'हमारे गाँव' विचार के तहत बिहार के नालन्दा ज़िला के बिन्द गाँव में शुरू किया देवनन्दन पब्लिक स्कूल निरंतर आगे बढ़ता जा रहा है. खुशी है कि स्कूल की तीनों टीचर्स अच्छा काम कर रही हैं. बच्चों की प्रोग्रेस किसी भी आगंतुक को लुभा ले रही है. शुद्ध हिन्दी भी नहीं बोल पाने वाले बच्चे अंग्रेजी सीख रहे हैं. पहली क्लास के बच्चे जो एडमिशन के वक़्त सही अल्फाबेट भी लिख - पढ़ नहीं पाते थे, अब इंग्लिश बुक की फ्लुएंट रीडिंग करने लगे हैं.
गाँव के बच्चों को आधुनिक भारत की धारा से जोड़ने के क्रम में मैंने 'हमारे गाँव' की संकल्पना में इंग्लिश मीडियम स्कूल की भूमिका को महत्वपूर्ण माना था. इसी के तहत देवनन्दन पब्लिक स्कूल की 2012 में स्थापना की गई. स्कूल शुरू करते वक़्त मुझे यह पता नहीं था कि टीचर ढूँढने में इतनी परेशानी आएगी. काफी मशक्कत के बाद भी मैं एक भी टीचर को अपने स्कूल से जोड़ नही पाया. कारण कोई भी टीचर शहर छोड़कर गाँव आने को तैयार नहीं हुआ. शहर से ज्यादा सेलरी देने को राज़ी होने के बाद भी.गाँव में जो टीचर मिल रहे थे, इंग्लिश में बिल्कुल साफ थे. अंदाज़ा लगाइए Fun को वह 'फुन' प्रोनाउंस करते थे. लिहाजा सत्र 2012-13 में स्कूल शुरू नहीं हो पाया.
मैं समझ नहीं पा रहा था क्या करूँ...मेरी सारी कोशिशें बेकार साबित हुईं. तब मैंने निर्णय लिया कि गाँव की ही लड़कियों को टीचर बनाऊँगा. मैंने दो लड़कियों सिम्पी और आरती को लगभग चार महीने लगातार पढ़ाया और इस लायक बनाया कि नर्सरी से क्लास वन तक के बच्चों को ठीक से पढ़ा सके. और सुखद रहा कि दोनों ने पूरे मनोयोग से मेरे मिशन में मेरा साथ दिया. वे दोनों बिहारशरीफ के एक कॉलेज से बीए की पढ़ाई भी कर रही हैं. और शुरुआत में जहाँ वह बात करने में भी कमज़ोर थीं आज आत्मविश्वास से भरी हैं और मेरी अनुपस्थिति में भी ठीक से स्कूल चला ले रहीं हैं. इस बीच दो और लड़कियों पर मेहनत की-ममता और पूजा. ममता बीए में पढ़ती हैं. हालाँकि चार-पाँच महीने ही साथ रह पाई. अभी व्ह किसी और स्कूल में पढ़ा रही है. जबकि पूजा अभी ग्यारहवीं की छात्रा है. वह अब भी रेग्यूलर खासकर नर्सरी के बच्चों को पढ़ा रही है.
अगले साल सेकंड और थर्ड भी शुरू करने की तैयारी में हूँ. नई टीचर की तलाश शुरू कर दी है, पता नहीं इतिहास दोहराता है या इस बार बाहर से टीचर लाने में कामयाब हो पाता हूँ. मैं दोनों स्थिति के लिए तैयार हूँ.
बच्चों को घर से स्कूल लाने में गाड़ी की समस्या भी बड़ी संगीन रही. लोगों में प्रोफेशनलिज़्म और समय की कीमत की समझ बिल्कुल अल्प है. इस वजह से आठ -दस बच्चे स्कूल से हट भी गए. खैर डेढ़ सौ रुपए प्रति बच्चे का नुकसान सहकर किसी तरह काफी जद्दोजहद के बाद गाड़ी को समय पर चलवाने में कामयाब हो पाया हूँ. अगले सत्र में गाड़ी की सही व्यवस्था करने की कोशिश में अभी से जुटा हूँ.
