Sunday, 16 September 2012

स्लम बनते गाँव



विकास और प्रगति के नाम पर गाँव को शहरीकरण की अंधी दौड़ में शामिल करा दिया गया है और गाँव शहरों के चमकते स्वरूप पर नासूर की तरह पसरे स्लम का रूप लेते जा रहे हैं. तंग गलियाँ, छोटे-छोटे बंद कमरों वाले घर, खुली ज़गहों पर लगातार अतिक्रमण, अपने परिवार तक केन्द्रित सोच, अधिक से अधिक पैसे कमाने की भाग-दौड़, रोटी-रोजगार के भविष्य की चिंता आदि शहरी विसंगतियाँ अब गाँव के चरित्र में भी घुल गई हैं. लेकिन जिस तरह से हमारे नगरों-महानगरों की मानवीय-सामाजिक व्यवस्था चरमरा रही है. दम तोड़ रही है, उसे देखते हुए हमें फिर से गाँव की सुध लेने की ज़रूरत है. हम सभी भारतवासियों को पलभर रुककर सोचने की ज़रूरत है कि गाँवों को निरंतर नजर अंदाज करना हमारे देश के लिए कितना घातक रहा. आज जब भारत सरकार खाद्य सुरक्षा बिल लाकर हर भारतीय को पेटभर भोजन देने का सुखद सपना साकार करना चाहती है, ऎसे में यह और ज़रूरी हो गया है कि हम हमारे गाँव के बारे में नए सिरे से गंभीरता से सोचें.
देश की बदलती अर्थव्यवस्था ने गाँवों की बजाय शहरों के निर्माण को ज्यादा तवज्जो दिया. कृषि से ध्यान हटा औद्योगिकीकरण को विकास की धुरी बनाया गया. सरकारी नौकरियाँ करनेवाले लोगों को, वेतन के रूप में मिलनेवाली नियमित राशि और हर प्रकार की सरकारी मानवीय सहायता और सुरक्षा ने नौकरी के प्रति ग्रामीणों का ध्यान खींचा. क्योंकि कृषि कार्य जहाँ पूरी तरह भगवान भरोसे (मॉनसून आधारित) थे, वहीं सरकारी नौकरियों में हर तरह की सुरक्षा थी. फिर नौकरी करने वालों को हर महीने वेतन के रूप मिलने वाली निश्चित व नियमित रकम ने भी लोगों को खेती और गाँव से दूर होने को बाध्य किया. परिणाम यह हुआ कि शहरों के प्रति लोगों का आकर्षण लगातार बढ़ता गया और गाँवों के प्रति उसी अनुपात में घटता गया. शहर और नौकरी करनेवाले लोग प्रगति का, जबकि गाँव और किसान पिछड़ेपन का पर्याय बन गए. और अंतत: यही भारत की विशेषताओं में से एक संयुक्त परिवार की टूट का कारण बना तथा हमारा समाज चौतरफा पतन की ओर चल पड़ा . 
गाँव तेजी से अपना सौंदर्य खोता जा रहा है. जो गाँव कभी बैलों के गले में बँधी घंटियों, तरह-तरह के पंछियों के कलरव और ग्रामीणों के गीतों से गुंजायमान रहते थे, आज वहाँ मोटरगाड़ियों की आवाज़ और लाउडस्पीकर पर बजते फिल्मी गीतों का शोर है. जो ग्रामीण कभी किसी के भी दुख-दर्द को बाँटना अपना धर्म और वास्तविक कर्म समझते थे, अब ज्यादा अमीर बनने की लालसा में अपने भाई की हत्या कर देने से भी परहेज नहीं करते हैं. जिन गाँवों में पहले एकता थी, बंधुत्व था, सुन्दर प्राकृतिक तथा सामाजिक वातावरण था, वहाँ आज पॉलीथिन में भरी गंदगियाँ, टूटन, ईर्ष्या और व्यक्तिवादी विसंगतियाँ पसरी हैं.
महात्मा गाँधी ने कहा था कि ग्रामोद्योग का नाश हो गया तो भारत के गाँवों का सर्वनाश ही समझिए. उनका यह अंदेशा आज की कड़वी सच्चाई है. जो गाँव कभी सह-अस्तित्व पर आधारित अपने कुटीर और घरेलू काम-धंधों की वजह से आत्मनिर्भर हुआ करते थे, आज हर बात के लिए तेजी से पराश्रित होते जा रहे हैं. बढ़ई, चर्मकार, कुम्हार, लोहार, नाई, धोबी, जुलाहा आदि जाति के लोग अपनी मेहनत और हुनर से ग्रामीणों की ज़रूरत का सामान बनाते थे. ग्रामीणों को कभी भी शहरों या विदेशों का मुँह ताकना नहीं पड़ता था. लेकिन आज यह सारा कुछ ध्वस्त हो चुका है. साग-सब्ज़ी तक के लिए शहरों की तरफ भागना पड़ता है. हुनरमंद पारम्परिक जातियों की जगह अब व्यापारियों ने ले ली है. जो काम पहले घर-आँगन या घर के बाहर चौक-चौराहों पर बिना कोई खर्च हो जाया करते थे, उसके लिए अब बाज़ार में अच्छा-खासा किराया आदि चुकाना पड़ता है. पहले जो खेती और माल ढुलाई का काम बैलों से किया जाता है, उसकी जगह ट्रक्टरों ने ली है. गोबर और घूरे की खाद की जगह रासायनिक खादों का प्रयोग होने लगा. ऎसे में जाहिर है कि लागत मूल्य बढ़ेगा. फिर हमारी विपणन व्यवस्था में भी परजीवियों का खर्चीला प्रवेश हुआ है. पहले हाट-बाज़ार में किसान-उपभोक्ता सीधे मिलते थे. लेकिन बदली हुई व्यवस्था में किसान-उपभोक्ता का मिलना ही समाप्त हो गया. बिचौलियों की एक-दो नहीं अनगिनत कड़ियाँ खेत से बाज़ार के बीच घुस आई हैं. नतीजा है कि जीवन जीने के लिए बेहद अवश्यक वस्तुओं की कीमत भी तेज गति से बढ़ती जा रही है. पिछले दिनों औद्योगिक एजेंसी एसोचैम ने खाद्य पदार्थों की कीमतों में वृद्धि से मध्य वर्ग का जीना हुआ मुहाल के संदर्भ में जो सर्वे आधारित रिपोर्ट प्रकाशित की थी, उससे जाहिर होता है कि किसान खूब मुनाफा कमा रहे हैं, जबकि हकीकत यह है कि ट्रैक्टर और खाद आदि बनाने वाली कंपनियाँ और बिचौलिए मलाई मार रहे हैं. बेचारे किसानों के हाथ तो खुरचन ही आ रही है. 


