों रुपयों का गैरज़रूरी खर्च तो होता ही है, अनाज की इस उठापटक में अनाज की अच्छी खासी बर्बादी भी होती है. जबकि यही अनाज पंचायत या ब्लॉक स्तर पर गोदाम बनाकर जमा किए जा सकते हैं और समय के साथ वहीं बाँटा जा सकता है. इससे अनाज की बर्बादी रुकेगी और रखरखाव पर खर्च भी कम आएगा.
फिर पीडीएस तक पहुँचने वाले अनाज की गुणवत्ता भी अच्छी नहीं होती. यह अनाज प्रजा को कुपोषण से बचाने के लिए दिया जा रहा है, मगर वह नया और बढ़िया होने के बजाय पुराना और कई बार कीड़े लगे होते हैं. अनाज जिस राशन कार्ड के आधार पर बाँटा जाता है, उसमें भी गड़बड़ियाँ हैं. सही आदमी का राशन कार्ड असानी से बनता नहीं, वहीं जो ज़रूरतमंद नहीं हैं, वे भी गलत राशनकार्ड बनवाकर राशन उठा लेते हैं और बाज़ार की दुकानों में ज्यादा मूल्य पर बेच आते हैं. यह बेहद चिंताजनक है पीडीएस के भ्रष्टाचार में गाँव की सामान्य जनता भी शामिल हो गई है. कई जगह यह भी शिकायत मिलती है कि पीडीएस डीलर खुद ही अनाज को खुले बाज़ार में बेच देता है.
हालाँकि अब सरकार ज़रूरतमंद को सहायता पहुँचाने के बेहतर विकल्प के तौर पर नगद भुगतान करने की योजना बनाने जा रही है. सरकार की नीयत पर फिर भी सवाल उठ जाता  है कि सरकारी भोजन कराकर सरकार गरीब आदमी को भुखमरी के दलदल से निकालकर शारीरिक श्रम द्वारा अर्जित स्वाभिमान का भोजन करने का अवसर देना चाहती है या जीवन भर यूँ ही सरकारी भोजन कराकर सिर्फ वोट देने लायक बनाए रखना चाहती है?
सरकार वाहवाही के लिए अनाज बाँटती तो है, मगर इस बात की कभी जाँच नहीं करती कि सरकारी अनाज खाकर कुपोषित सेहतमन्द बने भी या नहीं,  और जो सेहतमंद हो गए, देश के लिए वह कौन सा काम कर रहे हैं? सिर्फ वोट के काम आ रहे हैं या देश के विकास में उनका सकारात्मक योगदान भी हो रहा है? या किसी अपराध या अपराधी की भेंट चढ़ गए? क्योंकि हमारे गाँव में यह कहावत बहुत प्रचलित है इंसान जैसा खाता है वैसा ही बनता है. 
राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ऎसे किसी भी तन्दुरुस्त आदमी को मुफ्त भोजन देने के खिलाफ थे, जिसने ईमानदारी से कुछ न कुछ काम न किया हो. उनका कहना था कि मुफ्त भोजन से राष्ट्र का पतन हुआ है. सुस्ती, बेकारी, दंभ और अपराधों को भी प्रोत्साहन मिला है. नियम यह होना चाहिए कि मेहनत नहीं तो खाना नहीं. हाँ जो शरीर से लाचार हैं, उनका पोषण राज्य को करना चाहिए.
मगर वास्तविकता यह है कि पीडीएस लाचार, बीमार, वृद्ध और कुपोषितों का पोषण करने के बजाय भारत सरकार के खाद्य मंत्रालय से लेकर गाँव के पीडीएस डीलर तक को भ्रष्टाचार करने का सुअवसर प्रदान कर रहा है, और इसका लाभ उठानेवाली प्रजा को पेट भरने के लिए उद्यम करने के बजाय काहिल बने रहने के लिए प्रेरित करता है. नहीं तो, गाँव में गरीबी होने के बावजूद किसी काम के लिए मजदूरों की कमी नहीं होती. सिर्फ खेती के काम के लिए ही नहीं, जिसमें ज्यादा मजदूरी न देना किसानों की मजबूरी है, बल्कि अन्य कामों के लिए भी मजदूर नहीं मिलते.
