Sunday, 29 June 2014

गाँव को बचाना है तो भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन करना होगा

हमारे गाँव और भूमि अधिग्रहण कानून
भूमि अधिग्रहण कानून आरंभ से ही हमारे गाँव के लिए अभिशाप की तरह रहा. देश में पहली बार भूमि अधिग्रहण कानून 1894 में बना. अंग्रेजी सरकार ने सार्वजनिक तरक्की के उद्देश्य की पूर्त्ति के लिए यह कानून बनाया था. हालाँकि कोई भी कानून न्याय को आधार बनाकर ही बनाया जाता है, मगर अंग्रेजों द्वारा बनाया गया यह भूमि अधिग्रहण कानून सीधे तौर पर न्याय को अँगूठा दिखानेवाला था. यह कानून सरकार को भूमि अधिग्रहण का अधिकार तो देता था, मगर जिसकी जमीन का अधिग्रहण किया जाता था, उसकी न तो मर्जी की परवाह थी, न उसके नुकसान और भविष्य की. कोई भी सरकार शासन के एवज में सुरक्षा के जो अधिकार देने को बाध्य होती है, इस कानून के तहत उस सुरक्षा के अधिकार की भी धज्जियाँ उड़ाई जाती रहीं. आश्चर्यजनक और विडंबनापूर्ण तो यह है कि आजादी के बाद भी यह कानून दशकों हमारे किसानों का गला घोंटता रहा. आजाद हिन्दुस्तान में भी किसी ने किसानों के साथ होनेवाले इस अन्याय की तरफ ध्यान नहीं दिया.
अंग्रेजों द्वारा बनाये गये इस भूमि अधिग्रहण कानून को न्यायपरक बनाने का प्रयास पहली बार आजादी के 37 सालों बाद 1984 में किया गया. इस बदलाव में किसानों को उचित मुआवजा देने का प्रावधान किया गया. मगर अंग्रेजों का बनाया यह कानून वैसे ही अलोकतांत्रिक बना रहा, यानी सरकार सार्वजनिक हित के उद्देश्य से किसानों की मर्जी के बगैर भी भूमि अधिग्रहण कर सकती थी. वैश्वीकरण और आर्थिक उदारीकरण के बाद इस कानून का और भी बेजा इस्तेमाल हुआ. नेताओं, नौकरशाहों और पूँजीपतियों के सिंडिकेट ने इस कानून की आड़ में खूब पैसे बनाये. उद्योग लगाने और घर मुहैया कराने के नाम पर उद्योगपतियों और बिल्डरों को सस्ती कीमतों पर जितनी चाहिए, उतनी जमीनें दी गईं, जिसे बाद में उनलोगों ने ऊँची कीमतों पर बेचा और करोड़ों-अरबों कमाए. और वे किसान, जिनकी जमीनें अधिग्रहण कानून के तहत ली गईं, ठगे गए. किसानों को जब इस बात का अहसास हुआ, तब आन्दोलन हुए और मामला कोर्ट तक पहुँचा. कोर्ट ने किसानों का पक्ष सुनने के बाद कई अधिग्रहणों को अवैधानिक बताते हुए खारिज कर दिया. सुप्रीम कोर्ट ने तो इस कानून को सरासर धोखा बता इसे खत्म कर दिये जाने तक की बात कह डाली. तब जाकर देश के नीति-नियंताओं की चेतना और गैरत जागी और नया भूमि अधिग्रहण कानून बनाने की कवायद शुरू हुई. और 29 अगस्त 2013 को भूमि अधिग्रहण कानून उचित मुआवजा और पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन में पारदर्शिता का अधिकार विधेयक 2012” नाम से पास किया गया.
देश में तेजी से बढ़ते औद्योगिकीकरण और शहरीकरण की खातिर भूमि अधिग्रहण आवश्यक तो है, मगर जिस अदूरदर्शी तरीके से भूमि का अधिग्रहण किया जा रहा है, वह भारतवर्ष के भविष्य के लिए न सिर्फ खतरनाक है, बल्कि भारत की पहचान को लेकर भी गंभीर चिंता प्रकट करता है. भूमि अधिग्रहण करते वक्त भारत के नीति नियंताओं को यह सतत याद रखने की ज़रूरत है कि भारत की पहचान आरंभकाल से कृषि प्रधान और गाँवों के देश के रूप में रहा है. इसके रहन-सहन, खान-पान, पारिवारिक-सामाजिक रीति-रिवाजों और उत्सवों-त्योहारों में भी ग्रामीण जीवन की गहरी छाप है. इसीलिए हमारे देश के मनीषियों-चिंतकों ने बार-बार यह माना और दोहराया है कि भारत की आत्मा गाँवों में बसती है. नये उद्योग-धंधे लगाने और नये शहर बसाने के जुनून में आवश्यक भूमि का अधिग्रहण करते वक्त यह ध्यान रखना होगा कि ज़रूरी विकास तो हो, मगर हमारी प्राचीन पहचान और संस्कृतियों को भी नुकसान न पहुँचे. 29 अगस्त 2013 को पास हुआ नया भूमि अधिग्रहण कानून पुराने भूमि अधिग्रहण कानून के अन्यायपूर्ण प्रावधानों को खत्म कर प्रभावितों के अधिकारों को अधिक से अधिक सुरक्षा प्रदान तो करता है, किंतु ‘हमारे गाँव’ और ‘खेती’ के अस्तित्व पर मंडराते संकट को यह तनिक भी कम नहीं करता है.
