Friday, 14 October 2011

चाँद से बेहतर माँ


कभी लिखता, कभी मिटाता हूँ, शब्दों से चित्र बनाता हूँ,
ऎ माँ ! तुझे क्या झूठ कहूँ, तुझे चाँद से बेहतर पाता हूँ.

है याद मुझे वो लोरी माँ, तू चाँद के गीत सुनाती थी,
तेरी गोद में सपने बुनते-बुनते नींद मुझे आ जाती थी,
वही चाँद, मगर वो नींद नहीं, क्यों ठगा-ठगा रह जाता हूँ.
ऎ माँ, तुझे क्या झूठ कहूँ, तुझे चाँद से बेहतर पाता हूँ.

माँ ! ममता तेरी, क्षमता तेरी, दूध और भात, कटोरी तेरी,
माँ ! आँचल तेरा, लोरी तेरी, वो मीठी-मीठी थपकी तेरी,
झूठा श्रेय ले जाता था वो, आज समझ मैं पाता हूँ.
ऎ माँ !तुझे क्या झूठ कहूँ, तुझे चाँद से बेहतर पाता हूँ.

चाँद है अपना, झूठा सपना, संकट के पल टूटा सपना,
ये तो सुख का साथी है बस, दूर गगन का वासी है बस,
दुःख के पल बस माँ तुझको ही, अपने पास मैं पाता हूँ,
ऎ माँ ! तुझे क्या झूठ कहूँ, तुझे चाँद से बेहतर पाता हूँ.

परियों वाली सभी कहानी झूठी-झूठी लगती है,
एक कहानी तेरी बस माँ सच्ची- सच्ची लगती है,
भूल गया वो सारे किस्से, तुझको भूल न पाता हूँ,
ऎ माँ ! तुझे क्या झूठ कहूँ, तुझे चाँद से बेहतर पाता हूँ.

तेरा हक़ छीना है सबने, सपनेहों याकि हक़ीकत हो,
समझ गया अब राज सभी, क्योंकि माँ तुम एक औरत हो.
तू तो सबकी जननी है फिर, विवश तुझे क्यों पाता हूँ ?
ऎ माँ ! तुझे क्या झूठ कहूँ, तुझे चाँद से बेहतर पाता हूँ.

धनंजय कुमार

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