प्राचीन काल में वायु, जल और प्रकाश की तरह भूमि भी
प्रकृति प्रदत्त उपहार मानी जाती थी, इसलिए भूमि किसी व्यक्ति की निजी सम्पत्ति
नहीं होती थी. हमारे ऋषियों के अनुसार भूमि पर पहला अधिकार उसका था,
जिसने जंगल काटकर उसे साफ किया, जोता और खेती की. तब यह अधिकार संपत्ति के तौर पर
बेचा-खरीदा नहीं जाता था. शायद इसलिए कि उस समय आबादी कम थी और भूमि बहुत ज्यादा.
जिसे भी खेती के लिए भूमि चाहिए होती होगी, वह जंगल साफ कर उपयोग भर भूमि प्राप्त
कर लेता होगा. यानी भूमि पर पहला अधिकार मेहनतकश किसानों का रहा. फिर समय के विकास
के साथ सरदार, मुखिया और राजा अस्तित्व में आये. किसान अपनी सुरक्षा के एवज में
कुछ अनाज आदि देने लगे होंगे, जो बाद में ‘कर’ के तौर पर नियमित किसानों से लिया
जाने लगा होगा. इतिहासकार बताते हैं अंग्रेजों के भारत आने से पहले किसान और राजा
के बीच कोई बिचौलिया नहीं हुआ करता था, बल्कि कर वसूलने का कार्य राजा द्वारा
नियुक्त कर्मचारी किया करते थे. और वह ‘कर’ राजा द्वारा किसानों की सहमति से तय
किया जाता था.
मुस्लिम
शासकाल में भी भूमि पर किसानों का हक पूर्ववत बना रहा. इतिहासकार बताते हैं कि
मुगल शासनकाल में किसानों को काफी इज्जत प्राप्त थी. प्राचीनकाल से चली आ रही कृषि
व्यवस्था में किसी बादशाह ने हस्तक्षेप नहीं किया और कृषक उसी तरह कर गाँव के
मुखिया अथवा राजा को कर देते रहे, जैसे पूर्व में दिया करते थे. और मुखिया अथवा
राजा को शासन द्वारा वैसे ही कर वसूलने के एवज में पारिश्रमिक मिला करता था, जैसे
पहले मिला करता था.
मगर
औरंगजेब की मृत्यु के बाद जैसे-जैसे मुगल बादशाहों की शक्ति क्षीण पड़ने लगी, भूमि
पर किसानों के अधिकार का भी क्षय होने लगा. शासन प्रजा के जानमाल की रक्षा करने
में असमर्थ होने लगा और देश में अराजकता फैलने लगी. और कर वसूलनेवाले मुखिया अथवा
राजा मनमानी करने लगे और मनमाफिक कर नहीं देनेवाले को भूमि से बेदखल कर देने लगे.
ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपने लाभ के लिए ऎसे लोगों को और शह दिया. और बाद में
अंग्रेजी सरकार ने जब शासन की बागडोर अपने हाथ में ले ली, तब उसने और आगे बढ़कर खुद
को भूमि का मालिक ही घोषित कर दिया. किसान भूमि पर अपने अधिकार से बेदखल कर दिए गए
और अंग्रेजी शासन ने किसानों के खेत कर वसूलने वाले ग्राम प्रधानों और
सामंतों-राजाओं को पट्टे पर देना शुरू कर दिया. इस तरह भारत में जमींदारी प्रथा
शुरू हो गई.
इतिहासकार
बताते हैं कि हालाँकि शुरुआत में अंग्रेजी शासन का विचार भूमि पर उनके अधिकार से
किसानों को वंचित करने का नहीं था, मगर 1786 ई0 में जब लार्ड कार्न वालिस
भारत का गर्वनर जनरल बना, तो उसने जमींदारी प्रथा को शासन की मान्यता दे दी. और 1791 में पहली बार बंगाल प्रांत
में दस वर्षीय पट्टे को स्वीकृति दी गई. दो साल के बाद बोर्ड आफ डाइरेक्टर्स ने इस
दस वर्षीय पट्टे को स्थायी बंदोबस्त में बदल देने की अनुमति दे दी. जबकि मद्रास
प्रांत में जमींदारी प्रथा की शुरुआत अंग्रेजी शासन की नीलामी नीति से हुई.
अंग्रेज अधिकारी जमीन की बोली लगवाते थे, और जो सबसे ऊँची बोली लगाता था, जमीन का
मालिकाना हक उसे दे दिया जाता था.