खेती ही हमारे भोजन का आधार हैं, ऎसे में यह बेहद आवश्यक है कि खेती योग्य जमीनों की हर हाल में रक्षा की जाय, मगर दुर्भाग्य यह है लगातार बढ़ते शहरीकरण की वजह से खेती योग्य जमीनें लगातार विकास की भेंट चढ़ती जा रही हैं, जबकि देश-दुनिया की आबादी लगातार बढ़ती जा रही है. हरित क्रांति ने बेशक खाद्य पदार्थों के उत्पादन में बढ़ोतरी की है, मगर अन्न, सब्जी, फल और दूध आदि पौष्टिक खाद्य ज़रूरतें अब भी आधुनिक समाज के समाज के सामने मुँह फैलाए खड़ी है. विज्ञान के दम पर पेट भरने भर अनाज उपजाने में हम कामयाब ज़रूर रहे हैं, मगर हर नागरिक को पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराने में हम अब भी नाकामयाब रहे हैं. चिंताजनक बात यह है कि 2013 में बना भूमि अधिग्रहण कानून भी भविष्य में और गहराते भोजन के इस देशव्यापी संकट को पहचानने में नाकामयाब रहा है.
आरंभिक काल से लेकर अंग्रेजों के शासन के पूर्व तक भूमि को सम्पत्ति के तौर पर नहीं, जीवन जीने के आधार के तौर देखा-समझा जाता था, मगर अंग्रेजों ने प्रॉपर्टी के तौर पर देखने की हमें दृष्टि दे दी. आजादी के बाद प्रबुद्ध भारतवासियों को इस दृष्टि में तरक्की की अपार संभावनाएँ दिखी, लिहाजा न तो ज़रूरी भूमि सुधार ही लागू हो पाये और न ही भूमिका वास्तविक मोल ही समझा गया. भूमि का असली मूल्य है उसकी उर्वरा में, अन्न, सब्जियां, फल आदि के ज़रूरी खाद्य पदार्थों के उत्पादन में, मगर आधुनिक भारत ने इसकी उर्वरा के बजाय इसके बांझपन को ज्यादा कीमती माना. फसलों से लहलहाते खेतों से ज्यादा कीमती कंक्रीट के जंगल हो गये.
नया भूमि अधिग्रहण कानून खेती की जमीन को कंक्रीट के जंगल में तब्दील करने के लिए पुरजोर तरीके से उत्साहित करता है. सरकारें जिस भी क्षेत्र की जमीनों का सरकारी या निजी उपक्रमों के लिए भूमि का अधिग्रहण करती हैं, वहाँ की जमीनों के भाव आसमान छूने लगते हैं. भूमि अधिग्रहण कानून में सरकार ने यह व्यवस्था दी है अधिग्रहण असिंचित, बंजर और खेती के लिए अयोग्य भूमि का ही अधिग्रहण किया जाएगा, और अगर इस तरह की भूमि उपलब्ध न हो, तो खेती योग्य भूमि का भी अधिग्रहण किया जा सकता है. इसमें पहली बात तो यह है कि कोई भूभाग अगर आजादी के इतने साल बाद भी, असिंचित है और उसकी वजह से बंजर और अनुपजाऊ है तो इसकी वजह भूमि नहीं हमारी सरकारों का नकारापन है कि हमारी सरकारें उचित जलप्रबंधन करने में अबतक असफल रही है. दूसरी बात यह कि बंजर होने की वजह से जो भूमि बेकार पड़ी थी, जिसकी कोई उल्लेखनीय कीमत नहीं थी, वह जमीन खेतीयोग्य जमीनों से भी ज्यादा कीमती हो गई. बंजर जमीनों के मालिक अमीर हो गये और कृषियोग्य जमीनों वाले किसान गरीबी की वजह से आत्महत्या करने को अभिशप्त.
भूमि अधिग्रहण कानून की दूसरी बड़ी विडम्बना या खामी कहें वह यह है कि कृषि भूमि का अधिग्रहण कर उद्योगों के साथ-साथ रियल-एस्टेट को भी पूरे जोर-शोर से बढ़ावा दिया जा रहा है। रियल एस्टेट आज भारतवर्ष का सबसे कमाऊ क्षेत्र है. कमाई कितनी है इसका अन्दाजा इसी से लगा लीजिए कि जमीनों की दलाली करनेवाले लोग भी लाखों-करोड़ों कमा रहे हैं. देश के काले धन का बहुत बड़ा हिस्सा रियल एस्टेट में लगा है. भूमि मालिकों के पुनर्वास को लेकर सरकार नगद मुआवजा देकर उन्हें चुप तो करा देती है, मगर इस बिजनेस के खेल में कृषिभूमि और किसान उजड़ रहे हैं. इसकी चिंता भूमि अधिग्रहण कानून में दिखाई नहीं पड़ती.
आखिर आदर्श भूमि अधिग्रहण कानून का आधार क्या होइस कानून में ऐसी कौन-कौन सी शर्तें जोड़ी जाय कि किसानों के हितों को भी चोट  पहुंचे और सार्वजनिक विकास में भी बाधा  आए?
इसके लिए ज़रूरी है कि अधिग्रहण कानून में गाँव और खेत को बचाए रखने की शर्त्त अनिवार्य की जाय. इस संबंध में कोई निश्चित नियम न होने की वजह से तेजी से शहरीकरण होते इस दौर में नई इंडस्ट्री के लगते ही नई रिहाइशी कॉलोनियाँ बननी शुरू हो जाती है, और खेती योग्य पूरी की पूरी ज़मीन भी ऊँची कीमतों पर बिल्डरों द्वारा खरीद ली जाती है. इससे खेती की ज़मीन तो खत्म होती ही है, गाँव का अस्तित्व भी सदा के लिए नष्ट हो जाता है. इसके लिए आवश्यक है कि अधिग्रहण कानून में कुछ ज़रूरी बातें शामिल कर ली जायं.
