Wednesday, 21 May 2014

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और हमारे गाँव

नरेन्द्र मोदी से नई और ऊँची अपेक्षाएँ सिर्फ इसलिए नहीं है कि वह भारत के नए प्रधानमंत्री हैं, बल्कि उनसे आम भारतवासियों की अपेक्षाएँ इसलिए भी अधिकतम है कि उन्होंने बतौर मुख्यमंत्री गुजरात का विकास कर दिखाया है और अपने चुनावी भाषणों के दौरान पूरे देश को यह भरोसा दिलाया है कि गुड गवर्नेंस कर जिस तरह गुजरात में उल्लेखनीय विकास किया है, वैसी ही विकास गंगा वह पूरे भारत में बहाएँगे.
हमारे गाँव को नरेन्द्र मोदी से बड़ी अपेक्षाएँ है. गाँव हमारे देश भारतवर्ष की पहचान हैं. हमारी संस्कृति, हमारी दृष्टि, हमारा विवेक, हमारी आकांक्षाएँ और वसुधैव कुटुम्बकम् का हमारा अद्भुत मानवीय विचार हमारे गाँव से ही अनुप्राणित हैं. हमारे पर्व-त्योहारों, शादी-ब्याहअन्य रीति रिवाजों और उत्सवों की आधार भूमि हमारे गाँव ही हैं. कहते हैं कि अगर किसी को खत्म करना है तो उसकी संस्कृति को खत्म कर दो, बिना किसी युद्द के वह स्वतः खत्म हो जाएगा. सदियों की गुलामी की वजह से हमारी संस्कृति पर लगातार विदेशी हमले होते रहे. फिर भी हमारी संस्कृति बची रही, तो इसलिए कि हमारी जड़ें गहरे तौर पर हमारे गाँव की मिट्टी में जमी हैं. मगर दुखद यह रहा कि आजादी के बाद भी भारतीय संस्कृति के गढ़ गाँव को मजबूत करने का काम नहीं हुआ. वैश्वीकरण और आर्थिक उदारीकरण के बाद गाँव की स्थिति और भी दयनीय हुई है. गाँव से प्रतिभा और युवा शक्ति दोनों का भारी पलायन हुआ. आज स्थिति यह है कि हर पढ़ा-लिखा छात्र और अनपढ़ मजदूर अपने सुनहरे भविष्य और रोटी-रोजगार के लिए गाँव छोड़ कर जा रहा है. हमारी सरकारें गाँव के विकास के नाम पर लंबे-चौड़े दावे करती हैं, मगर हकीकत बिल्कुल उलट है. गाँव में समस्याओं का जाल लगा है. सभ्य समाज की मूलभूत ज़रूरतों -शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार का घोर अभाव है. गाँव तक विकास पहुँचाने के नाम पर हर गाँव को सड़कों से जोड़ा तो जा रहा है, मगर उन सड़कों के रास्ते विकास आने के बजाय, शहरी अपसंस्कृति आ रही है. शहरों की झोपड़पट्टी संस्कृति गाँव में भी बस्ती की शक्ल में  अनगढ़ और बेतरतीव बढ़ती जा रही है. ग्राम पंचायतों को जो पैसे विकास के नाम पर भेजे जा रहे हैं, गाँव के बदमाश किस्म के लोगों और ब्लॉक के अधिकारियों-कर्मचारियों का सिंडिकेट जोंक की तरह उसे पीता जा रहा है.
तमाम सरकारी सहायता के बावजूद गाँव के लोग खेती से लगातार दूर होते जा रहे हैं. सभ्य समाज की मूलभूत सुविधाओं की कमी और खेती के घाटे का सौदा साबित हो चुकने के बाद गाँव पूरी तरह कंगाली की हालत में है. गाँव का पूरा सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक ताना-बाना लगभग पूरी तरह टूट चुका है. हमारा संयुक्त परिवार, हमारा सामाजिक कार्य-व्यवहार, हमारी पंचायती न्याय व्यवस्था, हमारी पारंपरिक खेती, पशु-पक्षियों के साथ हमारा सह अस्तित्व सब नष्ट होने के कगार पर हैं. क्या इनके बिना हम हजारों साल पुरानी अपनी भारतीय संस्कृति, जिस पर हर भारतीय को गर्व है, उसकी कल्पना हम कर सकते हैं ?
मोदी जी से हमारे गाँव को इसलिए भी अधिक अपेक्षा है कि मोदी उस पार्टी और विचार की पृष्ठभूमि से आए हैं, राष्ट्रवाद और भारतीय संस्कृति को प्रतिष्ठित करना जिसका मूल ध्येय है.        
गाँव को पुनर्स्थापित और पुनर्प्रतिष्ठित करने के लिए सरकार को सबसे पहले ढाँचागत स्तर पर काम करने की ज़रूरत है. गाँव में शिक्षा व्यवस्था बिल्कुल ही चौपट है. ज्यादातर गाँवों में प्राइमरी स्कूल भी नहीं है. हाइस्कूल की पढ़ाई के लिए बच्चों को पाँच से दस किलोमीटर की रोजाना यात्रा करनी पड़ती है, जाड़ा, गर्मी और बरसात तीनों मौसमों में छात्र-छात्राओं को हर साल जानलेवा मुसीबतों का सामना करना पड़ता है. कॉलेज की पढ़ाई के लिए प्रायः गाँव के विद्यार्थियों को अपने गाँव से 25 से 30 किलोमीटर (कहीं-कहीं तो इससे भी अधिक) अपने जिला मुख्यालयों तक आना पड़ता है. शहरों में किराए का कमरा लेकर रहना ज्यादातर विद्यार्थियों के माता-पिता की आर्थिक स्थिति इजाजत नहीं देती, ऎसे में प्रायः लड़कियों को आगे की पढ़ाई छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ता है.
स्वास्थ्य के क्षेत्र में तो स्थिति और भी बुरी है. पिछले कुछ सालों में प्राइमरी हेल्थ सेंटर की सुविधा पंचायत स्तर पर ज़रूर की गई है, मगर ज़रूरत के हिसाब से बेहद नाकाफी है. कह सकते हैं ऊँट के मुँह में जीरा. छोटे-मोटे ऑपरेशन के लिए भी ग्रामवासियों को सरकारी सुविधा के लिए राजधानी आना पड़ता है या अपने पास के शहरों के प्राइवेट अस्पताओं का आसरा लेना पड़ता है. जहाँ मरीजों के अटेंडेंट्स को नारकीय स्थिति भोगनी पड़ती है.
साफ-सफाई के मामले में भी हमारे गाँव की स्थिति बेहद बुरी है, ज्यादातर घरों में शौचालय नहीं है, और लोग सड़कों-अलंगों पर खुले में शौच करते हैं. नतीजा है हरी-भरी फसलों से भरे खेत तो सुन्दर दिखते हैं, मगर गाँव में प्रवेश के रास्ते से ही गंदगी का साम्राज्य शुरू हो जाता है. नालियों और गलियों की साफ-सफाई की कोई आधिकारिक व्यवस्था नहीं होने की वजह से घर का कूड़ा-कचरा और गंदा पानी रास्तों पर बिखरा रहता है.

