Friday, 27 June 2014

हमारे गाँव और भूमि सुधार- 2

भूमि सुधार की आधी-अधूरी कवायद 
जमींदारी प्रथा के अंत से कागजी तौर पर किसानों को भूमि पर अधिकार तो मिल गए, लेकिन जमींदारी प्रथा के उन्मूलन का जो मूल उद्देश्य था, भूमि पर किसानों का हक स्थापित करना, यानी भूमि उसकी जो उस पर खेती करे, अपनी आजीविका चलाये, उसपर आश्रित हो, वह वास्तविकता से कोसों दूर था. अंग्रेजी राज में किसानों से छीनकर जो जमीनें अंग्रेजी सरकार ने जमींदारों के नाम कर दी थीं, उसे वापस किसानों को लौटाया जाना अभी बाकी था.
किसान आन्दोलन के प्रमुख नेता स्वामी सहजानन्द सरस्वती जमींदारों से लड़कर किसान को उसकी जमीन वापस दिलाने के पक्षधर थे, जबकि महात्मा गाँधी जमींदारों से बलपूर्वक जमीन छीनने के खिलाफ थे. जमींदारी उन्मूलन और भूमि सुधार का कानून बनाते समय सरकार ने महात्मा गाँधी के विचार का ही अनुशरण किया. सरकार ने इसके लिए सीलिंग एक्ट बनाया,जिसमें बंजर क्षेत्र में सीमा 30 एकड तय की गई, जबकि सिंचित क्षेत्र में 15 और असिंचित में 20 एकड़ तय की गई थी.  मगर जमींदार सरकार से चालाक निकले. सीलिंग एक्ट लागू किए जाने के बाद जमींदारों ने चालाकी से जमीन को अपने परिवारों के सदस्यों आदि के नाम स्थानांतरित कर सरकार की नजर से बचा लिया. बड़े-बूढ़े बताते हैं, सीलिंग लगने के बाद जमींदारों ने अपने जानवरों तक के नाम पर भूमि ट्रांसफर करवा लिए और भूमि पर अपना कब्जा बरकरार रखा. कई जमींदारों ने औने-पौने दामों में जमीनें बेचकर पैसा बनाया. हालाँकि यह भी हकीकत है कि बहुत सारे जमींदारों ने ईमानदारी से भूमि पर से अपना कब्जा छोड़ा और अपनी जमींदारी की भूमि को किसानों के नाम कर दिए. बिनोबा भावे द्वारा चलाए जा रहे भूदान आन्दोलन में भी बहुत सारे जमींदारों ने अपने कब्जे की भूमि दान में दी.
लेकिन कुछ सुधारवादियों का मानना है कि देश में भूमि सुधार के कार्यक्रम सही तरह से नहीं चलाये गए और जमींदारों को चालाकी कर भूमि पर अपना कब्जा बनाये रखने का मौका दिया गया , जिसकी वजह से ज्यादातर वास्तविक किसान जमींदारी के समय की तरह ही भूमिहीन रह गये. आजादी और जमींदारी के खात्मे के बाद भी उनके साथ न्याय न हो सका.
बात सच भी है. जमींदारी प्रथा का उन्मूलन तो किया गया मगर वास्तविक किसानों को वापस अपनी भूमि मिल जाय इस दिशा में ईमानदारीपूर्वक बहुत ठोस काम नहीं हुए. अगर ऎसी नीति बनती कि हर किसान को ज़रूरत भर खेतीयोग्य भूमि मिल जाय, तो किसान खुशहाल होते, गाँव में गरीबी कम होती और गाँव की स्थिति इतनी खराब नहीं होती.  इस तरह भूमि पर किसानों को अधिकार दिलाने और भूमि सुधार नीति को लागू कर किसानों को भूमि देने की कवायद अधूरी रह गई.