बहरहाल खुशी है कि हर महीने कुछ हज़ार रुपए का नुकसान ही सही गाँवके बच्चों को क्वालिटी एजुकेशन दे पाने की दिशा में सार्थक तरीके से बढ़ रहा हूँ.
गाँव के बच्चों को आधुनिक भारत की धारा से जोड़ने के क्रम में मैंने 'हमारे गाँव' की संकल्पना में इंग्लिश मीडियम स्कूल की भूमिका को महत्वपूर्ण माना था. इसी के तहत देवनन्दन पब्लिक स्कूल की 2012 में स्थापना की गई. स्कूल शुरू करते वक़्त मुझे यह पता नहीं था कि टीचर ढूँढने में इतनी परेशानी आएगी. काफी मशक्कत के बाद भी मैं एक भी टीचर को अपने स्कूल से जोड़ नही पाया. कारण कोई भी टीचर शहर छोड़कर गाँव आने को तैयार नहीं हुआ. शहर से ज्यादा सेलरी देने को राज़ी होने के बाद भी.गाँव में जो टीचर मिल रहे थे, इंग्लिश में बिल्कुल साफ थे. अंदाज़ा लगाइए Fun को वह 'फुन' प्रोनाउंस करते थे. लिहाजा सत्र 2012-13 में स्कूल शुरू नहीं हो पाया.
मैं समझ नहीं पा रहा था क्या करूँ...मेरी सारी कोशिशें बेकार साबित हुईं. तब मैंने निर्णय लिया कि गाँव की ही लड़कियों को टीचर बनाऊँगा. मैंने दो लड़कियों सिम्पी और आरती को लगभग चार महीने लगातार पढ़ाया और इस लायक बनाया कि नर्सरी से क्लास वन तक के बच्चों को ठीक से पढ़ा सके. और सुखद रहा कि दोनों ने पूरे मनोयोग से मेरे मिशन में मेरा साथ दिया. वे दोनों बिहारशरीफ के एक कॉलेज से बीए की पढ़ाई भी कर रही हैं. और शुरुआत में जहाँ वह बात करने में भी कमज़ोर थीं आज आत्मविश्वास से भरी हैं और मेरी अनुपस्थिति में भी ठीक से स्कूल चला ले रहीं हैं. इस बीच दो और लड़कियों पर मेहनत की-ममता और पूजा. ममता बीए में पढ़ती हैं. हालाँकि चार-पाँच महीने ही साथ रह पाई. अभी व्ह किसी और स्कूल में पढ़ा रही है. जबकि पूजा अभी ग्यारहवीं की छात्रा है. वह अब भी रेग्यूलर खासकर नर्सरी के बच्चों को पढ़ा रही है.
अगले साल सेकंड और थर्ड भी शुरू करने की तैयारी में हूँ. नई टीचर की तलाश शुरू कर दी है, पता नहीं इतिहास दोहराता है या इस बार बाहर से टीचर लाने में कामयाब हो पाता हूँ. मैं दोनों स्थिति के लिए तैयार हूँ.
बच्चों को घर से स्कूल लाने में गाड़ी की समस्या भी बड़ी संगीन रही. लोगों में प्रोफेशनलिज़्म और समय की कीमत की समझ बिल्कुल अल्प है. इस वजह से आठ -दस बच्चे स्कूल से हट भी गए. खैर डेढ़ सौ रुपए प्रति बच्चे का नुकसान सहकर किसी तरह काफी जद्दोजहद के बाद गाड़ी को समय पर चलवाने में कामयाब हो पाया हूँ. अगले सत्र में गाड़ी की सही व्यवस्था करने की कोशिश में अभी से जुटा हूँ.
बहरहाल खुशी है कि हर महीने कुछ हज़ार रुपए का नुकसान ही सही गाँवके बच्चों को क्वालिटी एजुकेशन दे पाने की दिशा में सार्थक तरीके से बढ़ रहा हूँ.


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