Sunday, 29 June 2014

गाँव को बचाना है तो भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन करना होगा

हमारे गाँव और भूमि अधिग्रहण कानून
भूमि अधिग्रहण कानून आरंभ से ही हमारे गाँव के लिए अभिशाप की तरह रहा. देश में पहली बार भूमि अधिग्रहण कानून 1894 में बना. अंग्रेजी सरकार ने सार्वजनिक तरक्की के उद्देश्य की पूर्त्ति के लिए यह कानून बनाया था. हालाँकि कोई भी कानून न्याय को आधार बनाकर ही बनाया जाता है, मगर अंग्रेजों द्वारा बनाया गया यह भूमि अधिग्रहण कानून सीधे तौर पर न्याय को अँगूठा दिखानेवाला था. यह कानून सरकार को भूमि अधिग्रहण का अधिकार तो देता था, मगर जिसकी जमीन का अधिग्रहण किया जाता था, उसकी न तो मर्जी की परवाह थी, न उसके नुकसान और भविष्य की. कोई भी सरकार शासन के एवज में सुरक्षा के जो अधिकार देने को बाध्य होती है, इस कानून के तहत उस सुरक्षा के अधिकार की भी धज्जियाँ उड़ाई जाती रहीं. आश्चर्यजनक और विडंबनापूर्ण तो यह है कि आजादी के बाद भी यह कानून दशकों हमारे किसानों का गला घोंटता रहा. आजाद हिन्दुस्तान में भी किसी ने किसानों के साथ होनेवाले इस अन्याय की तरफ ध्यान नहीं दिया.
अंग्रेजों द्वारा बनाये गये इस भूमि अधिग्रहण कानून को न्यायपरक बनाने का प्रयास पहली बार आजादी के 37 सालों बाद 1984 में किया गया. इस बदलाव में किसानों को उचित मुआवजा देने का प्रावधान किया गया. मगर अंग्रेजों का बनाया यह कानून वैसे ही अलोकतांत्रिक बना रहा, यानी सरकार सार्वजनिक हित के उद्देश्य से किसानों की मर्जी के बगैर भी भूमि अधिग्रहण कर सकती थी. वैश्वीकरण और आर्थिक उदारीकरण के बाद इस कानून का और भी बेजा इस्तेमाल हुआ. नेताओं, नौकरशाहों और पूँजीपतियों के सिंडिकेट ने इस कानून की आड़ में खूब पैसे बनाये. उद्योग लगाने और घर मुहैया कराने के नाम पर उद्योगपतियों और बिल्डरों को सस्ती कीमतों पर जितनी चाहिए, उतनी जमीनें दी गईं, जिसे बाद में उनलोगों ने ऊँची कीमतों पर बेचा और करोड़ों-अरबों कमाए. और वे किसान, जिनकी जमीनें अधिग्रहण कानून के तहत ली गईं, ठगे गए. किसानों को जब इस बात का अहसास हुआ, तब आन्दोलन हुए और मामला कोर्ट तक पहुँचा. कोर्ट ने किसानों का पक्ष सुनने के बाद कई अधिग्रहणों को अवैधानिक बताते हुए खारिज कर दिया. सुप्रीम कोर्ट ने तो इस कानून को सरासर धोखा बता इसे खत्म कर दिये जाने तक की बात कह डाली. तब जाकर देश के नीति-नियंताओं की चेतना और गैरत जागी और नया भूमि अधिग्रहण कानून बनाने की कवायद शुरू हुई. और 29 अगस्त 2013 को भूमि अधिग्रहण कानून उचित मुआवजा और पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन में पारदर्शिता का अधिकार विधेयक 2012” नाम से पास किया गया.
