Monday, 14 April 2014

क्यों गाँवों की दुश्मन बनी हैं हमारी सरकारें


धनंजय कुमार  
इस बार के चुनावी घोषणापत्र में परंपरावादी राजनीतिक दल भारतीय जनता पार्टी ने भी सत्ता में आने पर देश में सौ नए शहर बसाने का वचन दिया है. यानी अब विशुद्ध भारतीय राजनीतिक सोच और दृष्टि रखनेवाले दल बीजेपी ने भी शहरों को ही भारत के विकास का मानक मान लिया है. शहरों को विकास की धुरी माननेवालों को बीजेपी का यह वचन विकासवादी और देश के विकास को नया आयाम देनेवाला लग सकता है, मगर क्या वाकई यह भारत को मजबूती देनेवाला है. ऎसे में यह प्रश्न लाजिमी है कि क्या गाँव की अवधारणा अब विकास विरोधी और अप्रासंगिक हो गई है? क्या हमारी अपनी सरकारें भी अब भारत की पहचान हमारे गाँव को खत्म करने की दिशा में योजनाएँ बनाएँगी?
भारत आदिकाल से कृषिप्रधान देश रहा, इसलिए भारत में गाँवों का महत्व ज्यादा रहा. इसी कारण देश के चिंतकों ने कहा कि भारत की आत्मा गाँव में बसती है. भारतीय आरंभ से गाँववादी सोच के रहे और उसी सोच के साथ विकास किया, भारत सोने की चिड़िया कहलाया.   शहरवादी सोच मूलत: यूरोपीय सोच है, जहाँ भूमि की कमी थी, और व्यापार और औद्योगिक क्रांति के दम पर ही तरक्की संभव हुई. जबकि भारत के संदर्भ में हमेशा यह उलट रही, यहाँ भूमि की कभी कमी नहीं रही. गाँव विकास की धुरी रहे. खुशहाल ज़िन्दगी गाँवों में और गाँवों के आसपास ही आबाद रही, इसलिए भारत में अंग्रेजों के आने से पहले तक भारत के गाँव लगातार फूलते-फलते और बढ़ते रहे. देश पर अंग्रेजों से पहले भी विदेशियों के आक्रमण होते रहे, इसकी मूल वजह भारत की संपन्नता थी, और यह संपन्नता गाँवों के दम पर बनी थी. विदेशी पहले लुटेरे के तौर पर भारत आते रहे, फिर स्थायी शासन की लालसा ने उन्हें यहीं बसने के लिए आकर्षित किया. चूँकि भारत की संपन्नता गाँवों की वजह से थी, इसलिए किसी भी विदेशी ने भारत के गाँव को नुकसान पहुँचाने की नहीं सोची. गाँवों को नष्ट करने की सबसे साजिश रची अंग्रेजों ने, क्योंकि अंग्रेज शहरी मानसिकता के लोग थे. इसलिए शुरुआत में तो उन्होंने गाँवों पर ध्यान नहीं दिया, लेकिन जब लगा कि गाँव ही इस देश की ताकत हैं, तो देश को गुलाम बनाने के लिए हमारे गाँवों को नष्ट करना अनिवार्य समझा और भूमि पर युगों-युगों से चले आ रहे किसानों के स्वामित्व को छीनकर देश में जमींदारी प्रथा लागू की. भारत में अंग्रेजों ने अपनी ज़रूरत के मुताबिक जो कुछ थोड़ा-बहुत विकास कार्य किया, वो शहरों में किया, जबकि हमारे गाँव का पूरी तरह दोहन और शोषण किया. जमींदारों के हाथों किसानों-मेहनतकशों को प्रताड़ित कराया, उनके स्वाभिमान को कुचलवाया, उनसे अपनी ज़रूरत के अनुसार खेती करवाया और अपनी इंडस्ट्री के लिए कच्चा माल हासिल किया, ताकि इग्लैंड की इंडस्ट्री में तैयार माल का लागत मूल्य न्यूनतम हो, दुनिया के बाज़ार में उसे अधिकतम मुनाफे पर बेचा सके और ब्रितानी उद्योगपतियों को तरक्की करने का भरपूर अवसर मिल सके.   