पहली शर्त्त, तो यह हो कि एक खास प्रतिशत से अधिक ज़मीन एक साथ अधिग्रहित नहीं की जाय, दूसरी शर्त्त, यह जोड़ी जाय कि किसानों को खेती की जमीन के एवज में नगद मुआवजा देने के बजाय वहीं आसपास खेती योग्य ज़मीन ही दी जाएगी, ताकि खेत और किसान दोनों बचे रहे, तीसरी शर्त्त यह हो कि खेती योग्य ज़मीन का वह खास प्रतिशत जो खेती के लिए संरक्षित है, उसका इस्तेमाल सिर्फ खेती के लिए हो. और चौथी शर्त्त यह हो कि नई कॉलोनियाँ बसाने हेतु ज़मीन अधिग्रहण के साथ यह निश्चित किया जाय कि इतने फ्लैट्स के बाद इतनी खेती योग्य ज़मीन होना अनिवार्य है. इससे दो तरह के लाभ होंगे, एक तो, खेत, किसान और गाँव का अस्तित्व बचा रहेगा, दूसरे, कॉलोनियों में बसे गैर कृषक आबादी को ज़रूरी खाद्यान्न पास के किसानों से उपलब्ध हो जाया करेगा. इससे किसानों को पास में ही बाज़ार मिल जाएगा और शहरी आबादी को अपेक्षाकृत सस्ते और बढ़िया खाद्यान्न मिल जाया करेंगे.
बहरहाल, यदि भारत वर्ष की वास्तविक पहचान को बचाए रखना है तो भूमि अधिग्रहण कानून में गाँव और किसान के अस्तित्व को बचाने हेतु संशोधन ज़रूरी है. 

Friday, 27 June 2014

हमारे गाँव और भूमि सुधार- 2

भूमि सुधार की आधी-अधूरी कवायद 
जमींदारी प्रथा के अंत से कागजी तौर पर किसानों को भूमि पर अधिकार तो मिल गए, लेकिन जमींदारी प्रथा के उन्मूलन का जो मूल उद्देश्य था, भूमि पर किसानों का हक स्थापित करना, यानी भूमि उसकी जो उस पर खेती करे, अपनी आजीविका चलाये, उसपर आश्रित हो, वह वास्तविकता से कोसों दूर था. अंग्रेजी राज में किसानों से छीनकर जो जमीनें अंग्रेजी सरकार ने जमींदारों के नाम कर दी थीं, उसे वापस किसानों को लौटाया जाना अभी बाकी था.
किसान आन्दोलन के प्रमुख नेता स्वामी सहजानन्द सरस्वती जमींदारों से लड़कर किसान को उसकी जमीन वापस दिलाने के पक्षधर थे, जबकि महात्मा गाँधी जमींदारों से बलपूर्वक जमीन छीनने के खिलाफ थे. जमींदारी उन्मूलन और भूमि सुधार का कानून बनाते समय सरकार ने महात्मा गाँधी के विचार का ही अनुशरण किया. सरकार ने इसके लिए सीलिंग एक्ट बनाया,जिसमें बंजर क्षेत्र में सीमा 30 एकड तय की गई, जबकि सिंचित क्षेत्र में 15 और असिंचित में 20 एकड़ तय की गई थी.  मगर जमींदार सरकार से चालाक निकले. सीलिंग एक्ट लागू किए जाने के बाद जमींदारों ने चालाकी से जमीन को अपने परिवारों के सदस्यों आदि के नाम स्थानांतरित कर सरकार की नजर से बचा लिया. बड़े-बूढ़े बताते हैं, सीलिंग लगने के बाद जमींदारों ने अपने जानवरों तक के नाम पर भूमि ट्रांसफर करवा लिए और भूमि पर अपना कब्जा बरकरार रखा. कई जमींदारों ने औने-पौने दामों में जमीनें बेचकर पैसा बनाया. हालाँकि यह भी हकीकत है कि बहुत सारे जमींदारों ने ईमानदारी से भूमि पर से अपना कब्जा छोड़ा और अपनी जमींदारी की भूमि को किसानों के नाम कर दिए. बिनोबा भावे द्वारा चलाए जा रहे भूदान आन्दोलन में भी बहुत सारे जमींदारों ने अपने कब्जे की भूमि दान में दी.
लेकिन कुछ सुधारवादियों का मानना है कि देश में भूमि सुधार के कार्यक्रम सही तरह से नहीं चलाये गए और जमींदारों को चालाकी कर भूमि पर अपना कब्जा बनाये रखने का मौका दिया गया , जिसकी वजह से ज्यादातर वास्तविक किसान जमींदारी के समय की तरह ही भूमिहीन रह गये. आजादी और जमींदारी के खात्मे के बाद भी उनके साथ न्याय न हो सका.
बात सच भी है. जमींदारी प्रथा का उन्मूलन तो किया गया मगर वास्तविक किसानों को वापस अपनी भूमि मिल जाय इस दिशा में ईमानदारीपूर्वक बहुत ठोस काम नहीं हुए. अगर ऎसी नीति बनती कि हर किसान को ज़रूरत भर खेतीयोग्य भूमि मिल जाय, तो किसान खुशहाल होते, गाँव में गरीबी कम होती और गाँव की स्थिति इतनी खराब नहीं होती.  इस तरह भूमि पर किसानों को अधिकार दिलाने और भूमि सुधार नीति को लागू कर किसानों को भूमि देने की कवायद अधूरी रह गई.
