Tuesday, 1 November 2011

आज मैं अपने गाँव जा रहा हूँ...!!!


मित्रों! आज रात की ट्रेन से मैं अपने गाँव जा रहा हूँ...वो गाँव जिसकी गोद में मैंने जन्म लिया,जिसकी गलियों में मैंने चलना सीखा, जिसकी हवाओं में मैंने उड़ना सीखा, जिसके स्कूल में जीवन का ककहरा सीखा,जिसकी रातों में मैंने सपने देखना सीखा,जिसकी खुश्बू ने सौन्दर्यबोध से परिचय कराया.
मित्रों, उस गाँव को आज से 27 साल पहले छोड़कर मैं शहर आया था, दुनिया की ऊँचाइयों और जीवन की गहराइयों को पढ़ने-समझने और देखने. इन 27 वर्षों में पाने की ललक में इस कदर उलझा रहा कि गाँव मेरी राह देख रहा है, इसका कभी ध्यान ही नहीं आया. गाँव से दूर पटना और फिर मुम्बई आकर मैंने क्या-क्या पाया, इसका आकलन तो कोई भी कर सकता है, लेकिन क्या-क्या खोया इसका आकलन सिर्फ मैं ही कर सकता हूँ.
हिसाब लगाता हूँ,तो पाता हूँ, मैंने पाया कम खोया ज्यादा. मासूमियत खोई,जवानी खोई,सौन्दयबोध खोया, सपने देखने की आदत खोई,चलना खोया,उड़ना खोया, संस्कार खोया, परिवार खोया,इंसानियत खोई. प्रकृति खोई,आज़ादी खोई,घर खोया.....खोया...खोया...खोया...ओह सब कुछ खो दिया...! फिर से सब पाना चाहता हूँ, इसीलिए गाँव जा रहा हूँ...
लेकिन गाँव में रह रहे लोग मुझे आगाह कर रहे हैं...जिस गाँव को आप छोड़कर आप आए थे, वो गाँव भी बिल्कुल वैसा नहीं रहा. इन वर्षों में गाँव ने भी बहुत कुछ खो दिया है...बैल खो दिए, खेतों में रोपनी करती मजदूर महिलाओं के गीत खो दिए...खलिहान खो दिए...आंगन खो दिए...संयुक्त परिवार से भरा-पूरा घर खो दिया....बच्चे खो दिए... युवा खो दिए...बूढ़ों की बच्चों के साथ की खिलखिलाहट खो दी... गोधूलि बेला में धूल उड़ाती गायों का रेला खो दिया....होली- चैता- बारहमासा खो दिया....नीम–बबूल के दातुन खो दिए...झाल-मजीरे-ढोलक की थाप खो दिए....कबीरपंथी आलाप खो दिए...खो दिए..खो दिए..
ओह ....!!! तो पाया किसने?
गाँव का टपोरी मुखिया बन गया है...लम्बी गाडी खरीद ली है..
एक साथ तीन लोगों की हत्या कर गाँव को दहशत से भर देनेवाला बदमाश जिला परिषद का अध्यक्ष बन गया है....वह लाल बत्ती की सरकारी गाड़ी से सुरक्षा-घेरे के बीच आता-जाता है.
स्कूल में बार-बार फेल होनेवाला इलाके का सबसे बड़ा ठीकेदार बन गया है...
फ्रॉड के केस में जेल जा चुका युवक सरपंच बन गया है....चोरी-चुपके देशी शराब बनानेवाला गाँव का सबसे बड़ा व्यापारी बन गया है...
कोई बात नहीं...मैं फिर भी गाँव आना चाहता हूँ...अपनी यादों को फिर से गाँव की हवाओं में बसाना चाहता हूँ.
मैं वहाँ अपनी पुश्तैनी खेती फिर से शुरू करना चाहता हूँ...अच्छा स्कूल और पुस्तकालय खोलना चाहता हूँ....पढ़ने-लिखने का माहौल बनाना चाहता हूँ....संस्कार-संस्कृति को पुनर्जीवित करना चाहता हूँ....चैता-फाग-बारहमासा की धुनें फिर से गुंजाना चाहता हूँ...खेतों में रोपनी-गीत गवाना चाहता हूँ...
तो आज मैं अपने गाँव जा रहा हूँ...!!!
 धनंजय कुमार

1 comment:

  1. विशेष वृक्षारोपण करते हुए किसी विषय में अनोखा विषय-आधारित उद्यान स्थापित करके अपने गाँव की एक अलग पहचान बनायें ०९४२५६०५४३२ सुमित, मार्गदर्शक

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