छठ ठेंठ बिहारी लोकपर्व है, किंतु पिछले कुछ दशकों से इसकी पहचान राष्ट्रीय लोकपर्व के रूप में उभरी है. चूँकि बिहारियों की इस लोकपर्व में अद्भुत श्रद्धा और आस्था है, इसलिए रोटी-रोजगार के चक्कर में प्रवासी बनकर बिहारी जहाँ भी गए, छठ को अपने साथ लेते गए. आज स्थिति यह है कि पटना के गँगा तट से कहीं अधिक मुम्बई के अरब सागर तट और दिल्ली के यमुना तट पर छठ व्रतियों का मेला लगता है.
छठ की शुरुआत कब हुई, इसका कोई प्रामाणिक उल्लेख नहीं है. हाँ, पुराणों में इसकी चर्चा अवश्य है. इसमें सूर्य देवता की पूजा होती है और यह मुख्यतः पुत्र-प्राप्ति के लिए की जाती है. ज्योतिष की मानें, तो सूर्य आत्मा का कारक है और आत्मा की जन्म-मरण से मुक्ति के लिए पुत्र का होना अनिवार्य है. मान्यता यह है कि पितरों की आत्मा तभी तृप्त होती हैं अथवा मोक्ष मिलता है, जब मृत्यु के पश्चात पुत्र मुखाग्नि देता है और श्राद्ध करता है.
यहाँ पर यह जानना भी दिल्चस्प है कि छठ में पूजा सूर्य देवता की होती है, मगर “छठि मैया” संबोधित कर पूजा-अर्चना की जाती है.,सूर्य को दूध और जल का अर्घ्य दिया जाता है. इस सन्दर्भ में कथा कुछ इस तरह है कि एक स्त्री को विवाह के बाद कई सालों तक कोई पुत्र नहीं हुआ. ससुराल में सास-ननद ने “बाँझ” कहकर प्रताड़ित करना शुरू कर दिया. दुखों से मुक्ति के लिए उस स्त्री ने आत्मा के कारक देवता सूर्य की पूजा की. सूर्य के आशीर्वाद से वह गर्भवती हो गई, मगर सास-ननद की प्रताड़ना कम नहीं हुई. तब भगवान सूर्य ने स्वयं बूढ़ी स्त्री का वेश धरकर माँ की तरह उस स्त्री की सेवा की. प्रसव कराया. पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई. बूढ़ी स्त्री का रूप धारण किए सूर्य भगवान ने अपना परिचय “छठि मैया” के तौर पर दिया. तभी से सूर्य को छठि मैया के रूप में पूजा जाने लगा.
यह पर्व साल में दो बार मनाया जाता है- कार्तिक मास और चैत्र मास में. अधिकांश लोग कतिकी छठ करते हैं. मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से छठ का विधान शुरू हो जाता है. चतुर्थी के विधान को संजत या नहाय-खाय बोलते हैं. इस दिन व्रती स्नान कर लौकी और ओल की तरकारी, चने की दाल और अरवा चावल का भात पकाते-खाते हैं. पंचमी को लोहंडा या खड़णा होता है. इस दिन व्रती दिनभर के उपवास के बाद रात में पूजा का प्रसाद ग्रहण करते हैं. फिर वही प्रसाद घर के बाकी सदस्य और आमंत्रित मेहमान खाते हैं. षष्ठी को व्रती फिर उपवास रखते हैं. सूर्यास्त के समय घाट (समुद्र,नदी, तलाब आदि कोई भी स्वच्छ जलाशय का किनारा) पर जाकर सूर्य या कहें छठि मैया को सन्ध्या अर्घ्य देते हैं. अगले दिन यानी सप्तमी को सुबह का अर्घ्य देकर व्रती अपना निर्जला उपवास तोड़ते हैं. इस तरह सप्तमी को छठ-व्रत सम्पन्न होता है.
छठ को आमतौर पर लोग छठ-पूजा से संबोधित करते हैं. किंतु यह सिर्फ पूजा नहीं है,व्रत है. इसीलिए छठ को वास्तव में “छठव्रत” कहा गया है और छठ करनेवाले को व्रती. पुजारी या पुजारिन नहीं. व्रत शुद्धता का, पवित्रता का, समानता का, मानवीयता का और साक्षात भक्ति का. इस लोकपर्व में मन,आत्मा और व्यवहार तीनों की शुद्धि- निष्कलुषता ही मूल है. इसीलिए जाति-पाति,ऊँच-नीच और आडम्बरयुक्त धार्मिक कर्मकाण्डों से परे यह पर्व मनाया जाता है. अमीर हों या गरीब सभी एक ही घाट पर जमा हो सूर्य की पूजा करते हैं. उन्हें अर्घ्य देते है. पूजा के सामान और प्रसाद कच्चे बाँस के बने जिस डाला और सूप में रखकर व्रती घर से घाट पर ले जाते हैं, उस डाला या सूप को समाज की सबसे निम्न मानी जानेवाली जाति डोमजाति के लोग बनाते हैं. पूजा-विधान बिना किसी ब्राह्मण के स्वयं व्रती द्वारा किए जाते हैं. निश्चित रूप से ब्राह्मणवाद का इसमें खुला विरोध दर्ज है. परमात्मा से आत्मा के संवाद-सम्पर्क के लिए विभिन्न धर्मों के ब्राह्मणों, पादरियों और मुल्ला-मौलवियों ने जो दीवार खड़ी की है, छठव्रत उसे खारिज करता है और आत्मा को सीधे परमात्मा से जोड़ता है.
आज जबकि पूरी दुनिया में स्त्री-पुरुष की समानता की बात की जा रही है, छठ में स्त्री-पुरुष में कोई भेद नहीं है. सिर्फ स्त्री ही व्रत रखेगी, ऎसी कोई बाध्यता नहीं है, बल्कि पुरुष भी यह व्रत रखते हैं.
ऎसे में छठ पूरे मानव-जाति के लिए कितना प्रासंगिक और महत्वपूर्ण है यह समझा जाने योग्य है और यह जो छठ बिहार के लोकपर्व के रूप में देश-दुनिया में मशहूर हो रहा है, उसे पूरी मानव-जाति के पर्व के रूप में मनाने की आवश्यक्ता है.
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धनंजय कुमार


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