लगातार बढ़ते शहरीकरण की वजह से भी गाँव की अस्मिता लगातार खतरे में है. इसके लिए भूमि अधिग्रहण कानून में यह सुधार की ज़रूरत है कि अधिग्रहण की स्थिति में किसानों को नगदी मुआवजा देने के बजाय खेत के बदले खेत का नियम बने. साथ ही यह आवश्यक किया जाय कि खेती की जमीन का एक निश्चित प्रतिशत ही विकास के लिए इस्तेमाल हो, बाकी पर खेती ही की जाय. ताकि उद्योगपति और व्यापारी के साथ-साथ किसान भी जिन्दा रहें और विकास में भागीदार बन सकें. 
धनंजय कुमार          

Monday, 14 April 2014

क्यों गाँवों की दुश्मन बनी हैं हमारी सरकारें


धनंजय कुमार  
इस बार के चुनावी घोषणापत्र में परंपरावादी राजनीतिक दल भारतीय जनता पार्टी ने भी सत्ता में आने पर देश में सौ नए शहर बसाने का वचन दिया है. यानी अब विशुद्ध भारतीय राजनीतिक सोच और दृष्टि रखनेवाले दल बीजेपी ने भी शहरों को ही भारत के विकास का मानक मान लिया है. शहरों को विकास की धुरी माननेवालों को बीजेपी का यह वचन विकासवादी और देश के विकास को नया आयाम देनेवाला लग सकता है, मगर क्या वाकई यह भारत को मजबूती देनेवाला है. ऎसे में यह प्रश्न लाजिमी है कि क्या गाँव की अवधारणा अब विकास विरोधी और अप्रासंगिक हो गई है? क्या हमारी अपनी सरकारें भी अब भारत की पहचान हमारे गाँव को खत्म करने की दिशा में योजनाएँ बनाएँगी?
भारत आदिकाल से कृषिप्रधान देश रहा, इसलिए भारत में गाँवों का महत्व ज्यादा रहा. इसी कारण देश के चिंतकों ने कहा कि भारत की आत्मा गाँव में बसती है. भारतीय आरंभ से गाँववादी सोच के रहे और उसी सोच के साथ विकास किया, भारत सोने की चिड़िया कहलाया.   शहरवादी सोच मूलत: यूरोपीय सोच है, जहाँ भूमि की कमी थी, और व्यापार और औद्योगिक क्रांति के दम पर ही तरक्की संभव हुई. जबकि भारत के संदर्भ में हमेशा यह उलट रही, यहाँ भूमि की कभी कमी नहीं रही. गाँव विकास की धुरी रहे. खुशहाल ज़िन्दगी गाँवों में और गाँवों के आसपास ही आबाद रही, इसलिए भारत में अंग्रेजों के आने से पहले तक भारत के गाँव लगातार फूलते-फलते और बढ़ते रहे. देश पर अंग्रेजों से पहले भी विदेशियों के आक्रमण होते रहे, इसकी मूल वजह भारत की संपन्नता थी, और यह संपन्नता गाँवों के दम पर बनी थी. विदेशी पहले लुटेरे के तौर पर भारत आते रहे, फिर स्थायी शासन की लालसा ने उन्हें यहीं बसने के लिए आकर्षित किया. चूँकि भारत की संपन्नता गाँवों की वजह से थी, इसलिए किसी भी विदेशी ने भारत के गाँव को नुकसान पहुँचाने की नहीं सोची. गाँवों को नष्ट करने की सबसे साजिश रची अंग्रेजों ने, क्योंकि अंग्रेज शहरी मानसिकता के लोग थे. इसलिए शुरुआत में तो उन्होंने गाँवों पर ध्यान नहीं दिया, लेकिन जब लगा कि गाँव ही इस देश की ताकत हैं, तो देश को गुलाम बनाने के लिए हमारे गाँवों को नष्ट करना अनिवार्य समझा और भूमि पर युगों-युगों से चले आ रहे किसानों के स्वामित्व को छीनकर देश में जमींदारी प्रथा लागू की. भारत में अंग्रेजों ने अपनी ज़रूरत के मुताबिक जो कुछ थोड़ा-बहुत विकास कार्य किया, वो शहरों में किया, जबकि हमारे गाँव का पूरी तरह दोहन और शोषण किया. जमींदारों के हाथों किसानों-मेहनतकशों को प्रताड़ित कराया, उनके स्वाभिमान को कुचलवाया, उनसे अपनी ज़रूरत के अनुसार खेती करवाया और अपनी इंडस्ट्री के लिए कच्चा माल हासिल किया, ताकि इग्लैंड की इंडस्ट्री में तैयार माल का लागत मूल्य न्यूनतम हो, दुनिया के बाज़ार में उसे अधिकतम मुनाफे पर बेचा सके और ब्रितानी उद्योगपतियों को तरक्की करने का भरपूर अवसर मिल सके.   
स्वतंत्र और मजबूत भारत के स्वप्नद्रष्टा महात्मा गाँधी इस बात को भली-भाँति समझते थे. इसलिए वह जानते थे कि गाँव की तरक्की के रास्ते ही भारत को तरक्की के शिखर पर पहुँचाया जा सकता है. इसलिए गाँव को लेकर उनमें बड़ी ही भावनात्मक और रचनात्मक दृष्टि थी. हमेशा उन्होंने गाँवों को उनके वास्तविक स्वरूप में देखा, इसलिए पंचायती राज की उन्होंने सदा हिमायत की. ग्राम पंचायतों को अधिकार संपन्न बनाने की हमेशा वकालत की. यह अलग बात रही कि महात्मा गाँधी को अपना आदर्श मानने वाले नेताओं ने गाँवों को गाँधी के स्वप्न का गाँव बनाने में कोई ठोस दिलचस्पी नहीं दिखाई. रस्मी दिलचस्पी के तौर पर गाँव और गाँव के लोगों को बेचारा समझ मदद करने का नियम ज़रूर बनाते रहे, मगर गाँव अंग्रेजों की गुलामी से पूर्व जिस तरह आत्मनिर्भर और खुशहाल थे, भारत के गाँव आत्मनिर्भरता और खुशहाली पुनः उसी तरह बहाल हो, ऎसी कोशिश किसी ने नहीं की.
आज देश को स्वतंत्र हुए 67 साल हो गए, मगर गाँवों की हालत लगातार खराब होती जा रही है. आधुनिक विकास के इस दौर में गाँव लगातार सिमटते या नष्ट होते जा रहे हैं. विकास के नाम पर गाँव को बिजली, सड़क, स्कूल जैसी सुविधाओं से लैस तो किया जा रहा है, मगर खेती और खेतों को नष्ट किया जा रहा है. किसानों से खेत छीनकर उन्हें भूमिहीन बनाया जा रहा है. मुआवजा के नाम पर सरकार किसानों को अपेक्षाकृत ऊँची कीमत तो देती है, मगर इसकी ओट में वह उनका पुश्तैनी रोजगार छीन ले रही है, उन्हें विस्थापन के लिए मजबूर कर दे रही है. इस तरह गाँव को सुविधासंपन्न करने के नाम पर गाँव की सामाजिक और आर्थिक संरचना के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है. बिना किसी समुचित विकास योजना और दृष्टि के गाँव को ऎसे शहर के रूप में बढ़ने दिया जा रहा है, जहाँ ग्रामीण विशेषताओं को तो पिछड़ापन समझ दुत्कारकर नष्ट किया जा रहा है, जबकि शहरी विसंगतियों को शहरीकरण के नाम पर आदरपूर्वक अपनाया जा रहा है. अब सवाल उभरता है क्या ऎसा कर हमारी सरकारें भारत को मजबूत कर रही हैं या उसे सामाजिक, आर्थिक और नैतिक पतन की ओर धकेल रही है?
अंग्रेजों की 200 साल की गुलामी ने भारत को सामाजिक, सांस्कृतिक, नैतिक, आर्थिक, वैचारिक हर दृष्टिकोण से जर्जर बनाया. किसी भी देश की तरक्की उसकी अपनी भौगोलिक, प्राकृतिक,  सामाजिक, सांस्कृतिक और वैचारिक स्थिति पर अबलंबित होती है. अमेरिका को चीन की तरह नहीं विकास के रास्ते दौड़ाया नहीं जा सकता, तो चीन को अमेरिका की तरह नहीं हाँका जा सकता है. आज दोनों देश तरक्की के शिखर पर हैं तो अपनी-अपनी विशेषताओं की वजह से न कि किसी और का विकास मॉडल नकलकर आगे बढ़ रहे हैं. भारत के सन्दर्भ में ऎसा नहीं हुआ. हमारे नेताओं-नौकरशाहों ने अपनी विशेषताओं को पहचानने में हर स्तर पर भूल की. हमारे नेताओं-नौकरशाहों ने भारत की विशेषताओं को जड़ता और पिछड़ापन माना, जबकि अंग्रेजी सभ्यता-संस्कृति को रोल मॉडल. नतीजा हुआ, आदिकाल से भारत की शक्ति के केंद्र रहे गाँव को संभावना विहीन और हेय भाव से देखा गया और गाँव पिछड़ापन और जड़ता के पर्याय बना दिए गए. गाँव हाशिए पर धकेल दिए गए.             
भारत के सन्दर्भ में गाँव की प्रासंगिकता को खत्म करना भारी भूल होगी. भारत विशाल देश है, मगर संसाधनों की तुलना में देश की जनसंख्या ज्यादा बड़ी है. यही कारण है कि हमारे मनीषियों-चिंतकों और पूर्वजों ने सादा जीवन उच्च विचार का हमें मंत्र दिया. धरती के संसाधनों को अधिक से अधिक भोगने के बजाय शांति और भाईचारे से जीवन निर्वाह की प्रेरणा दी. दूसरों पर शासन करने के बजाय स्वशासन की दृष्टि दी. सामाजिक जीवन सुखमय बीत सके, इसके लिए सह-अस्तित्व से अनुप्राणित ग्राम पंचायती व्यवस्था दी. शत्रुओं से बचने के लिए राजाओं का पोषण किया. भोजन से परे अपनी ज़रूरत की चीजों के लिए अपने ही बीच हुनरमंदों को अनुकूल वातावरण दिया. और भारत बिना किसी अन्य देश पर कब्जा किए, बिना किसी और की सम्पत्ति को लूटे सिर्फ अपनी मेहनत और अपनी जीवन दृष्टि के बल पर युगों-युगों तक संपन्न और आत्मनिर्भर रहा. विश्वगुरु और सोने की चिड़िया कहलाया. जब इतना सुन्दर विरासत हमारे पास है, फिर दुनिया की नकल करने की हमें क्या ज़रूरत है ?!
आज गरीब भारत के सन्दर्भ में भी गाँव हमारे लिए शहरों की तुलना में ज्यादा मुनासिब हैं. जीवन जीने के लिए ज़रूरी वस्तुएँ प्राकृतिक संसाधनों की सहज उपलब्धता की वजह से गाँव में आज भी न्यूनतम मूल्य पर उपलब्ध हो जाती हैं. जबकि शहरों में ज़रूरत के अनुसार साधन और सुविधाएँ कृत्रिम तरीके से बढ़ाई गईं. इस कारण शहर गाँव की तुलना में ज्यादा खर्चीले होते हैं. गाँव में प्रकृति के अनुसार जीवन चलता है, जबकि शहरों में प्रकृति के विपरीत चलने की जिद चलती है, और विसंगति के तौर पर पनपते हैं, अजनबीपन, आगे बढ़ने की अमानवीय होड़ और एकाकीपन.
भारतीय सभ्यता के विकास में शहरों का भी स्थान रहा, मगर मुख्य गाँव ही रहे. शहर शासन और व्यापार का केंद्र रहे, जबकि गाँव उत्पादन का. उत्पादन में निश्चित तौर पर ज्यादा लोगों की ज़रूरत पड़ती है, जबकि बाज़ार में कम लोगों की. यानी गाँव की समृद्धता पर शहर की चमक संभव है. भारत आरंभ से ही एक विशाल देश रहा. विशाल देश होने की वजह से इसकी आबादी भी सदा विशाल रही और मूलभूत ज़रूरतें भी. और यह ज़रूरतें बिना गाँव के कतई संभव नहीं थी. आरंभ से ही भोजन मनुष्य की पहली और सबसे महत्वपूर्ण ज़रूरत रही. नित आधुनिकता और तरक्की के नए आयाम गढ़ते, सोपान चढ़ते विश्व में भी भूख दुनिया की सबसे बड़ी समस्या है. करोड़ों लोग भुखमरी के शिकार हैं. हम आरंभ से ही दुनिया के सबसे बड़े कृषि प्रधान देश रहे, मगर भुखमरी आज भी भारत की प्रमुख समस्या में से एक है, और नागरिकों को दो वक़्त का पेट भरने भर सामान्य भोजन देने के लिए भी कानून बनाना पड़ता है. और करोड़ों करोड़ लोग कुपोषण के शिकार हैं. मतलब उन्हें स्वस्थ शरीर की ज़रूरत भर भी भोजन नहीं मिल पाता. यह स्थिति तब है, जब देश की आधी से अधिक आबादी गाँवों में रहती है और कृषि पर आश्रित है. यानी सभी नागरिकों को पौष्टिक आहार देने के लिए और अधिक मात्रा में खाद्य पदार्थ के उत्पादन की आवश्यकता है. जबकि लगातार दुर्बल होती किसानों की स्थिति किसानों और उनके परिवारों को खेती से दूर करने को बाध्य करती जा रही है. खेती पर किसानों की निर्भरता लगातार कष्दप्रद और कम होती जा रही है. किसान के बेटे किसानी छोड़ चाकरी करने और छोटे-मोटे रोजगार करने को मजबूर हैं. वह गाँव और खेत छोड़कर लगातार पलायन कर रहे हैं. इस वजह भारत की कुल आय में कृषि का आनुपातिक योगदान कम हुआ है और आगे भी लगातार कम होता जा रहा है. सरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक कृषि का उत्पादन कई वजहों से ज़रूर बढ़ा है, मगर आर्थिक और सामाजिक दृष्टिकोण से न तो यह पर्याप्त है और न ही मुँह ढँककर सोने लायक है. ऎसे में गाँवों का महत्व और बढ़ जाता है. विकास की अंधी दौड़ में दौड़ने के बजाय हमें ठहर कर सोचने की ज़रूरत है कि हम गलत क्या गलत कर रहे हैं और क्या सही? गाँवों को शहरों में तब्दील करना भारत के हित में कतई नहीं है.       