Saturday, 15 September 2012

ग्रामीण विकास की झूठी कथा सुना रहे हैं आँकड़े



आँकड़ेबाज़ी में गाँव का ज़रूर विकास हो रहा है, लेकिन वस्तुस्थिति यह है कि गाँव तेजी से नष्ट हो रहे हैं. गाँव के मूल सौन्दर्य को कैसे बचाया जाय, इस संदर्भ में कोई ठोस ग्रामीण विकास नीति नहीं होने की वजह से गाँव स्लम में तब्दील होते जा रहे हैं. लोग गाँव के पाइन-पोखर-खत्ता से लेकर नदी तक हर गैरमजरुआ (सरकारी कह सकते हैं) ज़मीन पर बेरोकटोक कब्ज़ा कर रहे हैं. वह दिन दूर नहीं जब गाँव में खुली ज़गह का टोंटा हो जाएगा. जब भी कोई ग्रामीण घर बनाता है गली की फीट-दो फीट ज़मीन दबा लेता है. इस वजह से गलियाँ लगातार संकरी हो रही हैं.
इसी तरह आर्थिक खुशहाली का आँकड़ा भी कि ‘ग्रामीण भारतीयों ने शहरी भारतीयों से ज्यादा पैसे खर्च किए’ का विश्लेषण कर गाँव के विकास की जो मोहक कथा सुना रहा है, वह गाँव की आत्मनिर्भरता से जुड़ा होने के बजाय शहरों और सरकार से विभिन्न योजनाओं के तहत भेजे गए पैसों पर आधारित है. इस उत्साहवर्द्धक आँकड़ों की हकीकत इसी बात से जाहिर हो जाती है कि आम ग्रामीण युवा विकास के इतने उत्साहवर्द्धक आँकड़ों के बावजूद शहरों और सरकारी व प्राइवेट नौकरियों के मोह से लिपटा है. वह हर साँस इसी जुगत में भिड़ा है कि कब और कैसे शहरों से उसे बुलावा आए और शहरों में तरक्की की अथाह संभावनाओं से वह अपने लिए अंकवार भर खुशी हथिया ले. ग्रामीण विकास के आँकड़े इकट्ठा करने में जुटे सरकारी व गैरसरकारी चिंतको को इस पहलू पर गंभीरतापूर्ण विचार करने की ज़रूरत है.
अगर सरकार की मंशा सचमुच गाँव में विकास की गंगा बहाना है तो ग्रामीण विकास की नीति विदेशों से आयात करने की बजाय भारतीय दृष्टि से एक मुकम्मल और ठोस नीति बनानी होगी. साथ ही, उसे नियमपूर्वक गाँवों में लागू भी करना होगा.
गाँव की पहले अपनी आर्थिक व्यवस्था हुआ करती थी. एक आत्मनिर्भर व्यवस्था. जहाँ खाने-पीने का सामान उपजाने वाले किसान से लेकर तमाम ज़रूरत के सामान बनाने वाली हुनरमंद जातियाँ हुआ करती थीं. बढ़ई, चर्मकार, सुनार, लोहार अपने पारम्परिक हुनर से ज़रूरत के सामान बनाते थे, तो नाई, धोबी और कहार आदि जातियाँ सेवा के कार्य करती थीं. सबका जीवन सह-अस्तित्व पर आधारित था, लेकिन पहले ब्राह्मणवाद ने और बाद में अंग्रेजों ने हमारी सह-अस्तित्ववादी जातिगत व्यवस्था में इस क़दर नफरत और शोषण का ज़हर भरा कि हमारे खुशहाल गाँव घूरे का ढेर बन गए. लिओनेल कार्टिस नामक अंग्रेज लेखक ने हमारे गाँवों का वर्णन करते हुए उसे ‘घूरे का ढेर’ कहा था. लेकिन महात्मा गाँधी ‘घूरे के ढेर’ में दबे हमारे गाँवों की शक्ति को पहचानते थे, इसीलिए उन्होंने कहा कि भारतवर्ष