हमारे गाँव सदियों हमारी पहचान रहे. गाँव हमारी ताकत थे. देश
की अर्थव्यवस्था की रीढ़ थे. हमारी सभ्यता-संस्कृति, विचार
और सृजन का केंद्र थे. लेकिन जैसे-जैसे आधुनिकता ने अपने पैर पसारे, आधुनिकता की दौड़ में हमारे गाँव पिछड़ते चले गए. अर्थवाद ने
हमारे गाँवों से उसकी शक्ति छीन ली. देश की बदलती अर्थव्यवस्था ने कृषि से ध्यान
हटा औद्योगिकीकरण को विकास की धुरी बनाया. विकास के घूमते पहिए ने बेशक हमारे
गाँवों को सड़कों और शहरों से जोड़ा, लेकिन बदले में गाँवों से बहुत
बड़ी कीमत वसूली. गाँवों से उसके किसान-मजदूर और हल-बैल छीन लिए. खेत-खलिहान उजड़
गए. गाँव का सौन्दर्य बिगड़ गया.
देश की बदलती अर्थव्यवस्था ने
गाँवों की बजाय शहरों के निर्माण को ज्यादा तवज्जो दिया. कृषि से ध्यान हटा
औद्योगिकीकरण को विकास की धुरी बनाया गया. सरकारी नौकरियाँ करनेवाले लोगों को, वेतन के रूप में मिलनेवाली नियमित राशि और हर प्रकार की
सरकारी मानवीय सहायता और सुरक्षा ने नौकरी के प्रति ग्रामीणों का ध्यान खींचा.
क्योंकि कृषि कार्य जहाँ पूरी तरह भगवान भरोसे (मॉनसून आधारित) थे, वहीं सरकारी नौकरियों में हर तरह की सुरक्षा थी. फिर नौकरी
करने वालों को हर महीने वेतन के रूप मिलने वाली निश्चित व एकमुश्त नियमित रकम ने
भी लोगों को खेती और गाँव से दूर होने को बाध्य किया. परिणाम यह हुआ कि शहरों के
प्रति लोगों का आकर्षण लगातार बढ़ता गया और गाँवों के प्रति उसी अनुपात में घटता
गया.
शहर और नौकरी करनेवाले लोग
प्रगति, जबकि गाँव और किसान पिछड़ेपन का पर्याय बन गए. और अंतत: यही
भारत की विशेषताओं में से एक संयुक्त परिवार की टूट का कारण बना. सबसे दुखद यह है
कि हमारे गाँव विकास और प्रगति के नाम शहरीकरण की अंधी दौड़ में शामिल हो गए हैं.
गाँव का अपना सौंदर्य तेजी से विलुप्त हो रहा है.जो गाँव कभी बैलों के गले में
बँधी घंटियों,तरह-तरह के पंछियों के कलरव और ग्रामीणों के गीतों से
गुंजायमान रहते थे, आज वहाँ मोटरगाड़ियों की आवाज़
और लाउडस्पीकर पर बजते फिल्मी गीतों का शोर है. जो ग्रामीण कभी किसी के भी
दुख-दर्द को बाँटना अपना धर्म और वास्तविक कर्म समझते थे अब ज्यादा अमीर बनने की
लालसा में अपने भाई की हत्या कर देने से भी परहेज नहीं करते हैं. जिन गाँवों में
पहले एकता थी,
बंधुत्व था, सुन्दर प्राकृतिक तथा सामाजिक वातावरण था, वहाँ आज पॉलीथिन में भरी गंदगियाँ, टूटन, ईर्ष्या और व्यक्तिवादी
विसंगतियाँ पसरी हैं.
जिस तरह से हमारे महानगरों की
मानवीय-सामाजिक व्यवस्था चरमरा रही है. दम तोड़ रही है, उसे देखते हुए हमें फिर से गाँव की सुध लेने की ज़रूरत है.
गाँव में बसे भारत में ही इण्डिया की प्रोग्रेस की तमाम संभावनाएँ छिपी हैं. हम
सभी भारतवासियों को पलभर रुककर सोचने की ज़रूरत है कि गाँवों को निरंतर नजर अंदाज
करना हमारे देश के लिए कितना घातक रहा. आज जब भारत सरकार खाद्य सुरक्षा बिल लाकर
हर भारतीय को पेटभर भोजन देने का सुखद सपना साकार करना चाहती है, ऎसे में और ज़रूरी हो गया है कि हम हमारे गाँव के बारे में नए
सिरे से गंभीरता से सोचें.
आँगन सोसियो-कल्चरल
ऑर्गेनाइजेशन का गठन भविष्य की इन्हीं चिंताओं के चिंतन के बाद हुआ है. और
लेखक-पत्रकार,
समाज विश्लेषक व चिंतक धनंजय कुमार ने “हमारे गाँव” नामक विचार का सृजन किया, आँगन सोसियो-कल्चरल ऑर्गेनाइजेशन जिसे पिछले साल के नवंबर
महीने से ज़मीन पर उतारना शुरू कर दिया है. हमारे गाँव का पायलेट प्रोजेक्ट बिहार
प्रदेश के नालंदा ज़िला के बिन्द गाँव में शुरू हो चुका है.
आँगन सोसियो-कल्चरल
ऑर्गेनाइजेशन ने “हमारे गाँव” की वास्तविक पहचान को वापस दिलाने के संकल्प के साथ “हमारे गाँव” नाम से एक अभियान शुरू किया है.
इस अभियान के तहत आँगन सोशियो-कल्चरल ऑर्गेनाइजेशन ने गाँव को आत्मनिर्भर बनाने का
लक्ष्य निर्धारित किया है ताकि दुनिया से भुखमरी समाप्त हो.
धनंजय कुमार

No comments:
Post a Comment