Thursday, 13 February 2014

हमारे गाँव को सही शिक्षा की ज़रूरत

हमारे गाँव और शिक्षा
शिक्षा मनुष्य की बुनियादी ज़रूरत है. बिना शिक्षा के न तो सम्मानपूर्वक जीवन यापन किया जा सकता है और न ही जीवन का वास्तविक-आध्यात्मिक मूल्य ही समझा जा सकता है.  हमारे पूर्वज शिक्षा के महत्व को अच्छी तरह जानते थे, इसीलिए उन्होंने शिक्षा देनेवाले आचार्यों और गुरुओं को भगवान के तुल्य माना. गुरू की तुलना त्रिदेव- ब्रह्मा, विष्णु और महेश से की है. यानी गुरू ब्रह्मा की तरह जन्मदाता हैं, विष्णु की तरह पालनकर्त्ता हैं और  महेश की तरह शिष्य के मार्ग में आनेवाली बाधाओं के संहारक हैं. इस तरह गुरू साक्षात् परमब्रह्म हैं यानी गुरू ज्ञानमय परमात्मा हैं.
आरंभ में गुरुकुल शिक्षा के प्रमुख केन्द्र थे. जहाँ गुरु के सान्निध्य में विद्यार्थी गुरू-शिष्य परम्परा के तहत शिक्षा ग्रहण किया करते थे. इसके लिए विद्यार्थियों को घर का त्यागकर गुरू के साथ उनके आश्रमों में रहना पड़ता था. गुरुकुल का खर्च भिक्षाटन और गाँवों के सहयोग से चलता था. हमारे गाँवों ने यही परम्परा उच्च शिक्षा में भी कायम रखी. इतिहासकार बताते हैं कि उच्च शिक्षा के लिए भारत वर्ष के बाहर भी विख्यात नालन्दा विश्वविद्यालय का खर्च आसपास के दो सौ गाँवों की आय से चलता था. विद्यार्थियों को शिक्षा, आवास, भोजन आदि सभी सुविधाएं नि:शुल्क थीं. यह जानकर मन आत्मगौरव से भर जाता है कि उस समय हमारे गाँव इतने सबल और आत्मनिर्भर थे!
शिक्षा की हमारी इस महान परम्परा को मुस्लिम आक्रमणकारियों ने नष्ट कर दिया. और तबसे हम शिक्षा में पिछड़े तो पिछड़ते ही चले गए, क्योंकि उसके बाद हम लगातार गुलाम ही रहे. मुस्लिमों ने विश्वविद्यालय नष्ट किए और अंग्रेजी हुकूमत ने आधुनिक शिक्षा देने  के नाम पर हमारे गाँव में अबतक चल रहे गुरूकुलों को मृतप्राय बना दिया.         
स्वतंत्रता के बाद भी हमारे गाँव में शिक्षा की स्थिति सुधरी नहीं, बल्कि अब तो दिनोंदिन और भी दयनीय होती जा रही है. हालाँकि हमारी सरकार ने शिक्षा को बच्चों के मौलिक अधिकार में शामिल कर 6 साल से 14 साल तक के बच्चों की शिक्षा को आवश्यक कर दिया है, ताकि सभी बच्चे अनिवार्य तौर पर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त कर सकें और ज्ञान, कौशल और मूल्यों से लैस होकर भारत का प्रबुध्द नागरिक बन सकें. यह अधिनियम गाँव के बच्चों को शिक्षा देने का की दिशा में बेहतर सुधार कर सकता है. मगर अभीतक सरकार विर्द्यार्थियों को बेहतर शिक्षा देने की जगह वोटबैंक तैयार करने की संभावनाओं पर काम कर रही दिखती है. जीवन-मूल्य परक शिक्षा की क्या बात करें, गाँव के इन स्कूलों में जीवन यापन के लिए रोजगार पाने योग्य शिक्षा भी नहीं मिल पा रही है. हालाँकि गाँव के बच्चों को शिक्षा देने के लिए सरकार ने विद्यालयों की संख्या तो बढ़ाई है. 2012 एक सर्वे के अनुसार, ग्रामीण इलाकों के 6-14 साल के 96.5% बच्चों को स्कूल से जोड़ा जा चुका है. मगर यह डेटा सिर्फ हमारे नेताओं और शिक्षा अधिकारियों के खुश होने के लिए अच्छा है. वस्तुस्थित यह है कि ग्रामीण क्षेत्रों के इन स्कूलों के रजिस्टरों में जितने विद्यार्थियों की संख्या दर्ज है, उनका संबंध स्कूलों से मध्याह्ण भोजन, पोशाक और साइकिल लेने भर से है, पढ़ाई से नहीं. गुरू भी अब ज्ञानमय परमात्मा नहीं, अपना जीवन यापन करने के लिए सरकारी नौकरी करनेवाले शिक्षक बन गए हैं. अफसोस तो यह है कि हमारे गाँव के स्कूलों में ऎसे शिक्षकों की भी भारी कमी है.