इस
प्रकार भारतवर्ष के इतिहास में शासन और किसानों के बीच जमींदारों का उदय हुआ. और
किसानों का भूमि पर जो अधिकार अनादि काल से चला आ रहा था, छिन गया. हालाँकि उन जमीनों
पर कृषि कार्य अब भी किसान ही करते थे, मगर उत्पादन पर पहला अधिकार भूमि मालिकों यानी
जमींदारों का ही होता था. इस तरह किसानों का भयंकर शोषण होने लगा. कई बार तो ज़मींदारों
का शोषण बेहद अमानवीय भी हो जाता था, मगर अंग्रेजी सरकार ने किसानों की दुर्दशा से
खुद को दूर ही रखा, उसे तो बस जमींदारों से अधिकतम कर लेने से मतलब रहता था.
अंग्रेज शासकों का विचार था कि शक्तिशाली और धनी वर्ग यानी जमींदार
शासन से जितना अधिक खुश रहेंगे, उन्हें भारत पर शासन करने में उतनी ही सहूलियत
मिलेगी, मगर यही सोच उनके पतन का कारण बन गया. जमींदारों ने किसानों को इतना सताया
कि किसान खेती का कार्य छोड़कर भागने पर मजबूर हो गए. किसानों में अंग्रेजी शासन के
प्रति जबरदस्त आक्रोश पनपने लगा. अंग्रेज शासक को भी अपनी भूल का अहसास हुआ और
किसानों का असंतोष विद्रोह का रूप न ले ले, इसके लिए अंग्रेजी शासन ने पहली बार
किसानों की दशा सुधारने के लिए 1859 में भूमि संबंधी अधिनियम पास किया. मगर
जमींदारी व्यवस्था पूर्ववत बनी रही. किसानों पर जुर्म होते रहे. और किसानों का
असंतोष आन्दोलन का रूप लेने लग गया.
किसान आन्दोलन का पहला बीज किसान सभा द्वारा बोया गया 11 फरवरी, 1918 को हुई अखिल भारतीय कांग्रेस
की इलाहाबाद बैठक में. कांग्रेस के नेताओं ने किसानों के हितों को जोर-शोर से
उभारा, जिसका ग्रामीण जनता पर बड़ा भारी असर हुआ. क्योंकि अधिकांश ग्रामीण जनता या
तो किसान थी या किसानों पर आश्रित काम करिन्दे.
किसान
आन्दोलन के असर को देखते हुए भारत की स्वतंत्रता के लिए लड़ रहे काँग्रेसी नेताओं
ने 27 अक्टूबर, 1928 को यूपी काँग्रेस कमिटी की
सभा में यह घोषणा की कि भारत की राजनीतिक स्वतंत्रता तबतक बेमानी है जब तक किसानों
को शोषण से मुक्ति न दिला दी जाय. किसान अब और अधिक मुखर हो गए. लगान कम करने और
उसे न्यायसंगत बनाने की माँग मुख्य रूप से उठने लगी. अंग्रेजी सरकार ने भूमि सुधार
अधिनियम में सुधार करके जमींदारों के हक को और कम करके किसानों को राहत देने की
कोशिश भी की, मगर 27-28 अप्रैल 1935 को इलाहाबाद में सरदार पटेल के सभापतित्व में काँग्रेसी
नेताओं ने जमींदारों के हक को कम करने के सरकारी अधिनियम को किसानों के हित के लिए
नाकाफी बताते हुए जमींदारी उन्मूलन का प्रस्ताव पास कर दिया. इस प्रस्ताव में यह
घोषणा की गई कि वर्तमान जमींदारी प्रथा ग्रामकल्याण के बिल्कुल विपरीत है. यह
प्रथा ब्रिटिश शासन के दौरान लाई गई और
इससे ग्रामीण जीवन पूरी तरह तहस नहस हो गया है. इसलिए हर हाल में जमींदारी प्रथा
को समाप्त किया जाय.
कुछ साल बाद 1940 में बंगाल लैंड कमीशन भी इस नतीजे
पर पहुँचा कि जमींदारी प्रथा में बहुत
सारी बुराइयाँ आ चुकी हैं और वर्तमान परिस्थिति में देश हित में यह बेहद अनुपयुक्त
है. दूसरे विश्वयुद्ध और भीषण अकाल का सामना कर रही अंग्रेजी सरकार को भारतीय और
ब्रिटिश अर्थशास्त्रियों ने भी अधिक कृषि उत्पादन के लिए जमींदारी प्रथा के उन्मूलन
को आवश्यक बतलाया. लिहाजा 1946 में चुनाव में जीत के बाद जब हर प्रांत में कांग्रेस की
सरकार बनी, तो चुनावी घोषणा पत्र के अनुसार जमींदारी प्रथा को समाप्त करने के लिये
विधेयक प्रस्तुत किया गया. और यही विधेयक अधिनियम बनकर जमींदारी प्रथा के उन्मूलन
का सूत्रधार बना. किसानों और राज्य के बीच फिर से सीधा संबंध स्थापित हो गया और
भूमि का अधिकार वापस किसानों को मिल गया .
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