Saturday, 9 June 2012


महिलाओं के साथ दूसरा दिन
Dhananjay Kumar

महिलाओं के साथ आज दूसरा दिन था. अबतक महिलाएँ सभा स्थल पर नहीं आई थीं. कुछ महिलाएँ दिखी तो, मगर काम-काज में व्यस्त थीं. जब उनकी नज़र मुझ पर पड़ी तो झेंप-सी गई, मतलब उनका उत्साह उफनने लगा. वह बाकी साथियों को जमा करने  में जुट गईं. थोड़ी ही देर में लगभग सभी महिलाएँ पहुँच चुकी थीं. महिलाओं ने कहा कि समय थोड़ा जल्दी रखा गया था, घर का काम अभी खत्म नहीं हुआ था. पहले दिन की तुलना में आज महिलाएँ काफी मुखर थीं.उनका आत्मविश्वास बढ़ा हुआ था. आज कुछ और महिलाएँ आईं थीं. जब रजिस्टर पर उपस्थित महिलाओं का नाम लिखा जाने लगा तो आज पहली बार आई महिलाओं ने भी अपना नाम लिखने को कहा. कुछ महिलाएँ जो नहीं आई थीं, उनका भी नाम लिखवाने लगीं.कि उन्हें भी रोजगार चाहिए. मैंने टोका, ‘ यह रोजगार देने के लिए नहीं लिखा जा रहा है, बल्कि उपस्थिति दर्ज करने के लिए लिखा जा रहा है. पहले दिन आईं महिलाओं ने भी उन्हें समझाया.
अब समय था संवाद को आगे बढ़ाने का. जब महिलाओं से यह पूछा कि पहले दिन जो बात हुई थी, क्या उसे अपने घर में पति के साथ शेअर किया. ज्यादातर महिलाओं ने पति के साथ इस सदर्भ में बात करने की बात बताई. और उनके पतियों की प्रतिक्रिया भी सकारत्मक थी. लेकिन कुछ महिलाओं ने तल्खी से कहा कि पति से क्यों बताएँ? वह हमें कब कुछ बताते हैं..? जब हम काम करेंगे तो उनको अपने आप पता चल जाएगा.
तो बात फिर आगे वहीं से शुरु हुई कि क्या काम करना है? महिलाओं ने कहा कि हमें जो समझ में आता था, उसी दिन बता दिया था, अब आप ही कुछ कहिए. धनंजय कुमार ने तब गौ-पालन का प्रस्ताव रखा. धनंजय कुमार ने हमारे गाँव के लक्ष्य को हासिल करने के ख्याल से विशेष रणनीति के तहत ‘गौ-पालन’ के कार्य को महिलाओं के समक्ष रखा था, ताकि इन महिलाओं को कृषि कार्य से प्रत्यक्ष नहीं तो अप्रत्यक्ष तौर पर ही सही, जोड़ा जा सके. मैंने महसूस किया ज्यादातर महिलाओं का चेहरा बुझ गया. पूछने पर कुछ ने कहा कि ज़गह की समस्या है, तो कुछ ने कहा कि बंधन हो जाएगा. गाय पालना एक आदमी के वश की बात नहीं है, दिनभर उसी में लगे रहना होगा. गायों के चारा के लिए घास गढ़ना भी हमारे लिए ठीक नहीं है. इस पर मैने और स्पष्ट किया कि न तो ज़गह की समस्या आएगी और न ही किसी को घास गढ़ना होगा, और न ही किसी को किसी तरह का बंधन होगा. महिलाओं की उत्सुकता जागी, ‘यह कैसे संभव है? मैंने कहा, अगर आप सब महिलाएँ ग्रुप बना लीजिए, एक हो जाइए. इस पर एक महिला बोली, ‘अच्छा तो स्वयं सहायता समूह बनाने के लिए कह रहे हैं...!’ मैंने कहा, नहीं, दूसरे की सहायता करने वाला ग्रुप. एक ऎसा ग्रुप जिसमें किसी एक की समस्या सिर्फ उसकी समस्या न रहे, बल्कि बाकी साथी भी उसकी समस्या को अपनी समस्या मानकर उसके समाधान में जुट जाएँ. मान लीजिए, आपका बीस साथियों का यह ग्रुप है, और इनमें से कोई एक साथी किसी समस्या से घिर जाए, तो उन्हें उस संकट के समय अकेला नहीं छोड़ देंगे, बल्कि बाकी उन्नीस साथी भी उनकी सहायता के लिए डट जाएँगी. महिलाओं को यह कुछ अजीब-सा लगा- हसुआ के बियाह में खुरपी के गीत जैसा. उनकी जिज्ञासा अबतक अनुत्तरित थी-गौ-पालन कैसे होगा? मैंने आगे रास्ता सुझाया-‘ समूह में गौ-पालन किया जाएगा. सबकी गाएँ एक गौशाले में रहेंगी,आपलोगों का यह समूह एक समिति का रूप ले लेगा. फिर एक कार्यकारिणी समिति चुनी जाएगी. समिति का सोसायटी एक्ट के तहत रजिस्ट्रेशन करा लिया जाएगा.आप सारे सदस्य जो व्यवस्था बनाएँगे, कार्यकारिणी समिति उस पूरी व्यवस्था को सँभालेगी. गायों की देखभाल के लिए दो लोग नियुक्त किए जाएँगे. अगर आप में से कोई काम करना चाहें तो वो कर सकती हैं, बदले में हर महीने वेतन मिलेगा. अन्यथा बाहर के लोगों को नियुक्त किया जाएगा. दूध, गोबर और गौमूत्र की बिक्री से जो आमदनी आएगी, वो समिति के बैंक खाते में जमा किया जाएगा, फिर सारे खर्चे काटकर जो रकम बचेगी, वह बराबर- बराबर सबके बैंक खाते में जमा करा दी जाएगी.जिस पर सिर्फ आपका अधिकार होगा.’ यह सब सुनने के बाद महिलाओं का सवाल आया कि गाएँ आएँगी कहाँ से? क्या गाय खरीदने के लिए सरकार पैसे देगी?’ मैंने कहा, सरकार भी सहायता करती है, लेकिन पहले आपलोग समूह बनाने और समूह में रहने का मन बना लीजिए, उसके बाद इस पर चर्चा करेंगे अगली मीटिंग में.         
 

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