की आत्मा गाँवों में बसती है. ‘मेरे सपनों का भारत में’ गाँव की महत्ता बताते हुए उन्होंने लिखा है, हमें गाँवोंवाला भारत और शहरोंवाला भारत, इन दोनों में से एक को चुन लेना है. गाँव उतने ही पुराने हैं, जितना कि यह भारत पुराना है. शहरों को विदेशी आधिपत्य ने बनाया है. जब यह आधिपत्य मिट जाएगा, तब शहरों को गाँवों के मातहत होकर रहना पड़ेगा. आज तो शहरों का बोलवाला है, और वे गाँवों की सारी दौलत खींच लेते हैं. इससे गाँवों का ह्रास और नाश हो रहा है. आज़ादी के इतने सालों बाद भी गाँव का ह्रास और नाश जारी है, हमारे नीति-नियंताओं के लिए यह गहरी चिंता का विषय होना चहिए था, लेकिन वह गाँव पर सरकारी धन की बरसात कर अपने कर्तव्य से उऋण होते जा रहे हैं.   
ग्रामीण विकास योजनाओं के नाम पर सरकारी धन की बरसात की वजह से बेशक सड़क-स्कूल और अस्पताल बने हैं. जगह-जगह हैंडपाइप गाड़े जाने से पीने का साफ पानी भी उपलब्ध हुआ है. गराबी उन्मूलन के तहत शुरू की गई मनरेगा, पीडीएस सिस्टम के तहत कम कीमत पर अनाज, इंदिरा आवास योजना, बच्चों की मुफ्त शिक्षा, हेल्थ कार्ड आदि सरकारी योजनाओं की वजह से गरीबों की दशा भी सुधरी है. पढ़ाई में पिछड़कर शहर न जा सके युवा सरकारी योजनाओं के ठेकों से अपनी आर्थिक स्थिति सुधार रहे हैं. मगर गाँव की दशा और दिशा दोनों बिग़ड़ गई है. गाँव में शराब पीने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है. सुख-दुख में एक-दूसरे की मदद के लिए उठ खड़े होने वाले ग्रामीणों के पास अब दूसरों के लिए फुर्सत नहीं है. सह-अस्तित्व की भारतीय संस्कृति नष्ट होती जा रही है. गाँव शहर की काली कॉपी बनते जा रहे हैं.   
गाँव का वास्तविक विकास तब होगा जब उसकी अपनी अर्थव्यवस्था खड़ी होगी. पारम्परिक खेती के साथ-साथ व्यावसायिक फसलों की खेती, फूड प्रोसेसिंग इंडस्ट्री, डेयरी इंडस्ट्री और मछली पालन आदि उद्योग के तौर पर गाँव में अपनाएँ जाएंगे. घर बनाने को लेकर एक मानक तय करना होगा कि अपने घर की चारों तरफ गलियों को कबजाने की बजाय इतनी ज़गह छोड़नी होगी कि स्वयं के साथ-साथ किसी और के घर की हवा और धूप भी न रुके. साफ-सफाई के लिए सामूहिक व्यवस्था हो और खत्ता,पाइन,पोखर,अलंग और नदी आदि पर किसी तरह का  अतिक्रमण न होने पाए. इन सारी विसंगतियों से निबटने के लिए एक कारगर व्यवस्था बनाकर अमल के लिए ग्राम-पंचायत के सौंपा जाना चाहिए. अन्यथा सरकार की सारी कवायद और गाँवों को आज़ादी के बाद भी 50 से अधिक सालों तक उपेक्षित करने के अपराधबोध से बचने के लिए ज़रूरी-गैरज़रूरी योजनाएँ बना पैसों की बरसात गाँव में विकास की जगह ठीक वैसे ही बर्बादी लाएगी, जैसे अतिवृष्टि विनाशकारी बाढ़ लाती है.