महात्मा गाँधी की अहिंसा की नीति इसके पीछे एक बड़ी वजह तो रही ही. महात्मा गाँधी यह मानते तो थे कि जिन किसानों के परिश्रम से पृथ्वी फलप्रसु और समृद्ध हुई है, जमीन उनकी ही है या होनी चाहिए, जमीन से दूर रहनेवाले जमींदारों की नहीं, लेकिन जमींदारों से बलपूर्वक जमीन छीनने के वह खिलाफ थे. दूसरी महत्वपूर्ण वजह यह थी कि ज्यादातर जमींदार काँग्रेसी नेता का चोला पहन चुके थे. ऎसे में सरकार ने गरीब-शोषित किसानों के लिए जमींदारों के हित को छेड़ना स्वहित में ठीक नहीं समझा. इसलिए सरकार का सीलिंग एक्ट किसानों के लिए छलावा बनकर रह गया. महात्मा गाँधी के अनन्य शिष्य विनोबा भावे का भूदान आंदोलन भी किसानों को उनका न्यायपूर्ण हक नहीं दिला सका, बिना लाग-लपेट के कहें तो भूदान आंदोलन किसानों को भरमाये रखने का करतब मात्र था, ताकि किसान असंतुष्ट और नाराज होकर आजाद भारत की सरकार के खिलाफ आंदोलन न कर दे. लेकिन वस्तुतः भूमि सुधार नीति देश में कितने न्यायपूर्ण तरीके से लागू हुई, इसका भेद खोलती है ये सर्वे रिपोर्ट. 2006 में की गई एक सर्वे रिपोर्ट के अनुसार 95.65 प्रतिशत किसान, जो कि छोटे और सीमान्त श्रेणी के हैं, वे 62 प्रतिशत खेती योग्य भूमि के मालिक हैं, जबकि 3.5 प्रतिशत किसान, जो कि मध्यम बड़ी श्रेणी के हैं, 37.72 प्रतिशत भूमि के मालिक हैं.
सरकार की नीयत पर इसलिए भी संदेह करने का कारण बनता है कि सरकार यदि वाकई भूमि सुधार नीति को मूर्त रूप देना चाहती, तो पहले पूरे देश की भूमि का सर्वेक्षण करवाती, अंग्रेजी सरकार ने 1905-06 में जमीन का सर्वेक्षण कराया था. उसके बाद सौ से अधिक साल गुजर गए, मगर हमारी सरकार ने भूमि का सही सही रिकॉर्ड रखने के लिए कोई पहल नहीं की है. नतीजा है भूमि के स्वामित्व को लेकर स्थिति अभी तक बेहद उलझी हुई है. रजिस्ट्री दस्तावेज के माध्यम से जमीनों की खरीद-बिक्री हो तो रही है और स्वामित्व अधिकार बदल रहे हैं, मगर किस भूमि का मालिक कौन है, अगर सरकारी दस्तावेज गृह से कोई पता करना चाहे, तो काफी मशक्कत करनी पड़ेगी.
गैर मजरुआ आम और गैर मजरुआ मालिक जमीनों को लेकर तो स्थिति और भी बुरी है. 1905-06 के सर्वे के अनुसार जमीन तीन भागों में विभक्त की गई थी, रैयत जमीन, गैर मजरुआ आम और गैर मजरुआ मालिक. रैयत जमीन तो किसानों के नाम हो गई, मगर गैर मजरुआ मालिक जमीन पर जमींदारों का कब्जा बना रहा, जबकि रास्ते, पोखरे, खत्ते, नदी, तालाब, नहर, पाइन, तटबंध आदि जमीनें, जिनका सार्वजनिक इस्तेमाल होता था, वे जमीनें गैर मजरुआ आम थीं. आजादी के बाद इन जमीनों का सबसे बुरा हाल हुआ. सरकार की अस्पष्ट नीति और गाँव की तरफ सरकार की लापरवाही भरे दृष्टिकोण की वजह से गैरमजरुआ आम जमीनों पर जिसको जहाँ मौका मिला, आम ओ खास सबने कब्जा कर लिया. इन जमीनों को लेकर चूँकि मालिकाना हक स्पष्ट नहीं है, इसलिए अक्सर गाँव के लोग जमीनों की खरीद-बिक्री करते समय ठगे जाते हैं और झगड़े होते हैं.
नदी, तालाब, पोखरा, नहर, पाइन आदि जो पानी के श्रोत थे, ज्यादातर उन्हीं जमीनों पर अराजक कब्जा हुआ है, इसलिए गाँवों में पानी की समस्या बढ़ी है. बरसात में बाढ़ की स्थिति रहती है और बरसात समाप्त होते ही, सूखे की स्थिति बन जाती है. बरसात का पानी बेकार बह जाता है. जलाशयों के समाप्त हो जाने की वजह से पशुओं को पीने का पानी मिलना, खेतों के लिए पटवन का काम आदि के लिए जमीन के नीचे के जल पर निर्भर रहना एकमात्र विकल्प रह गया है. नतीजा है जलस्तर लगातार नीचे गिरता जा रहा है.                  
खेती योग्य भूमि क्षेत्रों में भूमि सुधार की सरकारी प्रक्रिया अब भी जारी है, मगर पिछले एक दशक में भूमि की कीमतों में जिस तरह अभूतपूर्व वृद्धि हुई है, भूमिपतियों से भूमि लेना आसान नहीं रह गया है और यह अब न्यायसंगत भी नहीं है. शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों की भूमि की कीमतों में जिस तरह का आसमान-जमीन का अंतर है, उसमें शहरों के झोपड़ों में रहनेवाले लोगों झोपड़े की कीमत से भी कम है, उनके सारे खेतों का मूल्य. फिर जिन-जिन गाँवों में या उसके आसपास सरकार के विकास के कदम पड़ते हैं, जमीन की कीमत अनाप-शनाप बढ़ने लगती है. ऎसे में भूमि सुधार के नाम पर भूमिपतियों से जमीन वापस लेना सही नहीं होगा. फिर पिछले कुछ दशकों में नौकरी करनेवालों ने जिस तरह से अफरात कमाई कर शहरों में अथाह सम्पत्ति बनाई है, उसका क्या. टाटा-बिरला-अम्बानी जैसे पूँजीपतियों का क्या. भूमि आज सिर्फ आजीविका का साधन नहीं रह गया है, बल्कि भूमि की खरीद-बिक्री करोड़ों में होने लगी है, मामूली किसान भी नित नए बढ़ते शहरों के पास की जमीन बेचकर करोड़ों पति बन रहे हैं.     