देश में तेजी से बढ़ते औद्योगिकीकरण और शहरीकरण की खातिर भूमि अधिग्रहण आवश्यक तो है, मगर जिस अदूरदर्शी तरीके से भूमि का अधिग्रहण किया जा रहा है, वह भारतवर्ष के भविष्य के लिए न सिर्फ खतरनाक है, बल्कि भारत की पहचान को लेकर भी गंभीर चिंता प्रकट करता है. भूमि अधिग्रहण करते वक्त भारत के नीति नियंताओं को यह सतत याद रखने की ज़रूरत है कि भारत की पहचान आरंभकाल से कृषि प्रधान और गाँवों के देश के रूप में रहा है. इसके रहन-सहन, खान-पान, पारिवारिक-सामाजिक रीति-रिवाजों और उत्सवों-त्योहारों में भी ग्रामीण जीवन की गहरी छाप है. इसीलिए हमारे देश के मनीषियों-चिंतकों ने बार-बार यह माना और दोहराया है कि भारत की आत्मा गाँवों में बसती है. नये उद्योग-धंधे लगाने और नये शहर बसाने के जुनून में आवश्यक भूमि का अधिग्रहण करते वक्त यह ध्यान रखना होगा कि ज़रूरी विकास तो हो, मगर हमारी प्राचीन पहचान और संस्कृतियों को भी नुकसान न पहुँचे. 29 अगस्त 2013 को पास हुआ नया भूमि अधिग्रहण कानून पुराने भूमि अधिग्रहण कानून के अन्यायपूर्ण प्रावधानों को खत्म कर प्रभावितों के अधिकारों को अधिक से अधिक सुरक्षा प्रदान तो करता है, किंतु ‘हमारे गाँव’ और ‘खेती’ के अस्तित्व पर मंडराते संकट को यह तनिक भी कम नहीं करता है.
खेती ही हमारे भोजन का आधार हैं, ऎसे में यह बेहद आवश्यक है कि खेती योग्य जमीनों की हर हाल में रक्षा की जाय, मगर दुर्भाग्य यह है लगातार बढ़ते शहरीकरण की वजह से खेती योग्य जमीनें लगातार विकास की भेंट चढ़ती जा रही हैं, जबकि देश-दुनिया की आबादी लगातार बढ़ती जा रही है. हरित क्रांति ने बेशक खाद्य पदार्थों के उत्पादन में बढ़ोतरी की है, मगर अन्न, सब्जी, फल और दूध आदि पौष्टिक खाद्य ज़रूरतें अब भी आधुनिक समाज के समाज के सामने मुँह फैलाए खड़ी है. विज्ञान के दम पर पेट भरने भर अनाज उपजाने में हम कामयाब ज़रूर रहे हैं, मगर हर नागरिक को पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराने में हम अब भी नाकामयाब रहे हैं. चिंताजनक बात यह है कि 2013 में बना भूमि अधिग्रहण कानून भी भविष्य में और गहराते भोजन के इस देशव्यापी संकट को पहचानने में नाकामयाब रहा है.
आरंभिक काल से लेकर अंग्रेजों के शासन के पूर्व तक भूमि को सम्पत्ति के तौर पर नहीं, जीवन जीने के आधार के तौर देखा-समझा जाता था, मगर अंग्रेजों ने प्रॉपर्टी के तौर पर देखने की हमें दृष्टि दे दी. आजादी के बाद प्रबुद्ध भारतवासियों को इस दृष्टि में तरक्की की अपार संभावनाएँ दिखी, लिहाजा न तो ज़रूरी भूमि सुधार ही लागू हो पाये और न ही भूमिका वास्तविक मोल ही समझा गया. भूमि का असली मूल्य है उसकी उर्वरा में, अन्न, सब्जियां, फल आदि के ज़रूरी खाद्य पदार्थों के उत्पादन में, मगर आधुनिक भारत ने इसकी उर्वरा के बजाय इसके बांझपन को ज्यादा कीमती माना. फसलों से लहलहाते खेतों से ज्यादा कीमती कंक्रीट के जंगल हो गये.
नया भूमि अधिग्रहण कानून खेती की जमीन को कंक्रीट के जंगल में तब्दील करने के लिए पुरजोर तरीके से उत्साहित करता है. सरकारें जिस भी क्षेत्र की जमीनों का सरकारी या निजी उपक्रमों के लिए भूमि का अधिग्रहण करती हैं, वहाँ की जमीनों के भाव आसमान छूने लगते हैं. भूमि अधिग्रहण कानून में सरकार ने यह व्यवस्था दी है अधिग्रहण असिंचित, बंजर और खेती के लिए अयोग्य भूमि का ही अधिग्रहण किया जाएगा, और अगर इस तरह की भूमि उपलब्ध न हो, तो खेती योग्य भूमि का भी अधिग्रहण किया जा सकता है. इसमें पहली बात तो यह है कि कोई भूभाग अगर आजादी के इतने साल बाद भी, असिंचित है और उसकी वजह से बंजर और अनुपजाऊ है तो इसकी वजह भूमि नहीं हमारी सरकारों का नकारापन है कि हमारी सरकारें उचित जलप्रबंधन करने में अबतक असफल रही है. दूसरी बात यह कि बंजर होने की वजह से जो भूमि बेकार पड़ी थी, जिसकी कोई उल्लेखनीय कीमत नहीं थी, वह जमीन खेतीयोग्य जमीनों से भी ज्यादा कीमती हो गई. बंजर जमीनों के मालिक अमीर हो गये और कृषियोग्य जमीनों वाले किसान गरीबी की वजह से आत्महत्या करने को अभिशप्त.
