Wednesday, 19 February 2014

हमारे गाँव और ग्राम पंचायतें-2

स्वतंत्रता के बाद भी ग्राम पंचायतों को नहीं मिली स्वायत्तता

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद नवनिर्मित भारतीय सरकार ने ग्राम पंचायतों की प्राचीन परम्परा के महत्व को समझते हुए ग्राम पंचायतों को स्थानीय ग्रामीणों द्वारा मतों के आधार पर पंचों का चुनाव करने का अधिकार तो दिया, मगर कामकाज में सरकारी हस्तक्षेप बनाए रखा. लिहाजा पंचायतें अधिकार और संसाधनों के अभाव में प्राचीन प्रतिष्ठा हासिल नहीं कर सकीं और निष्प्रभावी ही बनी रहीं. ग्राम विकास के लिए बनी सारी कमिटियों ने सरकार को कमोवेश यही रिपोर्ट दी कि समुचित अधिकार और संसाधन नहीं होने की वजह से ग्राम पंचायतें अनुकूल लक्ष्य हासिल करने में अक्षम हैं. योजना आयोग द्वारा ग्रामीण क्षेत्र में विकास व गरीबी उन्मूलन से संबंधित प्रशासनिक व्यवस्था की समीक्षा के लिए 1985 में गठित जी. के. वी. राव समिति ने भी अपनी रिपोर्ट में कहा कि लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण की प्रक्रिया के प्रति सरकारों की उदासीनता की वजह से अधिकांश राज्यों में पंचायतें शक्ति, अधिकार और संसाधनों के अभाव में निष्प्रभावी होती जा रही हैं. मगर तमाम सिफारिशों के बावजूद सरकारें पंचायतों को अधिकार व संसाधन संपन्न बनाने के प्रति लापरवाह बनी रहीं. परिणामस्वरूप स्थानीय ग्रामीणों द्वारा ग्राम पंचायतों के प्रतिनिधियों के चुने जाने के बाद भी ग्राम सुधार और विकास में ग्राम पंचायतें कोई उल्लेखनीय परिवर्त्तन लाने में सफल नहीं हो सकीं.

90 के दशक में मिली ग्राम पंचायतों को आंशिक स्वायत्तता      
एल. एम. सिंघवी के नेतृत्व में गठित समिति की रिपोर्ट के आधार पर संसद ने 1992 में 73वें संविधान संशोधन विधेयक पास कर पंचायतों को संविधान की नौवीं सूची में शामिल किया। इसके तहत गाँववासियों के आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय के लिए पंचायतों को योजना बनाने और उसके निष्पादन के अधिकार दिए गए. अतिरिक्त व्यवस्था और उसके निर्बाध संचालन के लिए कर व अन्य शुल्क लगाने और वसूलने का अधिकार भी दिया गया. मगर ग्राम पंचायतों को पूरी स्वायत्तता नहीं दी गई. ग्राम पंचायतें ग्रामसभा की मदद से स्थानीय ज़रूरत के अनुसार योजना बनाने या उसकी प्राथमिकता तय करने को स्वतंत्र नहीं है. गाँव में लागू होने वाले कार्यक्रमों की रूपरेखा राजधानियों के वाताकुलित कमरे से बनकर आती है, जबकि उसे ग्रामसभा में तय किए जाने की ज़रूरत है. इससे शासन में ग्रामीणों की भागीदारी बढ़ेगी और लोकतंत्र मजबूत होगा. कार्यक्रमों के निष्पादन में सरकारी हस्तक्षेप को कम करके उसे पर्यवेक्षक के तौर पर सीमित करने की ज़रूरत है.
             