दूसरी तरफ गाँवों में आज भी भूमिहीन परिवारों का एक बड़ा वर्ग ऐसा भी है, जिनके पास घर के लिए भी ज़मीन नहीं है. हालाँकि हमारी इक्कीसवीं सदी की सरकार ने इंदिरा आवास योजना और राजीव आवास योजना शुरू कर घरविहीनों को घर देने का काम शुरू किया है. मगर सरकार यह घर उन्हें उनके अधिकार के तौर पर नहीं, बल्कि भीख के तौर पर दे रही है, या कहें कृपा कर रही है. सरकार का कर्तव्य है कि उसके हर नागरिक को सम्मान पूर्वक जीने का हक मिले, मगर नागरिक दया के पात्र के तौर पर जीवन जीने के लिए न्यूनतम सुविधाएँ ही प्राप्त कर पाते हैं. इन योजनाओं में भी भ्रष्टाचार और बेईमानी का दीमक वैसे ही लगा है, जैसे सरकार की बाकी योजनाओं में.

आदिवासियों के मामले में यह स्थिति और भी शर्मनाक और अन्यायपूर्ण है. किसानों को भूमि के कुछ न कुछ अधिकार तो मिले, मगर उन आदिवासियों को, जिनका जीवन जंगलों पर निर्भर था, जिनकी आजीविका जंगलों से प्राप्त लकड़ी, पत्ते, फूल-फल और पशु-पक्षी पर आश्रित थी, उन्हें भूमि के अधिकार से सरकार ने लगभग पूरी तरह वंचित कर दिया. शहर आधारित मानसिकता के अंग्रेजों ने सम्पन्न गाँवों को तो अपने शोषण का केन्द्र बनाया, मगर अलाभकर जंगलों और आदिवासियों को इससे मुक्त रखा. वहाँ अंग्रेजी हुकूमत ने खेतीयोग्य जमीनवाले इलाकों की तरह जमींदारी प्रथा लागू नहीं की, और सुदूर जंगलों में आदिवासी अपना जीवन पूर्ववत जीते रहे. जब भारत आजाद हुआ, सरकार ने अंग्रेजों की तरह खेतों पर अपना स्वामित्व नहीं माना, और जमींदारों से खेत किसानों को मिले इसके लिए नियम–कानून तो बनाये, मगर जंगलों पर चूँकि जमींदारों का कब्जा नहीं था, इसलिए पूरे जंगल पर सरकार ने अपना कब्जा जमा लिया. आदिवासियों को जंगल की जमीन पर कोई अधिकार नहीं मिला. आज उसी अन्याय की वजह से देश के जंगली इलाकों में आग लगी है. आदिवासियों को उनका हक दिलाने के नाम पर एक तरफ नक्सली बंदूकें ताने खड़े हैं तो दूसरी तरफ कानून-व्यवस्था के नाम पर सरकारी सिपाही बंदूकें लिए आदिवासी इलाकों में घूम रहे हैं. और कुल मिलाकर स्थिति यह है कि पूरा जंगल जंगली जानवरों के आतंक से भी ज्यादा खतरनाक आतंक के साये में जी रहा है. सरकार जंगल पर अपना अधिकार मानती है, जबकि नक्सली जंगल पर आदिवासियों का हक बता, सरकार से जंग ठाने हैं. आदिवासियों को उसका हक दिलाने के नाम पर जबसे नक्सली आंदोलन शुरू हुआ है, लाखों लोग मारे जा चुके हैं, इनमें बहुत बड़ी संख्या निर्दोष आदिवासियों की भी है, मगर आदिवासियों का हक अब भी हवा में है. वास्तविक स्थिति यह है कि आदिवासी जंगल की तरफ सरकारी विकास के बढ़ते कदम की वजह से अपने घर से भी विस्थापित होने को मजबूर हैं. 

हमारे गाँव और भूमि सुधार-1

प्राचीन काल में वायु, जल और प्रकाश की तरह भूमि भी प्रकृति प्रदत्त उपहार मानी जाती थी, इसलिए भूमि किसी व्यक्ति की निजी सम्पत्ति नहीं होती थी. हमारे ऋषियों के अनुसार भूमि पर पहला अधिकार उसका था, जिसने जंगल काटकर उसे साफ किया, जोता और खेती की. तब यह अधिकार संपत्ति के तौर पर बेचा-खरीदा नहीं जाता था. शायद इसलिए कि उस समय आबादी कम थी और भूमि बहुत ज्यादा. जिसे भी खेती के लिए भूमि चाहिए होती होगी, वह जंगल साफ कर उपयोग भर भूमि प्राप्त कर लेता होगा. यानी भूमि पर पहला अधिकार मेहनतकश किसानों का रहा. फिर समय के विकास के साथ सरदार, मुखिया और राजा अस्तित्व में आये. किसान अपनी सुरक्षा के एवज में कुछ अनाज आदि देने लगे होंगे, जो बाद में ‘कर’ के तौर पर नियमित किसानों से लिया जाने लगा होगा. इतिहासकार बताते हैं अंग्रेजों के भारत आने से पहले किसान और राजा के बीच कोई बिचौलिया नहीं हुआ करता था, बल्कि कर वसूलने का कार्य राजा द्वारा नियुक्त कर्मचारी किया करते थे. और वह ‘कर’ राजा द्वारा किसानों की सहमति से तय किया जाता था.
मुस्लिम शासकाल में भी भूमि पर किसानों का हक पूर्ववत बना रहा. इतिहासकार बताते हैं कि मुगल शासनकाल में किसानों को काफी इज्जत प्राप्त थी. प्राचीनकाल से चली आ रही कृषि व्यवस्था में किसी बादशाह ने हस्तक्षेप नहीं किया और कृषक उसी तरह कर गाँव के मुखिया अथवा राजा को कर देते रहे, जैसे पूर्व में दिया करते थे. और मुखिया अथवा राजा को शासन द्वारा वैसे ही कर वसूलने के एवज में पारिश्रमिक मिला करता था, जैसे पहले मिला करता था.