    

Saturday, 12 April 2014

Devnandan Public School : कामयाब रहे हम

बिहार के नालन्दा जिला स्थित बिन्द गाँव में “हमारे गाँव” कॉंसेप्ट के तहत एजुकेशनल अवेयरनेस के लिए शुरू किए गए देवनन्दन पब्लिक स्कूल का पहला शैक्षणिक सत्र (2013-14) पूरा हुआ. यह स्कूल का पहला वर्ष था. पहले वर्ष कुल 36 बच्चों ने नामांकन कराया था. ज्यादातर बच्चे बड़ी उम्र के थे, अपनी क्लास से बड़े. जैसे नर्सरी के बच्चे की उम्र 3 साल के आसपास होनी चाहिए, मगर पाँच साल तक के बच्चे को भी नर्सरी में ही रखना पड़ा, क्योंकि उन्हें इंग्लिश का बिल्कुल ही ज्ञान नहीं था. हालाँकि वे बच्चे पास-पड़ोस के गाँव के ही किसी न किसी स्कूल में पढ़ने जाते थे. इसी वजह से हमने पहले वर्ष नर्सरी से स्टैंडर्ड वन तक की पढ़ाई शुरू की थी. क्लास से बड़ी उम्र के बच्चे को जूनियर से लेकर स्टैंडर्ड वन में जाँच परखकर रखा गया, और कोशिश की गई कि सभी बच्चे उम्र के अनुसार क्लास में आ जाएँ. सुखद यह रहा कि मेरे, टीचर्स और बच्चे के कलेक्टिव प्रयास से हमने तय लक्ष्य हासिल करने में हम कामयाब रहे. और हम गर्व से कह सकते हैं कि बच्चे क्लास के अनुसार लिखना-पढ़ना सीख गए हैं.
स्कूल के गाँव में होने की वजह से शुरूआती स्तर पर टीचर्स ढूँढने से लेकर गाड़ी की व्यवस्था करने तक में काफी मशक्कत करनी पड़ी. नौकरी की तलाश के लिए पढ़े-लिखे लोगों के शहर पलायन कर जाने की वजह स्थानीय इलाकों में अच्छा टीचर ढूँढना मुश्किल हुआ. शहर से टीचर लाना चाहा, तो टीचर गाँव की वजह से आने को तैयार नहीं हुए. फिर मैंने स्थानीय लड़कियाँ, जो गाँव में ही रहकर कॉलेज की पढ़ाई कर रही थीं, उनपर ध्यान फोकस किया. दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि बीए में पढ़ रही लड़कियों को भी इंग्लिश का सामान्य ज्ञान तक नहीं था. अल्फावेट से लेकर स्टोरी तक उन्हें पढ़ाना पड़ा. सुखद यह रहा कि उन लड़कियों ने मेहनत कर बहुत कम समय में बच्चों को पढ़ाने भर सीख लिया. ग्रामीण इलाका होने की वजह से लगभग पेरेंट्स अनपढ़ या कम पढ़े-लिखे हैं, इसलिए टीचर्स को ज्यादा स्ट्रेन लेना पड़ा. मगर बच्चों की प्रोग्रेस को देखकर पेरेंट्स खुश हैं. वे खुश हैं कि उनके बच्चे गाँव में रहकर शहरों जैसी पढ़ाई इंग्लिश मीडियम से कर रहे हैं.