हमारे गाँव के सर्जक और पहलकर्ता धनंजय कुमार

Tuesday, 11 September 2012

" हमारे गाँव"के मार्केटिंग इंचार्ज संजय कुमार (बायें)
A Scene of Village. Photo- Manoj Kumar

हमारे गाँव क्यों बदले...?


हमारे गाँव सदियों हमारी पहचान रहे. गाँव हमारी ताकत थे. देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ थे. हमारी सभ्यता-संस्कृति, विचार और सृजन का केंद्र थे. लेकिन जैसे-जैसे आधुनिकता ने अपने पैर पसारे, आधुनिकता की दौड़ में हमारे गाँव पिछड़ते चले गए. अर्थवाद ने हमारे गाँवों से उसकी शक्ति छीन ली. देश की बदलती अर्थव्यवस्था ने कृषि से ध्यान हटा औद्योगिकीकरण को विकास की धुरी बनाया. विकास के घूमते पहिए ने बेशक हमारे गाँवों को सड़कों और शहरों से जोड़ा, लेकिन बदले में गाँवों से बहुत बड़ी कीमत वसूली. गाँवों से उसके किसान-मजदूर और हल-बैल छीन लिए. खेत-खलिहान उजड़ गए. गाँव का सौन्दर्य बिगड़ गया.
देश की बदलती अर्थव्यवस्था ने गाँवों की बजाय शहरों के निर्माण को ज्यादा तवज्जो दिया. कृषि से ध्यान हटा औद्योगिकीकरण को विकास की धुरी बनाया गया. सरकारी नौकरियाँ करनेवाले लोगों को, वेतन के रूप में मिलनेवाली नियमित राशि और हर प्रकार की सरकारी मानवीय सहायता और सुरक्षा ने नौकरी के प्रति ग्रामीणों का ध्यान खींचा. क्योंकि कृषि कार्य जहाँ पूरी तरह भगवान भरोसे (मॉनसून आधारित) थे, वहीं सरकारी नौकरियों में हर तरह की सुरक्षा थी. फिर नौकरी करने वालों को हर महीने वेतन के रूप मिलने वाली निश्चित व एकमुश्त नियमित रकम ने भी लोगों को खेती और गाँव से दूर होने को बाध्य किया. परिणाम यह हुआ कि शहरों के प्रति लोगों का आकर्षण लगातार बढ़ता गया और गाँवों के प्रति उसी अनुपात में घटता गया.
शहर और नौकरी करनेवाले लोग प्रगति, जबकि गाँव और किसान पिछड़ेपन का पर्याय बन गए. और अंतत: यही भारत की विशेषताओं में से एक संयुक्त परिवार की टूट का कारण बना. सबसे दुखद यह है कि हमारे गाँव विकास और प्रगति के नाम शहरीकरण की अंधी दौड़ में शामिल हो गए हैं. गाँव का अपना सौंदर्य तेजी से विलुप्त हो रहा है.जो गाँव कभी बैलों के गले में बँधी घंटियों,तरह-तरह के पंछियों के कलरव और ग्रामीणों के गीतों से गुंजायमान रहते थे, आज वहाँ मोटरगाड़ियों की आवाज़ और लाउडस्पीकर पर बजते फिल्मी गीतों का शोर है. जो ग्रामीण कभी किसी के भी दुख-दर्द को बाँटना अपना धर्म और वास्तविक कर्म समझते थे अब ज्यादा अमीर बनने की लालसा में अपने भाई की हत्या कर देने से भी परहेज नहीं करते हैं. जिन गाँवों में पहले एकता थी, बंधुत्व था, सुन्दर प्राकृतिक तथा सामाजिक वातावरण था, वहाँ आज पॉलीथिन में भरी गंदगियाँ, टूटन, ईर्ष्या और व्यक्तिवादी विसंगतियाँ पसरी हैं.
जिस तरह से हमारे महानगरों की मानवीय-सामाजिक व्यवस्था चरमरा रही है. दम तोड़ रही है, उसे देखते हुए हमें फिर से गाँव की सुध लेने की ज़रूरत है. गाँव में बसे भारत में ही इण्डिया की प्रोग्रेस की तमाम संभावनाएँ छिपी हैं. हम सभी भारतवासियों को पलभर रुककर सोचने की ज़रूरत है कि गाँवों को निरंतर नजर अंदाज करना हमारे देश के लिए कितना घातक रहा. आज जब भारत सरकार खाद्य सुरक्षा बिल लाकर हर भारतीय को पेटभर भोजन देने का सुखद सपना साकार करना चाहती है, ऎसे में और ज़रूरी हो गया है कि हम हमारे गाँव के बारे में नए सिरे से गंभीरता से सोचें.

