Thursday, 6 September 2012

save the village


महात्मा गाँधी ने कहा था, भारतवर्ष की आत्मा इसके गाँवों में निवास करती है... अगर गाँवों का नाश होता है तो भारत का भी नाश हो जाएगा. उस हालत में भारत भारत नहीं रहेगा. दुनिया को उसे जो संदेश देना है, वह संदेश खो देगा. 
गुलाम भारत में महात्मा गाँधी की उपरोक्त चिंता आज़ाद भारत में और गहराती जा रही है. गाँवों का अस्तित्व अब सचमुच खतरे में है. विकास के बहाने रोज़ गाँव मिटते जा रहे हैं.
इसमें कोई दो राय नहीं कि राज्य व केंद्र सरकारों के विभिन्न विकास कार्यक्रमों की वजह से गाँव का विकास हुआ है. गाँव सड़को से जोड़े गए हैं. आवागमन सुलभ हुआ है. स्कूल और अस्पताल खुले है. शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार आया है. पीने का पानी सुलभ हुआ है. मनरेगा से मजदूरों की दशा सुधरी है. मगर यह विकास गाँव के सौन्दर्य, संस्कार-संस्कृति, पारिवारिक-सामाजिक संरचना, लोकाचार-रीति-रिवाज, खान-पान, पहनावा, लोकगीत-संगीत आदि को संवार नहीं पा रहा है. जैसे-जैसे विकास का आधुनिक मॉडल हमारे गाँव में अपने पाँव पसार रहा है, वैसे-वैसे गाँव की विशेषता रहे–संयुक्त परिवार, आँगन, दालान, चौपाल, बाग-बागीचे, खेत-खलिहान, हल-बैल, कुआँ-पनघट, गोधूलि बेला में धूल उड़ाती गायें, मंदिरों से आते प्रात:-संध्या की आरती के स्वर, लोकसंगीत-गीत से सराबोर शामें, गाँव का गँवईपन, मिट्टी का सोंधापन, अपनों की मिठास सब लुप्त होती जा रही हैं. सब पर शहरी मजबूरियों और विकृतियों की काली छाया पड़ रही है. गाँव शहर का विकृत रूप लेता जा रहा है.
हमें ‘हमारे गाँव’ को बचाना है, तभी बचेंगें हम और हमारा प्यारा देश भारत.

