शब्दों को ज़मीन पर उतारने की
पहल शुरू की धनंजय कुमार ने
आँगन सोशिओ-कल्चरल ऑर्गेनाइजेशन ने अपने प्रोजेक्ट ‘हमारे गाँव’ को ज़मीन पर
उतारना शुरू कर दिया है. गाँव को आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश्य से बनाए गए इस
प्रोजेक्ट की शुरूआत बिहार प्रदेश के नालंदा ज़िला के बिन्द गाँव से की गई है.
दरअसल बिन्द सिर्फ एक गाँव नहीं, ब्लॉक है, जो आसपास के बीस से अधिक गाँवों की शैक्षणिक,प्रशासनिक
और मार्केट की ज़रूरतों को पूरा करता है, इन गाँवों के निवासियों को प्रत्यक्ष व
परोक्ष रूप से प्रभावित करता है.
आँगन सोशिओ कल्चरल ऑर्गेनाइजेशन के इस प्रोजेक्ट के सर्जक धनंजय कुमार हैं. वह
पत्रकार-लेखक, विचारक व चिंतक होने के साथ-साथ फिल्म निर्देशक भी हैं. उन्होंने
पूरे प्रोजेक्ट को तीन चरणों में बाँटा है. फिर हर चरण को भी तीन-तीन भागों में
बाँटा है, ताकि प्रोजेक्ट तय समय में धरातल पर उतर जाए.
पहले चरण के पहले भाग में गाँव में वास्तविक शिक्षा का वातावरण बनाने पर कार्य
शुरू किया गया. ‘शिक्षा क्यों और कैसे?’ इस विषय पर अभिभावकों,शिक्षकों और
विद्यार्थियों में दृष्टि-निर्माण को लेकर संवाद स्थापित किया गया और उन सबकी
सहभागिता से विचार को व्यवहार में साकार होता देखा गया.
इस क्रम में धनंजय कुमार ने सबसे पहले शिक्षकों पर प्रयोग किए. उन्होंने जब
शिक्षकों से पूछा कि बच्चों को आप क्या देना चाहते हैं ? तो आगंतुक शिक्षकों ने
कहा-“ ज्ञान! उनको अच्छी
तरह से पढ़ाएँगे, ताकि हर परीक्षा में अव्वल आएँ और आगे जाकर कुछ बन सकें. इसपर
धनंजय कुमार ने शिक्षकों से पूछा कि वह बच्चों को क्या बनाना चाहते हैं? शिक्षकों
का जवाब था, ’वह क्या बनेंगे-डॉक्टर,इंजीनियर या कुछ और, यह तो विद्यार्थियों के
परिश्रम और अभिभावकों की चाहत पर निर्भर करता है. इस पर धनंजय ने पुन: सवाल किया
कि क्या बच्चे वो सब पढ़ना चाहते हैं, जो आप पढ़ाना चाहते हैं ? शिक्षक ने आसान सा
उत्तर दिया बच्चे स्कूल आएंगे तो वे वो तो पढ़ेंगे ही, जो हम पढ़ाएँगे, तभी तो
परीक्षा में बढ़िया परिणाम आएँगे. इस पर धनंजय ने कहा कि बच्चे अब उस तरह से नहीं
पढ़ना चाहते हैं, जैसे सालों से उनको पढ़ाया जा रहा है. आज के बच्चों को उपदेश और ज्ञान
नहीं चाहिए. आपसे वह दो चीज़ें चाहते हैं-एक, उनको आप अपना कीमती समय दीजिए और
दूसरा अपने कान दीजिए. उनको सुनिए,वो क्या कहना चाहते हैं? और ऎसा क्यों कहना
चाहते हैं ?वो आपसे क्या चाहते हैं? क्या और कैसे पढ़ना चाहते हैं? फिर उसपर चिंतन
कीजिए, विश्लेषण कीजिए और कहीं व्यवधान हो, रुकावट हो, तो बच्चों को आगे का रास्ता
दिखाइए/सुझाइए, उसे गाइड कीजिए. उन्हें कतई पढ़ाने की कोशिश मत कीजिए. ज़माना बदल
चुका है. विचारों और जानकारियों में नित नए परिवर्तन आ रहे हैं. बच्चे आपके साथ के
बगैर वो बातें जान-सीख सकते हैं. बच्चे उपदेश सुनने के बजाए खुद अनुभव कर अभ्यास
करना चाहते हैं. अगर आपको लगे कि वो मार्ग से विलग हो रहे हैं या गलत रास्ते जा
रहे हैं तो उपदेश देने के बजाए उनके साथ संवाद कीजिए. एक मित्र की तरह.