महात्मा गाँधी की अहिंसा की नीति इसके पीछे एक बड़ी वजह तो रही ही. महात्मा गाँधी यह मानते तो थे कि जिन किसानों के परिश्रम से पृथ्वी फलप्रसु और समृद्ध हुई है, जमीन उनकी ही है या होनी चाहिए, जमीन से दूर रहनेवाले जमींदारों की नहीं, लेकिन जमींदारों से बलपूर्वक जमीन छीनने के वह खिलाफ थे. दूसरी महत्वपूर्ण वजह यह थी कि ज्यादातर जमींदार काँग्रेसी नेता का चोला पहन चुके थे. ऎसे में सरकार ने गरीब-शोषित किसानों के लिए जमींदारों के हित को छेड़ना स्वहित में ठीक नहीं समझा. इसलिए सरकार का सीलिंग एक्ट किसानों के लिए छलावा बनकर रह गया. महात्मा गाँधी के अनन्य शिष्य विनोबा भावे का भूदान आंदोलन भी किसानों को उनका न्यायपूर्ण हक नहीं दिला सका, बिना लाग-लपेट के कहें तो भूदान आंदोलन किसानों को भरमाये रखने का करतब मात्र था, ताकि किसान असंतुष्ट और नाराज होकर आजाद भारत की सरकार के खिलाफ आंदोलन न कर दे. लेकिन वस्तुतः भूमि सुधार नीति देश में कितने न्यायपूर्ण तरीके से लागू हुई, इसका भेद खोलती है ये सर्वे रिपोर्ट. 2006 में की गई एक सर्वे रिपोर्ट के अनुसार 95.65 प्रतिशत किसान, जो कि छोटे और सीमान्त श्रेणी के हैं, वे 62 प्रतिशत खेती योग्य भूमि के मालिक हैं, जबकि 3.5 प्रतिशत किसान, जो कि मध्यम बड़ी श्रेणी के हैं, 37.72 प्रतिशत भूमि के मालिक हैं.
सरकार की नीयत पर इसलिए भी संदेह करने का कारण बनता है कि सरकार यदि वाकई भूमि सुधार नीति को मूर्त रूप देना चाहती, तो पहले पूरे देश की भूमि का सर्वेक्षण करवाती, अंग्रेजी सरकार ने 1905-06 में जमीन का सर्वेक्षण कराया था. उसके बाद सौ से अधिक साल गुजर गए, मगर हमारी सरकार ने भूमि का सही सही रिकॉर्ड रखने के लिए कोई पहल नहीं की है. नतीजा है भूमि के स्वामित्व को लेकर स्थिति अभी तक बेहद उलझी हुई है. रजिस्ट्री दस्तावेज के माध्यम से जमीनों की खरीद-बिक्री हो तो रही है और स्वामित्व अधिकार बदल रहे हैं, मगर किस भूमि का मालिक कौन है, अगर सरकारी दस्तावेज गृह से कोई पता करना चाहे, तो काफी मशक्कत करनी पड़ेगी.
गैर मजरुआ आम और गैर मजरुआ मालिक जमीनों को लेकर तो स्थिति और भी बुरी है. 1905-06 के सर्वे के अनुसार जमीन तीन भागों में विभक्त की गई थी, रैयत जमीन, गैर मजरुआ आम और गैर मजरुआ मालिक. रैयत जमीन तो किसानों के नाम हो गई, मगर गैर मजरुआ मालिक जमीन पर जमींदारों का कब्जा बना रहा, जबकि रास्ते, पोखरे, खत्ते, नदी, तालाब, नहर, पाइन, तटबंध आदि जमीनें, जिनका सार्वजनिक इस्तेमाल होता था, वे जमीनें गैर मजरुआ आम थीं. आजादी के बाद इन जमीनों का सबसे बुरा हाल हुआ. सरकार की अस्पष्ट नीति और गाँव की तरफ सरकार की लापरवाही भरे दृष्टिकोण की वजह से गैरमजरुआ आम जमीनों पर जिसको जहाँ मौका मिला, आम ओ खास सबने कब्जा कर लिया. इन जमीनों को लेकर चूँकि मालिकाना हक स्पष्ट नहीं है, इसलिए अक्सर गाँव के लोग जमीनों की खरीद-बिक्री करते समय ठगे जाते हैं और झगड़े होते हैं.
नदी, तालाब, पोखरा, नहर, पाइन आदि जो पानी के श्रोत थे, ज्यादातर उन्हीं जमीनों पर अराजक कब्जा हुआ है, इसलिए गाँवों में पानी की समस्या बढ़ी है. बरसात में बाढ़ की स्थिति रहती है और बरसात समाप्त होते ही, सूखे की स्थिति बन जाती है. बरसात का पानी बेकार बह जाता है. जलाशयों के समाप्त हो जाने की वजह से पशुओं को पीने का पानी मिलना, खेतों के लिए पटवन का काम आदि के लिए जमीन के नीचे के जल पर निर्भर रहना एकमात्र विकल्प रह गया है. नतीजा है जलस्तर लगातार नीचे गिरता जा रहा है.                  
