Saturday, 15 September 2012

ग्रामीण विकास की झूठी कथा सुना रहे हैं आँकड़े



आँकड़ेबाज़ी में गाँव का ज़रूर विकास हो रहा है, लेकिन वस्तुस्थिति यह है कि गाँव तेजी से नष्ट हो रहे हैं. गाँव के मूल सौन्दर्य को कैसे बचाया जाय, इस संदर्भ में कोई ठोस ग्रामीण विकास नीति नहीं होने की वजह से गाँव स्लम में तब्दील होते जा रहे हैं. लोग गाँव के पाइन-पोखर-खत्ता से लेकर नदी तक हर गैरमजरुआ (सरकारी कह सकते हैं) ज़मीन पर बेरोकटोक कब्ज़ा कर रहे हैं. वह दिन दूर नहीं जब गाँव में खुली ज़गह का टोंटा हो जाएगा. जब भी कोई ग्रामीण घर बनाता है गली की फीट-दो फीट ज़मीन दबा लेता है. इस वजह से गलियाँ लगातार संकरी हो रही हैं.
इसी तरह आर्थिक खुशहाली का आँकड़ा भी कि ‘ग्रामीण भारतीयों ने शहरी भारतीयों से ज्यादा पैसे खर्च किए’ का विश्लेषण कर गाँव के विकास की जो मोहक कथा सुना रहा है, वह गाँव की आत्मनिर्भरता से जुड़ा होने के बजाय शहरों और सरकार से विभिन्न योजनाओं के तहत भेजे गए पैसों पर आधारित है. इस उत्साहवर्द्धक आँकड़ों की हकीकत इसी बात से जाहिर हो जाती है कि आम ग्रामीण युवा विकास के इतने उत्साहवर्द्धक आँकड़ों के बावजूद शहरों और सरकारी व प्राइवेट नौकरियों के मोह से लिपटा है. वह हर साँस इसी जुगत में भिड़ा है कि कब और कैसे शहरों से उसे बुलावा आए और शहरों में तरक्की की अथाह संभावनाओं से वह अपने लिए अंकवार भर खुशी हथिया ले. ग्रामीण विकास के आँकड़े इकट्ठा करने में जुटे सरकारी व गैरसरकारी चिंतको को इस पहलू पर गंभीरतापूर्ण विचार करने की ज़रूरत है.
अगर सरकार की मंशा सचमुच गाँव में विकास की गंगा बहाना है तो ग्रामीण विकास की नीति विदेशों से आयात करने की बजाय भारतीय दृष्टि से एक मुकम्मल और ठोस नीति बनानी होगी. साथ ही, उसे नियमपूर्वक गाँवों में लागू भी करना होगा.
गाँव की पहले अपनी आर्थिक व्यवस्था हुआ करती थी. एक आत्मनिर्भर व्यवस्था. जहाँ खाने-पीने का सामान उपजाने वाले किसान से लेकर तमाम ज़रूरत के सामान बनाने वाली हुनरमंद जातियाँ हुआ करती थीं. बढ़ई, चर्मकार, सुनार, लोहार अपने पारम्परिक हुनर से ज़रूरत के सामान बनाते थे, तो नाई, धोबी और कहार आदि जातियाँ सेवा के कार्य करती थीं. सबका जीवन सह-अस्तित्व पर आधारित था, लेकिन पहले ब्राह्मणवाद ने और बाद में अंग्रेजों ने हमारी सह-अस्तित्ववादी जातिगत व्यवस्था में इस क़दर नफरत और शोषण का ज़हर भरा कि हमारे खुशहाल गाँव घूरे का ढेर बन गए. लिओनेल कार्टिस नामक अंग्रेज लेखक ने हमारे गाँवों का वर्णन करते हुए उसे ‘घूरे का ढेर’ कहा था. लेकिन महात्मा गाँधी ‘घूरे के ढेर’ में दबे हमारे गाँवों की शक्ति को पहचानते थे, इसीलिए उन्होंने कहा कि भारतवर्ष की आत्मा गाँवों में बसती है. ‘मेरे सपनों का भारत