धनंजय कुमार ने फिर उन आगंतुक शिक्षकों के सामने सवाल रखा कि आप बच्चों से
क्या लेना चाहते हैं? वे चौंके! शायद उनके सामने पहली बार यह सवाल आया था. वह कुछ
जवाब नहीं दे पाए. तब धनंजय ने कहा कि न्यूटन के गति का तीसरा नियम कहता है कि
प्रत्येक क्रिया के विपरीत और बराबर प्रतिक्रिया होती है, इसका मतलब है कि बच्चे
अगर आपसे कुछ लेंगे तो अवश्य आपको कुछ देंगे..हम जैसे-जैसे उम्र की सीढ़ियाँ चढ़ते
हैं जीवन में गाँठें बढ़ती जाती हैं, लेकिन बच्चे गाँठ पड़ने ही नहीं देते. आपस में
लड़ते-झगड़ते हैं और फिर थोड़ी ही देर में वे दोस्त भी बन जाते हैं. मतलब बच्चों से
आप जीवन की गाँठें खोलना सीख सकते हैं. तो आप उनको गणित और विज्ञान के सूत्र
सिखाइए, वो आपको जीवन का सूत्र सिखाएँगे.
इसके बाद धनंजय कुमार ने विद्यार्थियों के साथ संवाद शुरू किया. टीचर भी पास में ही
खड़े थे. सभी विद्यार्थी सहमे हुए से थे. धनंजय ने विद्यार्थियों से इसका कारण
जानना चाहा, तो किसी भी विद्यार्थी ने स्पष्ट उत्तर नहीं दिया. किसी तरह के डर की
बात तो नहीं की, मगर चेहरे पर डर के भाव साफ दिख रहे थे. धनंजय कुमार ने सबसे पहले
विद्यार्थियों से कहा कि वह टीचर नहीं दोस्त हैं, इसलिए कोई भी बात करने में
झिझकना नहीं. फिर सबको अपना परिचय दिया और विद्यार्थियों के साथ धनंजय कुमार का
संवाद आगे बढ़ने लगा. सुखद आश्चर्य यह था कि थोड़ी देर में ही विद्यार्थी सहज हो गए
थे. धनंजय ने विद्यार्थियों से पूछा कि सबसे ज्यादा मन किस काम में लगता है- सभी
विद्यार्थियों ने एक मत से कहा कि खेलने में सबसे अधिक मन लगता है. यह धनंजय के
संवाद कौशल्य का ही प्रभाव था कि सभी विद्यार्थी जो कुछ देर पहले सहमे हुए थे अब
सहज और मुखर सहभागी बन गए थे. अब विद्यार्थियों के बीच हँसी और ठिठोली भी शामिल हो
चुकी थी. एक घंटे के इस संवाद शिविर में धनंजय कुमार के साथ विद्यार्थियों ने
क्रिकेट से लेकर सूरज और महात्मा ग़ाँधी तक बात की. शिविर के समाप्त होने के बाद
विद्यार्थियों ने माना कि बात-बात में धनंजय सर
ने जिस तरह से पढ़ाई से हमें जोड़ दिया, उस तरह का हमारा पहला और अनोखा अनुभव
है. पढ़ना बोझिल काम लगता है, मगर धनंजय सर ने पढ़ाई को खेल के जैसा मनोरंजक बना
दिया. टीचर भी विद्यार्थियों में अभी-अभी आए बदलाव और उत्साह को देखकर सुखद
आश्चर्य में थे.
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