दूसरे साल में प्रवेश के साथ ‘स्टैंडर्ड टू’ तक क्लास बढ़ा दी गई है. नए एडमिशंस हो रहे हैं. हालाँकि कई बच्चे स्कूल छोड़कर अपनी अलग-अलग वजहों से गये भी हैं, मगर नए बच्चों का आना जारी है. इस साल स्कूल ने अपनी गाड़ी लेने का विचार किया है, जो कि बहुत जल्द आ जाएगी.       

Thursday, 20 February 2014

हमारे गाँव और ग्राम पंचायतें-3

ग्राम पंचायतें और न्याय व्यवस्था
ग्राम पंचायतें सबको न्याय और समय पर न्याय देने-दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं. मगर अफसोस की बात यह है कि ग्रामपंचायतें इस पहलू पर भी बेहद कमजोर हैं, खाना-पूर्त्ति भर रह गई हैं. रोजगार और बेहतर जीवन की तलाश में पढ़े-लिखे ग्रामीणों के  शहर पलायन कर जाने की वजह से गाँव में न्याय और कानून को बेहतर तरीके से समझ पा सकनेवाले लोगों की बेशक कमी हो गई है, मगर गाँव के छोटे-मोटे झगड़ों और विवादों को सही पंचों के चयन से निबटाना बहुत मुश्किल नहीं है. लेकिन सरकार इस दिशा में भी उदासीन है. ग्रामीण मामलों में न्याय के लिए आरंभिक तौर पर ग्राम पंचायतों के पास जाना अनिवार्य होना चाहिए था, जबकि यह वैकल्पिक है. पुलिस और राजस्व कर्मचारियों को ग्राम पंचायतों के सहयोगी के तौर पर काम करना चाहिए था, मगर ऎसा नहीं है, वे न्याय के अलग और ज्यादा ऑथेंटिक संस्था के तौर पर गाँव में दखल रखते हैं. इस वजह से ग्राम पंचायतों में जाने की बजाय सीधा सरकारी अधिकारियों के पास चले जाते हैं. और ज्यादातर मामले वहीं के वहीं सुलझने के बजाय उलझकर न्यायालय तक पहुँच जाते हैं, जहाँ व्यवस्थागत संसाधनों और न्यायधीशों की कमी की वजह से और हज़ारों-लाखों केस सालों से लम्बित हैं. न्याय व्यवस्था के साथ-साथ आम आदमी का भी समय और धन व्यर्थ बर्बाद होता है.        
खाप पंचायत
ग्राम पंचायती व्यवस्था के बीच हमारे देश के कुछ हिस्सों में एक और तरह की पंचायत सदियों से अस्तित्व में हैं, जो खाप पंचायत के तौर पर जानी जाती है. इसका वजूद पश्चिमी उत्तरप्रदेश और हरियाणा के गाँवों में देखने को मिलता है. इस पंचायत का गठन पूर्वजों ने मूलतः गाँव की पारिवारिक-सामाजिक समस्याएँ सुलझाने के लिए किया था.
‘खाप’ दो शब्दों से मिलकर बना है- और आप‘. ख का अर्थ है आकाश और आप का अर्थ है जल, अर्थात ऐसा संगठन जो आकाश की तरह सर्वोपरि हो और पानी की तरह निर्मल और सब के लिए सुलभ एवं न्यायकारी हो.

पहले खाप पंचायतें सामाजिक समस्याओं एवं कुरीतियों के खिलाफ ऐतिहासिक निर्णय लेने बैठती थीं और अपने स्तर पर ही हर विवाद का निष्पक्ष एवं सर्वमान्य हल करके कानून की मदद किया करती थीं. हाल के वर्षों में भी इन पंचायतों ने दहेज लेने और देने वालों को बिरादरी से बाहर करने और छोटी बारात लाने जैसे फरमान जारी कर कई कुप्रथाओं को खत्म करने में भी रचनात्मक भूमिका निभाई है. मगर आजकल ये सब खाप पंचायतें एक गोत्र के लड़के-लड़की के प्रेम और विवाह के खिलाफ मौत तक का फरमान सुनाने को लेकर चर्चा में ज्यादा है. समय के अनुसार खाप पंचायतें बदल नहीं पाईं और आधुनिक समाज तथा उसकी  बदलती हुई विचारधाराओं के साथ सहज सामंजस्य बिठा नहीं पा रही है. संस्कृति के नाम पर वह पुरानी मान्याताओं को कट्टरता से नई पीढ़ी से मनवाने पर अड़ी है और इस क्रम में वह उन मूल्यों को भी ध्वस्त करने में भी नहीं हिचक रही, जो मूल्य भारतीय धर्म और संस्कृति के प्राण हैं. भारतीय धर्म और संस्कृति मूलतः बेहद उदार है, जो अपने अलावा अन्य विचारों और रीति रिवाजों को समाप्त कर देने के बजाय उन्हें भी सहर्ष साथ चलने देता है. यही वजह है कि एक ही हिन्दू संस्कृति के होने के बावजूद अलग-अलग समुदाय अलग-अलग रीति-रिवाजों को मानते हैं. कहीं एक गोत्र में भी विवाह गलत है, तो कहीं अपने निकट रिश्तेदारों में विवाह भी सहजता और खुशीपूर्वक होता है. और हमारा संविधान भी हमारी उसी संस्कृति को लेकर चल रहा है. हमारा संविधान देश के हर नागरिक को स्वतंत्र रूप से जीवन जीने का अधिकार देता है. खाप पंचायतों को संस्कृति का अन्धानुकरण करने की बजाय समय के अनुसार स्वयं में बदलाव लाकर समाज की उन्नति के लिए काम करना चाहिए. 