मगर औरंगजेब की मृत्यु के बाद जैसे-जैसे मुगल बादशाहों की शक्ति क्षीण पड़ने लगी, भूमि पर किसानों के अधिकार का भी क्षय होने लगा. शासन प्रजा के जानमाल की रक्षा करने में असमर्थ होने लगा और देश में अराजकता फैलने लगी. और कर वसूलनेवाले मुखिया अथवा राजा मनमानी करने लगे और मनमाफिक कर नहीं देनेवाले को भूमि से बेदखल कर देने लगे. ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपने लाभ के लिए ऎसे लोगों को और शह दिया. और बाद में अंग्रेजी सरकार ने जब शासन की बागडोर अपने हाथ में ले ली, तब उसने और आगे बढ़कर खुद को भूमि का मालिक ही घोषित कर दिया. किसान भूमि पर अपने अधिकार से बेदखल कर दिए गए और अंग्रेजी शासन ने किसानों के खेत कर वसूलने वाले ग्राम प्रधानों और सामंतों-राजाओं को पट्टे पर देना शुरू कर दिया. इस तरह भारत में जमींदारी प्रथा शुरू हो गई.      
इतिहासकार बताते हैं कि हालाँकि शुरुआत में अंग्रेजी शासन का विचार भूमि पर उनके अधिकार से किसानों को वंचित करने का नहीं था, मगर 1786 0 में जब लार्ड कार्न वालिस भारत का गर्वनर जनरल बना, तो उसने जमींदारी प्रथा को शासन की मान्यता दे दी. और 1791 में पहली बार बंगाल प्रांत में दस वर्षीय पट्टे को स्वीकृति दी गई. दो साल के बाद बोर्ड आफ डाइरेक्टर्स ने इस दस वर्षीय पट्टे को स्थायी बंदोबस्त में बदल देने की अनुमति दे दी. जबकि मद्रास प्रांत में जमींदारी प्रथा की शुरुआत अंग्रेजी शासन की नीलामी नीति से हुई. अंग्रेज अधिकारी जमीन की बोली लगवाते थे, और जो सबसे ऊँची बोली लगाता था, जमीन का मालिकाना हक उसे दे दिया जाता था.
इस प्रकार भारतवर्ष के इतिहास में शासन और किसानों के बीच जमींदारों का उदय हुआ. और किसानों का भूमि पर जो अधिकार अनादि काल से चला आ रहा था, छिन गया. हालाँकि उन जमीनों पर कृषि कार्य अब भी किसान ही करते थे, मगर उत्पादन पर पहला अधिकार भूमि मालिकों यानी जमींदारों का ही होता था. इस तरह किसानों का भयंकर शोषण होने लगा. कई बार तो ज़मींदारों का शोषण बेहद अमानवीय भी हो जाता था, मगर अंग्रेजी सरकार ने किसानों की दुर्दशा से खुद को दूर ही रखा, उसे तो बस जमींदारों से अधिकतम कर लेने से मतलब रहता था.   
अंग्रेज शासकों का विचार था कि शक्तिशाली और धनी वर्ग यानी जमींदार शासन से जितना अधिक खुश रहेंगे, उन्हें भारत पर शासन करने में उतनी ही सहूलियत मिलेगी, मगर यही सोच उनके पतन का कारण बन गया. जमींदारों ने किसानों को इतना सताया कि किसान खेती का कार्य छोड़कर भागने पर मजबूर हो गए. किसानों में अंग्रेजी शासन के प्रति जबरदस्त आक्रोश पनपने लगा. अंग्रेज शासक को भी अपनी भूल का अहसास हुआ और किसानों का असंतोष विद्रोह का रूप न ले ले, इसके लिए अंग्रेजी शासन ने पहली बार किसानों की दशा सुधारने के लिए 1859 में भूमि संबंधी अधिनियम पास किया. मगर जमींदारी व्यवस्था पूर्ववत बनी रही. किसानों पर जुर्म होते रहे. और किसानों का असंतोष आन्दोलन का रूप लेने लग गया.
किसान आन्दोलन का पहला बीज किसान सभा द्वारा बोया गया 11 फरवरी, 1918 को हुई अखिल भारतीय कांग्रेस की इलाहाबाद बैठक में. कांग्रेस के नेताओं ने किसानों के हितों को जोर-शोर से उभारा, जिसका ग्रामीण जनता पर बड़ा भारी असर हुआ. क्योंकि अधिकांश ग्रामीण जनता या तो किसान थी या किसानों पर आश्रित काम करिन्दे.
किसान आन्दोलन के असर को देखते हुए भारत की स्वतंत्रता के लिए लड़ रहे काँग्रेसी नेताओं ने 27 अक्टूबर, 1928 को यूपी काँग्रेस कमिटी की सभा में यह घोषणा की कि भारत की राजनीतिक स्वतंत्रता तबतक बेमानी है जब तक किसानों को शोषण से मुक्ति न दिला दी जाय. किसान अब और अधिक मुखर हो गए. लगान कम करने और उसे न्यायसंगत बनाने की माँग मुख्य रूप से उठने लगी. अंग्रेजी सरकार ने भूमि सुधार अधिनियम में सुधार करके जमींदारों के हक को और कम करके किसानों को राहत देने की कोशिश भी की, मगर 27-28 अप्रैल 1935 को इलाहाबाद में सरदार पटेल के सभापतित्व में काँग्रेसी नेताओं ने जमींदारों के हक को कम करने के सरकारी अधिनियम को किसानों के हित के लिए नाकाफी बताते हुए जमींदारी उन्मूलन का प्रस्ताव पास कर दिया. इस प्रस्ताव में यह घोषणा की गई कि वर्तमान जमींदारी प्रथा ग्रामकल्याण के बिल्कुल विपरीत है. यह प्रथा ब्रिटिश शासन के  दौरान लाई गई और इससे ग्रामीण जीवन पूरी तरह तहस नहस हो गया है. इसलिए हर हाल में जमींदारी प्रथा को समाप्त किया जाय.