गाँव को बचाने और उसे आत्मनिर्भर बनाने के संकल्प के साथ पत्रकार-लेखक-फिल्मकार,समाज विश्लेषक व चिंतक धनंजय कुमार पिछले वर्ष से ही बिहार के नालंदा ज़िला के बिन्द गाँव में हमारे गाँवनामक विचार को मूर्त रूप देने में जुटे हैं.हमारे गाँव धनंजय कुमार द्वारा सृजित, विस्तारित और क्रियान्वित विचार है। इस महत्वपूर्ण कार्य में धनंजय कुमार का कदम दर कदम साथ दे रहे हैं आँगन सोशियो कल्चरल ऑर्गेनाइजेशन नामक संगठन और उसके कार्यकर्ता.
आँगन सोशियो-कल्चरल ऑर्गेनाइजेशन भारतीय सोसायटीज एक्ट एवं ट्रस्ट के तहत पंजीकृत (पंजीकरण सं-336/2003,मुम्बई) पूर्णतया स्वदेशी, प्रकृतिपरक और व्यावसायिक दृष्टिकोण से सम्पन्न एक आंदोलनात्मक सृष्टिसेवी संगठन है, जिसका लक्ष्य है भारतवर्ष के शैक्षणिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक, आर्थिक, प्राकृतिक और वैचारिक धरातल पर भारतीय विचार और दृष्टिकोण (वसुधैव कुटुम्बकम्) को रुपायित करना. संगठन का सूत्र वाक्य है- ‘साहित्य-संगीत-कला विहीन: साक्षात् पशुपुच्छ विषाणहीन:’. साहित्य, संगीत और कला संगठन के लिए आँख, कान, और नाक की तरह हैं.
हमारे गाँव के तहत शिक्षा, कृषि, थिएटर और मार्केटिंग पर एक साथ काम किया जा रहा है. ताकि कृषि और गाँव को लेकर लोगों में जागरूकता आए, कृषि फिर से लाभ का कारोबार बने, गाँव में रोजगार का सृजन हो और महज रोजी-रोटी के लिए परदेस गए सपूत अपने गाँव लौटें...और आँगन, दालान, खेत-खलिहान, बाग-बागीचे, चौपाल सब के सब फिर से गोधूलि बेला में धूल उड़ाती गायों, मंदिरों से आते प्रात:-संध्या की आरती के स्वरों तथा लोकसंगीत-गीत से सराबोर हो उठे.
Photo- Dhananjay Kumar
गाँव के विद्यार्थी शहर के विद्यार्थियों से कॉम्प्लेक्स्ड फील न करें, इसके लिए ‘हमारे गाँव’ की कोशिश है कि अंग्रेजी मीडियम के स्कूल गाँवों में भी खुले. जहाँ विद्यार्थियों को सिर्फ परीक्षा पास करने के गुर सिखाने के बजाय शिक्षा को लेकर यह जागृति फैलाई जाती है कि ‘शिक्षा क्यों और कैसे ?’ शिक्षकों और अभिभावकों में भी शिक्षा को लेकर सही और व्यावहारिक दृष्टि विकसित की जा रही है. बिन्द के देवनंदन पब्लिक स्कूल में यह प्रयोग शुरू किया जा चुका है.
कृषि के क्षेत्र में किसानों को पारम्परिक खेती के बजाय बुद्धिमतापूर्ण तरीके से नगदी खेती करने के लिए प्रेरित,उत्साहित और प्रशिक्षित किया जा रहा है. ताकि किसानों को मेहनत का उचित मूल्य मिल सके. इसके लिए सब्ज़ी, फूल, बासमती चावल, पपीता और केले की खेती पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है. किसान श्री व बिन्द आत्मा अध्यक्ष संजीव कुमार के अलावा कृषि वैज्ञानिक पुरुषोत्तम कुमार और अनुज कुमार भी अपना अमूल्य समय और सलाह उपलब्ध करा रहे हैं.
गौपालन को मुख्यत: दूध के व्यवसाय के तौर पर देखा जा रहा है, इसलिए डेयरी फॉर्मों में देशी गायों की ज़गह विदेशी नस्ल की जर्सी, फ्रिजियन आदि गायों को तरजीह दिया जाता है. जबकि हमारे गाँवमें गौपालन से दूध के साथ-साथ गोबर और गौमूत्र से प्राप्त होनेवाले लाभ को भी व्यवसाय का आधार बनाया गया है. गोबर से बनी गोबर-खाद और गौमूत्र से बना कीटनाशक किसानों के रासायनिक खाद व पेस्टिसाइड पर होनेवाले भारी खर्च से तो बचाता ही है, अनाजों,फलों और सब्जियों पर केमिकल्स और पेस्टिसाइड के बुरे प्रभाव को भी समाप्त करता है.
किसानों को समूह-गौपालन के लिए प्रेरित किया जा रहा है, ताकि गौओं की सही देखभाल भी हो सके और किसानों के समय की भी बचत हो. इसमें विशेषकर किसानों की पत्नियों को जोड़ा जा रहा है. दूध से प्राप्त आय किसानों की अतिरिक्त आय होती है. इस अभियान में महत्वपूर्ण साथ है नाबार्ड के पूर्व महाप्रबंधक डॉ.मोहन प्रसाद का.
किसानों को अपने माल की स्वयं मार्केटिग करने के गुर भी सिखाए जा रहे हैं, ताकि उन्हें अपनी मेहनत और पूँजी का पूरा-पूरा लाभ मिले. साथ ही, इसमें उपभोक्ताओं तक बेहतर और अपेक्षाकृत सस्ता सामान पहुँचाने का सेवाभाव भी निहित है. इसके लिए आँगन सोशियो कल्चरल ऑर्गेनाइजेशन किसानों को सामूहिक मार्केंटिंग स्टॉल के लिए भी समझाया जा रहा है. इससे गाँव के युवाओं को रोजगार भी मिलता है. बाज़ार विशेषज्ञ संजय कुमार इसमें अपना अमूल्य योगदान दे रहे हैं.
किसानों को खेतों तक सीमित रहने के बजाय शहर-देश-दुनिया में हो रहे परिवर्तनों और उठ रही ज़रूरतों के प्रति भी जागरूक रहने के लिए प्रेरित-उत्साहित किया जा रहा है. ताकि किसान अपनी चिंताओं से उबरकर देश-दुनिया के चिंतन से भी जुड़ सकें. इसके लिए चौपाल को पुनर्जीवित किया जा रहा है, जहाँ ‘चाय, चर्चा और चेंज’ के तहत किसानों, महिलाओं, युवाओं, विद्यार्थियों  व शिक्षकों और विशेषज्ञों के बीच संवाद होता है.
हमारे गाँवगाँवों में सांस्कृतिक धरोहरों को बचाने और थिएटर के माध्यम से ग्रामीण जीवन में कलात्मक-व्यावहारिक बदलाव लाने की दिशा में भी अग्रसर है. इस अभियान में साथ हैं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चित ‘थिएटर ऑफ रेलेवेंस’  के सर्जक और प्रयोगकर्त्ता रंगकर्मी मंजुल भारद्वाज.
इस तरह हमारे गाँव का अंतिम लक्ष्य है पूरे विश्व से भुखमरी का नामोनिशान मिटाना और पूरी सृष्टि को खुशहाल बनाना। सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया,सर्वे भद्राणि पश्यन्तु माँ कश्चिद् दुःख भाग भवेत्।के सदविचार को साकार करना।
इस पवित्र मुहिम में उन सारे महानुभावों से साथ की अपेक्षा है, जो स्वाभिमान और सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ जीवन जीना चाहते हैं.
आप हमें संपर्क कर सकते हैं

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