हमारे गाँव और संयुक्त परिवार
संयुक्त परिवार की
अवधारणा दुनिया के मानव समाज को भारतीय संस्कृति की अद्भुत देन है. मगर दुनिया से
क्या कहें, इसे हम भी सँभाल कर रख नहीं पा रहे हैं. संयुक्त परिवारों को जिस तेजी से हम खत्म करते जा रहे हैं, वह
भविष्य के लिए ठीक नहीं है. हम सब जानते हैं कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, फिर
भी पता नहीं क्यों, हम एकाकी जीवन जीने की मूर्खतापूर्ण और स्वनाशी ज़िद में हैं.
हमारे पूर्वजोंने मनुष्य
जीवन को सर्वोत्तम जीवन माना और इस मनुष्य जीवन के परम आनन्द को प्राप्त करने के
लिए हमें ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का जीवन मंत्र दिया. यानी पूरी वसुधा के हर जीव यहाँ
तक कि पेड़-पौधे भी हमारे कुटुम्ब हैं. और अपने कुटुम्बों के साथ हम कैसे जिएँ,
इसके लिए सह-अस्तित्व का मार्ग हमें दिखाया. हम इस मार्ग पर आस्था की हद तक
विश्वास करके चलें, इसके लिए पूर्वजों ने सह-अस्तित्व को धर्म से जोड़ दिया. हमारे
आराध्य देव शिव का परिवार सह-अस्तित्व की दिव्य मिसाल है. भगवान शिव के परिवार में
पत्नी पार्वती के अलावा दो पुत्र कार्तिकेय और गणेश के अलावा बैल, शेर, साँप, मोर
और चूहा भी रहते हैं. शेर बैल के लिए प्राणघातक हैं, तो साँप चूहे के लिए और मोर
साँप के लिए, बावजूद इसके भगवान शिव के परिवार में सभी आनन्द से रहते हैं. तो, यह
है ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ तक पहुँचने का सह-अस्तित्व का दिव्य मार्ग! संयुक्त परिवार
‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की पहली कड़ी है, और हमारे गाँव में संयुक्त परिवार की बहुत ही
पुरानी परम्परा है.
संयुक्त परिवार में कई
पीढ़ियों तक भाइयों के परिवार के लोग एक साथ रहते हैं. यह सह अस्तित्व की भावना को
मजबूत करता है. इसके चलते बचपन से ही इंसान में साथ जीने की भावना विकसित होती है,
मजबूत होती है. व्यक्तिगत पसन्द-नापसन्द के बजाय सबकी पसन्द-नापसन्द का ख्याल रखने
का भाव बढ़ता है. कौन सदस्य कितना काम करता है और कौन सदस्य कितना खाता है, इस तरह
की भावना बिल्कुल ही काम नहीं करती. सबको एक खास किस्म की आज़ादी होती है, शिकायत
का भाव नहीं होता. खाने-पीने से लेकर सुविधाओं के उपभोग तक में समानता होती है.
संयुकत परिवार व्यक्ति
के अन्दर अनुशासन और मर्यादा का भाव आनुवांशिक तौर पर स्वतः विकसित हो जाता है. यहाँ
व्यक्ति के निरंकुश होने की आशंका नहीं के बराबर होती है. क्योंकि परिवार के सारे
सदस्यों पर ऊपर परिवार के मुखिया का पितृवत अंकुश होता है और परिवार के सदस्य
परिवार के मुखिया के निर्णय को अंतिम और सर्वहिताय मानकर शिरोधारण करते हैं.
परिवार का मुखिया भी निरंकुश नहीं होता, बल्कि अपने बड़े-बूढ़ों की सलाह से बँधा
होता है.
संयुक्त परिवार में
अधिकार पाने से ज्यादा त्याग का भाव होता है. क्योंकि परिवार का मुखिया सिर्फ अपनी
पत्नी या बच्चे के लिए नहीं सोचता, बल्कि सबके लिए समान रूप से सोचता है. और जब
त्याग करने की परिस्थिति बनती है, सबसे पहले स्वयं त्याग करता है और पत्नी-बच्चे
पर भी त्याग के लिए नैतिक दबाव बनाता है. इस तरह विपत्ति के समय भी कोई सदस्य अकेला
नहीं पड़ता.
