ग्राम
पंचायतें हमारे गाँव के सुधार और विकास में क्रांतिकारी और असाधारण भूमिका निभा
सकती हैं. क्योंकि गाँव के सरोकार वहाँ रह रहे सभी ग्रामीणों से गहरे जुड़े हैं.
हमारी ग्रामीण संरचना इस तरह की है कि परिवार और बिरादरी से अलग भी हर व्यक्ति के
हित अहित आपस में गहरे और पारस्परिक तौर पर जुड़े हैं. भाषा, पहनावा, संस्कृति और
विचार सब के एक से होने के कारण अलग-अलग घरों में रहकर भी सब आपस में भावनात्मक
तौर पर एक दूसरे से जुड़े हैं. फिर वर्ण और जाति व्यवस्था के आधार पर बँटे सबके
कार्य भी सबको एक दूसरों से जोड़ते हैं. फिर प्रकृति भी सबको एक सी प्रभावित करती
है. बाढ़-सूखा, सर्दी-गर्मी सबपर एक सा असर डालते हैं. इसीलिए हमारे पूर्वजों ने
ग्राम पंचायतों की अवधारणा पर गहरे काम किया. इतना गहरा कि चाणक्य जैसे कूटनीतिज्ञ
ने ग्राम पंचायत को राजनीति की इकाई कहा.
जो सबसे कम शासन करे वही उत्तम सरकार मानी जाती है. हमारी ग्राम पंचायतें
इसका सबसे बढ़िया उदाहरण है. राजनीतिक सत्ता का अर्थ है जन प्रतिनिधियों द्वारा
उपलब्ध संसाधनों और उसके उपभोग का सही नियोजन कर सामूहिक जीवन को सरल और आनन्दमय
बनाना. अगर सामाजिक जीवन इतना पूर्ण हो जाए कि व्यक्ति स्वयं ही स्वयं को नियमबद्ध
कर ले तो फिर किसी पर सता की आवश्यकता ही नहीं रह जाती और न ही प्रतिनिधित्व के
लिए संघर्ष रह जाता है. जैसे परिवार में प्रतिनिधित्व के सवाल पर कभी कोई मतभेद या
किसी सदस्य का निजी स्वार्थ नहीं उभर पाता. परिवार का बड़ा या कोई अन्य योग्य सदस्य
बिना किसी औपचारिक प्रक्रिया के परिवार का प्रतिनिधि यानी मुखिया बन जाता है. हरएक
व्यक्ति स्वतंत्र भी होता है और जवाबदेह भी. परिवार में सत्ता होते हुए भी किसी
सत्ता का अहसास नहीं होता. शायद इसी बुनियाद पर हमारे पूर्वजों ने पूरी वसुधा को
अपना कुटुम्ब माना था और ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ का विचार गढ़ा था.
राष्ट्रपिता महात्मा
गाँधी राज्य की सत्ता को केन्द्रित और संगठित रूप में हिंसा का प्रतीक मानते थे.
उनका सोचना था कि जाहिर तौर पर तो राजसत्ता शोषण को कम से कम करके लाभ पहुँचाती
है, परंतु व्यक्तित्व, जो सब प्रकार की उन्नति की जड़ है, उसको नष्ट कर देती है.
इसलिए वह राज्य के हाथों में सत्ता केन्द्रित न करके ट्रस्टीशिप की भावना का
विस्तार करने का विचार रखते थे. जैसा कि हमारे संयुक्त परिवारों में देखने को
मिलता है. इसी वजह से वह ग्राम पंचायतों को सबसे अधिक मजबूती दिलाना चाहते
थे.
पंचायत
की अवधारणा
पंचायत
की अवधारणा हमारे गाँव में प्राचीन काल से रही है. यह शब्द संस्कृत भाषा के ‘पंचायतन्’ शब्द से
बना है. पंचायतन यानी पाँच व्यक्तियों का समूह. मनुस्मृति के अनुसार गाँव के प्रधान
को ‘ग्रामिक’ कहते थे.