‘हमारे गाँव’ में हमें ऎसी व्यवस्था विकसित करनी है कि गाँव के गरीब, अशक्त, लाचार, बीमार और वृद्ध को भोजन के लिए गाँव के बाहर मुँह ताकने की आवश्यकता ही न पड़े. इससे भूखे को भोजन देने के नाम पर हो रहे भ्रष्टाचार और देश की आमदनी का फिजूल खर्च रुकेगा. साथ ही, चूँकि यह व्यवस्था स्थानीय गाँववासियों की निर्वाचित कमिटी की देखरेख में चलेगी, इसलिए कौन वास्तविक ज़रूरतमंद है और कौन फर्जी, यह आसानी से परखा जा सकेगा. इससे भोजन सिर्फ ज़रूरतमंद को ही मिलेगा आलसियों और काहिलों को नहीं. और ‘हमारे गाँव’ में कमाकर खाने की भावना जीवित रहेगी.
मुम्बई. 07-02-2014
          







हमारे गाँव और संयुक्त परिवार

हमारे गाँव और संयुक्त परिवार
संयुक्त परिवार की अवधारणा दुनिया के मानव समाज को भारतीय संस्कृति की अद्भुत देन है. मगर दुनिया से क्या कहें, इसे हम भी सँभाल कर रख नहीं पा रहे हैं. संयुक्त परिवारों  को जिस तेजी से हम खत्म करते जा रहे हैं, वह भविष्य के लिए ठीक नहीं है. हम सब जानते हैं कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, फिर भी पता नहीं क्यों, हम एकाकी जीवन जीने की मूर्खतापूर्ण और स्वनाशी ज़िद में हैं.     
हमारे पूर्वजोंने मनुष्य जीवन को सर्वोत्तम जीवन माना और इस मनुष्य जीवन के परम आनन्द को प्राप्त करने के लिए हमें ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का जीवन मंत्र दिया. यानी पूरी वसुधा के हर जीव यहाँ तक कि पेड़-पौधे भी हमारे कुटुम्ब हैं. और अपने कुटुम्बों के साथ हम कैसे जिएँ, इसके लिए सह-अस्तित्व का मार्ग हमें दिखाया. हम इस मार्ग पर आस्था की हद तक विश्वास करके चलें, इसके लिए पूर्वजों ने सह-अस्तित्व को धर्म से जोड़ दिया. हमारे आराध्य देव शिव का परिवार सह-अस्तित्व की दिव्य मिसाल है. भगवान शिव के परिवार में पत्नी पार्वती के अलावा दो पुत्र कार्तिकेय और गणेश के अलावा बैल, शेर, साँप, मोर और चूहा भी रहते हैं. शेर बैल के लिए प्राणघातक हैं, तो साँप चूहे के लिए और मोर साँप के लिए, बावजूद इसके भगवान शिव के परिवार में सभी आनन्द से रहते हैं. तो, यह है ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ तक पहुँचने का सह-अस्तित्व का दिव्य मार्ग! संयुक्त परिवार ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की पहली कड़ी है, और हमारे गाँव में संयुक्त परिवार की बहुत ही पुरानी परम्परा है.
संयुक्त परिवार में कई पीढ़ियों तक भाइयों के परिवार के लोग एक साथ रहते हैं. यह सह अस्तित्व की भावना को मजबूत करता है. इसके चलते बचपन से ही इंसान में साथ जीने की भावना विकसित होती है, मजबूत होती है. व्यक्तिगत पसन्द-नापसन्द के बजाय सबकी पसन्द-नापसन्द का ख्याल रखने का भाव बढ़ता है. कौन सदस्य कितना काम करता है और कौन सदस्य कितना खाता है, इस तरह की भावना बिल्कुल ही काम नहीं करती. सबको एक खास किस्म की आज़ादी होती है, शिकायत का भाव नहीं होता. खाने-पीने से लेकर सुविधाओं के उपभोग तक में समानता होती है. 
संयुकत परिवार व्यक्ति के अन्दर अनुशासन और मर्यादा का भाव आनुवांशिक तौर पर स्वतः विकसित हो जाता है. यहाँ व्यक्ति के निरंकुश होने की आशंका नहीं के बराबर होती है. क्योंकि परिवार के सारे सदस्यों पर ऊपर परिवार के मुखिया का पितृवत अंकुश होता है और परिवार के सदस्य परिवार के मुखिया के निर्णय को अंतिम और सर्वहिताय मानकर शिरोधारण करते हैं. परिवार का मुखिया भी निरंकुश नहीं होता, बल्कि अपने बड़े-बूढ़ों की सलाह से बँधा होता है.
संयुक्त परिवार में अधिकार पाने से ज्यादा त्याग का भाव होता है. क्योंकि परिवार का मुखिया सिर्फ अपनी पत्नी या बच्चे के लिए नहीं सोचता, बल्कि सबके लिए समान रूप से सोचता है. और जब त्याग करने की परिस्थिति बनती है, सबसे पहले स्वयं त्याग करता है और पत्नी-बच्चे पर भी त्याग के लिए नैतिक दबाव बनाता है. इस तरह विपत्ति के समय भी कोई सदस्य अकेला नहीं पड़ता.  