में’ गाँव की महत्ता बताते हुए उन्होंने लिखा है, हमें गाँवोंवाला भारत और शहरोंवाला भारत, इन दोनों में से एक को चुन लेना है. गाँव उतने ही पुराने हैं, जितना कि यह भारत पुराना है. शहरों को विदेशी आधिपत्य ने बनाया है. जब यह आधिपत्य मिट जाएगा, तब शहरों को गाँवों के मातहत होकर रहना पड़ेगा. आज तो शहरों का बोलवाला है, और वे गाँवों की सारी दौलत खींच लेते हैं. इससे गाँवों का ह्रास और नाश हो रहा है. आज़ादी के इतने सालों बाद भी गाँव का ह्रास और नाश जारी है, हमारे नीति-नियंताओं के लिए यह गहरी चिंता का विषय होना चहिए था, लेकिन वह गाँव पर सरकारी धन की बरसात कर अपने कर्तव्य से उऋण होते जा रहे हैं.   
ग्रामीण विकास योजनाओं के नाम पर सरकारी धन की बरसात की वजह से बेशक सड़क-स्कूल और अस्पताल बने हैं. जगह-जगह हैंडपाइप गाड़े जाने से पीने का साफ पानी भी उपलब्ध हुआ है. गराबी उन्मूलन के तहत शुरू की गई मनरेगा, पीडीएस सिस्टम के तहत कम कीमत पर अनाज, इंदिरा आवास योजना, बच्चों की मुफ्त शिक्षा, हेल्थ कार्ड आदि सरकारी योजनाओं की वजह से गरीबों की दशा भी सुधरी है. पढ़ाई में पिछड़कर शहर न जा सके युवा सरकारी योजनाओं के ठेकों से अपनी आर्थिक स्थिति सुधार रहे हैं. मगर गाँव की दशा और दिशा दोनों बिग़ड़ गई है. गाँव में शराब पीने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है. सुख-दुख में एक-दूसरे की मदद के लिए उठ खड़े होने वाले ग्रामीणों के पास अब दूसरों के लिए फुर्सत नहीं है. सह-अस्तित्व की भारतीय संस्कृति नष्ट होती जा रही है. गाँव शहर की काली कॉपी बनते जा रहे हैं.   
गाँव का वास्तविक विकास तब होगा जब उसकी अपनी अर्थव्यवस्था खड़ी होगी. पारम्परिक खेती के साथ-साथ व्यावसायिक फसलों की खेती, फूड प्रोसेसिंग इंडस्ट्री, डेयरी इंडस्ट्री और मछली पालन आदि उद्योग के तौर पर गाँव में अपनाएँ जाएंगे. घर बनाने को लेकर एक मानक तय करना होगा कि अपने घर की चारों तरफ गलियों को कबजाने की बजाय इतनी ज़गह छोड़नी होगी कि स्वयं के साथ-साथ किसी और के घर की हवा और धूप भी न रुके. साफ-सफाई के लिए सामूहिक व्यवस्था हो और खत्ता,पाइन,पोखर,अलंग और नदी आदि पर किसी तरह का  अतिक्रमण न होने पाए. इन सारी विसंगतियों से निबटने के लिए एक कारगर व्यवस्था बनाकर अमल के लिए ग्राम-पंचायत के सौंपा जाना चाहिए. अन्यथा सरकार की सारी कवायद और गाँवों को आज़ादी के बाद भी 50 से अधिक सालों तक उपेक्षित करने के अपराधबोध से बचने के लिए ज़रूरी-गैरज़रूरी योजनाएँ बना पैसों की बरसात गाँव में विकास की जगह ठीक वैसे ही बर्बादी लाएगी, जैसे अतिवृष्टि विनाशकारी बाढ़ लाती है.


हमारे गाँव के सर्जक और पहलकर्ता धनंजय कुमार

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