Saturday, 9 June 2012


महिलाओं के साथ पहला दिन

Dhananjay kumar

महिलाओं को स्वाबलंबी बनाने के क्रम में हमारे गाँव के तहत धनंजय कुमार ने सबसे पहले ‘महिलाओं के साथ संवाद’ के स्तर पर काम करना शुरू किया. लोकल रिसोर्स पर्सन पिन्नु ने इसके लिए 20 के करीब महिलाओं को इकट्ठा किया था. महिलाएँ तय समय पर एक घर के एक कमरे में जमा हो चुकी थीं. महिलाओं की उम्र 25 से लेकर 60 साल तक की थी. महिलाओं में संवाद को लेकर उत्सुकता थी, हाँ बात करने में झिझक और शर्म ज़रूर महसूस कर रही थीं. धनंजय कुमार सबसे पहले इस सभा में आने की वजह जाननी चाही, तो महिलाओं ने बतलाया कि कुछ रोजगार के बारे में बात होगी, हमको कुछ काम मिल सकता है, इस वजह से यहाँ आए हैं. धनंजय ने और स्पष्ट किया, काम यानी नौकरी? महिलाओं ने हाँ में जवाब दिया. इस धनंजय ने कहा कि वह नौकरी देने वाली किसी कंपनी या भारत सरकार के प्रतिनिधि नहीं हैं, जो नौकरी देंगे, बल्कि वह बिना किसी नौकरी के रोजगार उपलब्ध कराने में उनकी मदद करने आए हैं.फिर पूछा कि अभी क्या काम करते हैं? सभी महिलाओं ने कहा कि अभी तो अपने घर-परिवार का ही काम करते हैं- खाना बनाना, पुरुषों-बच्चों के कपड़े धोना, बच्चों को तैयार करके स्कूल भेजना..आदि. बातचीत के दौरान यह पता चला कि सभी महिलाएँ निम्न मध्य वर्ग से हैं. पहले सबके परिवार वाले किसान थे, मगर लगातार टूटते संयुक्त परिवार की वजह से खेत बँटते-कम होते चले गए. ये सारी महिलाएँ अभी एकल परिवार में रह रही हैं. बहरहाल, अब इतने खेत नहीं रहे कि खेती से गुजारा हो सके, इस वजह से इन महिलाओं के पति छोटा-मोटा कोई बिजनेस या छोटी-मोटी कोई प्रायवेट नौकरी करते हैं. बहरहाल जब धनंजय कुमार ने यह पूछा कि आपलोगों को काम क्यों चाहिए, तो महिलाओं ने कहा कि एक तो घर के काम करने के बाद काफी समय खाली बच जाता है, उसका कुछ इस्तेमाल करना चाहते हैं, दूसरे कुछ काम करेंगे तो कुछ कमाई होगी. क्या पति की कमाई घर-खर्च में कम पड़ती हैं?  इसपर महिलाओं ने घर-खर्च में कमी की बात तो नहीं स्वीकारीं, मगर यह ज़रूर स्वीकारा कि स्वयं का कमाया पैसा उनका होगा,जिसे वह अपनी मर्जी से जैसे चाहें,जहाँ चाहें खर्च कर सकती हैं. यह पूछने पर कि किस तरह का काम करना चाहती हैं? ज्यादातर महिलाओं ने कहा कि वैसा कोई भी काम, जिसे घर में रहकर किया जा सकता है. घर में रहकर ही क्यों, घर से बाहर काम मिले तो क्यों नहीं? महिलाओं का झिझक भरा जवाब था कि घर के काम को देखते हुए वह काम कर सकते हैं इसलिए. दरअसल, यह महिलाएँ काम तो करना चाहती हैं, मगर बिना घर-परिवार को डिस्टर्व किए.इसमें छुपा भय पति का भी था.यह पूछने पर कि क्या पति को पता है कि आपलोग काम के लिए यहाँ जमा हुए हैं? महिलाओं ने कहा- ‘नहीं. यहाँ से जाने के बाद ज़रूर बताएँगे.’ महिलाओं से जब यह जानने की कोशिश की कि कौन-कौन काम कर सकती हैं? महिलाओं ने स्टीरियो सा जवाब दिया,’ सिलाई-बुनाई-कढ़ाई का काम, अचार-पापड़ आदि बनाने का काम. धनंजय कुमार ने कहा कि ये तो महिलाओं द्वारा किया जानेवाला टिपिकल-ट्रैडिशनल काम है, कोई ऎसा काम सोचिए, जो अलग हो, जिसमें कमाई और आगे बढ़ने के ज्यादा स्कोप हों. इन्हीं बातों के साथ सभा सम्पन्न हुई, और तय हुआ कि सप्ताह में दो दिन मिला जाए...मंगलवार और शनिवार को. आज शनिवार था, इसलिए अगली मीटिंग मंगलवार को तय हुई. सभा-स्थल भी बदल दिया गया.महारानी स्थान के बाहर चौराहे पर.       

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