Wednesday, 19 February 2014

हमारे गाँव और ग्राम पंचायतें-2

स्वतंत्रता के बाद भी ग्राम पंचायतों को नहीं मिली स्वायत्तता

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद नवनिर्मित भारतीय सरकार ने ग्राम पंचायतों की प्राचीन परम्परा के महत्व को समझते हुए ग्राम पंचायतों को स्थानीय ग्रामीणों द्वारा मतों के आधार पर पंचों का चुनाव करने का अधिकार तो दिया, मगर कामकाज में सरकारी हस्तक्षेप बनाए रखा. लिहाजा पंचायतें अधिकार और संसाधनों के अभाव में प्राचीन प्रतिष्ठा हासिल नहीं कर सकीं और निष्प्रभावी ही बनी रहीं. ग्राम विकास के लिए बनी सारी कमिटियों ने सरकार को कमोवेश यही रिपोर्ट दी कि समुचित अधिकार और संसाधन नहीं होने की वजह से ग्राम पंचायतें अनुकूल लक्ष्य हासिल करने में अक्षम हैं. योजना आयोग द्वारा ग्रामीण क्षेत्र में विकास व गरीबी उन्मूलन से संबंधित प्रशासनिक व्यवस्था की समीक्षा के लिए 1985 में गठित जी. के. वी. राव समिति ने भी अपनी रिपोर्ट में कहा कि लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण की प्रक्रिया के प्रति सरकारों की उदासीनता की वजह से अधिकांश राज्यों में पंचायतें शक्ति, अधिकार और संसाधनों के अभाव में निष्प्रभावी होती जा रही हैं. मगर तमाम सिफारिशों के बावजूद सरकारें पंचायतों को अधिकार व संसाधन संपन्न बनाने के प्रति लापरवाह बनी रहीं. परिणामस्वरूप स्थानीय ग्रामीणों द्वारा ग्राम पंचायतों के प्रतिनिधियों के चुने जाने के बाद भी ग्राम सुधार और विकास में ग्राम पंचायतें कोई उल्लेखनीय परिवर्त्तन लाने में सफल नहीं हो सकीं.

90 के दशक में मिली ग्राम पंचायतों को आंशिक स्वायत्तता      
एल. एम. सिंघवी के नेतृत्व में गठित समिति की रिपोर्ट के आधार पर संसद ने 1992 में 73वें संविधान संशोधन विधेयक पास कर पंचायतों को संविधान की नौवीं सूची में शामिल किया। इसके तहत गाँववासियों के आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय के लिए पंचायतों को योजना बनाने और उसके निष्पादन के अधिकार दिए गए. अतिरिक्त व्यवस्था और उसके निर्बाध संचालन के लिए कर व अन्य शुल्क लगाने और वसूलने का अधिकार भी दिया गया. मगर ग्राम पंचायतों को पूरी स्वायत्तता नहीं दी गई. ग्राम पंचायतें ग्रामसभा की मदद से स्थानीय ज़रूरत के अनुसार योजना बनाने या उसकी प्राथमिकता तय करने को स्वतंत्र नहीं है. गाँव में लागू होने वाले कार्यक्रमों की रूपरेखा राजधानियों के वाताकुलित कमरे से बनकर आती है, जबकि उसे ग्रामसभा में तय किए जाने की ज़रूरत है. इससे शासन में ग्रामीणों की भागीदारी बढ़ेगी और लोकतंत्र मजबूत होगा. कार्यक्रमों के निष्पादन में सरकारी हस्तक्षेप को कम करके उसे पर्यवेक्षक के तौर पर सीमित करने की ज़रूरत है.
             
ग्रामपंचायत, सरकारी कार्यक्रम और भ्रष्टाचार
बावजूद इसके सरकार ने गाँवों के सुधार और विकास के लिए जितने सारे कार्यक्रम चला रखे हैं अगर सही तरह से क्रियान्वित हो जाएँ तो सचमुच गाँव की कायापलट हो सकती है, मगर ग्राम पंचायतों के प्रतिनिधि और सरकारी अधिकारी सुधार और विकास के सरकारी कार्यक्रमों में जोंक की तरह चिपक गए हैं. ग्राम पंचायतें भी उसी तरह भ्रष्ट हो गई हैं, जैसे बाकी सारी सरकारी व्यवस्थाएँ. ग्राम पंचायतों के प्रतिनिधि सरकार के सुधार और विकास के कार्यक्रमों के लिए भेजी गई धनराशि के एक बड़े हिस्से की बँदरबाँट कर लेते हैं. इसमें सरकारी अधिकारियों का शेयर भी तय रहता है और गाँव के सुधार और विकास के कार्यक्रम आधे-अधूरे और अनुपयोगी रह जाते हैं. भवन, गली, पुलिया, नाली, चापाकल आदि सभी की गुणवत्ता निम्नतर स्तर की होती है, जो कुछ दिनों-महीनों बाद खराब होने लगते हैं.
ग्रामीण सब जानते-देखते हुए भी चुप रह जाते हैं, क्योंकि विभिन्न सरकारी योजनाओं में हर ग्रामीण किसी न किसी तरह जायज या नाजायज लाभांवित हो रहा है. राशन दुकानों में मिलने वाले किरासन तेल से लेकर अनाज तक तो वृद्धा पेंशन से लेकर इन्दिरा आवास    और पोशाक-साइकिल लेने से लेकर छात्रवृति पाने के लिए बनाये जाने वाले आय प्रमाण तक, लगभग हर ग्रामीण भ्रष्ट रास्तों पर चलकर लाभ हथियाने में जुटा है. ऎसे में भ्रष्टाचार पर शिकायत करने का नैतिक साहस कोई कहाँ से लाए? जो लोग जायज तौर पर सरकारी योजनाओं के लाभ का हकदार होने के बाद भी सरकारी योजनाओं का लाभ उठा पाने से वंचित हैं, वे बेचारे निहायत ही कमजोर हैं. वह अपना जायज हिस्सा पाने के लिए आवाज उठाना तो चाहते हैं, मगर कहाँ और कैसे, नहीं मालूम. और क्या सरकारी धन की लूट के उत्सव की गूँज में कोई उनकी आवाज सुन भी पाएगा.
फिर ज्यादातर जनप्रतिनिधि बाहुबली और आपराधिक पृष्ठभूमि के होते हैं, इसलिए कोई इन भ्रष्ट प्रतिनिधियों से दुश्मनी नहीं लेना चाहता. और कोई दुश्मनी ले भी तो क्यों? खर्च हो रहा पैसा उनका अपना नहीं, सरकारी है, और न ही जो कुछ बन रहा है, उसका इस्तेमाल सिर्फ वही करनेवाले हैं, फिर जब कोई और किए जा रहे भ्रष्टाचार के खिलाफ बोलने को तैयार नहीं है, तो वह अकेला क्यों बोले? फिर कोई जोखिम लेकर शिकायत करता भी है तो जाँच अधिकारी ले-देकर मामले को रफा-दफा कर देते हैं.          
ग्राम पंचायतों के जनप्रतिनिधियों को भी भ्रष्ट बनाने में देश की दोषपूर्ण चुनावी व्यवस्था बड़ी भूमिका निभा रही है. चुनाव लड़ने और जीतने के खर्चे ग्रामपंचायतों के चुनाव में भी बढ़ते जा रहे हैं. विधायक और सांसद की तरह मुखिया, सरपंच और पंच के चुनाव में भी चुनाव प्रचार के नाम पर हजारों-लाखों रुपए खर्च करने के साथ- साथ वो तमाम हथकंडे अपनाए जाने लगे हैं, जो चुनाव जीतने के लिए आवश्यक हैं. चुनाव से एक या दो दिन पहले वोटरों को दारू पिलाने से लेकर नकदी रुपए तक बाँटे जाते हैं. ग्रामपंचायतों के कमजोर होने की एक और बड़ी वजह जातिवाद भी है, जिसकी वजह से मतदान के समय योग्य उम्मीदवार को चुनने की बजाय लोग अपनी जाति के बदमाश और भ्रष्ट उम्मीदवार को चुनना पसंद करते हैं. अब गलत तरीके से चुने गए प्रतिनिधि अच्छा और ईमानदार काम करेंगे, इसकी कल्पना ही बेकार है.
        
