Saturday, 9 June 2012


डेयरी से बदली जा सकती है गाँवों की तकदीर
धनंजय कुमार
गाँवों से श्रमशक्ति और प्रतिभा का पलायन आज भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ी चुनौती बनकर खड़ा हो गया है। शहरों में बढ़ती भीड़ से शहर की सारी नागरिक सुविधापरक व्यवस्थाएँ चरमरा गई हैं. पीने का पानी उपलब्ध कराने और कचरे के निबटारे जैसी व्यवस्थाओं का संचालन भी सरकारों के लिए भारी सरदर्द बन गया है. शहर जो कभी सपनों को पूरा करने का केन्द्र हुआ करते थे,  पिछले कुछ दशकों में मुसीबत का केन्द्र बन गए हैं. महँगाई की वजह से घर में रहना मुश्किल है, तो भारी ट्रैफिक की वजह से सड़कों पर निकलना. सच कहा जाय तो हमारे शहर जेल में तब्दील हो गए हैं.
ऎसे में जरूरत है एक ऐसी अर्थव्यवस्था की जो गाँवों के युवाओं को गाँवों में ही रोजगार दे सके. गाँव की अर्थव्यवस्था सदियों से खेती और मवेशी आधारित रही है.  पिछले कुछ सालों में हमारी सरकारों ने इस ओर ध्यान ज़रूर दिया है, लेकिन उनकी दोषपूर्ण नीतियों, अगंभीर कोशिशों और नख से लेकर शिख तक व्याप्त अप्रतिम भ्रष्टाचार की वजह से अबतक कोई भी सकारत्मक परिणाम धरातल पर नहीं आ पाए हैं. सरकार की भारी सब्सिडी आधारित तमाम लाभकारी घोषणाओं-योजनाओं के बावजूद गाँवों से युवाओं का शहरों और सरकारी नौकरियों की ओर पलायन जारी है.
डेयरी एक ऐसा क्षेत्र है जिसके उत्थान से गाँवों की तस्वीर और तकदीर दोनों बदली जा सकती है। भारत सरकार ने 1970  से शुरू हुई दुग्ध क्रांति के बाद डेयरी को ज़रूर उद्योग के तौर पर देखना शुरू किया, लेकिन उसकी दृष्टि, नीतियाँ और कोशिशें दूध और दूध आधारित व्यवसाय तक ही सीमित रहीं. यही वजह है कि आज भारत की गिनती दुनिया के सबसे बड़े दुग्ध उत्पादक देश में होने और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर डेयरी उत्पादों के योगदान की अगुआई करने के बावजूद भारत की अर्थव्यवस्था में डेयरी का जितना योगदान होना चाहिए था, नहीं है.
दुग्ध उत्पादों के वृहत बाज़ार को देखते हुए भारत का डेयरी उद्योग दूध का अधिक से अधिक दूध उत्पादन चाहता है. लिहाजा पशुपालन के क्षेत्र में देशी गायों की तुलना में ज्यादा दूध देनेवाली विदेशी नस्ल की गायों को मह्त्व दिया जा रहा है. विदेशी नस्ल की ये गाएँ दूध देने में ज़रूर बाज़ी मार लेती हैं, मगर दूध की गुणवता में पिछड़ जाती हैं. गोबर और मूत्र के मामले में विदेशी नस्ल की ये गाएँ अलाभकारी होती हैं. इनके गोबर बदबूदार होते हैं, घर आँगन को इस गोबर से लीपकर शुद्ध नहीं किया जा सकता. मिट्टी की उर्वरा क्षमता बढ़ाने के मामले में भी विदेशी नस्ल की गायों के गोबर देशी गायों के गोबर की तुलना में कमतर हैं. इन सब के अलावा विदेशी नस्ल की इन गायों का सर्वाधिक निराशाजनक पहलू यह है कि इनके नर बच्चे न तो किसानों के काम आने लायक होते हैं और न ही बोझ ढोने के लिए बैलगाड़ी में जोते जाने लायक. इसलिए इन बछड़ों का बाज़ार मूल्य देशी गायों के बछड़ों की तुलना में नगण्य होता है. ऎसे में विदेशी गायों के ये बछड़े माँस के लिए बूचड़खानों में कटने को अभिशप्त होते हैं. वास्तव में यह कितना अमानवीय है कि जिनके दूध से हम अपनी सेहत और अर्थव्यवस्था सुधार रहे हैं, उन्हीं के बच्चों को क़त्लखानों में निर्ममता से काट रहे हैं!
जबकि देशी गायों से दूध भले ही कुछ किलो कम मिलता हो, लेकिन उसके बछड़ों से लेकर गोबर और मूत्र तक हमारे लिए उपयोगी और कीमती हैं. इनके गोबर और मूत्र का खाद व कीटनाशक के तौर पर इस्तेमाल कर जैविक खेती के माध्यम से कृषि के क्षेत्र में भी कायाकल्प किया जा सकता है. लेकिन विडम्बना है कि गोबर और मूत्र से बनने वाली खाद और कीटनाशक की तरफ सरकार का ध्यान और प्रयास महज खानापूर्ति भर है. नहीं तो गायों से सिर्फ अधिक से अधिक दूध प्राप्त करने की दिशा में प्रयास नहीं किए जाते. ज्यादा दूध के फेर में जर्सी गायों को डेयरी के विकास के नाम पर जिस तरह से बढ़ावा दिया जा रहा है, वह चिंताजनक अदूरदर्शी सोच और नीतियों का परिणाम है. यह ठीक वैसा ही है, जैसा सूरज का इस्तेमाल हम सदियों सिर्फ दिन के उजाले के तौर पर करते रहे. आज सौर-ऊर्जा को लेकर जो वैश्विक दृष्टि बनी है, वह कितनी चमत्कारिक है, यह अब अलग से बताने की ज़रूरत नहीं है. ठीक उसी तरह, अगर हम दूध के अलावा गोबर और मूत्र के इस्तेमाल को लेकर अपनी दृष्टि विकसित कर लें, तो जैविक माध्यम से उत्तम खेती कर न सिर्फ अर्थव्यवस्था को शिखर तक सुधार सकते हैं बल्कि भूख और भोजन में मिले केमिकल्स व पेस्टिसाइड से होनेवाली बीमारियों से भी हम मुक्ति पा सकते हैं.

   


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