प्राचीन काल से ही हमारे
गाँव कृषि प्रधान रहे, और कृषि एक ऎसा कार्य है जिसमें अपने आदमियों की हमेशा ज़रूरत पड़ती है. शायद यह एक
महत्वपूर्ण वजह रही होगी कि हमारे पूर्वजों ने संयुक्त परिवार के तौर पर रहना
बेहतर समझा और इसे परम्परागत तौर पर सहस्रावदियों निभाया भी.
संयुक्त परिवार में दरार
पड़ने की पहली वजह बनी अंग्रेजी सरकार, जिसने हमारी खेती चौपट की और हमारे गाँव
चौपट किए. एकल परिवारों में पले-बढ़े और सिर्फ अपनी ही संस्कृति को महान समझने के
मूढ़तापूर्ण अंधप्रेम में पड़े अंग्रेजों ने संयुक्त परिवार की विशिष्टता, उपयोगिता
और गरिमा को जान ही न सके. उसके बाद, आजादी के बाद के शहरीकरण के बढ़ते प्रभाव ने भी
संयुक्त परिवार को अभूतपूर्व नुकसान पहुँचाया है. रोजी-रोजगार के लिए लिए शहरों की
ओर लोगों का पलायन-विस्थापन और अपना मालिक खुद बनने की ज़रूरत भरे भाव ने संयुक्त परिवार
से लोगों को दूर किया. नौकरी करनेवाले भाइयों ने खेती करनेवाले भाइयों को कम करके
आँकना शुरू किया, जिनमें पत्नियों का अहम रोल रहा,और संयुक्त टूटने लगे.
संयुक्त परिवार लगातार
टूट रहे हैं, और उनकी जगह एकल परिवार ले रहे हैं. एकल परिवार, मूलतः विदेशी
पारिवारिक अवधारणा है, जिसमें परिवार का मतलब पति-पत्नी और उनके बच्चे हैं. जहाँ
माता-पिता के लिए भी जगह नहीं है. नतीजा है बुढ़ापे में अकेले छूट जाने या छोड़ दिए
जाने की समस्या हमारे गाँव में भी लगातार बढ़ रही है. शहरों में तो वृद्धाश्रम होते
हैं, जहाँ वृद्ध अपना बुढ़ापा गुजार लेते हैं, मगर हमारे गाँव में वृद्धाश्रम बनाने
का प्रयास अभी तक न तो सरकारी और न ही सामाजिक स्तर पर हुआ है, इसलिए वृद्धों का
जीवन बेहद एकाकी और दुखभरा देखने को मिल रहा है. हमारे गाँव के लोग चूँकि या तो खेती
या स्वरोजगार से जुड़े हैं, इसलिए सरकारी नौकरी करनेवाले शहरियों की तरफ पेंशन नहीं
मिलती और उनकी आर्थिक निर्भरता अपनी संतानों पर हो जाती है, इसलिए उन्हें
बेटे-बहुओं की दया पर ही जीना पड़ता है. हालाँकि सरकार ने उनकी समस्या पर गौर करते
हुए, वृद्धा पेंशन की शुरूआत की है, मगर यह उनके जीवन के लिए न सिर्फ नाकाफी है,
बल्कि दुखदायी भी है, पेंशन की वजह से बेटे-बहू से मनमुटाव भी हो जाता है क्योंकि
उसपर वृद्ध और बहू-बेटे में अधिकार की लड़ाई ठन जाती है. वृद्ध माता-पिता की देखभाल
न करनेवालों के लिए सरकार ने जेल भेजने का कानून भी बनाया है. मगर क्या यह
व्यावहारिक है कि अपना खून और दूध पिलाकर अपनी संतानों को बड़ा करनेवाले माँ-बाप,
कानून का सहारा लेकर अपनी उपेक्षा करनेवाली संतानों को जेल भिजवाना चाहेंगे? बहरहाल,
गाँव में भी वृद्ध जीवन दुखदायी हो गया है. जबकि संयुक्त परिवार में वृद्ध
माता-पिता के साथ-साथ अशक्त और लाचार भाई-बहन भी सम्मान और सुखपूर्वक जीवन गुजार
पाते थे.
‘हमारे गाँव’ में
संयुक्त परिवार की परम्परा को पुनर्स्थापित करना है. तभी हम स्वयं भी सुखपूर्वक
जीवन जी पाएँगे और पूर्वजों द्वारा दिया गया जीवन मंत्र ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ को भी
साकार कर पाएँगे.
मुम्बई. 08-02-2014
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