प्राचीन काल से ही हमारे गाँव कृषि प्रधान रहे, और कृषि एक ऎसा कार्य है जिसमें अपने  आदमियों की हमेशा ज़रूरत पड़ती है. शायद यह एक महत्वपूर्ण वजह रही होगी कि हमारे पूर्वजों ने संयुक्त परिवार के तौर पर रहना बेहतर समझा और इसे परम्परागत तौर पर सहस्रावदियों निभाया भी.
संयुक्त परिवार में दरार पड़ने की पहली वजह बनी अंग्रेजी सरकार, जिसने हमारी खेती चौपट की और हमारे गाँव चौपट किए. एकल परिवारों में पले-बढ़े और सिर्फ अपनी ही संस्कृति को महान समझने के मूढ़तापूर्ण अंधप्रेम में पड़े अंग्रेजों ने संयुक्त परिवार की विशिष्टता, उपयोगिता और गरिमा को जान ही न सके. उसके बाद, आजादी के बाद के शहरीकरण के बढ़ते प्रभाव ने भी संयुक्त परिवार को अभूतपूर्व नुकसान पहुँचाया है. रोजी-रोजगार के लिए लिए शहरों की ओर लोगों का पलायन-विस्थापन और अपना मालिक खुद बनने की ज़रूरत भरे भाव ने संयुक्त परिवार से लोगों को दूर किया. नौकरी करनेवाले भाइयों ने खेती करनेवाले भाइयों को कम करके आँकना शुरू किया, जिनमें पत्नियों का अहम रोल रहा,और संयुक्त टूटने लगे.   
संयुक्त परिवार लगातार टूट रहे हैं, और उनकी जगह एकल परिवार ले रहे हैं. एकल परिवार, मूलतः विदेशी पारिवारिक अवधारणा है, जिसमें परिवार का मतलब पति-पत्नी और उनके बच्चे हैं. जहाँ माता-पिता के लिए भी जगह नहीं है. नतीजा है बुढ़ापे में अकेले छूट जाने या छोड़ दिए जाने की समस्या हमारे गाँव में भी लगातार बढ़ रही है. शहरों में तो वृद्धाश्रम होते हैं, जहाँ वृद्ध अपना बुढ़ापा गुजार लेते हैं, मगर हमारे गाँव में वृद्धाश्रम बनाने का प्रयास अभी तक न तो सरकारी और न ही सामाजिक स्तर पर हुआ है, इसलिए वृद्धों का जीवन बेहद एकाकी और दुखभरा देखने को मिल रहा है. हमारे गाँव के लोग चूँकि या तो खेती या स्वरोजगार से जुड़े हैं, इसलिए सरकारी नौकरी करनेवाले शहरियों की तरफ पेंशन नहीं मिलती और उनकी आर्थिक निर्भरता अपनी संतानों पर हो जाती है, इसलिए उन्हें बेटे-बहुओं की दया पर ही जीना पड़ता है. हालाँकि सरकार ने उनकी समस्या पर गौर करते हुए, वृद्धा पेंशन की शुरूआत की है, मगर यह उनके जीवन के लिए न सिर्फ नाकाफी है, बल्कि दुखदायी भी है, पेंशन की वजह से बेटे-बहू से मनमुटाव भी हो जाता है क्योंकि उसपर वृद्ध और बहू-बेटे में अधिकार की लड़ाई ठन जाती है. वृद्ध माता-पिता की देखभाल न करनेवालों के लिए सरकार ने जेल भेजने का कानून भी बनाया है. मगर क्या यह व्यावहारिक है कि अपना खून और दूध पिलाकर अपनी संतानों को बड़ा करनेवाले माँ-बाप, कानून का सहारा लेकर अपनी उपेक्षा करनेवाली संतानों को जेल भिजवाना चाहेंगे? बहरहाल, गाँव में भी वृद्ध जीवन दुखदायी हो गया है. जबकि संयुक्त परिवार में वृद्ध माता-पिता के साथ-साथ अशक्त और लाचार भाई-बहन भी सम्मान और सुखपूर्वक जीवन गुजार पाते थे.
‘हमारे गाँव’ में संयुक्त परिवार की परम्परा को पुनर्स्थापित करना है. तभी हम स्वयं भी सुखपूर्वक जीवन जी पाएँगे और पूर्वजों द्वारा दिया गया जीवन मंत्र ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ को भी साकार कर पाएँगे.
मुम्बई. 08-02-2014