Thursday, 20 February 2014

हमारे गाँव और ग्राम पंचायतें-3

ग्राम पंचायतें और न्याय व्यवस्था
ग्राम पंचायतें सबको न्याय और समय पर न्याय देने-दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं. मगर अफसोस की बात यह है कि ग्रामपंचायतें इस पहलू पर भी बेहद कमजोर हैं, खाना-पूर्त्ति भर रह गई हैं. रोजगार और बेहतर जीवन की तलाश में पढ़े-लिखे ग्रामीणों के  शहर पलायन कर जाने की वजह से गाँव में न्याय और कानून को बेहतर तरीके से समझ पा सकनेवाले लोगों की बेशक कमी हो गई है, मगर गाँव के छोटे-मोटे झगड़ों और विवादों को सही पंचों के चयन से निबटाना बहुत मुश्किल नहीं है. लेकिन सरकार इस दिशा में भी उदासीन है. ग्रामीण मामलों में न्याय के लिए आरंभिक तौर पर ग्राम पंचायतों के पास जाना अनिवार्य होना चाहिए था, जबकि यह वैकल्पिक है. पुलिस और राजस्व कर्मचारियों को ग्राम पंचायतों के सहयोगी के तौर पर काम करना चाहिए था, मगर ऎसा नहीं है, वे न्याय के अलग और ज्यादा ऑथेंटिक संस्था के तौर पर गाँव में दखल रखते हैं. इस वजह से ग्राम पंचायतों में जाने की बजाय सीधा सरकारी अधिकारियों के पास चले जाते हैं. और ज्यादातर मामले वहीं के वहीं सुलझने के बजाय उलझकर न्यायालय तक पहुँच जाते हैं, जहाँ व्यवस्थागत संसाधनों और न्यायधीशों की कमी की वजह से और हज़ारों-लाखों केस सालों से लम्बित हैं. न्याय व्यवस्था के साथ-साथ आम आदमी का भी समय और धन व्यर्थ बर्बाद होता है.        
खाप पंचायत
ग्राम पंचायती व्यवस्था के बीच हमारे देश के कुछ हिस्सों में एक और तरह की पंचायत सदियों से अस्तित्व में हैं, जो खाप पंचायत के तौर पर जानी जाती है. इसका वजूद पश्चिमी उत्तरप्रदेश और हरियाणा के गाँवों में देखने को मिलता है. इस पंचायत का गठन पूर्वजों ने मूलतः गाँव की पारिवारिक-सामाजिक समस्याएँ सुलझाने के लिए किया था.
‘खाप’ दो शब्दों से मिलकर बना है- और आप‘. ख का अर्थ है आकाश और आप का अर्थ है जल, अर्थात ऐसा संगठन जो आकाश की तरह सर्वोपरि हो और पानी की तरह निर्मल और सब के लिए सुलभ एवं न्यायकारी हो.

पहले खाप पंचायतें सामाजिक समस्याओं एवं कुरीतियों के खिलाफ ऐतिहासिक निर्णय लेने बैठती थीं और अपने स्तर पर ही हर विवाद का निष्पक्ष एवं सर्वमान्य हल करके कानून की मदद किया करती थीं. हाल के वर्षों में भी इन पंचायतों ने दहेज लेने और देने वालों को बिरादरी से बाहर करने और छोटी बारात लाने जैसे फरमान जारी कर कई कुप्रथाओं को खत्म करने में भी रचनात्मक भूमिका निभाई है. मगर आजकल ये सब खाप पंचायतें एक गोत्र के लड़के-लड़की के प्रेम और विवाह के खिलाफ मौत तक का फरमान सुनाने को लेकर चर्चा में ज्यादा है. समय के अनुसार खाप पंचायतें बदल नहीं पाईं और आधुनिक समाज तथा उसकी  बदलती हुई विचारधाराओं के साथ सहज सामंजस्य बिठा नहीं पा रही है. संस्कृति के नाम पर वह पुरानी मान्याताओं को कट्टरता से नई पीढ़ी से मनवाने पर अड़ी है और इस क्रम में वह उन मूल्यों को भी ध्वस्त करने में भी नहीं हिचक रही, जो मूल्य भारतीय धर्म और संस्कृति के प्राण हैं. भारतीय धर्म और संस्कृति मूलतः बेहद उदार है, जो अपने अलावा अन्य विचारों और रीति रिवाजों को समाप्त कर देने के बजाय उन्हें भी सहर्ष साथ चलने देता है. यही वजह है कि एक ही हिन्दू संस्कृति के होने के बावजूद अलग-अलग समुदाय अलग-अलग रीति-रिवाजों को मानते हैं. कहीं एक गोत्र में भी विवाह गलत है, तो कहीं अपने निकट रिश्तेदारों में विवाह भी सहजता और खुशीपूर्वक होता है. और हमारा संविधान भी हमारी उसी संस्कृति को लेकर चल रहा है. हमारा संविधान देश के हर नागरिक को स्वतंत्र रूप से जीवन जीने का अधिकार देता है. खाप पंचायतों को संस्कृति का अन्धानुकरण करने की बजाय समय के अनुसार स्वयं में बदलाव लाकर समाज की उन्नति के लिए काम करना चाहिए. 

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