कमजोर ग्रामसभा
भ्रष्टाचार नियंत्रण में ग्रामसभा बेहद प्रभावी हो सकती थी, मगर, आजादी के बाद भी गाँव में कृषि, रोजगार और अन्य नागरिक सुविधाओं की स्थिति में यथोचित सुधार नहीं हो पाने की वजह से गाँव के किसानों के बेटे-बेटियों का पढ़-लिखकर भी गाँव नहीं लौट पाना और युवा मजदूरों का रोजगार के लिए शहर की ओर पलायन की वजह से गाँव में जागरूक और समझदार लोगों की कमी हो गई है. गाँव की आबादी में अब गरीबों और मजदूरों का ही बाहुल्य है. जो न तो पढ़े-लिखे हैं और न ही बाहुबल में उतने मजबूत कि गाँवों में सक्रिय बदमाशों और धूर्त्तों का मुकाबला कर सकें. ऎसे में बदमाश और धूर्त्त किस्म के लोगों की चाँदी हो गई है.

दुखद यह है कि सरकारी मशीनरी भी इस दिशा में पूरी तरह उदासीन है. शिकायत की जाँच कर दोषियों पर कार्रवाई का पारम्परिक तरीका लगभग फेल हो चुका है. यह महज खानापूर्त्ति भर बनकर रह गया है. इसलिए भ्रष्टाचार को रोकने और भ्रष्टाचारियों को पकड़ने का कोई नया और प्रभावी तंत्र ढूँढना होगा. ग्राम पंचायतों में सही प्रतिनिधियों की भागीदारी और पंचायतों का ठीक तरह से संचालन सरकारी ग्राम सुधार व विकास कार्यक्रमों के माध्यम से गाँवों की दशा को बहुत हद तक सुधार सकता है. ग्रामीणों को सरकारी कार्यक्रमों के प्रति जागरूक बनाकर ग्रामसभा को मजबूत कर भ्रष्ट और धूर्त्त जनप्रतिनिधियों तथा सरकारी कर्मचारियों-अधिकारियों पर नकेल कसी जा सकती है.

शेष आगे.... 

Tuesday, 18 February 2014

हमारे गाँव और ग्राम पंचायतें-1

ग्राम पंचायतें हमारे गाँव के सुधार और विकास में क्रांतिकारी और असाधारण भूमिका निभा सकती हैं. क्योंकि गाँव के सरोकार वहाँ रह रहे सभी ग्रामीणों से गहरे जुड़े हैं. हमारी ग्रामीण संरचना इस तरह की है कि परिवार और बिरादरी से अलग भी हर व्यक्ति के हित अहित आपस में गहरे और पारस्परिक तौर पर जुड़े हैं. भाषा, पहनावा, संस्कृति और विचार सब के एक से होने के कारण अलग-अलग घरों में रहकर भी सब आपस में भावनात्मक तौर पर एक दूसरे से जुड़े हैं. फिर वर्ण और जाति व्यवस्था के आधार पर बँटे सबके कार्य भी सबको एक दूसरों से जोड़ते हैं. फिर प्रकृति भी सबको एक सी प्रभावित करती है. बाढ़-सूखा, सर्दी-गर्मी सबपर एक सा असर डालते हैं. इसीलिए हमारे पूर्वजों ने ग्राम पंचायतों की अवधारणा पर गहरे काम किया. इतना गहरा कि चाणक्य जैसे कूटनीतिज्ञ ने ग्राम पंचायत को राजनीति की इकाई कहा.
जो सबसे कम शासन करे वही उत्तम सरकार मानी जाती है. हमारी ग्राम पंचायतें इसका सबसे बढ़िया उदाहरण है. राजनीतिक सत्ता का अर्थ है जन प्रतिनिधियों द्वारा उपलब्ध संसाधनों और उसके उपभोग का सही नियोजन कर सामूहिक जीवन को सरल और आनन्दमय बनाना. अगर सामाजिक जीवन इतना पूर्ण हो जाए कि व्यक्ति स्वयं ही स्वयं को नियमबद्ध कर ले तो फिर किसी पर सता की आवश्यकता ही नहीं रह जाती और न ही प्रतिनिधित्व के लिए संघर्ष रह जाता है. जैसे परिवार में प्रतिनिधित्व के सवाल पर कभी कोई मतभेद या किसी सदस्य का निजी स्वार्थ नहीं उभर पाता. परिवार का बड़ा या कोई अन्य योग्य सदस्य बिना किसी औपचारिक प्रक्रिया के परिवार का प्रतिनिधि यानी मुखिया बन जाता है. हरएक व्यक्ति स्वतंत्र भी होता है और जवाबदेह भी. परिवार में सत्ता होते हुए भी किसी सत्ता का अहसास नहीं होता. शायद इसी बुनियाद पर हमारे पूर्वजों ने पूरी वसुधा को अपना कुटुम्ब माना था और ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ का विचार गढ़ा था.
राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी राज्य की सत्ता को केन्द्रित और संगठित रूप में हिंसा का प्रतीक मानते थे. उनका सोचना था कि जाहिर तौर पर तो राजसत्ता शोषण को कम से कम करके लाभ पहुँचाती है, परंतु व्यक्तित्व, जो सब प्रकार की उन्नति की जड़ है, उसको नष्ट कर देती है. इसलिए वह राज्य के हाथों में सत्ता केन्द्रित न करके ट्रस्टीशिप की भावना का विस्तार करने का विचार रखते थे. जैसा कि हमारे संयुक्त परिवारों में देखने को मिलता है. इसी वजह से वह ग्राम पंचायतों को सबसे अधिक मजबूती दिलाना चाहते थे.   

पंचायत की अवधारणा
पंचायत की अवधारणा हमारे गाँव में प्राचीन काल से रही है. यह शब्द संस्कृत भाषा के पंचायतन् शब्द से बना है. पंचायतन यानी पाँच व्यक्तियों का समूह. मनुस्मृति के अनुसार गाँव के प्रधान को ग्रामिककहते थे. ग्रामिक गाँवों से कर वसूलने का कार्य करता था. मौर्यवंश के संस्थापक चन्द्रगुप्त मौर्य के राजनीतिक, आर्थिक और कूटनीतिक सलाहकार चाणक्य ने ग्राम को राजनीतिक इकाई के तौर पर वर्णित किया है. उस समय भी ग्राम के प्रधान को ‘ग्रामिक’ ही कहा जाता था, जिसे गाँव से जुड़े सारे राजनीतिक अधिकार प्राप्त थे. इतिहासकार बताते हैं कि भारत का स्वर्णिमकाल कहे जाने गुप्तकाल भी में ‘ग्राम’ शासन की सबसे छोटी इकाई था, जिसके प्रमुख को ‘ग्रामिक’ कहा जाता था. ग्रामिक ‘पंचमंडल’ यानी  पंचायत की सहायता से ग्राम का शासन चलाता था। पंचायत के सदस्य गाँव के वृद्ध होते थे. ग्रामिक और ग्राम पंचायत, ग्रामसभा के सहयोग से गाँव की समस्याओं को हल करते थे.  ग्रामपंचायत को युद्ध करने और सन्धि करने, इन दो अधिकारों को छोड़कर राज्य व शासन के शेष सभी अधिकार प्राप्त थे. 
ग्राम पंचायतों में शासन का हस्तक्षेप
ग्राम पंचायत में शासन का सीधा हस्तक्षेप शुरू हुआ मुस्लिम शासन काल से, जब  मुस्लिम शासकों ने गाँव पर अपना नियंत्रण रखने के लिए तीन अधिकारी बहाल किए- गाँव की देखभाल के लिए ‘मुकादम’, झगड़े निबटाने के लिए ‘चौधरी’ और राजस्व संबंधी कार्य के लिए ‘पटवारी’. मगर ग्राम पंचायत व्यवस्था भी चलती रही और गाँव आत्मनिर्भर बने रहे. मगर अंग्रेजों ने पूरी तरह से गाँव की व्यवस्था को अपने नियंत्रण में कर लिया. ग्रामपंचायतों को चलने तो दिया मगर उनके अधिकार सामाजिक जीवन और रीति-रिवाजों तक सीमित कर दिए. ग्राम पंचायतों से उसके राजनीतिक, आर्थिक और न्यायिक अधिकार पूरी तरह छीन लिए गए और गाँवों की स्वायत्तता खत्म कर दी. इस तरह, गाँव की व्यवस्था को सभी ग्रामवासियों के सहयोग से, जनतांत्रिक तरीके से चलाने की महान परंपरा ‘ग्राम पंचायत’ का लगभग अंत कर दिया गया.

