Tuesday, 28 January 2014

क्या सब्सिडी गाँव को आत्मनिर्भर बनाने दिशा में मदद है

हमने 65 वाँ गणतंत्र दिवस मना लिया...उसी परम्परागत तरीके से.मगर यह गणतंत्र तबतक इसी तरह रस्मी बना रहेगा, जबतक हमारे गाँव को महत्व दिया जाएगा...क्योंकि हमारा देश गाँवों का देश कल भी था और आज तमाम शहरी विकास के दावों के बावजूद हमारा देश गाँवों का देश है. 2011 की जनगणना बताती है कि अभी भी देश की 70 प्रतिशत आबादी गाँवो में रहती है. और गाँव में मुख्य व्यवसाय आज भी कृषि है. वह कृषि जो सदियों हमारी पूर्वजों को पालती रही, आजादी के 66 साल बाद भी हमारी जनतांत्रिक सरकार उस कृषि को लाभ के कारोबार में नहीं बदल सकी है. कृषि को बढ़ावा देने के उद्देश्य से सरकार हर साल अरबों की सब्सिडी अपने विभिन्न विभागों के माध्यम से भेजती है, मगर किसान घाटे से उबर नहीं पा रहे हैं. किसान आत्महत्या कर रहे हैं और किसान के बेटे खेती छोड़कर शहर की ओर भाग रहे हैं. सवाल उठता है कि जब कृषि लाभ का व्यवसाय नहीं बन पा रही, तो देश के अरबों रुपए सब्सिडी के नाम पर क्यों गाँव की मिट्टी में मिलाए जा रहे हैं ?  
सरकार इस सवाल का जवाब जानती है, मगर जानबूझकर इससे आँख मूदे है, क्योंकि जिस दिन कृषि लाभ के कारोबार में तब्दील होगी, सरकार की उद्योग आधारित अर्थव्यवस्था का पोल खुल जाएगा. मामूली प्याज की कुछ दिनों की महँगाई जब सरकार की चूलें हिला देती है, तो चावल, दाल और गेहूँ की बढ़ी कीमत सरकार का क्या हाल करेगी? किसानों को बाज़ार में अपने अनाज की जो कीमत मिलती है, उसके लागत मूल्य से भी कम है. जिस दिन किसानों को मुनाफा सहित उसकी उपज का मूल्य मिलना शुरू होगा, सोचिए उस दिन क्या होगा? सामान्य चावल 40 की जगह 140 रुपए मिलेगा, गेहूँ भी सौ के पार चला जाएगा, सब्जियाँ भी कई गुणा महँगी हो जाएगी. क्या सरकार शहरी नागरिकों का गुस्सा बर्दास्त कर पाएगी?
आज़ादी के बाद हमारी सरकारें बड़ी चालाकी से अंग्रेजी नीति-रीति को पटरी पर चला रही है. जिस तरह अंग्रेजों ने गाँव को चूसकर शहरों को आबाद किया हमारी सरकारें भी वही कर रही हैं. और गाँव को स्कूल,अस्पताल और सड़कों से जोड़कर विकास को जन-जन तक पहुँचाने का छलभरा दावा कर रही है. अगर सचमुच सरकारों की गाँव का विकास करने इच्छा होती तो गाँव को सब्सिडी की बैसाखी, देने की बजाय गाँव को आत्मनिर्भर बनाने का प्रयास करती, गाँव को वापस उसका सम्मान दिलाने की दिशा में ठोस कदम उठाती. भारत गाँवों का देश है, भारत की आत्मा गाँवों में बसती है और भारत एक कृषिप्रधान है, जबतक इसे हम गर्व से नहीं कह पाएँगे, तबतक हमारा गणतंत्र भारत के जन-जन का सच्चा गणतंत्र नहीं बन पाएगा. 


No comments:

Post a Comment