देश विकास कर रहा है,यह ढोल बजा-बजाकर, तरह-तरह के आँकड़े दिखा बताए जा रहे हैं. बेशक आर्थिक आँकड़े सच हों. मगर यह भी एक कठोर सच्चाई है कि देश में गरीबी और गरीबों की संख्या कहीं अधिक बढ़ी है. विकास के इस स्वरूप ने विषमताएँ बढ़ाई हैं. मुट्ठी भर चालाक किस्म के लोग ज़रूर अमीर हुए हैं, किंतु बाहों से भी अधिक लोग गरीब हुए हैं-दरिद्रता की हद तक गरीब. दुखद यह है कि इस बढ़ते भौतिकवाद ने मानवीय संवेदनाएँ भी हमसे छीनी है. हमारी धंनलोलुपता असीमित बढ़ी है. संयुक्त परिवार के बाद अब एकल परिवार भी टूटन की ओर हैं. ये कैसा विकास है, जहाँ हम अंत में अकेले हुए जा रहे हैं!
गाँवों की हालत यह है कि युवा प्रतिभा और मजदूर दोनों शहरों की ओर पलायन कर गए हैं.बचे किसानों को अनिश्चितता ने और बुरी तरह दबोचा है. एक तरफ बाढ़ और सूखे की स्थिति ने उन्हें असहाय बनाया है, वहीं आधुनिक विकास ने उनके सामने मजदूरों की समस्या खड़ी कर दी है.खेती के लिए मजदूर नहीं मिलते, क्योंकि शहर जितनी नगद मजदूरी मजदूरों को देता है, बेचारे किसान नहीं दे सकते.लेकिन यह भी सच है कि ज्यादा पैसे के लालच में मजदूर शहर में नारकीय जीवन जी रहे हैं.लगभग सारे शहरों की स्थिति बिगड़ी है.पलायन की वजह से बढ़ी भीड़ ने शहर की खूबसूरती और चमक-दमक दोनों को ध्वस्त किया है. सड़कों पर जाम की स्थिति हो या नागरिक सुविधाओं की बात हो, हर जगह भीड़ ने कचरा किया है. भ्रष्टाचार को बढ़ाने में भी पलायन की ज़बरदस्त भूमिका रही है.
दूसरी तरफ गाँव प्रतिभा और मजदूरों की समस्या से त्रस्त है.गरीबों का रहना अब ग़ाँव में भी दूभर हो गया है,क्योंकि महँगाई समान अनुपात से बढ़ी है,लेकिन गाँव में कमाई के अवसर न्यूनतम हुए हैं.मजदूरों की कमी के चलते किसान बैल और हलवाहा की जगह ट्रैक्टर आदि से खेती करने को मजबूर हैं,जो कि नगदी की माँग करता है. और किसानों के पास कितनी नगदी होती है, यह बताना शर्मिदा करने जैसा होगा.
आधुनिक विकास ने गाँव को एक और तरीके से भी गरीब बनाया है-ग्रामीण विकास की सरकारी योजनाओं ने पैसों की जो 'बरसात' की है, उसने युवाओं को काहिल और भ्रष्ट बनाया है.गाँव में छूट गए लोग सरकारी धन की लूट में ज़ोर-शोर से लगे हैं. 20 साल का आदमी वृद्धा पेंशन ले रहा है.थोड़ा सा भी चालू-पुर्जा आदमी ठेकेदार बन जाने की जुगत में लगा है.कृषि के नाम पर मिल रहे अनुदानों की बंदरबाँट हो रही है.पंचायत के वार्ड मेंबर से लेकर बीडीओ साहब तक सरकारी लूट का लाभ उठा रहे हैं. और जो कमजोर हैं, मरने को अभिशप्त हैं.शहरों में भी और गाँवों में भी.
यह कैसा विकास है भाई???
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