आँगन सोसियो-कल्चरल ऑर्गेनाइजेशन का गठन भविष्य की इन्हीं चिंताओं के चिंतन के बाद हुआ है. और लेखक-पत्रकार, समाज विश्लेषक व चिंतक धनंजय कुमार ने हमारे गाँवनामक विचार का सृजन किया, आँगन सोसियो-कल्चरल ऑर्गेनाइजेशन जिसे पिछले साल के नवंबर महीने से ज़मीन पर उतारना शुरू कर दिया है. हमारे गाँव का पायलेट प्रोजेक्ट बिहार प्रदेश के नालंदा ज़िला के बिन्द गाँव में शुरू हो चुका है.
आँगन सोसियो-कल्चरल ऑर्गेनाइजेशन ने हमारे गाँवकी वास्तविक पहचान को वापस दिलाने के संकल्प के साथ हमारे गाँवनाम से एक अभियान शुरू किया है. इस अभियान के तहत आँगन सोशियो-कल्चरल ऑर्गेनाइजेशन ने गाँव को आत्मनिर्भर बनाने का लक्ष्य निर्धारित किया है ताकि दुनिया से भुखमरी समाप्त हो.

धनंजय कुमार





Thursday, 6 September 2012

save the village


महात्मा गाँधी ने कहा था, भारतवर्ष की आत्मा इसके गाँवों में निवास करती है... अगर गाँवों का नाश होता है तो भारत का भी नाश हो जाएगा. उस हालत में भारत भारत नहीं रहेगा. दुनिया को उसे जो संदेश देना है, वह संदेश खो देगा. 
गुलाम भारत में महात्मा गाँधी की उपरोक्त चिंता आज़ाद भारत में और गहराती जा रही है. गाँवों का अस्तित्व अब सचमुच खतरे में है. विकास के बहाने रोज़ गाँव मिटते जा रहे हैं.
इसमें कोई दो राय नहीं कि राज्य व केंद्र सरकारों के विभिन्न विकास कार्यक्रमों की वजह से गाँव का विकास हुआ है. गाँव सड़को से जोड़े गए हैं. आवागमन सुलभ हुआ है. स्कूल और अस्पताल खुले है. शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार आया है. पीने का पानी सुलभ हुआ है. मनरेगा से मजदूरों की दशा सुधरी है. मगर यह विकास गाँव के सौन्दर्य, संस्कार-संस्कृति, पारिवारिक-सामाजिक संरचना, लोकाचार-रीति-रिवाज, खान-पान, पहनावा, लोकगीत-संगीत आदि को संवार नहीं पा रहा है. जैसे-जैसे विकास का आधुनिक मॉडल हमारे गाँव में अपने पाँव पसार रहा है, वैसे-वैसे गाँव की विशेषता रहे–संयुक्त परिवार, आँगन, दालान, चौपाल, बाग-बागीचे, खेत-खलिहान, हल-बैल, कुआँ-पनघट, गोधूलि बेला में धूल उड़ाती गायें, मंदिरों से आते प्रात:-संध्या की आरती के स्वर, लोकसंगीत-गीत से सराबोर शामें, गाँव का गँवईपन, मिट्टी का सोंधापन, अपनों की मिठास सब लुप्त होती जा रही हैं. सब पर शहरी मजबूरियों और विकृतियों की काली छाया पड़ रही है. गाँव शहर का विकृत रूप लेता जा रहा है.
हमें ‘हमारे गाँव’ को बचाना है, तभी बचेंगें हम और हमारा प्यारा देश भारत.

