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| फोटो - मनोज कुमार |
धनंजय कुमार
किसानों की स्थिति लगातार
बदतर होती जा रही है. केन्द्र व राज्य सरकारें भले ही किसानों की बेहतर स्थिति के
लिए अरबों-खरबों रुपयों की सब्सिडी बाँटने और किसानों के हित के लिए सतत
कल्याणकारी नीतियाँ बनाने के दावे कर रही हो, मगर सच्चाई बिल्कुल उलट है.
अरबों-खरबों की सब्सिडी किसानों के नाम पर बँदरबाँट की भेंट चढ़ रही है और रोज़ किसान
अपने खेत छोड़कर भाग रहे हैं या इंडस्ट्री के नाम पर सरकारों व एस्टेट एजेंटों
द्वारा जबरन ख्देड़े जा रहे हैं. मैं स्वयं किसान परिवार से हूँ. मेरा लालन-पालन,
शिक्षा-दीक्षा सब कृषि की वजह से ही हुआ, मगर आज से 40 साल पहले ही मेरे पिता ने
स्वप्न देख लिया था या कहिए कसम ले ली थी कि बेटा किसान नहीं बनेगा. इसी तरह मेरे
पिताजी के अन्य मित्रों के बेटे भी अपने पिताओं की चाहत (मजबूरी कहना उपयुक्त
होगा) के चलते आज कलेक्टर से लेकर क्लर्क तक बन भारत अथवा किसी राज्य सरकार की
चाकरी कर रहे हैं, मगर कोई किसान नहीं बना. सरकार के वैज्ञानिकों के शोध व
रिकॉर्ड्स आज भी बताते हैं कि बिहार के नालंदा ज़िले के खेतों की मिट्टी कृषि कार्य
के लिए सर्वोत्तम है, बावजूद इसके नालंदा के लगभग युवा खेती छोड़ कोई छोटी-मोटी
नौकरी भी करने को लालायित हैं. हाँ सरकारें अपने कृषि विभाग के आँकड़ों के आधार पर
ज़रूर दावे कर खुश हो रही है कि कृषि के क्षेत्र में प्रदेश व देश लगातार तरक्की कर
रहा है. यही रटंत आँकड़ा नालंदा ज़िले के ही बिन्द प्रखण्ड के दफ्तर में एक दिन
चर्चा के केन्द्र में उछला. कृषि विभाग के एक छोटे से कर्मचारी ने गर्व से आँकड़ा
प्रकट किया कि हमने कितने हेक्टेयर खेतों में फलाँ-फलाँ फसलें लगवाईं. हमारे ज़िला
नालंदा ने आलू से लेकर धान उत्पादन में विश्व रिकॉर्ड बनाए. यह सब सरकार की किसान
समर्थक नीतियों और हमारे बेहतर क्रियान्वयन का नतीजा है. इस पर मैंने पूछा कि अगर
कृषि के क्षेत्र में इतना उत्साहजनक विकास हुआ है तो यह बताइए कि क्या आपके विभाग
के छोटे कर्मचारी से लेकर किसी बड़े अफसर ने इस्तीफा देकर खेती से जुड़ने का एक उदाहरण
भी प्रस्तुत किया है? इसपर इस कर्मचारी को बचाव में कोई जवाब नहीं सूझा, वह
अ...ब... करने लगा, जबकि बाकी श्रोता हँस पड़े. तो यह है कृषि और किसानों की
वस्तुस्थिति, वह भी उस प्रदेश में, जिस प्रदेश के मुख्यमंत्री सालों से देश की हर
थाली में अपने प्रदेश के खेतों में उपजे अन्न, फल अथवा सब्ज़ियों से बना एक व्यंजन
परोसना चाहते हैं. बहरहाल यह कहने में कोई हिचक नहीं है कि किसानों के नाम पर हर सरकारी
नीति और योजना सिर्फ लूट है, और लूट के सिवा कुछ नहीं है. सच यह है कि किसानों की
दशा लगातार बिगड़ रही है.
क्यों बिगड़ रहे हैं हालात
गाँधी जी ने आज़ादी का वास्तविक सुख देश के किसानों के घरों में देखना चाहा था,
इसीलिए भारत में अंग्रेजों के खिलाफ अपनी लड़ाई उन्होंने चम्पारण के नील की खेती
करनेवाले किसानों के साथ शुरू की थी, मगर कालांतर में किसान लगातार हाशिए पर धकेले
जाते चले गए. हरित क्रांति को भले ही किसानों की भलाई के लिए प्रचारित किया गया,
मगर वह भी देश को भुखमरी से बचाने के क्रम में उठाया गया किसान विरोधी कदम था.
इसका नतीजा आज पंजाब के किसान और खेत भुगत रहे हैं. किसान कैसर और कर्ज से ग्रस्त
हैं तो खेत लगातार घटते वाटर लेबल और उर्वरा क्षमता से बांझपन के कगार पर हैं.
किसानों की बदहाल हालत के लिए मुख्य रूप से ज़िम्मेदार फैक्टर है सरकारों
द्वारा किसानों और उनके खेतों को कम करके आँका जाना. आज़ादी से पहले जिन खेतों पर
देश की नब्बे प्रतिशत से अधिक आबादी आश्रित थी, उसको देश की आर्थिक व्यवस्था का
आधार मानने के बजाय देश के कर्णधार नेताओं और नौकरशाहों ने इंडस्ट्रीयलायजेशन को
मूल आधार बनाया. नतीजा रहा बाज़ार पर किसानों का प्रभुत्व होने के बजाय
उद्योगपतियों और व्यापारियों का दबदबा बना. और बनता गया. किसान बाज़ार से दूर
मिट्टी तक सीमित कर दिए गए और अंततः मिट्टी में ही मिल गए.
मनरेगा और एफडीआई ताबूत में आखिरी कील हैं
मनरेगा को देश के महान
आधुनिक अर्थशास्त्री और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि मानते हुए
गर्व से फूले नहीं समा रहे हैं, मगर दरहकीकत यह है कि बाज़ार की मार से अधमरे
किसानों के लिए यह ज़हर का काम कर रहा है. मनरेगा के पीछे श्रीमान सिंह और उनके
वृदों का सुमधुर गीत यह है कि मनरेगा गाँव से मजदूरों के पलायन को रोकने में कारगर
होगा, जबकि सच्चाई यह प्रकट हो रही है मनरेगा के तहत साल के सौ दिन प्रतिदिन लगभग
डेढ़ सौ रुपए पानेवाले मजदूर किसानों की पहुँच से बाहर हो गए हैं. पलायन की वजह से
मजदूरों की
कमी झेल रहे किसानों पर
मजदूरों का महँगा हो जाना सर मुड़ाते ओले पड़ने जैसा है. इसी तरह मनरेगा के बाद
एफडीआई किसानों पर और भी भारी पड़ने वाली है. श्रीमान सिंह का तर्क है कि इससे
बिचौलियों का सफाया हो जाएगा और किसान को अपनी उपज का अधिकतम मूल्य मिलेगा. बेचारे
किसान जो छोटे व्यापारियों से पार नहीं पा रहे थे अब वॉल-मार्ट जैसी मल्टीनेशनल
कम्पनी से स्वतः निबट लेंगे, यह हास्यास्पद और मूर्खतापूर्ण सोच नहीं तो और क्या
है! अगर यह मूर्खतापूर्ण नहीं है तो फिर देश को पुनः गुलामी की ओर धकेलने का
अद्भुत प्रयास ज़रूर है. हे गाँधी!

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