खेती योग्य भूमि क्षेत्रों में भूमि सुधार की सरकारी प्रक्रिया अब भी जारी है, मगर पिछले एक दशक में भूमि की कीमतों में जिस तरह अभूतपूर्व वृद्धि हुई है, भूमिपतियों से भूमि लेना आसान नहीं रह गया है और यह अब न्यायसंगत भी नहीं है. शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों की भूमि की कीमतों में जिस तरह का आसमान-जमीन का अंतर है, उसमें शहरों के झोपड़ों में रहनेवाले लोगों झोपड़े की कीमत से भी कम है, उनके सारे खेतों का मूल्य. फिर जिन-जिन गाँवों में या उसके आसपास सरकार के विकास के कदम पड़ते हैं, जमीन की कीमत अनाप-शनाप बढ़ने लगती है. ऎसे में भूमि सुधार के नाम पर भूमिपतियों से जमीन वापस लेना सही नहीं होगा. फिर पिछले कुछ दशकों में नौकरी करनेवालों ने जिस तरह से अफरात कमाई कर शहरों में अथाह सम्पत्ति बनाई है, उसका क्या. टाटा-बिरला-अम्बानी जैसे पूँजीपतियों का क्या. भूमि आज सिर्फ आजीविका का साधन नहीं रह गया है, बल्कि भूमि की खरीद-बिक्री करोड़ों में होने लगी है, मामूली किसान भी नित नए बढ़ते शहरों के पास की जमीन बेचकर करोड़ों पति बन रहे हैं.     
दूसरी तरफ गाँवों में आज भी भूमिहीन परिवारों का एक बड़ा वर्ग ऐसा भी है, जिनके पास घर के लिए भी ज़मीन नहीं है. हालाँकि हमारी इक्कीसवीं सदी की सरकार ने इंदिरा आवास योजना और राजीव आवास योजना शुरू कर घरविहीनों को घर देने का काम शुरू किया है. मगर सरकार यह घर उन्हें उनके अधिकार के तौर पर नहीं, बल्कि भीख के तौर पर दे रही है, या कहें कृपा कर रही है. सरकार का कर्तव्य है कि उसके हर नागरिक को सम्मान पूर्वक जीने का हक मिले, मगर नागरिक दया के पात्र के तौर पर जीवन जीने के लिए न्यूनतम सुविधाएँ ही प्राप्त कर पाते हैं. इन योजनाओं में भी भ्रष्टाचार और बेईमानी का दीमक वैसे ही लगा है, जैसे सरकार की बाकी योजनाओं में.

आदिवासियों के मामले में यह स्थिति और भी शर्मनाक और अन्यायपूर्ण है. किसानों को भूमि के कुछ न कुछ अधिकार तो मिले, मगर उन आदिवासियों को, जिनका जीवन जंगलों पर निर्भर था, जिनकी आजीविका जंगलों से प्राप्त लकड़ी, पत्ते, फूल-फल और पशु-पक्षी पर आश्रित थी, उन्हें भूमि के अधिकार से सरकार ने लगभग पूरी तरह वंचित कर दिया. शहर आधारित मानसिकता के अंग्रेजों ने सम्पन्न गाँवों को तो अपने शोषण का केन्द्र बनाया, मगर अलाभकर जंगलों और आदिवासियों को इससे मुक्त रखा. वहाँ अंग्रेजी हुकूमत ने खेतीयोग्य जमीनवाले इलाकों की तरह जमींदारी प्रथा लागू नहीं की, और सुदूर जंगलों में आदिवासी अपना जीवन पूर्ववत जीते रहे. जब भारत आजाद हुआ, सरकार ने अंग्रेजों की तरह खेतों पर अपना स्वामित्व नहीं माना, और जमींदारों से खेत किसानों को मिले इसके लिए नियम–कानून तो बनाये, मगर जंगलों पर चूँकि जमींदारों का कब्जा नहीं था, इसलिए पूरे जंगल पर सरकार ने अपना कब्जा जमा लिया. आदिवासियों को जंगल की जमीन पर कोई अधिकार नहीं मिला. आज उसी अन्याय की वजह से देश के जंगली इलाकों में आग लगी है. आदिवासियों को उनका हक दिलाने के नाम पर एक तरफ नक्सली बंदूकें ताने खड़े हैं तो दूसरी तरफ कानून-व्यवस्था के नाम पर सरकारी सिपाही बंदूकें लिए आदिवासी इलाकों में घूम रहे हैं. और कुल मिलाकर स्थिति यह है कि पूरा जंगल जंगली जानवरों के आतंक से भी ज्यादा खतरनाक आतंक के साये में जी रहा है. सरकार जंगल पर अपना अधिकार मानती है, जबकि नक्सली जंगल पर आदिवासियों का हक बता, सरकार से जंग ठाने हैं. आदिवासियों को उसका हक दिलाने के नाम पर जबसे नक्सली आंदोलन शुरू हुआ है, लाखों लोग मारे जा चुके हैं, इनमें बहुत बड़ी संख्या निर्दोष आदिवासियों की भी है, मगर आदिवासियों का हक अब भी हवा में है. वास्तविक स्थिति यह है कि आदिवासी जंगल की तरफ सरकारी विकास के बढ़ते कदम की वजह से अपने घर से भी विस्थापित होने को मजबूर हैं. 

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