दरअसल हुआ यह कि सारे बच्चों को शिक्षा देने की कवायद में विद्यालय तो बनते चले गए, मगर प्रशिक्षित शिक्षकों को उसी अनुपात में तैयार करने की दिशा में गुणात्मक कार्य नहीं किया गया. और पहले से विभिन्न स्कूलों में पदस्थापित प्रशिक्षित शिक्षकों को ही नए स्कूलों में स्थानांतरित कर दिया गया. इस तरह सभी स्कूलों में शिक्षकों की कमी हो गई. इसकी भरपाई राज्य सरकारों ने कॉंन्ट्रैक्ट बेसिस पर अप्रशिक्षित शिक्षकों की नियुक्ति कर करने की नीति बनाई. मगर, यह नीति भ्रष्टाचार को बढ़ाने वाली और अयोग्य शिक्षकों की भर्त्ती करनेवाली साबित हुई है. प्रशिक्षित शिक्षकों के अभाव और वास्तविक वेतन दे पाने में असमर्थ सरकारें शिक्षकों को तय मापदंडों पर परखकर नियुक्त करने के बजाय कॉन्ट्रैक्ट बेसिस और कम वेतन पर शिक्षकों को नियुक्त कर रही है. इस वजह से ये अप्रशिक्षित शिक्षक (अनट्रेंड टीचर) बच्चों को सही तरह से पढ़ाने में अक्षम तो हैं ही, कम वेतन पाने से असंतुष्ट भी. फिर मध्याहण भोजन, पोशाक और साइकिल वितरण की जिम्मेदारी भी सरकार ने इनपर लाद दी गई है. नतीजा है, शिक्षा के नाम पर सरकारें ज्यादा से ज्यादा बच्चों को स्कूल से जोड़ने की कामयाबी पर डेटा द्वारा तो अपनी पीठ थपथपा ले रही है, मगर शिक्षा और उसकी गुणवत्ता बिल्कुल ही चौपट हो गई है. स्थिति यह है कि दसवीं पास विद्यार्थी को भी किताब तक पढ़ना नहीं आता. ऎसी शिक्षा किस काम की?
शिक्षा की ऎसी दुर्गति के लिए सरकार की राजनीति से प्रेरित शिक्षानीति सर्वाधिक जिम्मेदार है. देश के 6 वर्ष से 14 वर्ष तक के हर बच्चे को स्कूल से जोड़ने की कवायद में सरकार ने शिक्षा का सत्यानाश कर दिया है. शिक्षा मद की राशि का एक बड़ा भाग मध्याह्ण भोजन, किताबें, पोशाक और साइकिल आदि बाँटने में खर्च कर दिया जा रहा है. शिक्षा के लिए ज़रूरी योग्य शिक्षक और शिक्षण समय उपेक्षित रह जाता है.
यह सच है कि गाँव में स्कूलों से दूर सिर्फ उनके ही बच्चे हैं, जो गरीब हैं और जिनको अपने बच्चे को स्कूल भेजने से ज्यादा लाभदायक दिखता है, बच्चों को काम पर भेजना या अपने साथ काम करवाना. गाँवों में इनकी संख्या अधिकतम हैं. सरकार की मध्याह्ण भोजन, पोशाक और साइकिल आदि योजना ने इनके बच्चों को स्कूल से जोड़ा भी है. हालाँकि अब भी ढेर ऎसे बच्चे हैं, जो स्कूल नहीं जाते, वजह है उनके माता-पिता में शिक्षा के प्रति सही जागरूकता का अभाव और शिक्षा के नाम पर चलाई जा रही रस्मी शिक्षा से उनका मोहभंग.    सरकारी कवायद में चौपट हुई पढ़ाई व्यवस्था ने उन परिवारों को मायूस कर दिया, जो गाँव में रहकर थोड़ी-बहुत खेती और छोटा-मोटा व्यापार कर रहे हैं. वह शिक्षा के महत्व को समझते हैं और अपने बच्चे को अच्छी शिक्षा दिलाना चाहते हैं. इस वजह से अब गाँव में भी प्रायवेट स्कूलों का चलन शुरू हो गया है. हालाँकि उन स्कूलों में शिक्षा का स्तर बेहद खराब है, क्योंकि ठीक-ठाक पढ़े-लिखे युवा गाँव में न तो रहना चाहते हैं, न जाना चाहते हैं, क्योंकि उन्हें मालूम है कि गाँव में उनका भविष्य संवरने के बजाय चौपट ही होगा.         