स्वतंत्र और मजबूत भारत के स्वप्नद्रष्टा महात्मा गाँधी इस बात को भली-भाँति समझते थे. इसलिए वह जानते थे कि गाँव की तरक्की के रास्ते ही भारत को तरक्की के शिखर पर पहुँचाया जा सकता है. इसलिए गाँव को लेकर उनमें बड़ी ही भावनात्मक और रचनात्मक दृष्टि थी. हमेशा उन्होंने गाँवों को उनके वास्तविक स्वरूप में देखा, इसलिए पंचायती राज की उन्होंने सदा हिमायत की. ग्राम पंचायतों को अधिकार संपन्न बनाने की हमेशा वकालत की. यह अलग बात रही कि महात्मा गाँधी को अपना आदर्श मानने वाले नेताओं ने गाँवों को गाँधी के स्वप्न का गाँव बनाने में कोई ठोस दिलचस्पी नहीं दिखाई. रस्मी दिलचस्पी के तौर पर गाँव और गाँव के लोगों को बेचारा समझ मदद करने का नियम ज़रूर बनाते रहे, मगर गाँव अंग्रेजों की गुलामी से पूर्व जिस तरह आत्मनिर्भर और खुशहाल थे, भारत के गाँव आत्मनिर्भरता और खुशहाली पुनः उसी तरह बहाल हो, ऎसी कोशिश किसी ने नहीं की.
आज देश को स्वतंत्र हुए 67 साल हो गए, मगर गाँवों की हालत लगातार खराब होती जा रही है. आधुनिक विकास के इस दौर में गाँव लगातार सिमटते या नष्ट होते जा रहे हैं. विकास के नाम पर गाँव को बिजली, सड़क, स्कूल जैसी सुविधाओं से लैस तो किया जा रहा है, मगर खेती और खेतों को नष्ट किया जा रहा है. किसानों से खेत छीनकर उन्हें भूमिहीन बनाया जा रहा है. मुआवजा के नाम पर सरकार किसानों को अपेक्षाकृत ऊँची कीमत तो देती है, मगर इसकी ओट में वह उनका पुश्तैनी रोजगार छीन ले रही है, उन्हें विस्थापन के लिए मजबूर कर दे रही है. इस तरह गाँव को सुविधासंपन्न करने के नाम पर गाँव की सामाजिक और आर्थिक संरचना के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है. बिना किसी समुचित विकास योजना और दृष्टि के गाँव को ऎसे शहर के रूप में बढ़ने दिया जा रहा है, जहाँ ग्रामीण विशेषताओं को तो पिछड़ापन समझ दुत्कारकर नष्ट किया जा रहा है, जबकि शहरी विसंगतियों को शहरीकरण के नाम पर आदरपूर्वक अपनाया जा रहा है. अब सवाल उभरता है क्या ऎसा कर हमारी सरकारें भारत को मजबूत कर रही हैं या उसे सामाजिक, आर्थिक और नैतिक पतन की ओर धकेल रही है?
अंग्रेजों की 200 साल की गुलामी ने भारत को सामाजिक, सांस्कृतिक, नैतिक, आर्थिक, वैचारिक हर दृष्टिकोण से जर्जर बनाया. किसी भी देश की तरक्की उसकी अपनी भौगोलिक, प्राकृतिक,  सामाजिक, सांस्कृतिक और वैचारिक स्थिति पर अबलंबित होती है. अमेरिका को चीन की तरह नहीं विकास के रास्ते दौड़ाया नहीं जा सकता, तो चीन को अमेरिका की तरह नहीं हाँका जा सकता है. आज दोनों देश तरक्की के शिखर पर हैं तो अपनी-अपनी विशेषताओं की वजह से न कि किसी और का विकास मॉडल नकलकर आगे बढ़ रहे हैं. भारत के सन्दर्भ में ऎसा नहीं हुआ. हमारे नेताओं-नौकरशाहों ने अपनी विशेषताओं को पहचानने में हर स्तर पर भूल की. हमारे नेताओं-नौकरशाहों ने भारत की विशेषताओं को जड़ता और पिछड़ापन माना, जबकि अंग्रेजी सभ्यता-संस्कृति को रोल मॉडल. नतीजा हुआ, आदिकाल से भारत की शक्ति के केंद्र रहे गाँव को संभावना विहीन और हेय भाव से देखा गया और गाँव पिछड़ापन और जड़ता के पर्याय बना दिए गए. गाँव हाशिए पर धकेल दिए गए.             
भारत के सन्दर्भ में गाँव की प्रासंगिकता को खत्म करना भारी भूल होगी. भारत विशाल देश है, मगर संसाधनों की तुलना में देश की जनसंख्या ज्यादा बड़ी है. यही कारण है कि हमारे मनीषियों-चिंतकों और पूर्वजों ने सादा जीवन उच्च विचार का हमें मंत्र दिया. धरती के संसाधनों को अधिक से अधिक भोगने के बजाय शांति और भाईचारे से जीवन निर्वाह की प्रेरणा दी. दूसरों पर शासन करने के बजाय स्वशासन की दृष्टि दी. सामाजिक जीवन सुखमय बीत सके, इसके लिए सह-अस्तित्व से अनुप्राणित ग्राम पंचायती व्यवस्था दी. शत्रुओं से बचने के लिए राजाओं का पोषण किया. भोजन से परे अपनी ज़रूरत की चीजों के लिए अपने ही बीच हुनरमंदों को अनुकूल वातावरण दिया. और भारत बिना किसी अन्य देश पर कब्जा किए, बिना किसी और की सम्पत्ति को लूटे सिर्फ अपनी मेहनत और अपनी जीवन दृष्टि के बल पर युगों-युगों तक संपन्न और आत्मनिर्भर रहा. विश्वगुरु और सोने की चिड़िया कहलाया. जब इतना सुन्दर विरासत हमारे पास है, फिर दुनिया की नकल करने की हमें क्या ज़रूरत है ?!
