शिक्षा हमारी मूलभूत ज़रूरत है. हम भौतिक जीवन जीना चाहें या आध्यात्मिक जीवन
शिक्षा हर राह पर हमारी चेतना को संवारती है. इसीलिए “हमारे गाँव” के तहत हमने सबसे पहले शिक्षा पर ही काम करना
शुरू किया. इसकी संकल्पना करते वक़्त हमारे पास पहला सवाल था - कैसी शिक्षा?
रोजगारोन्मुख बनाने वाली शिक्षा या समाजोन्मुखी बनाने वाली शिक्षा. आम ग्रामीण
जनमानस चाहती है, वैसी शिक्षा या भविष्य को सचमुच संवारे वैसी शिक्षा..? हमारे
बच्चों को अच्छी नौकरी करने लायक बनाए, वैसी शिक्षा या दुनिया में कहीं भी किसी भी
विषम परिस्थिति में मानवीय बने रहने लायक बनाए, वैसी शिक्षा..? तो हमने तय किया कि
शिक्षा वो जो गणित के जोड़-घटाव के साथ-साथ जीवन के जोड़-घटाव में भी हमारे बच्चों को
अव्वल बनाए !
फिर हमारे सामने प्रश्न उभरा-शिक्षा का माध्यम क्या हो? यानी शिक्षा का माध्यम
स्थानीय भाषा यानी हिन्दी हो या पूरी दुनिया की सम्पर्क भाषा बन चुकी अंग्रेजी
भाषा...? बहुत विचार कर हमने अंग्रेजी को ही माध्यम के तौर पर चुनना श्रेयस्कर
समझा. क्योंकि आम जनमानस में अंग्रेजी को लेकर बड़ा भय व्याप्त है. किसी तरह दो-चार
पंक्ति टूटी-फूटी अंग्रेजी बोलने वाला व्यक्ति भी पढ़ा-लिखा होने का रौब गाँठ लेता
है. हमने तय किया आम जनमानस के भय और अंग्रेजी बोलनेवाले के रौब को समाप्त करने की
आवश्यकता है.
गाँव तो छोड़िए मुम्बई-दिल्ली तक में हमने देखा है कि अँग्रेजी के नाम पर
टुच्चा-सा स्कूल भी किस तरह हम पर और हमारे बच्चों पर आर्थिक और मानसिक ज्यादतियाँ
करता है. हमारे स्वाभिमान पर तो आठों पहर नकेल कसे रहता है. हम हमेशा अपने बच्चों
के स्कूल से अपमानित किए जाने और निष्कासित कर दिए जाने से आक्रांत रहते हैं. इसी
भय के तहत हम भारी से भारी डोनेशन देने से लेकर स्कूल की ऊटपटांग माँगों-फरमाईशों
के सामने सजदा किए रहते हैं. ऎसा इसलिए कि हम यह आत्मसात किए बैठे हैं कि ये
अंग्रेजी स्कूल ही हमारे बच्चों के भविष्य का निर्माता हैं. यह सच है कि विद्यालय
हमारे बच्चों के भविष्य-निर्माण में महती भूमिका निभाते हैं...लेकिन अँग्रेजी के
नाम पर चलाए जा रहे ये संस्थान विद्यालय कहलाने योग्य भी हैं...? विद्यालय का पहला
कार्य है शिक्षार्थियों का चरित्र-निर्माण करना. उनमें मनुष्य होने के गुण भरना.
भारी डोनेशन की नींव पर खड़े ये स्कूल क्या चरित्र-निर्माण की बात कर सकने योग्य भी
हैं...?
अतः यह चिंता सर्वथा प्रासंगिक है कि शिक्षा के नाम पर अपने बच्चों को हम क्या
दे रहे हैं...? जबरिया डोनेशन के बल पर ली जा रही शिक्षा क्या कल्याणकारी होगी ?
“हमारे गाँव” के तहत हमने वैसी शिक्षा को मूर्तता प्रदान करने का स्वप्न देखा है, जो
शिक्षार्थी के साथ-साथ पूरी सृष्टि के लिए कल्याणकारी हो. 6 फरवरी 2013 को नालन्दा
जिले के बड़े और सुन्दर से बिन्द गाँव में “देवनन्दन पब्लिक स्कूल” की शुरूआत कर हमने इस दिशा में पहला कदम बढ़ाया
है. इसकी ओपनिंग पर हमने आम ग्रामीणों के साथ-साथ बिन्द प्रखण्ड विकास पदाधिकारी अशोक
कुमार जी को भी आमंत्रित किया, ताकि हमारी सरकार तक भी हमारा विचार पहुंचे.
“देवनन्दन पब्लिक स्कूल” में इस वर्ष नर्सरी से पहले क्लास तक की पढ़ाई
की व्यवस्था की गई है. आगे ज़रूरत के अनुसार क्लास बढ़ती चली जाएगी. बस ज़रूरत है
आपकी शुभकामनाओं की.
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| ‘देवनन्दन पब्लिक स्कूल’ बिन्द, नालन्दा |
”हमारे गाँव” के तहत शुरू किए गए ‘देवनन्दन पब्लिक स्कूल’ के
शुभारंभ के अवसर पर बिन्द प्रखण्ड विकास पदाधिकारी अशोक कुमार के साथ ‘हमारे गाँव’
के स्वप्न द्रष्टा व प्रयोगकर्त्ता धनंजय कुमार, शिक्षिका और विद्यार्थी.

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