कुछ साल बाद 1940 में बंगाल लैंड कमीशन भी इस नतीजे पर पहुँचा कि जमींदारी प्रथा  में बहुत सारी बुराइयाँ आ चुकी हैं और वर्तमान परिस्थिति में देश हित में यह बेहद अनुपयुक्त है. दूसरे विश्वयुद्ध और भीषण अकाल का सामना कर रही अंग्रेजी सरकार को भारतीय और ब्रिटिश अर्थशास्त्रियों ने भी अधिक कृषि उत्पादन के लिए जमींदारी प्रथा के उन्मूलन को आवश्यक बतलाया. लिहाजा 1946 में चुनाव में जीत के बाद जब हर प्रांत में कांग्रेस की सरकार बनी, तो चुनावी घोषणा पत्र के अनुसार जमींदारी प्रथा को समाप्त करने के लिये विधेयक प्रस्तुत किया गया. और यही विधेयक अधिनियम बनकर जमींदारी प्रथा के उन्मूलन का सूत्रधार बना. किसानों और राज्य के बीच फिर से सीधा संबंध स्थापित हो गया और भूमि का अधिकार वापस किसानों को मिल गया .

Sunday, 15 June 2014

प्रधानमंत्री मोदी कैसे बदलेंगे गाँव की तस्वीर

यह बड़ी खुशी की बात है कि भारत के नए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी हमारे गाँव को स्वावलंबी बनाना चाहते हैं. गाँव की आत्मा को बचाए रखकर गाँव को शहर जैसी सुविधाओं से लैश करने का इरादा उन्होंने संसद में दिए अपने पहले भाषण में ही प्रकट कर दिया है. उन्होंने महात्मा गाँधी के सपनों को भी उद्धृत किया और कहा कि गाँव के विकास से ही देश का विकास होगा. मगर कैसे ? इसका खाका अपने भाषण में उन्होंने प्रकट नहीं किया.
कहने को तो यह देश किसानों का है, मगर वास्तविकता यह है कि देश का सबसे शोषित, पीड़ित, प्रताड़ित, वंचित और पिछड़ा किसान ही है. देश की सत्तर प्रतिशत आबादी आज भी गाँवों में रहती है. कभी गाँव की पूरी सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था कृषि आधारित हुआ करती थी, किंतु आज गाँव की सामाजिक आर्थिक व्यवस्था में कृषि का दखल हाशिए पर चला गया है. किसान सहित सारे ग्रामीण सरकारी नौकरियों, छोटे-मोटे रोजगार-धंधों और शहरों के भरोसे जी रहे हैं. खेती बस मजबूरी में की जा रही है. ग्राम जीवन पर अंग्रेजी शासनकाल के दौरान लगा ग्रहण अभी तक छँटा नहीं है. देश की आजादी के साथ किसानों के शोषक जमींदार ज़रूर खत्म हो गए, मगर किसानों का शोषण रुका नहीं. पहले ज़मींदार किसानों की मेहनत-पसीने की कमाई को गड़प कर जाते थे, आजादी के बाद सरकार की व्यवस्था.
कोई भी व्यवसाय-कार्य और उसमे लगे लोग तभी सरवाइव कर सकते हैं, जब उस कार्य-व्यवसाय से उन्हें मुनाफा हो. किसानों के साथ ऎसी स्थिति कभी नहीं बनी. अंग्रेजी काल से आजतक उनके द्वारा उत्पादित अनाज, सब्जियाँ, फल और दूध आदि बगैर मुनाफा जोड़े बाजार तक पहुँचती है. कितनी हैरत की बात है कि बाज़ार में बैठे व्यापारी और बिचौलिए किसानों द्वार उत्पादित वस्तुओं को बेचकर गाढ़ी कमाई कर रहे हैं और किसान अपनी परवरिश भर लाभ भी प्राप्त नहीं कर पाता है. यहाँ यह बताते हुए चलना आवश्यक है कि एक एकड़ में गेहूँ की खेती करने से किसान को लागत के अलावा 2500 रुपए की बचत हो पाती है, जबकि उतनी ही ज़मीन पर धान की खेती से 3500 रुपए की बचत हो पाती है. यानी 5 एकड़ खेत जोतनेवाला किसान एक साल में 30 हज़ार रुपए कमा पाता है. वह भी तब जब पूरे खेत उसके हों और फसल भी अच्छी हुई हो. अब अंदाजा लगा लीजिए 5 एकड़ में खेती करनेवाला सालाना 30 हज़ार रुपए कमाकर अपने परिवार का भरण-पोषण कैसे कर सकता है? और यह हालत तब है, जब केन्द्र व राज्य सरकारें बीज से लेकर खाद, पानी, बिजली, डीजल और ट्रैक्टर आदि के नाम पर भारी सब्सिडी किसानों को देने का दावा करती हैं. जबकि सरकारी नौकरी करनेवाला चपरासी भी कम से कम 15 हज़ार रुपए महीना वेतन पाता है. इस सन्दर्भ में दूसरी वास्तविकता यह भी है कि देश के अधिकांश किसानों के पास बमुश्किल 2 एकड़ ज़मीन है. लिहाजा, आज़ादी के 67 साल बाद भी किसान इस देश का सबसे शोषित, पीड़ित, प्रताड़ित, वंचित और पिछड़ा तबका है तो क्यों? इस सवाल का जवाब आजतक या तो सरकारें ढूँढ नहीं पाईं या फिर इस सवाल को जानबूझकर नजरअंदाज़ किया.
