गाँवों में कभी भारतवर्ष की आत्मा निवास करती थी. हमारे गाँव ही सदियों हमारी
पहचान रहे. गाँव हमारी ताकत थे. देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ थे. हमारी
सभ्यता-संस्कृति, विचार और सृजन का केंद्र थे. लेकिन जैसे-जैसे आधुनिकता ने अपने
पैर पसारे, आधुनिकता की दौड़ में हमारे गाँव पिछड़ते चले गए. अर्थवाद ने हमारे
गाँवों से उसकी शक्ति छीन ली. देश की बदलती अर्थव्यवस्था ने कृषि से ध्यान हटा
औद्योगिकीकरण को विकास की धुरी बनाया. विकास के घूमते पहिए ने बेशक हमारे गाँवों
को सड़कों और शहरों से जोड़ा, लेकिन बदले में गाँवों से बहुत बड़ी कीमत वसूली. गाँवों
से उसके किसान-मजदूर और हल-बैल छीन लिए. खेत-खलिहान उजड़ गए. गाँव का सौन्दर्य बिगड़
गया.
आँगन सोसियो-कल्चरल
ऑर्गेनाइजेशन ने “हमारे गाँव” की वास्तविक पहचान को वापस दिलाने के संकल्प के साथ “हमारे गाँव” नाम से एक अभियान शुरू किया
है. इस अभियान के तहत आँगन सोशियो-कल्चरल ऑर्गेनाइजेशन ने गाँव को आत्मनिर्भर
बनाने का लक्ष्य निर्धारित किया है ताकि दुनिया से भुखमरी समाप्त हो.
‘हमारे गाँव’ नामक इस अद्भुत
प्रोजेक्ट का सृजन लेखक-पत्रकार, समाज विश्लेषक व चिंतक धनंजय कुमार ने किया है. आँगन
सोसियो-कल्चरल ऑर्गेनाइजेशन जिसे पिछले साल के नवंबर महीने से ज़मीन पर उतारना शुरू
कर दिया है. हमारे गाँव का पायलेट प्रोजेक्ट बिहार प्रदेश के नालंदा ज़िला के बिन्द
गाँव में शुरू हो चुका है.
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