भूमि अधिग्रहण कानून की दूसरी बड़ी विडम्बना या खामी कहें वह यह है कि कृषि भूमि का अधिग्रहण कर उद्योगों के साथ-साथ रियल-एस्टेट को भी पूरे जोर-शोर से बढ़ावा दिया जा रहा है। रियल एस्टेट आज भारतवर्ष का सबसे कमाऊ क्षेत्र है. कमाई कितनी है इसका अन्दाजा इसी से लगा लीजिए कि जमीनों की दलाली करनेवाले लोग भी लाखों-करोड़ों कमा रहे हैं. देश के काले धन का बहुत बड़ा हिस्सा रियल एस्टेट में लगा है. भूमि मालिकों के पुनर्वास को लेकर सरकार नगद मुआवजा देकर उन्हें चुप तो करा देती है, मगर इस बिजनेस के खेल में कृषिभूमि और किसान उजड़ रहे हैं. इसकी चिंता भूमि अधिग्रहण कानून में दिखाई नहीं पड़ती.
आखिर आदर्श भूमि अधिग्रहण कानून का आधार क्या होइस कानून में ऐसी कौन-कौन सी शर्तें जोड़ी जाय कि किसानों के हितों को भी चोट  पहुंचे और सार्वजनिक विकास में भी बाधा  आए?
इसके लिए ज़रूरी है कि अधिग्रहण कानून में गाँव और खेत को बचाए रखने की शर्त्त अनिवार्य की जाय. इस संबंध में कोई निश्चित नियम न होने की वजह से तेजी से शहरीकरण होते इस दौर में नई इंडस्ट्री के लगते ही नई रिहाइशी कॉलोनियाँ बननी शुरू हो जाती है, और खेती योग्य पूरी की पूरी ज़मीन भी ऊँची कीमतों पर बिल्डरों द्वारा खरीद ली जाती है. इससे खेती की ज़मीन तो खत्म होती ही है, गाँव का अस्तित्व भी सदा के लिए नष्ट हो जाता है. इसके लिए आवश्यक है कि अधिग्रहण कानून में कुछ ज़रूरी बातें शामिल कर ली जायं.
पहली शर्त्त, तो यह हो कि एक खास प्रतिशत से अधिक ज़मीन एक साथ अधिग्रहित नहीं की जाय, दूसरी शर्त्त, यह जोड़ी जाय कि किसानों को खेती की जमीन के एवज में नगद मुआवजा देने के बजाय वहीं आसपास खेती योग्य ज़मीन ही दी जाएगी, ताकि खेत और किसान दोनों बचे रहे, तीसरी शर्त्त यह हो कि खेती योग्य ज़मीन का वह खास प्रतिशत जो खेती के लिए संरक्षित है, उसका इस्तेमाल सिर्फ खेती के लिए हो. और चौथी शर्त्त यह हो कि नई कॉलोनियाँ बसाने हेतु ज़मीन अधिग्रहण के साथ यह निश्चित किया जाय कि इतने फ्लैट्स के बाद इतनी खेती योग्य ज़मीन होना अनिवार्य है. इससे दो तरह के लाभ होंगे, एक तो, खेत, किसान और गाँव का अस्तित्व बचा रहेगा, दूसरे, कॉलोनियों में बसे गैर कृषक आबादी को ज़रूरी खाद्यान्न पास के किसानों से उपलब्ध हो जाया करेगा. इससे किसानों को पास में ही बाज़ार मिल जाएगा और शहरी आबादी को अपेक्षाकृत सस्ते और बढ़िया खाद्यान्न मिल जाया करेंगे.
बहरहाल, यदि भारत वर्ष की वास्तविक पहचान को बचाए रखना है तो भूमि अधिग्रहण कानून में गाँव और किसान के अस्तित्व को बचाने हेतु संशोधन ज़रूरी है. 

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