आज गरीब भारत के सन्दर्भ में भी गाँव हमारे लिए शहरों की तुलना में ज्यादा मुनासिब हैं. जीवन जीने के लिए ज़रूरी वस्तुएँ प्राकृतिक संसाधनों की सहज उपलब्धता की वजह से गाँव में आज भी न्यूनतम मूल्य पर उपलब्ध हो जाती हैं. जबकि शहरों में ज़रूरत के अनुसार साधन और सुविधाएँ कृत्रिम तरीके से बढ़ाई गईं. इस कारण शहर गाँव की तुलना में ज्यादा खर्चीले होते हैं. गाँव में प्रकृति के अनुसार जीवन चलता है, जबकि शहरों में प्रकृति के विपरीत चलने की जिद चलती है, और विसंगति के तौर पर पनपते हैं, अजनबीपन, आगे बढ़ने की अमानवीय होड़ और एकाकीपन.
भारतीय सभ्यता के विकास में शहरों का भी स्थान रहा, मगर मुख्य गाँव ही रहे. शहर शासन और व्यापार का केंद्र रहे, जबकि गाँव उत्पादन का. उत्पादन में निश्चित तौर पर ज्यादा लोगों की ज़रूरत पड़ती है, जबकि बाज़ार में कम लोगों की. यानी गाँव की समृद्धता पर शहर की चमक संभव है. भारत आरंभ से ही एक विशाल देश रहा. विशाल देश होने की वजह से इसकी आबादी भी सदा विशाल रही और मूलभूत ज़रूरतें भी. और यह ज़रूरतें बिना गाँव के कतई संभव नहीं थी. आरंभ से ही भोजन मनुष्य की पहली और सबसे महत्वपूर्ण ज़रूरत रही. नित आधुनिकता और तरक्की के नए आयाम गढ़ते, सोपान चढ़ते विश्व में भी भूख दुनिया की सबसे बड़ी समस्या है. करोड़ों लोग भुखमरी के शिकार हैं. हम आरंभ से ही दुनिया के सबसे बड़े कृषि प्रधान देश रहे, मगर भुखमरी आज भी भारत की प्रमुख समस्या में से एक है, और नागरिकों को दो वक़्त का पेट भरने भर सामान्य भोजन देने के लिए भी कानून बनाना पड़ता है. और करोड़ों करोड़ लोग कुपोषण के शिकार हैं. मतलब उन्हें स्वस्थ शरीर की ज़रूरत भर भी भोजन नहीं मिल पाता. यह स्थिति तब है, जब देश की आधी से अधिक आबादी गाँवों में रहती है और कृषि पर आश्रित है. यानी सभी नागरिकों को पौष्टिक आहार देने के लिए और अधिक मात्रा में खाद्य पदार्थ के उत्पादन की आवश्यकता है. जबकि लगातार दुर्बल होती किसानों की स्थिति किसानों और उनके परिवारों को खेती से दूर करने को बाध्य करती जा रही है. खेती पर किसानों की निर्भरता लगातार कष्दप्रद और कम होती जा रही है. किसान के बेटे किसानी छोड़ चाकरी करने और छोटे-मोटे रोजगार करने को मजबूर हैं. वह गाँव और खेत छोड़कर लगातार पलायन कर रहे हैं. इस वजह भारत की कुल आय में कृषि का आनुपातिक योगदान कम हुआ है और आगे भी लगातार कम होता जा रहा है. सरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक कृषि का उत्पादन कई वजहों से ज़रूर बढ़ा है, मगर आर्थिक और सामाजिक दृष्टिकोण से न तो यह पर्याप्त है और न ही मुँह ढँककर सोने लायक है. ऎसे में गाँवों का महत्व और बढ़ जाता है. विकास की अंधी दौड़ में दौड़ने के बजाय हमें ठहर कर सोचने की ज़रूरत है कि हम गलत क्या गलत कर रहे हैं और क्या सही? गाँवों को शहरों में तब्दील करना भारत के हित में कतई नहीं है.       




    

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