किंतु स्वतंत्रता आन्दोलन के जोर पकड़ने के बाद अंग्रेजों को सत्ता के विकेन्द्रीकरण के लिए बाध्य होकर 1907 के विकेन्द्रीकरण संबन्धी शाही कमीशन की सिफारिश के बाद अंग्रेजी सरकार को ग्राम पंचायत की परम्परा को पुनर्स्थापित करना पड़ा. हालाँकि शासन ने ग्राम पंचायतों को फैसले लेने का अधिकार नाम मात्र का ही दिया. फिर 1919 में अंग्रेजी सरकार ने जब प्रांतीय सरकारों को स्वशासन के सीमित अधिकार दिये, तो पंचायत अधिनियम भी बनाए, और ग्राम पंचायतों को स्वास्थ्य, स्वच्छता और तालाबों आदि की देखभाल के साथ-साथ छोटे-मोटे मामलों में न्याय करने के अधिकार दिए. मगर इन पंचायतों का स्वरूप हमारी प्राचीन पंचायती व्यवस्था जैसा जनतांत्रिक और स्वायत्त नहीं था. पंच स्थानीय ग्रामीणों द्वारा चुने जाने के बजाय सरकार द्वारा मनोनीत किए जाते थे.
शेष अगले भाग में... 

Thursday, 13 February 2014

हमारे गाँव को सही शिक्षा की ज़रूरत

हमारे गाँव और शिक्षा
शिक्षा मनुष्य की बुनियादी ज़रूरत है. बिना शिक्षा के न तो सम्मानपूर्वक जीवन यापन किया जा सकता है और न ही जीवन का वास्तविक-आध्यात्मिक मूल्य ही समझा जा सकता है.  हमारे पूर्वज शिक्षा के महत्व को अच्छी तरह जानते थे, इसीलिए उन्होंने शिक्षा देनेवाले आचार्यों और गुरुओं को भगवान के तुल्य माना. गुरू की तुलना त्रिदेव- ब्रह्मा, विष्णु और महेश से की है. यानी गुरू ब्रह्मा की तरह जन्मदाता हैं, विष्णु की तरह पालनकर्त्ता हैं और  महेश की तरह शिष्य के मार्ग में आनेवाली बाधाओं के संहारक हैं. इस तरह गुरू साक्षात् परमब्रह्म हैं यानी गुरू ज्ञानमय परमात्मा हैं.
आरंभ में गुरुकुल शिक्षा के प्रमुख केन्द्र थे. जहाँ गुरु के सान्निध्य में विद्यार्थी गुरू-शिष्य परम्परा के तहत शिक्षा ग्रहण किया करते थे. इसके लिए विद्यार्थियों को घर का त्यागकर गुरू के साथ उनके आश्रमों में रहना पड़ता था. गुरुकुल का खर्च भिक्षाटन और गाँवों के सहयोग से चलता था. हमारे गाँवों ने यही परम्परा उच्च शिक्षा में भी कायम रखी. इतिहासकार बताते हैं कि उच्च शिक्षा के लिए भारत वर्ष के बाहर भी विख्यात नालन्दा विश्वविद्यालय का खर्च आसपास के दो सौ गाँवों की आय से चलता था. विद्यार्थियों को शिक्षा, आवास, भोजन आदि सभी सुविधाएं नि:शुल्क थीं. यह जानकर मन आत्मगौरव से भर जाता है कि उस समय हमारे गाँव इतने सबल और आत्मनिर्भर थे!
शिक्षा की हमारी इस महान परम्परा को मुस्लिम आक्रमणकारियों ने नष्ट कर दिया. और तबसे हम शिक्षा में पिछड़े तो पिछड़ते ही चले गए, क्योंकि उसके बाद हम लगातार गुलाम ही रहे. मुस्लिमों ने विश्वविद्यालय नष्ट किए और अंग्रेजी हुकूमत ने आधुनिक शिक्षा देने  के नाम पर हमारे गाँव में अबतक चल रहे गुरूकुलों को मृतप्राय बना दिया.         
स्वतंत्रता के बाद भी हमारे गाँव में शिक्षा की स्थिति सुधरी नहीं, बल्कि अब तो दिनोंदिन और भी दयनीय होती जा रही है. हालाँकि हमारी सरकार ने शिक्षा को बच्चों के मौलिक अधिकार में शामिल कर 6 साल से 14 साल तक के बच्चों की शिक्षा को आवश्यक कर दिया है, ताकि सभी बच्चे अनिवार्य तौर पर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त कर सकें और ज्ञान, कौशल और मूल्यों से लैस होकर भारत का प्रबुध्द नागरिक बन सकें. यह अधिनियम गाँव के बच्चों को शिक्षा देने का की दिशा में बेहतर सुधार कर सकता है. मगर अभीतक सरकार विर्द्यार्थियों को बेहतर शिक्षा देने की जगह वोटबैंक तैयार करने की संभावनाओं पर काम कर रही दिखती है. जीवन-मूल्य परक शिक्षा की क्या बात करें, गाँव के इन स्कूलों में जीवन यापन के लिए रोजगार पाने योग्य शिक्षा भी नहीं मिल पा रही है. हालाँकि गाँव के बच्चों को शिक्षा देने के लिए सरकार ने विद्यालयों की संख्या तो बढ़ाई है. 2012 एक सर्वे के अनुसार, ग्रामीण इलाकों के 6-14 साल के 96.5% बच्चों को स्कूल से जोड़ा जा चुका है. मगर यह डेटा सिर्फ हमारे नेताओं और शिक्षा अधिकारियों के खुश होने के लिए अच्छा है. वस्तुस्थित यह है कि ग्रामीण क्षेत्रों के इन स्कूलों के रजिस्टरों में जितने विद्यार्थियों की संख्या दर्ज है, उनका संबंध स्कूलों से मध्याह्ण भोजन, पोशाक और साइकिल लेने भर से है, पढ़ाई से नहीं. गुरू भी अब ज्ञानमय परमात्मा नहीं, अपना जीवन यापन करने के लिए सरकारी नौकरी करनेवाले शिक्षक बन गए हैं. अफसोस तो यह है कि हमारे गाँव के स्कूलों में ऎसे शिक्षकों की भी भारी कमी है.
दरअसल हुआ यह कि सारे बच्चों को शिक्षा देने की कवायद में विद्यालय तो बनते चले गए, मगर प्रशिक्षित शिक्षकों को उसी अनुपात में तैयार करने की दिशा में गुणात्मक कार्य नहीं किया गया. और पहले से विभिन्न स्कूलों में पदस्थापित प्रशिक्षित शिक्षकों को ही नए स्कूलों में स्थानांतरित कर दिया गया. इस तरह सभी स्कूलों में शिक्षकों की कमी हो गई. इसकी भरपाई राज्य सरकारों ने कॉंन्ट्रैक्ट बेसिस पर अप्रशिक्षित शिक्षकों की नियुक्ति कर करने की नीति बनाई. मगर, यह नीति भ्रष्टाचार को बढ़ाने वाली और अयोग्य शिक्षकों की भर्त्ती करनेवाली साबित हुई है. प्रशिक्षित शिक्षकों के अभाव और वास्तविक वेतन दे पाने में असमर्थ सरकारें शिक्षकों को तय मापदंडों पर परखकर नियुक्त करने के बजाय कॉन्ट्रैक्ट बेसिस और कम वेतन पर शिक्षकों को नियुक्त कर रही है. इस वजह से ये अप्रशिक्षित शिक्षक (अनट्रेंड टीचर) बच्चों को सही तरह से पढ़ाने में अक्षम तो हैं ही, कम वेतन पाने से असंतुष्ट भी. फिर मध्याहण भोजन, पोशाक और साइकिल वितरण की जिम्मेदारी भी सरकार ने इनपर लाद दी गई है. नतीजा है, शिक्षा के नाम पर सरकारें ज्यादा से ज्यादा बच्चों को स्कूल से जोड़ने की कामयाबी पर डेटा द्वारा तो अपनी पीठ थपथपा ले रही है, मगर शिक्षा और उसकी गुणवत्ता बिल्कुल ही चौपट हो गई है. स्थिति यह है कि दसवीं पास विद्यार्थी को भी किताब तक पढ़ना नहीं आता. ऎसी शिक्षा किस काम की?
