विकास और प्रगति के नाम पर
गाँव को शहरीकरण की अंधी दौड़ में शामिल करा दिया गया है और गाँव शहरों के चमकते
स्वरूप पर नासूर की तरह पसरे “स्लम” का रूप लेते जा रहे हैं. तंग गलियाँ, छोटे-छोटे बंद कमरों
वाले घर, खुली ज़गहों पर लगातार अतिक्रमण, अपने परिवार तक केन्द्रित सोच, अधिक से
अधिक पैसे कमाने की भाग-दौड़, रोटी-रोजगार के भविष्य की चिंता आदि शहरी विसंगतियाँ
अब गाँव के चरित्र में भी घुल गई हैं. लेकिन जिस तरह से हमारे नगरों-महानगरों की
मानवीय-सामाजिक व्यवस्था चरमरा रही है. दम तोड़ रही है, उसे देखते हुए हमें फिर से
गाँव की सुध लेने की ज़रूरत है. हम सभी भारतवासियों को पलभर रुककर सोचने की ज़रूरत
है कि गाँवों को निरंतर नजर अंदाज करना हमारे देश के लिए कितना घातक रहा. आज जब
भारत सरकार खाद्य सुरक्षा बिल लाकर हर भारतीय को पेटभर भोजन देने का सुखद सपना
साकार करना चाहती है, ऎसे में यह और ज़रूरी हो गया है कि हम हमारे गाँव के बारे में
नए सिरे से गंभीरता से सोचें.
देश की बदलती अर्थव्यवस्था
ने गाँवों की बजाय शहरों के निर्माण को ज्यादा तवज्जो दिया. कृषि से ध्यान हटा
औद्योगिकीकरण को विकास की धुरी बनाया गया. सरकारी नौकरियाँ करनेवाले लोगों को,
वेतन के रूप में मिलनेवाली नियमित राशि और हर प्रकार की सरकारी मानवीय सहायता और
सुरक्षा ने नौकरी के प्रति ग्रामीणों का ध्यान खींचा. क्योंकि कृषि कार्य जहाँ
पूरी तरह भगवान भरोसे (मॉनसून आधारित) थे, वहीं सरकारी नौकरियों में हर तरह की
सुरक्षा थी. फिर नौकरी करने वालों को हर महीने वेतन के रूप मिलने वाली निश्चित व
नियमित रकम ने भी लोगों को खेती और गाँव से दूर होने को बाध्य किया. परिणाम यह हुआ
कि शहरों के प्रति लोगों का आकर्षण लगातार बढ़ता गया और गाँवों के प्रति उसी अनुपात
में घटता गया. शहर और नौकरी करनेवाले लोग प्रगति का, जबकि गाँव और किसान पिछड़ेपन
का पर्याय बन गए. और अंतत: यही भारत की विशेषताओं में से एक संयुक्त परिवार की टूट
का कारण बना तथा हमारा समाज चौतरफा पतन की ओर चल पड़ा .
गाँव तेजी से अपना सौंदर्य
खोता जा रहा है. जो गाँव कभी बैलों के गले में बँधी घंटियों, तरह-तरह के पंछियों
के कलरव और ग्रामीणों के गीतों से गुंजायमान रहते थे, आज वहाँ मोटरगाड़ियों की आवाज़
और लाउडस्पीकर पर बजते फिल्मी गीतों का शोर है. जो ग्रामीण कभी किसी के भी
दुख-दर्द को बाँटना अपना धर्म और वास्तविक कर्म समझते थे, अब ज्यादा अमीर बनने की
लालसा में अपने भाई की हत्या कर देने से भी परहेज नहीं करते हैं. जिन गाँवों में
पहले एकता थी, बंधुत्व था, सुन्दर प्राकृतिक तथा सामाजिक वातावरण था, वहाँ आज
पॉलीथिन में भरी गंदगियाँ, टूटन, ईर्ष्या और व्यक्तिवादी विसंगतियाँ पसरी हैं.
महात्मा गाँधी ने कहा था कि
ग्रामोद्योग का नाश हो गया तो भारत के गाँवों का सर्वनाश ही समझिए. उनका यह अंदेशा
आज की कड़वी सच्चाई है. जो गाँव कभी सह-अस्तित्व पर आधारित अपने कुटीर और घरेलू
काम-धंधों की वजह से आत्मनिर्भर हुआ करते थे, आज हर बात के लिए तेजी से पराश्रित
होते जा रहे हैं. बढ़ई, चर्मकार, कुम्हार, लोहार, नाई, धोबी, जुलाहा आदि जाति के
लोग अपनी मेहनत और हुनर से ग्रामीणों की ज़रूरत का सामान बनाते थे. ग्रामीणों को
कभी भी शहरों या विदेशों का मुँह ताकना नहीं पड़ता था. लेकिन आज यह सारा कुछ ध्वस्त
हो चुका है. साग-सब्ज़ी तक के लिए शहरों की तरफ भागना पड़ता है. हुनरमंद पारम्परिक
जातियों की जगह अब व्यापारियों ने ले ली है. जो काम पहले घर-आँगन या घर
के बाहर चौक-चौराहों पर बिना कोई खर्च हो जाया करते थे, उसके लिए अब बाज़ार में
अच्छा-खासा किराया आदि चुकाना पड़ता है. पहले जो खेती और माल ढुलाई का काम बैलों से
किया जाता है, उसकी जगह ट्रक्टरों ने ली है. गोबर और घूरे की खाद की जगह रासायनिक
खादों का प्रयोग होने लगा. ऎसे में जाहिर है कि लागत मूल्य बढ़ेगा. फिर हमारी विपणन
व्यवस्था में भी परजीवियों का खर्चीला प्रवेश हुआ है. पहले हाट-बाज़ार में
किसान-उपभोक्ता सीधे मिलते थे. लेकिन बदली हुई व्यवस्था में किसान-उपभोक्ता का
मिलना ही समाप्त हो गया. बिचौलियों की एक-दो नहीं अनगिनत कड़ियाँ खेत से बाज़ार के
बीच घुस आई हैं. नतीजा है कि जीवन जीने के लिए बेहद अवश्यक वस्तुओं की कीमत भी तेज
गति से बढ़ती जा रही है. पिछले दिनों औद्योगिक एजेंसी एसोचैम ने खाद्य पदार्थों की
कीमतों में वृद्धि से मध्य वर्ग का जीना हुआ मुहाल के संदर्भ में जो सर्वे आधारित
रिपोर्ट प्रकाशित की थी, उससे जाहिर होता है कि किसान खूब मुनाफा कमा रहे हैं,
जबकि हकीकत यह है कि ट्रैक्टर और खाद आदि बनाने वाली कंपनियाँ और बिचौलिए मलाई मार
रहे हैं. बेचारे किसानों के हाथ तो खुरचन ही आ रही है.
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