ग्रामिक गाँवों से कर वसूलने का कार्य करता था. मौर्यवंश के संस्थापक चन्द्रगुप्त
मौर्य के राजनीतिक, आर्थिक और कूटनीतिक सलाहकार चाणक्य ने ग्राम को राजनीतिक इकाई
के तौर पर वर्णित किया है. उस समय भी ग्राम के प्रधान को ‘ग्रामिक’ ही कहा जाता
था, जिसे गाँव से जुड़े सारे राजनीतिक अधिकार प्राप्त थे. इतिहासकार बताते हैं कि
भारत का स्वर्णिमकाल कहे जाने गुप्तकाल भी में ‘ग्राम’ शासन की सबसे छोटी इकाई था, जिसके प्रमुख को ‘ग्रामिक’
कहा जाता था. ग्रामिक ‘पंचमंडल’ यानी पंचायत
की सहायता से ग्राम का शासन चलाता था। पंचायत के सदस्य गाँव के वृद्ध होते थे.
ग्रामिक और ग्राम पंचायत, ग्रामसभा के सहयोग से गाँव की समस्याओं को हल करते
थे. ग्रामपंचायत को युद्ध करने और सन्धि करने, इन
दो अधिकारों को छोड़कर राज्य व शासन के शेष सभी अधिकार प्राप्त थे.
ग्राम
पंचायतों में शासन का हस्तक्षेप
ग्राम पंचायत में शासन का
सीधा हस्तक्षेप शुरू हुआ मुस्लिम शासन काल से, जब
मुस्लिम शासकों ने गाँव पर अपना नियंत्रण रखने के लिए तीन अधिकारी बहाल
किए- गाँव की देखभाल के लिए ‘मुकादम’, झगड़े निबटाने के लिए ‘चौधरी’ और राजस्व
संबंधी कार्य के लिए ‘पटवारी’. मगर ग्राम पंचायत व्यवस्था भी चलती रही और गाँव
आत्मनिर्भर बने रहे. मगर अंग्रेजों ने पूरी तरह से गाँव की व्यवस्था को अपने नियंत्रण
में कर लिया. ग्रामपंचायतों को चलने तो दिया मगर उनके अधिकार सामाजिक जीवन और
रीति-रिवाजों तक सीमित कर दिए. ग्राम पंचायतों से उसके राजनीतिक, आर्थिक और
न्यायिक अधिकार पूरी तरह छीन लिए गए और गाँवों की स्वायत्तता खत्म कर दी. इस तरह, गाँव
की व्यवस्था को सभी ग्रामवासियों के सहयोग से, जनतांत्रिक तरीके से चलाने की महान
परंपरा ‘ग्राम पंचायत’ का लगभग अंत कर दिया गया.
किंतु स्वतंत्रता आन्दोलन के
जोर पकड़ने के बाद अंग्रेजों को सत्ता के विकेन्द्रीकरण के लिए बाध्य होकर 1907 के
विकेन्द्रीकरण संबन्धी शाही कमीशन की सिफारिश के बाद अंग्रेजी सरकार को ग्राम
पंचायत की परम्परा को पुनर्स्थापित करना पड़ा. हालाँकि शासन ने ग्राम पंचायतों को
फैसले लेने का अधिकार नाम मात्र का ही दिया. फिर 1919 में अंग्रेजी सरकार ने जब प्रांतीय
सरकारों को स्वशासन के सीमित अधिकार दिये, तो पंचायत अधिनियम भी बनाए, और ग्राम पंचायतों
को स्वास्थ्य, स्वच्छता और तालाबों आदि की देखभाल के साथ-साथ छोटे-मोटे
मामलों में न्याय करने के अधिकार दिए. मगर इन पंचायतों का स्वरूप हमारी प्राचीन
पंचायती व्यवस्था जैसा जनतांत्रिक और स्वायत्त नहीं था. पंच स्थानीय ग्रामीणों
द्वारा चुने जाने के बजाय सरकार द्वारा मनोनीत किए जाते थे.
शेष अगले भाग में...
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