अब सवाल उठता है कि क्या प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी वाकई गाँव को सँवारने को लेकर गंभीर है ? क्या वह गाँव में रहनेवाले लोगों की सामाजिक-आर्थिक हैसियत को लेकर सचमुच चिंतित है? क्या वह गाँव और ग्रामीणों की दशा सुधारने को लेकर वाकई प्रतिबद्ध हैं?
गाँव को मजबूत और स्वावलंबी बनाने के लिए सबसे पहले कृषि और किसान को ताकतवर बनाना होगा. आधुनिक तकनीकों और तरीकों से खेती करने की वजह से कृषि उत्पादनों में वृद्धि तो हुई है, मगर बाज़ार में किसान की हैसियत अभी तक बन नहीं पाई है. फुटपाथ पर बैठा मोची और हॉकर भी अपनी मेहनत की कीमत खुद तय करता है, मगर बड़ा से बड़ा किसान भी अपने उत्पादन की कीमत तय नहीं कर पाता. उसे बाज़ार के रहमोकरम पर ही जीना पड़ता है. कहने को तो सरकार कृषि उत्पादनों का न्यूनतम समर्थन तय करती है, मगर वह बेहद कम, दोषपूर्ण और अन्यायी है. बाज़ार में किसी भी वस्तु की कीमत उस वस्तु की लागत में मुनाफा जोड़कर तय की जाती है, मगर किसानों द्वारा उत्पादित वस्तुओं के साथ ऎसी बात नहीं है. किसानों को मुनाफा तो दूर, मेहनत की मजूरी तक नहीं मिल पाती. क्या प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी किसानों को मुनाफा सहित मूल्य दिलाने का संकल्प रखते हैं? यदि हाँ, तो किसानों को बाज़ार से अपनी मेहनत का सही मूल्य मिले, इसकी उपयुक्त व्यवस्था करनी होगी.
पब्लिक डिस्ट्रिब्यूशन सिस्टम यानी सस्ते गल्ले की सरकारी दुकान पूरी तरह से किसान विरोधी है. यह नेताओं का वोट बैंक तो बढ़ाती है, मगर ग्रामीण अर्थव्यस्था को पूरी तरह ध्वस्त कर देती है. अभी सरकार ग्रामीण क्षेत्रों की 75% आबादी और शहरी क्षेत्र की 50% आबादी को सस्ता गल्ला बाँट रही है, क्या ऎसी ही कीमतों पर घर, टीवी-फ्रिज और मोटरगाड़ियाँ बाँट सकती? क्योंकि आज ये चीज़ें भी लक्जरी नहीं ज़रूरी हो गई हैं. मेरा दावा है एक साल के लिए भी सरकार ऎसा कर दे तो बड़े-बड़े उद्योगपतियों का बेड़ा गर्क हो जाएगा. किसानों ने फायदे को कभी अपना मकसद नहीं बनाया, यह इस देश पर किसानों का अहसान है. वरना गेहूँ 400 रुपए किलो और चावल 500 रुपए खरीदते, तब इस देश के शहरी अमीरों को समझ में आता कि उनकी कितनी हैसियत है. हमारे गाँव में एक कहावत है ‘ कमाए लँगोटी, खाय धोती’ इस देश की व्यवस्था इस कहावत को पूरी तरह चरितार्थ कर रही है.
आधुनिक जीवन व्यवस्था में बिजली की बड़ी अहम भूमिका है, मगर देश में बिजली की स्थिति बेहद दयनीय है. लाखों गाँवों ने आजादी के 67 साल बाद भी बिजली का मुँह नहीं देखा है. बिजली के अभाव में कम्प्यूटर जैसे ज़रूरी साधन का इस्तेमाल युवा और किसान नहीं कर सकते. जबकि आज की दुनिया में प्रगति का सहचर बनने के लिए कम्प्यूटर का साथ अनिवार्य है. क्या उत्साही प्रधानमंत्री देश के गाँवों तक बिजली पहुँचा पाने की स्थिति में होंगे?
ज्यादातर गाँवों में सभ्य समाज के जीवन की मूलभूत सुविधाएँ- अच्छे स्कूल और अस्पताल तक नदारद हैं. मुझे लगता है, गाँव को सड़कों से जोड़ने से ज्यादा ज़रूरी स्कूलों और अस्पतालों से लैश करना है. क्या संसद को मंदिर मानकर उसके प्रवेश द्वार पर श्रद्धा से शीश नवाने वाले प्रधानमंत्री मोदी हमारे गाँव में स्कूल और अस्पताल का जाल बिछा पाएँगे?
फूड प्रोसेसिंग में बड़ी-बड़ी कंपनियाँ धंधा कर रही हैं, मगर खेती करने के काम में ऎसी एक भी कंपनी क्यों नहीं उतर पाई है? इससे भी यह आसानी से समझा जा सकता है कि मौजूदा व्यवस्था में खेती में फायदा नहीं है. मोदी जी अगर सचमुच गाँव और किसान को मजबूत और स्वावलंबी बनाना चाहते हैं, तो फूड प्रोसेसिंग के व्यवसाय में उद्योगपतियों के एकाधिकार को खत्म करना होगा. बेहतर हो कि फूड प्रोसेसिंग इंडस्ट्री में किसानों की सीधी भागेदारी अनिवार्य की जाय और उन्हें इस इंडस्ट्री का मेन स्टेक होल्डर बनाया जाय. क्या सबका विकास चाहनेवाले प्रधानमंत्री मोदी देशी-विदेशी उद्योगपतियों को नाराज़ कर किसानों को उसका वाजिब हक दिला पाने का संकल्प रखते हैं? यदि हाँ, तभी गाँव का विकास संभव है, वरना 67 सालों से गाँव और किसान के विकास को लेकर चल रही सरकारी कवायद जिस तरह से अबतक रस्मी रही है, आगे भी रस्मी ही बनी रहेगी? भाषण देकर समर्थकों और मातहतों से तालियाँ जितनी भी पिटवा लें, हमारे गाँव की स्थिति सुधरने वाली नहीं.