गाँव के स्कूलों में शिक्षा का माध्यम क्या हो, इस पर भी सरकारें अबतक कंफ्यूज हैं. नौकरियों में अंग्रेजी माध्यम से पढ़े विद्यार्थियों की प्रधानता है, मगर हमारे गाँव के स्कूल अंग्रेजी माध्यम तो जाने छोड़िए, विषय के तौर पर पढ़ा पाने में भी फिसड्डी है. नतीजा है, पढ़ाई को लेकर गंभीर छात्र भी अंग्रेजी में कमजोर होने की वजह से आत्मविश्वास में कमी का शिकार शो जाते हैं, और शहरी छात्रों की तुलना में आत्महीनता से ग्रस्त हो जाते हैं. इस वजह से अच्छी नौकरियों में भी उन्हें अपेक्षित सफलता नहीं मिलती. और ज्यादातर छात्र डिग्री होल्डर होकर भी बेरोजगार रह जाते हैं, या फिर छोटी-मोटी नौकरी कर शिक्षा का लाभ उठाने से वंचित रह जाते हैं.
गाँव के विद्यार्थी दसवीं तक तो किसी तरह पढ़ ले रहे हैं, मगर कॉलेज की शिक्षा के लिए अभी भी वे शहरों पर ही आश्रित हैं. शहरों में किराये पर रूम लेकर रहना व अन्य ज़रूरतें पूरी करने में उन्हें हर महीने कमसेकम एक हज़ार रुपए की ज़रूरत पड़ती है. इनके माता-पिता जब प्राइमरी शिक्षा दिलाने में भी आर्थिक तौर पर असमर्थ हैं, तो अपने बच्चों को वे कॉलेज की शिक्षा कैसे दिला पाएँगे? इस विषय पर सरकार पूरी तरह मौन है. हमारी सरकारों को इस पर विचार करने की ज़रूरत है.
इनके लिए ब्लॉक स्तर पर कॉलेज खोले जाने की ज़रूरत है. सरकार के सामने यह एक मुश्किल टास्क है, क्योंकि इसके लिए काफी धन और योग्य शिक्षकों की आवश्यकता है. मगर सरकार यदि सबको शिक्षा परक रोजगार देना चाहती है, तब तो उसे यह करना ही पड़ेगा. प्राचीन काल में इसीलिए कई सारे रोजगार पारम्परिक घरेलु प्रशिक्षण पर आधारित होते थे, जिनमें बच्चे परिवारगत रोजगार परिवार के साथ काम करके सीख लेते थे. ऎसे कार्यों में कृषि से लेकर, मिट्टी व धातु के वर्तन बनाना, लोहे के सामान बनाना, लकड़ी के सामान बनाना, चमड़े के सामान बनाना, कपड़े बनाना आदि रोजगार शामिल थे. इनके अलावा सैलून,लॉड्री आदि सेवापरक रोजगार भी पारम्परिक तौर पर ही बच्चे सीख लेते थे. मगर जाति और वर्ण के नाम पर भेदभाव और घृणा ने इन पारम्परिक शिक्षण को बेमानी बना दिया. अब हर किसी के लिए स्कूल और कॉलेज की पढ़ाई अनिवार्य सी हो गई है. ऎसे में आवश्यक है कि सरकार गाँव के हर बच्चे के लिए कॉलेज में पढ़ाई की व्यवस्था करे. और जबतक सरकार ब्लॉक स्तर पर कॉलेज खोलने में स्वयं को असमर्थ पाती है, उसे वैकल्पिक व्यवस्थाओं पर विचार करना होगा.
यह व्यवस्था दो तरह की हो सकती है- एक, गाँव के विद्यार्थियों के शहर स्थित कॉलेज आने-जाने के लिए बस की मुफ्त सुविधा उपलब्ध कराए या दूसरी, शहर में ही उनके निवास के लिए हॉस्टल का प्रबन्ध करे. लड़कियों को कॉलेज की शिक्षा दिलाने में ये प्रबन्ध बेशक उल्लेखनीय सुधार करेंगे. अभी लड़कियों की पढ़ाई तो तकरीबन अधूरी ही रह जाती है. लड़कियाँ चाहकर भी आर्थिक और असुरक्षा कारणों से भी कॉलेज की शिक्षा हासिल नहीं पाती. गरीबों को शिक्षा देने की सरकारी कवायद इन व्यवस्थाओं के बाद ही अपनी पूर्णता हासिल कर पाएगी.
‘हमारे गाँव’ गाँव के विद्यार्थियों को कॉलेज स्तर की शिक्षा मिले, इसके लिए सरकार का सहयोग उसी प्रकार करेगा, जिस प्रकार नालन्दा विश्वविद्यालय को चलाने में 200 गाँव किया करते थे.

1 comment:

  1. सरकार जितनी मुस्तैदी से कल्याणकारी यौज्नाओं का प्रचार करती है , उतना ही मुस्तैदी से उनका क्रियान्वयन करें , तो स्तिथियाँ बदलने में देर नहीं लगेगी ! अफसरशाही व् लालफीताशाही को खत्म करने का मात्र जजाप करने से कोई फायदा नहीं होने वाला है , जरुरत इमानदार प्रयास का,, जिससे सूरत बदले ..!

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