गाँव को बचाने और उसे आत्मनिर्भर बनाने के संकल्प के साथ पत्रकार-लेखक-फिल्मकार,समाज विश्लेषक व चिंतक धनंजय कुमार पिछले वर्ष से ही बिहार के नालंदा ज़िला के बिन्द गाँव में हमारे गाँवनामक विचार को मूर्त रूप देने में जुटे हैं.हमारे गाँव धनंजय कुमार द्वारा सृजित, विस्तारित और क्रियान्वित विचार है। इस महत्वपूर्ण कार्य में धनंजय कुमार का कदम दर कदम साथ दे रहे हैं आँगन सोशियो कल्चरल ऑर्गेनाइजेशन नामक संगठन और उसके कार्यकर्ता.
आँगन सोशियो-कल्चरल ऑर्गेनाइजेशन भारतीय सोसायटीज एक्ट एवं ट्रस्ट के तहत पंजीकृत (पंजीकरण सं-336/2003,मुम्बई) पूर्णतया स्वदेशी, प्रकृतिपरक और व्यावसायिक दृष्टिकोण से सम्पन्न एक आंदोलनात्मक सृष्टिसेवी संगठन है, जिसका लक्ष्य है भारतवर्ष के शैक्षणिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक, आर्थिक, प्राकृतिक और वैचारिक धरातल पर भारतीय विचार और दृष्टिकोण (वसुधैव कुटुम्बकम्) को रुपायित करना. संगठन का सूत्र वाक्य है- ‘साहित्य-संगीत-कला विहीन: साक्षात् पशुपुच्छ विषाणहीन:’. साहित्य, संगीत और कला संगठन के लिए आँख, कान, और नाक की तरह हैं.
हमारे गाँव के तहत शिक्षा, कृषि, थिएटर और मार्केटिंग पर एक साथ काम किया जा रहा है. ताकि कृषि और गाँव को लेकर लोगों में जागरूकता आए, कृषि फिर से लाभ का कारोबार बने, गाँव में रोजगार का सृजन हो और महज रोजी-रोटी के लिए परदेस गए सपूत अपने गाँव लौटें...और आँगन, दालान, खेत-खलिहान, बाग-बागीचे, चौपाल सब के सब फिर से गोधूलि बेला में धूल उड़ाती गायों, मंदिरों से आते प्रात:-संध्या की आरती के स्वरों तथा लोकसंगीत-गीत से सराबोर हो उठे.
Photo- Dhananjay Kumar
गाँव के विद्यार्थी शहर के विद्यार्थियों से कॉम्प्लेक्स्ड फील न करें, इसके लिए ‘हमारे गाँव’ की कोशिश है कि अंग्रेजी मीडियम के स्कूल गाँवों में भी खुले. जहाँ विद्यार्थियों को सिर्फ परीक्षा पास करने के गुर सिखाने के बजाय शिक्षा को लेकर यह जागृति फैलाई जाती है कि ‘शिक्षा क्यों और कैसे ?’ शिक्षकों और अभिभावकों में भी शिक्षा को लेकर सही और व्यावहारिक दृष्टि विकसित की जा रही है. बिन्द के देवनंदन पब्लिक स्कूल में यह प्रयोग शुरू किया जा चुका है.
कृषि के क्षेत्र में किसानों को पारम्परिक खेती के बजाय बुद्धिमतापूर्ण तरीके से नगदी खेती करने के लिए प्रेरित,उत्साहित और प्रशिक्षित किया जा रहा है. ताकि किसानों को मेहनत का उचित मूल्य मिल सके. इसके लिए सब्ज़ी, फूल, बासमती चावल, पपीता और केले की खेती पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है. किसान श्री व बिन्द आत्मा अध्यक्ष संजीव कुमार के अलावा कृषि वैज्ञानिक पुरुषोत्तम कुमार और अनुज कुमार भी अपना अमूल्य समय और सलाह उपलब्ध करा रहे हैं.