ग्रामपंचायत, सरकारी कार्यक्रम और भ्रष्टाचार
बावजूद इसके सरकार ने गाँवों के सुधार और विकास के लिए जितने सारे कार्यक्रम चला रखे हैं अगर सही तरह से क्रियान्वित हो जाएँ तो सचमुच गाँव की कायापलट हो सकती है, मगर ग्राम पंचायतों के प्रतिनिधि और सरकारी अधिकारी सुधार और विकास के सरकारी कार्यक्रमों में जोंक की तरह चिपक गए हैं. ग्राम पंचायतें भी उसी तरह भ्रष्ट हो गई हैं, जैसे बाकी सारी सरकारी व्यवस्थाएँ. ग्राम पंचायतों के प्रतिनिधि सरकार के सुधार और विकास के कार्यक्रमों के लिए भेजी गई धनराशि के एक बड़े हिस्से की बँदरबाँट कर लेते हैं. इसमें सरकारी अधिकारियों का शेयर भी तय रहता है और गाँव के सुधार और विकास के कार्यक्रम आधे-अधूरे और अनुपयोगी रह जाते हैं. भवन, गली, पुलिया, नाली, चापाकल आदि सभी की गुणवत्ता निम्नतर स्तर की होती है, जो कुछ दिनों-महीनों बाद खराब होने लगते हैं.
ग्रामीण सब जानते-देखते हुए भी चुप रह जाते हैं, क्योंकि विभिन्न सरकारी योजनाओं में हर ग्रामीण किसी न किसी तरह जायज या नाजायज लाभांवित हो रहा है. राशन दुकानों में मिलने वाले किरासन तेल से लेकर अनाज तक तो वृद्धा पेंशन से लेकर इन्दिरा आवास    और पोशाक-साइकिल लेने से लेकर छात्रवृति पाने के लिए बनाये जाने वाले आय प्रमाण तक, लगभग हर ग्रामीण भ्रष्ट रास्तों पर चलकर लाभ हथियाने में जुटा है. ऎसे में भ्रष्टाचार पर शिकायत करने का नैतिक साहस कोई कहाँ से लाए? जो लोग जायज तौर पर सरकारी योजनाओं के लाभ का हकदार होने के बाद भी सरकारी योजनाओं का लाभ उठा पाने से वंचित हैं, वे बेचारे निहायत ही कमजोर हैं. वह अपना जायज हिस्सा पाने के लिए आवाज उठाना तो चाहते हैं, मगर कहाँ और कैसे, नहीं मालूम. और क्या सरकारी धन की लूट के उत्सव की गूँज में कोई उनकी आवाज सुन भी पाएगा.
फिर ज्यादातर जनप्रतिनिधि बाहुबली और आपराधिक पृष्ठभूमि के होते हैं, इसलिए कोई इन भ्रष्ट प्रतिनिधियों से दुश्मनी नहीं लेना चाहता. और कोई दुश्मनी ले भी तो क्यों? खर्च हो रहा पैसा उनका अपना नहीं, सरकारी है, और न ही जो कुछ बन रहा है, उसका इस्तेमाल सिर्फ वही करनेवाले हैं, फिर जब कोई और किए जा रहे भ्रष्टाचार के खिलाफ बोलने को तैयार नहीं है, तो वह अकेला क्यों बोले? फिर कोई जोखिम लेकर शिकायत करता भी है तो जाँच अधिकारी ले-देकर मामले को रफा-दफा कर देते हैं.          
ग्राम पंचायतों के जनप्रतिनिधियों को भी भ्रष्ट बनाने में देश की दोषपूर्ण चुनावी व्यवस्था बड़ी भूमिका निभा रही है. चुनाव लड़ने और जीतने के खर्चे ग्रामपंचायतों के चुनाव में भी बढ़ते जा रहे हैं. विधायक और सांसद की तरह मुखिया, सरपंच और पंच के चुनाव में भी चुनाव प्रचार के नाम पर हजारों-लाखों रुपए खर्च करने के साथ- साथ वो तमाम हथकंडे अपनाए जाने लगे हैं, जो चुनाव जीतने के लिए आवश्यक हैं. चुनाव से एक या दो दिन पहले वोटरों को दारू पिलाने से लेकर नकदी रुपए तक बाँटे जाते हैं. ग्रामपंचायतों के कमजोर होने की एक और बड़ी वजह जातिवाद भी है, जिसकी वजह से मतदान के समय योग्य उम्मीदवार को चुनने की बजाय लोग अपनी जाति के बदमाश और भ्रष्ट उम्मीदवार को चुनना पसंद करते हैं. अब गलत तरीके से चुने गए प्रतिनिधि अच्छा और ईमानदार काम करेंगे, इसकी कल्पना ही बेकार है.
        
कमजोर ग्रामसभा
भ्रष्टाचार नियंत्रण में ग्रामसभा बेहद प्रभावी हो सकती थी, मगर, आजादी के बाद भी गाँव में कृषि, रोजगार और अन्य नागरिक सुविधाओं की स्थिति में यथोचित सुधार नहीं हो पाने की वजह से गाँव के किसानों के बेटे-बेटियों का पढ़-लिखकर भी गाँव नहीं लौट पाना और युवा मजदूरों का रोजगार के लिए शहर की ओर पलायन की वजह से गाँव में जागरूक और समझदार लोगों की कमी हो गई है. गाँव की आबादी में अब गरीबों और मजदूरों का ही बाहुल्य है. जो न तो पढ़े-लिखे हैं और न ही बाहुबल में उतने मजबूत कि गाँवों में सक्रिय बदमाशों और धूर्त्तों का मुकाबला कर सकें. ऎसे में बदमाश और धूर्त्त किस्म के लोगों की चाँदी हो गई है.

दुखद यह है कि सरकारी मशीनरी भी इस दिशा में पूरी तरह उदासीन है. शिकायत की जाँच कर दोषियों पर कार्रवाई का पारम्परिक तरीका लगभग फेल हो चुका है. यह महज खानापूर्त्ति भर बनकर रह गया है. इसलिए भ्रष्टाचार को रोकने और भ्रष्टाचारियों को पकड़ने का कोई नया और प्रभावी तंत्र ढूँढना होगा. ग्राम पंचायतों में सही प्रतिनिधियों की भागीदारी और पंचायतों का ठीक तरह से संचालन सरकारी ग्राम सुधार व विकास कार्यक्रमों के माध्यम से गाँवों की दशा को बहुत हद तक सुधार सकता है. ग्रामीणों को सरकारी कार्यक्रमों के प्रति जागरूक बनाकर ग्रामसभा को मजबूत कर भ्रष्ट और धूर्त्त जनप्रतिनिधियों तथा सरकारी कर्मचारियों-अधिकारियों पर नकेल कसी जा सकती है.

शेष आगे.... 

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