भारतीय किसानों के खिलाफ
साज़िशों का दौर जारी है.
मुम्बई के नवभारत टाईम्स में आज फिर एक रिपोर्ट छापी गई है कि किस तरह खाद्य-सामग्रियों की कीमतों के बढ़ने से मध्य वर्ग के लिए घर चलाना मुश्किल हो गया है. रिपोर्ट औद्योगिक चैम्बर एसोचैम के सर्वे को आधार बनाकर लिखी गई है. सर्वे में इस शहरी मध्य वर्ग के दुख का कुछ इस तरह खुलासा किया गया है कि किसान विलेन के तौर पर उभरकर सामने आते हैं.
मुम्बई के नवभारत टाईम्स में आज फिर एक रिपोर्ट छापी गई है कि किस तरह खाद्य-सामग्रियों की कीमतों के बढ़ने से मध्य वर्ग के लिए घर चलाना मुश्किल हो गया है. रिपोर्ट औद्योगिक चैम्बर एसोचैम के सर्वे को आधार बनाकर लिखी गई है. सर्वे में इस शहरी मध्य वर्ग के दुख का कुछ इस तरह खुलासा किया गया है कि किसान विलेन के तौर पर उभरकर सामने आते हैं.
एसोचैम ने यह सर्वे
जून-जुलाई महीने में देश के विभिन्न शहरों चेन्नै, अहमदाबाद, हैदराबाद, पुणे, चंडीगढ़,
देहरादून, बेंगलुरू और दिल्ली एनसीआर के उन रहिवासियों से बातचीत करके तैयार किया
है, जिनकी सेलेरी 35 से 50 हज़ार रुपए के बीच है. सर्वे में 88 प्रतिशत मिडिल क्लास
परिवारों का कहना है कि खाद्य सामग्रियों की कीमतों में वृद्धि होने से उनका
परिवार चलाना मुश्किल हो गया है. इसी सर्वे में यह भी ज़िक्र है कि लोन या मेडिकल
किश्त और इंकमटैक्स देने के बाद उनके पास 40 हज़ार की सेलेरी में से बमुश्किल 20
हज़ार रुपए हाथ में आते हैं. इसमें बिजली का बिल, रसोई गैस का भुगतान करने के बाद
बाकी पैसों से परिवार का गुजारा अब बहुत मुश्किल हो गया है.और इसका अहम कारण है
खाने-पीने की चीज़ों में 100 से 300 प्रतिशत की वृद्धि हुई है.
इस मध्यवर्ग के परिवारों का
घर, गाड़ी और बच्चों की पढ़ाई पर कितना खर्च होता है, सर्वे में इस बात का कहीं
विश्लेषण नहीं है. खाद्य पदार्थों की कीमतें मध्यवर्ग को मुश्किल में डालने तक बढ़
गई हैं,तो इसमें इन बढ़ी कीमतों के लिए कौन ज़िम्मेदार है और बढ़ी कीमतों से कौन अपना
घर भर रहा है, इस बात का भी कोई विश्लेषण नहीं है.
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| photo by Sanjeev Kumar |

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