गौपालन को मुख्यत: दूध के व्यवसाय के तौर पर देखा जा रहा है, इसलिए डेयरी फॉर्मों में देशी गायों की ज़गह विदेशी नस्ल की जर्सी, फ्रिजियन आदि गायों को तरजीह दिया जाता है. जबकि हमारे गाँवमें गौपालन से दूध के साथ-साथ गोबर और गौमूत्र से प्राप्त होनेवाले लाभ को भी व्यवसाय का आधार बनाया गया है. गोबर से बनी गोबर-खाद और गौमूत्र से बना कीटनाशक किसानों के रासायनिक खाद व पेस्टिसाइड पर होनेवाले भारी खर्च से तो बचाता ही है, अनाजों,फलों और सब्जियों पर केमिकल्स और पेस्टिसाइड के बुरे प्रभाव को भी समाप्त करता है.
किसानों को समूह-गौपालन के लिए प्रेरित किया जा रहा है, ताकि गौओं की सही देखभाल भी हो सके और किसानों के समय की भी बचत हो. इसमें विशेषकर किसानों की पत्नियों को जोड़ा जा रहा है. दूध से प्राप्त आय किसानों की अतिरिक्त आय होती है. इस अभियान में महत्वपूर्ण साथ है नाबार्ड के पूर्व महाप्रबंधक डॉ.मोहन प्रसाद का.
किसानों को अपने माल की स्वयं मार्केटिग करने के गुर भी सिखाए जा रहे हैं, ताकि उन्हें अपनी मेहनत और पूँजी का पूरा-पूरा लाभ मिले. साथ ही, इसमें उपभोक्ताओं तक बेहतर और अपेक्षाकृत सस्ता सामान पहुँचाने का सेवाभाव भी निहित है. इसके लिए आँगन सोशियो कल्चरल ऑर्गेनाइजेशन किसानों को सामूहिक मार्केंटिंग स्टॉल के लिए भी समझाया जा रहा है. इससे गाँव के युवाओं को रोजगार भी मिलता है. बाज़ार विशेषज्ञ संजय कुमार इसमें अपना अमूल्य योगदान दे रहे हैं.
किसानों को खेतों तक सीमित रहने के बजाय शहर-देश-दुनिया में हो रहे परिवर्तनों और उठ रही ज़रूरतों के प्रति भी जागरूक रहने के लिए प्रेरित-उत्साहित किया जा रहा है. ताकि किसान अपनी चिंताओं से उबरकर देश-दुनिया के चिंतन से भी जुड़ सकें. इसके लिए चौपाल को पुनर्जीवित किया जा रहा है, जहाँ ‘चाय, चर्चा और चेंज’ के तहत किसानों, महिलाओं, युवाओं, विद्यार्थियों  व शिक्षकों और विशेषज्ञों के बीच संवाद होता है.
हमारे गाँवगाँवों में सांस्कृतिक धरोहरों को बचाने और थिएटर के माध्यम से ग्रामीण जीवन में कलात्मक-व्यावहारिक बदलाव लाने की दिशा में भी अग्रसर है. इस अभियान में साथ हैं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चित ‘थिएटर ऑफ रेलेवेंस’  के सर्जक और प्रयोगकर्त्ता रंगकर्मी मंजुल भारद्वाज.
इस तरह हमारे गाँव का अंतिम लक्ष्य है पूरे विश्व से भुखमरी का नामोनिशान मिटाना और पूरी सृष्टि को खुशहाल बनाना। सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया,सर्वे भद्राणि पश्यन्तु माँ कश्चिद् दुःख भाग भवेत्।के सदविचार को साकार करना।
इस पवित्र मुहिम में उन सारे महानुभावों से साथ की अपेक्षा है, जो स्वाभिमान और सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ जीवन जीना चाहते हैं.
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