शिक्षा की ऎसी दुर्गति के लिए सरकार की राजनीति से प्रेरित शिक्षानीति सर्वाधिक जिम्मेदार है. देश के 6 वर्ष से 14 वर्ष तक के हर बच्चे को स्कूल से जोड़ने की कवायद में सरकार ने शिक्षा का सत्यानाश कर दिया है. शिक्षा मद की राशि का एक बड़ा भाग मध्याह्ण भोजन, किताबें, पोशाक और साइकिल आदि बाँटने में खर्च कर दिया जा रहा है. शिक्षा के लिए ज़रूरी योग्य शिक्षक और शिक्षण समय उपेक्षित रह जाता है.
यह सच है कि गाँव में स्कूलों से दूर सिर्फ उनके ही बच्चे हैं, जो गरीब हैं और जिनको अपने बच्चे को स्कूल भेजने से ज्यादा लाभदायक दिखता है, बच्चों को काम पर भेजना या अपने साथ काम करवाना. गाँवों में इनकी संख्या अधिकतम हैं. सरकार की मध्याह्ण भोजन, पोशाक और साइकिल आदि योजना ने इनके बच्चों को स्कूल से जोड़ा भी है. हालाँकि अब भी ढेर ऎसे बच्चे हैं, जो स्कूल नहीं जाते, वजह है उनके माता-पिता में शिक्षा के प्रति सही जागरूकता का अभाव और शिक्षा के नाम पर चलाई जा रही रस्मी शिक्षा से उनका मोहभंग.    सरकारी कवायद में चौपट हुई पढ़ाई व्यवस्था ने उन परिवारों को मायूस कर दिया, जो गाँव में रहकर थोड़ी-बहुत खेती और छोटा-मोटा व्यापार कर रहे हैं. वह शिक्षा के महत्व को समझते हैं और अपने बच्चे को अच्छी शिक्षा दिलाना चाहते हैं. इस वजह से अब गाँव में भी प्रायवेट स्कूलों का चलन शुरू हो गया है. हालाँकि उन स्कूलों में शिक्षा का स्तर बेहद खराब है, क्योंकि ठीक-ठाक पढ़े-लिखे युवा गाँव में न तो रहना चाहते हैं, न जाना चाहते हैं, क्योंकि उन्हें मालूम है कि गाँव में उनका भविष्य संवरने के बजाय चौपट ही होगा.         
गाँव के स्कूलों में शिक्षा का माध्यम क्या हो, इस पर भी सरकारें अबतक कंफ्यूज हैं. नौकरियों में अंग्रेजी माध्यम से पढ़े विद्यार्थियों की प्रधानता है, मगर हमारे गाँव के स्कूल अंग्रेजी माध्यम तो जाने छोड़िए, विषय के तौर पर पढ़ा पाने में भी फिसड्डी है. नतीजा है, पढ़ाई को लेकर गंभीर छात्र भी अंग्रेजी में कमजोर होने की वजह से आत्मविश्वास में कमी का शिकार शो जाते हैं, और शहरी छात्रों की तुलना में आत्महीनता से ग्रस्त हो जाते हैं. इस वजह से अच्छी नौकरियों में भी उन्हें अपेक्षित सफलता नहीं मिलती. और ज्यादातर छात्र डिग्री होल्डर होकर भी बेरोजगार रह जाते हैं, या फिर छोटी-मोटी नौकरी कर शिक्षा का लाभ उठाने से वंचित रह जाते हैं.
गाँव के विद्यार्थी दसवीं तक तो किसी तरह पढ़ ले रहे हैं, मगर कॉलेज की शिक्षा के लिए अभी भी वे शहरों पर ही आश्रित हैं. शहरों में किराये पर रूम लेकर रहना व अन्य ज़रूरतें पूरी करने में उन्हें हर महीने कमसेकम एक हज़ार रुपए की ज़रूरत पड़ती है. इनके माता-पिता जब प्राइमरी शिक्षा दिलाने में भी आर्थिक तौर पर असमर्थ हैं, तो अपने बच्चों को वे कॉलेज की शिक्षा कैसे दिला पाएँगे? इस विषय पर सरकार पूरी तरह मौन है. हमारी सरकारों को इस पर विचार करने की ज़रूरत है.
इनके लिए ब्लॉक स्तर पर कॉलेज खोले जाने की ज़रूरत है. सरकार के सामने यह एक मुश्किल टास्क है, क्योंकि इसके लिए काफी धन और योग्य शिक्षकों की आवश्यकता है. मगर सरकार यदि सबको शिक्षा परक रोजगार देना चाहती है, तब तो उसे यह करना ही पड़ेगा. प्राचीन काल में इसीलिए कई सारे रोजगार पारम्परिक घरेलु प्रशिक्षण पर आधारित होते थे, जिनमें बच्चे परिवारगत रोजगार परिवार के साथ काम करके सीख लेते थे. ऎसे कार्यों में कृषि से लेकर, मिट्टी व धातु के वर्तन बनाना, लोहे के सामान बनाना, लकड़ी के सामान बनाना, चमड़े के सामान बनाना, कपड़े बनाना आदि रोजगार शामिल थे. इनके अलावा सैलून,लॉड्री आदि सेवापरक रोजगार भी पारम्परिक तौर पर ही बच्चे सीख लेते थे. मगर जाति और वर्ण के नाम पर भेदभाव और घृणा ने इन पारम्परिक शिक्षण को बेमानी बना दिया. अब हर किसी के लिए स्कूल और कॉलेज की पढ़ाई अनिवार्य सी हो गई है. ऎसे में आवश्यक है कि सरकार गाँव के हर बच्चे के लिए कॉलेज में पढ़ाई की व्यवस्था करे. और जबतक सरकार ब्लॉक स्तर पर कॉलेज खोलने में स्वयं को असमर्थ पाती है, उसे वैकल्पिक व्यवस्थाओं पर विचार करना होगा.
यह व्यवस्था दो तरह की हो सकती है- एक, गाँव के विद्यार्थियों के शहर स्थित कॉलेज आने-जाने के लिए बस की मुफ्त सुविधा उपलब्ध कराए या दूसरी, शहर में ही उनके निवास के लिए हॉस्टल का प्रबन्ध करे. लड़कियों को कॉलेज की शिक्षा दिलाने में ये प्रबन्ध बेशक उल्लेखनीय सुधार करेंगे. अभी लड़कियों की पढ़ाई तो तकरीबन अधूरी ही रह जाती है. लड़कियाँ चाहकर भी आर्थिक और असुरक्षा कारणों से भी कॉलेज की शिक्षा हासिल नहीं पाती. गरीबों को शिक्षा देने की सरकारी कवायद इन व्यवस्थाओं के बाद ही अपनी पूर्णता हासिल कर पाएगी.
‘हमारे गाँव’ गाँव के विद्यार्थियों को कॉलेज स्तर की शिक्षा मिले, इसके लिए सरकार का सहयोग उसी प्रकार करेगा, जिस प्रकार नालन्दा विश्वविद्यालय को चलाने में 200 गाँव किया करते थे.