Saturday, 16 August 2014

प्रधानमंत्री गाँवों को कैसे बनाएँगे स्वावलंबी ?

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस पर दिए अपने पहले भाषण में गाँवों को लेकर जो दृष्टिकोण प्रकट किया है, वह गाँववासियों के लिए आह्लादकारी तो है ही, शहरों में रह रहे शहरियों के लिए भी सुखदायक है. क्योंकि अगर गाँव की दशा और दिशा बदलेगी, तो गाँवों से भारी संख्या में हो रहा पलायन काफी हद तक थमेगा. शहरों में भीड़ घटेगी और बढ़ती आबादी की वजह से चरमराती शहरी व्यवस्था कुछ बेहतर होगी.
भारत गाँवों का देश है, हमारी संस्कृति गाँवों से ही उपजी है और हमारे विचारों का मूल आधार भी गाँव है. हमारे राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने इसे भली भाँति जानते थे, इसीलिए उन्होंने भारत की तरक्की का रास्ता भी गाँवों से निकलते हुए रास्तों में देखा था. मगर स्वतंत्रता के बाद हमारे देश के गाँधीवादी नेता उस राह पर चल न सके. देश की तरक्की का रास्ता उन्हें भारतीय गाँवों के बजाय यूरोपीय रास्तों पर चलने में दिखा. देश में शहरीकरण और औद्योगिकीकरण को बढ़ावा दिया गया और विकास की दौड़ में गाँवों की भूमिका को गौण कर दिया गया.
खुशी है कि 67 साल बाद किसी प्रधानमंत्री ने हमारे गाँव की शक्ति को पहचाना. जिस तरह से महात्मा गाँधी पहचानते थे. हालाँकि हमारे नए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी उस सांगठनिक पृष्ठभूमि से आएँ हैं, जिस पर महात्मा गाँधी की हत्या में शामिल रहने का आरोप है. खैर वो इतिहास और आरोप-प्रत्यारोप की राजनीतिक बातें हैं, आज की सच्चाई यह है कि नरेन्द्र मोदी महात्मा गाँधी के सपनों को अपना सपना मानकर उसे पूरा करने का संकल्प करते दिख रहे हैं. उन्होंने अपने भाषण में महात्मा गाँधी की दृष्टि का विशेष तौर पर जिक्र किया है. यह सुखद है.
नरेन्द्र मोदी ने अपने सांसदों का आह्वान किया है कि सभी सांसद अपने-अपने क्षेत्र में आदर्श गाँव के निर्माण में जुट जाएँ. शहरी क्षेत्र के सांसदों से भी गाँव चुनने की अपील की है. ऎसी ही अपील मोहन दास करमचन्द गाँधी यानी हमारे महात्मा गाँधी ने आजादी की लड़ाई लड़ते वक्त काँग्रेसी कार्यकर्त्ताओं से की थी कि वे गाँवों से जुड़ें और उनकी बेहतरी के लिए काम करें. साफ –सफाई से लेकर किसानी और ग्रामीण व्यवस्था तक के सभी कामों से काँग्रेसी कार्यकर्त्ताओं से अपील की थी. लेकिन जब नेताओं ने ही गाँधी की अपील को नजरअंदाज कर दिया तब कार्यकर्ताओं से कौन पूछे.
आजादी के बाद नेताओं और मंत्रियों के फॉर्महाउस नुमा बड़े-बड़े बंगले इसलिए बनबाए गए थे कि सांसद-विधायक और मंत्री अपने रिहाइशी परिसर में खेती का कार्य भी करेंगे और किसानों की समस्या को नजदीक से समझेंगे. ज़रूरत भर अनाज उगा लेंगे यह उसका निहित ल्क्ष्य था.
मगर हुआ क्या? राष्ट्रपिता के विचारों की अवहेलना और देश के संसाधनों का फिजूल इस्तेमाल.
नरेन्द्र मोदी अगर अपने सांसदों को आदर्श गाँव बनाने के लिए मोटिवेट करने में कामयाब हो जाते हैं तो निश्चित तौर पर बड़ी उपलब्धि होगी और देश को नई दिशा मिलेगी. देश उस रास्ते पर चल पड़ेगा जो उसका स्वाभाविक रास्ता है. यूरोपियन रास्ते पर चलकर हमने तरक्की तो की है, मगर अपनी जमीन, अपनी संस्कृति और अपनी पहचान की अवहेलना कर, उसे जबरन त्याग कर. नरेन्द्र मोदी अगर हमारी राष्ट्रीय पहचान और शक्ति को सचमुच देश के विकास की मुख्यधारा बनाना चाहते हैं, तो यह गाँधी के सपनों का भारत बनाने की दिशा में ठोस कदम होगा.
लेकिन पिछले 67 सालों में देश ने अपनी व्यवस्थाएँ जिस तरह की बनाई हैं और अपने जनमानस को जिस तरह की मानसिकता दी है, उसे विपरीत दिशा में बदल पाना आसान नहीं है. भारत गाँवों का देश है. अभी भी 7 लाख से अधिक गाँव हैं जिसमें 70 प्रतिशत से अधिक आबादी रहती है. मगर पिछले 67 सालों में देश की अर्थ व्यवस्था पूरी तरह शहरोन्मुखी रही. इन सालों में गाँव न सिर्फ आर्थिक स्तर पर बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक स्तर पर भी बर्बाद हुए. आज गाँवों में न रोजगार है, न समाज और न ही चेतना. हर स्तर पर गाँव शहरों की नकल बन गए हैं.
इन सालों में गाँवों की मदद के नाम पर भारत व राज्य सरकारें हर साल बेशक लाखों, करोड़ों और अरबों रुपए खर्च करती रही, मगर गाँवों में न तो शिक्षा का स्तर सुधरा न जीवन स्तर. गाँवों का मुख्य रोजगार कृषि इन सालों में बुरी तरह चौपट हुआ, क्योंकि कृषि उत्पादनों को न्यायसंगत मुनाफा आधारित बाजार देने की दिशा में कोई सार्थक पहल नहीं हुई. कृषि लगातार घाटे का रोजगार बनी रही. कृषि के जरूरी संसाधनों खाद, बीज, कृषि यंत्र की कीमतों और मजदूरी में निरंतर वृद्धि की वजह से किसानों का घाटा लगातार बढ़ता गया. ऊपर से मॉनसुन के भरोसे खेती. कभी बाढ़ तो कभी सूखे से सामना. किसानों को घोर निराशा में धकेल दिया. आज किसान खेती छोड़कर शहर की तरफ भाग रहे हैं. बच्चों को खेती से दूर रखने की हर संभव जुगत कर रहे हैं.

ऎसे में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की चुनौती है कृषि को लाभोन्मुखी बनाना. यह बेहद कठिन काम है, क्योंकि कृषि उत्पादित वस्तुओं के न्यायसंगत मूल्य निर्धारण से खाद्य वस्तुओं की कीमते बढ़ेंगी और महँगाई दमघोंटू स्तर पर पहुँच जाएगी. देखना है कि नरेन्द्र मोदी स्वतंत्रता के बाद शहरजीवी बन गए गाँवों को कैसे स्वावलंबी बनाते हैं ?
धनंजय कुमार 

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